मलूकदास जी की बानी (बेलवेडियर प्रेस, इलाहाबाद - ज्ञानपरोछी, साखी एवं अमर पद संग्रह)
Malukdas Ji Ki Bani: Belvedere Steam Printing Press Allahabad
सन्त मलूकदास (सम्पादक: बेलवेडियर प्रेस) द्वारा
१२ मलूकदासजी की बानी
झूठा नाता लोग लगावै । मन मेरे परतीत न आवै ॥४॥
जबहीं भेजे तबहिं बुलावै । हुकुम भया कोइ रहन न पावै ॥५॥
उलटत पलटत जग की अँचली१। जैसे फेरै पान तमोली ॥६॥
कहत मलूक रह्यो मोहिं घेरे । अब माया के जाउँ न नेरे ॥७॥
॥ शब्द ५ ॥
देखा सब जग ब्याकुल राम । नित उठि दग्धै क्रोध औ काम॥१॥
तुम तो प्रभु जी रहे छिपाय । पाँच मवासी दियो लगाय ॥२॥
एक घड़ी काहु कल ना देय । ज्ञान ध्यान आपुइ हरि लेय ॥३॥
देंह धरे का बड़ा जँजाल । जहँ तहँ फिरता गिरसे काल ॥४॥
आई अचानक करत घात । जिव लै भागत कहत बात ॥५॥
या पापी तें कोउ न बाच । नित उठि पेट नचावै नाच ॥६॥
या का उत्तर देवो मोहि । कैसे के कोउ मिलै तोहिं ॥७॥
जियत नरक है गर्भ बास । उपजत बिनसत बड़ी त्रास ॥८॥
कह मलूक यह बिनती मोरी । इन्हें छोड़ि बल जाऊँ तोरी ॥६॥
॥ शब्द ६ ॥
बाबा मुरदे मूँड़ उठाया ।
लागी अंग बाय दुनियाँ की, राम राय बिसराया ॥ १ ॥
आये पहिरि करम की बेड़ी, हाथ हाथ करि गाढ़ी ।
फूले फिरें जनु अमर भये हैं, प्रीति विषय सों बाढ़ी ॥ २ ॥
काहू के मन चार पाँच की, काहू के मन बीस ।
काहू के मन सात आठ की, सब बाँधे जगदीस ॥ ३ ॥
अब भये सौतिन२ हाथ केरे, घर बीघा३ सौ कीन्ह ।
मेरी मेरी कहि उमर गँवाई, कबहुँ राम ना चीन्ह ॥ ४ ॥
दिना चार के घोड़े सोड़े, दिना चार के हाथी ।
कहत मलूका दिना चार में, बिछुरि जायँगे साथी ॥ ५ ॥
(१) आँचल । (२) माया । (३) बिगहा ।
चेतावनी १३
॥ शब्द ७ ॥
मुवा सकल जग देखिया, मैं तो जियत न देखा कोय हो॥टेक॥
मुवा मुई को व्याहता रे, मुवा ब्याह करि देय ।
मुए बराते जात हैं, एक मुवा बधाई लेय हो ॥ १ ॥
मुवा मुए से लड़न को, मुवा जोर लै जाय ।
मुरदे मुरदे लड़ि मरे, एक मुरदा मन पछिताय हो ॥ २ ॥
अंत एक दिन मरौगे रे, गलि गुलि जैहै चाम ।
ऐसी झूठी देह तैं, काहैं लेव न साँचा नाम हो ॥ ३ ॥
मरने मरना भाँति है रे, जो मरि जानै कोय ।
राम दुआरे जो मरै, फिर बहुरि न मरना होय हो ॥ ४ ॥
इनकी यह गति जानिके, मैं जहँ तहँ फिरौं उदास ।
अजर अमर प्रभु पाइया, कहत मलूकादास हो ॥ ५ ॥
॥ शब्द ८ ॥
सोते सोते जन्म गँवाया ।
माया मोह में सानि पड़ो सो, राम नाम नहिं पाया ॥ १ ॥
मीठी नींद सोये सुख अपने, कबहूँ नहिं अलसाने ।
गाफिल होके महल में सोये, फिर पाछे पछिताने ॥ २ ॥
अजहूँ उठो कहाँ तुम बैठे, बिनती सुनो हमारी ।
चहूँ ओर मैं आहट पाया, बहुत भई भुइँ भारी ॥ ३ ॥
बंदीछोर रहत घट भीतर, खबर न काहू पाई ।
कहत मलूक राम के पहरा, जागो मेरे भाई ॥ ४ ॥
॥ शब्द ९ ॥
अवधू याही करो बिचार ।
दस औतार कहाँ तैं आये, किन रे गढ़े करतार ॥ १ ॥
केहि उपदेस भये तुम जोगी, केहि बिधि आतम जारा ।
केहि कारन तुम काया सताई, केहि बिधि आतम मारा ॥ २ ॥
