मत्तविलास प्रहसनम् (पल्लव नरेश महेन्द्रविक्रमवर्मा - कांचीपुरम सामाजिक व्यंग्य संस्कृत-हिन्दी सटीक)
Mattavilasa Prahasana of Mahendravarman I
पल्लव सम्राट् महेन्द्रविक्रमवर्मा (व्याख्या: रानी मजूमदार) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंहिन्दी अनुवाद ४५
कपाली—'कैसा कपाल' कहता है ? अथवा यह ठीक ही है—
पृथ्वी, सागर, पर्वत आदि विशाल प्रत्यक्ष वस्तुओं को मोह के कारण
छिपाने वाले (बुद्ध) के पुत्र तुम छोटे से कपाल को छिपाने में कैसे समर्थ
नहीं हो ॥१३॥
देवसोमा—स्वामी ! केवल प्यार से नहीं देगा । इसलिए इसके
हाथ से छीन कर चलते हैं ।
कपाली—प्रिये ! ठीक है । (जबरदस्ती छीनता है )
शाक्यभिक्षु—दुष्ट कापालिक ! दूर हो जा । (हाथ से धकेलता
हुआ पैर से मारता है )
कपाली—अरे, मैं गिर पड़ा ।
देवसोमा—अरे दासी के पुत्र ! तू मर गया । (बालों को खींचने
का अभिनय करके आश्रय न पाकर गिर पड़ती है )
शाक्यभिक्षु—(अपने मन में) बुद्ध का विज्ञान ठीक है, जिन्होंने आज
मुण्डन (संस्कार) देखा । उपासिका ! उठो, उठो ।
(तब देवसोमा को उठाता है )
कपाली—माहेश्वरो ! देखें, देखें ! यह दुष्ट भिक्षुनामधारी
नागसेन मेरी प्रियतमा का पाणिग्रहण कर रहा है (हाथ पकड़ रहा है ) ।
शाक्यभिक्षु—अरे उपासक ! नहीं ऐसी बात नहीं है । आपत्ति में
पड़े हुए पर दया करना हमारा धर्म ही है ।
कपाली—क्या यह भी सर्वज्ञ (बुद्ध का) धर्म है । तो पहले मैं
गिरा हूँ । अच्छा रहने दे । इससे क्या ? अब तेरे सिर का कपाल मेरा
भिक्षा का कपाल (पात्र) होगा ।