मत्तविलास प्रहसनम् (पल्लव नरेश महेन्द्रविक्रमवर्मा - कांचीपुरम सामाजिक व्यंग्य संस्कृत-हिन्दी सटीक)
Mattavilasa Prahasana of Mahendravarman I
पल्लव सम्राट् महेन्द्रविक्रमवर्मा (व्याख्या: रानी मजूमदार) द्वारा
पृष्ठ 73, कुल 100 में से
संदर्भ में पढ़ेंहिन्दी अनुवाद ६१
कपाली-ऐसा सोने का पात्र किसने बनाया ।
उन्मत्तक-भगवन् ! सुनहरे वर्ण वाले वस्त्र से (शरीर को) ढकने
वाले मेरे सुनार भगिनीपति ने बनाया है । इसलिए सोने का पात्र है (ऐसा)
कह रहा हूँ ।
शाक्यभिक्षु-क्या कह रहे हो ?
उन्मत्तक-सोने का पात्र ।
शाक्यभिक्षु-क्या यह पागल है ?
उन्मत्तक-'पागल' यह शब्द बार-बार सुनता हूँ । इसे (कपाल को)
लेकर (मुझे) पागल को दिखाओ । (कपाली को कपाल देता है )
कपाली-(कपाल को लेकर) यह तो अब दीवार से ओझल हो गया ।
जल्दी से पीछा करो ।
उन्मत्तक-मुझे प्रसन्नता हुई ।
(पागल तेजी से निकल जाता है )
शाक्यभिक्षु-अरे आश्चर्य है । मैं शत्रुपक्ष के लाभ से हर्षित हुआ ।
कपाली-(कपाल का आलिङ्गन करके)
मैंने बहुत समय तक अखण्ड तप किया है । भगवान् शिव में मेरी
भक्ति है । वह (पागल) तो अचानक सरलतापूर्वक ओझल हो गया, (किन्तु)
हमारे कुशल कपाल ! तुम आज दिखाई दे रहे हो ॥२१॥
देवसोमा-स्वामी ! चन्द्रमा के साथ आए हुए संध्याकाल के समान
आपको देखती हुई मेरी दृष्टि आज प्रफुल्लित हो रही है ।