१४ मलूकदासजी की बानी
थोथे बाँट बाँधि के भोंदू, येहि बिधि जाव न पारा ।
ऋद्धि सिद्धि में बूड़ि मरोगे, पकड़ो खेवनहारा ॥ ३ ॥
अगल बगल का पैंडा पकड़ा, दिन दिन चढ़ता भारा ।
कहत मलूक सुनो रे भोंदू, अबिगत मूल बिसारा ॥ ४ ॥
॥ शब्द १० ॥
नाम हमारा खाक है, हम खाकी बंदे ।
खाकहिं ते पैदा किये, अति गाफिल गंदे ॥ १ ॥
कबहुँ न करते बन्दगी, दुनिया में भूले ।
आसमान को ताकते, घोड़े चढ़ि फूले ॥ २ ॥
जोरू लड़के खुस किये, साहेब बिसराया ।
राह नेकी की छोड़ि के, बुरा अमल कमाया ॥ ३ ॥
हरदम तिस को याद कर, जिन वजूद संवारा ।
सबै खाक दर खाक है, कुछ समझ गँवारा ॥ ४ ॥
हाथी घोड़े खाक के, खाक खानखानी १।
कहैं मलूक रहि जायगा, औसाफ निसानी ॥ ५ ॥
॥ उपदेश ॥
॥ शब्द १ ॥
अब तो अजपा जपु मन मेरे ॥ टेक ॥
सुर नर असुर टहलुवा जा के, मुनि गंधर्ब जा के चेरे ॥१॥
दस औतार देखि मत भूलो, ऐसे रूप घनेरे ॥२॥
अलख पुरुप के हाथ बिकाने, जब तें नैन निहारे ॥३॥
अबिगत अगम अगोचर अबधू, संग फिरत हैं तेरे ॥४॥
कह मलूक तू चेत अवेता, काल न आवै नेरे ॥५॥
(१) बादशायत ।
उपदेश १५
॥ शब्द २ ॥
ऐ अजीज ईमान तू, काहे को खोवै ।
हिय राखै दरगाह में, तो प्यारा होवै ॥ १ ॥
यह दुनियाँ नाचीज के, जो आसिक होवै ।
भूलै जात खोदाय को, सिर धुन धुन रोवै ॥ २ ॥
इस दुनियाँ नाचीज के, तालिब हैं कुत्ते ।
लज्जत में मोहित हुए, दुख सहे बहुते ॥ ३ ॥
जब लगि अपने आप को, तहकीक न जानै ।
दास मलूका रब्ब को, क्योंकर पहिचानै ॥ ४ ॥
॥ शब्द ३ ॥
साधो भाई अपनी करनी नाहीं ॥ टेक ॥
जे करनी का करैं भरोसा, ते जम के घर जाहीं ॥ १ ॥
ना जानूँ धौं कहाँ मुए थे, ना जानूँ कहँ आये ।
ना जानूँ हरि गर्भ बसेरा, कौने भाँति बनाये ॥ २ ॥
महा कठिन यह हरि की माया, या तें कौन बचावै ।
जौन कहै जड़ मूलहिं त्यागी, तिन को हाथ लगावै ॥ ३ ॥
यह संसार बड़ो भौसागर, प्रलय काल ते भारी ।
बूड़त तें या सोई बाचै, जेहि राखै करतारी ॥ ४ ॥
लच्छ गऊ दे अन्न खात थे, राजा नृग से प्यारे ।
पुन्न करत जमा और गँवाई, लै गिरगिट कै डारे ॥ ५ ॥
गौतम नारि बड़ी पतिबरता, बहुते कीन्हे दाना ।
करनी करि बैकुंठ न पैठी, काहे भई पषाना ॥ ६ ॥
मारहु मान छेम करि बैठो, छोड़ो गर्व गुमाना ।
आपा मेटो राम भजो तुम, कहत मलूक दिवाना ॥ ७ ॥
॥ शब्द ४ ॥
आपा खोज रे जिय भाई ।
आपा खोजे त्रिभुवन सूझै, अंधकार मिटि जाई ॥ १ ॥
१६ मलूकदासजी की बानी
जोई मन सोई परमेसुर, कोइ बिरला अबधू जानै ।
जौन जोगीसुर सब घट ब्यापक, सो यह रूप बखानै ॥ २ ॥
सबद अनाहद होत जहाँ तें, तहाँ ब्रह्म कर बासा ।
गगन मँडल में करत कलोलै, परम जोति परगासा ॥ ३ ॥
कहत मलूका निरगुन के गुन, कोइ बड़भागी गावै ।
क्या गिरही औ क्या बैरागी, जेहि हेरि देयँ सो पावै ॥ ४ ॥
॥ शब्द ५ ॥
किरपा कर गुरु जुगत बताई । आपा खोजो भरम नसाई ॥१॥
आपा खोजे त्रिभुवन सूझै । गुरु परताप काल से जूझै ॥२॥
सबद ब्रह्म का करै बिचार । सोई चलै जियत होइ छार ॥३॥
