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मत्तविलास प्रहसनम् (पल्लव नरेश महेन्द्रविक्रमवर्मा - कांचीपुरम सामाजिक व्यंग्य संस्कृत-हिन्दी सटीक)

मत्तविलास प्रहसनम् (पल्लव नरेश महेन्द्रविक्रमवर्मा - कांचीपुरम सामाजिक व्यंग्य संस्कृत-हिन्दी सटीक)

Mattavilasa Prahasana of Mahendravarman I

पल्लव सम्राट् महेन्द्रविक्रमवर्मा (व्याख्या: रानी मजूमदार) द्वारा

DevanagariHindipublished100 पृष्ठ

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पृष्ठ 71

हिन्दी अनुवाद ५६
उन्मत्तक - अब इसके पास जाता हूँ । (पास जाकर) महासज्जन
चण्डाल के कुत्ते से प्राप्त इस कपाल को भगवन् ग्रहण करें ।
पाशुपत—(दृष्टि तिरछी कर) उचित पात्र को दें ।
उन्मत्तक- महाब्राह्मण ! कृपा कीजिए ।
शाक्यभिक्षु-यह महापाशुपत इसके योग्य है ।
उन्मत्तक-(कपाली के पास जाकर कपाल को पृथ्वी पर रखकर,
प्रदक्षिणा करके, पैरों पर गिर कर) महादेव ! कृपा कीजिए । तुम्हारे लिए
यह अञ्जलि है ।
कपाली-हमारा कपाल !
देवसोमा—हां ।
कपाली-भगवान् की कृपा से फिर कपाली बन गया । (लेना
चाहता है )
उन्मत्तक-अरे दासी के पुत्र ! विष खा । (कपाल छीनकर जाने
लगता है)
कपाली-(पीछा करके) यह यमदूत मेरे प्राणों को ले रहा है । आप
दोनों इसे पकड़ें ।
दोनों-ठीकं है । हम दोनों तुम्हारे सहायक बनते हैं ।
(सब रोकते हैं )
कपाली-अरे ! ठहरो, ठहरो ।
उन्मत्तक-मुझे क्यों रोक रहे हो ।
कपाली-हमारे कपाल को देकर जाओ ।
उन्मत्तक-मूर्ख ! क्या देखता नहीं है, यह तो सोने का पात्र है ।