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मत्तविलास प्रहसनम् (पल्लव नरेश महेन्द्रविक्रमवर्मा - कांचीपुरम सामाजिक व्यंग्य संस्कृत-हिन्दी सटीक)

मत्तविलास प्रहसनम् (पल्लव नरेश महेन्द्रविक्रमवर्मा - कांचीपुरम सामाजिक व्यंग्य संस्कृत-हिन्दी सटीक)

Mattavilasa Prahasana of Mahendravarman I

पल्लव सम्राट् महेन्द्रविक्रमवर्मा (व्याख्या: रानी मजूमदार) द्वारा

DevanagariHindipublished100 पृष्ठ

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पृष्ठ 65

हिन्दी अनुवाद ५३
शाक्यभिक्षु—अरे ! ठीक है (माना कि) रंग तो मैंने बदल दिया ।
(परन्तु) इसका आकार और परिमाण किसने बदला ?
कपाली—आप लोग तो माया की ही सन्तान हैं !
शाक्यभिक्षु—कितनी देर तक आपकी निंदा करूँ भगवन् ! लीजिए ।
कपाली-वस्तुतः बुद्ध ने भी इस प्रकार दानपारमिता पूर्ण की थी ।
शाक्यभिक्षु—इसके बाद अब मेरी शरण कहाँ ?
कपाली—निस्संदेह बुद्धधर्म के सङ्घ ।
पाशुपत-इस विवाद का निर्णय करना मेरे लिए असम्भव है । तो
न्यायालय ही चलते हैं ।
देवसोमा-यदि ऐसा है तो कपाल को नमस्कार ।
पाशुपत-क्या मतलब ?
देवसोमा-फिर यह अनेक मठों से प्राप्त हुई धनराशि वाला, इच्छा-
नुसार न्यायालय के अधिकारियों के मुखों को (रिश्वत देकर) भर सकता है ।
लेकिन सर्प की केंचुली मात्र जिसकी सम्पत्ति है ऐसे दरिद्र कापालिक की
हम जैसी सेविकाओं के पास न्यायालय में प्रवेश के लिए कौन साधन है ?
पाशुपत-नहीं ऐसी बात नहीं है ।
सरल (स्तम्भ पक्ष में—सीधे) सारगर्भ के कारण गुरु बने हुए (पक्ष
में—भारी), धैर्यशाली (पक्ष में—ठोस), नम्र (पक्ष में-चिकने), सत्कुलोत्पन्न
(पक्ष में-अच्छी नस्ल वाले) उन साधुओं द्वारा धर्म वैसे ही धारण किया
जाता है, जैसे स्तम्भों से महल (धारण किया जाता है) ॥१५॥