संतन की सेवा चित लावै । पाहन पूजि न मन भरमावै॥४॥
कामिनि कनक कलह का भंडा। इन ठगनिन सारा जग डंडा॥५॥
होत न हँसै मरत ना रोवै । ता को रंड कबहुँ न बिगोवै॥६॥
परम तत्त जो दृढ़ कर रहै । माया मोह में कबहुँ न बहै ॥७॥
गुरु के बचन करै परतीत । सोई सिद्ध जाय जग जीत ॥८॥
सत संतोष हिये में राखै । सो जन नाम रसायन चाखै ॥६॥
काटे कटै न जारे जरै । अर्ध नाम भजन करि तरै ॥१०॥
न्यारे होयँ पिता और माई । अगिनि बुझै सीतल होइ जाई॥११॥
मनुवाँ मारि करै नौ खंड । कबहुँ न सहै देंह का दंड ॥१२॥
गुरु गोबिंद सार मत दीन्ह । भला भया जो आतम चीन्ह ॥१३॥
बड़े भाग से आतम जागा । कहत मलूक सकल भ्रम भागा ॥१४॥
॥ शब्द ६ ॥
आपा मेटि न हरि भजे, तेई नर डूबे ।
हरि का मर्म न पाइया, कारन कर ऊबे ॥ १ ॥
करें भरोसा पुत्र का, साहेब बिसराया ।
बूड़ गये तरबोर१ को, कहुँ खोज न पाया ॥ २ ॥
(१) अथाह ।
द्वितीय भाग: शब्द एवं पद संग्रह (अजपा जाप व उपसंहार)
उपदेश १७
साध मंडली बैठि के, मूढ़ जाति बखानी ।
हम बड़ हम बड़ करि मुए, बूड़े बिन पानी ॥ ३ ॥
तब के बाँधे तेई नर, अजहूँ नहिं छूटे।
पकरि पकरि भलि भाँति से, जमदूतन लूटे ॥ ४ ॥
काम क्रोध सब त्यागि के, जो रामै गावै ।
दास मलूका यों कहै, तेहि अलख लखावै ॥ ५ ॥
॥ शब्द ७॥
गर्व न कीजे बावरे, हरि गर्व प्रहारी ।
गर्वहिं तें रावन गया, पाया दुख भारी ॥ १ ॥
जरन खुदी१ रघुनाथ के, मन नाहिं सोहाती ।
जा के जिय अभिमान है, ताकी तोरत छाती ॥ २ ॥
एक दया और दीनता, ले रहिये भाई ।
चरन गहो जाय साध के, रीझै रघुराई ॥ ३ ॥
यही बड़ा उपदेस है, परद्रोह न करिये ।
कहैं मलूक हरि सुमिर के, भौसागर तरिये ॥ ४ ॥
॥ शब्द ८ ॥
ना वह रीझै जप तप कीन्हे, ना आतम को जारे ।
ना वह रीझै धोती टाँगे, ना काया के पखारे ॥ १ ॥
दाया करै धरम मन राखै, घर में रहै उदासी ।
अपना सा दुख सब का जानै, ताहि मिलै अबिनासी ॥ २ ॥
सहै कुसब्द बादहू त्यागै, छाँड़ै गर्व गुमाना ।
यही रीझ मेरे निरंकार की, कहत मलूक दिवाना ॥ ३ ॥
॥ शब्द ६ ॥
सब से लालच का मत खोटा ।
लालच तें बैपारी सिट्ठी, दिन दिन आवै टोटा२ ॥ १ ॥
(१) ईर्षा और आपा । (२) घाटा ।
३
१८ मलूकदासजी की बानी
हाथ पसारे आँधर जाता, पानी परहि न भाई ।
माँगे तैं मकु मीच भली, अस जीने कौन बड़ाई ॥ २ ॥
माँगे तैं जग नाक सिकोरे, गोबिंद भला न मानै ।
अनमाँगे राम गले लगावै, बिरला जन कोइ जानै ॥ ३ ॥
जब लग जिव का लोभ न छूटै, तब लग तजै न माया ।
घर घर द्वार फिरै माया के, पूरा गुरु नहिं पाया ॥ ४ ॥
यह मैं कही जे हरि रँग राते, संसारी को नाहीं ।
संसारी तो लालच बंधा, देस देसान्तर जाहीं ॥ ५ ॥
जो माँगे सो कछू न पावै, बिन माँगे हरि देता ।
कहैं मलूक निःकाम भजै जे, ते आपन करि लेता ॥ ६ ॥
॥ शब्द १० ॥
मन तैं इतने भरम गँवावो ।
चलत बिदेस बिप्र जनि पूछो, दिन का दोष न लावो ॥ १ ॥
संझा होय करो तुम भोजन, बिनु दीपक के बारे ।
जौन कहैं असुरन की बेरिया, मूढ़ दई के मारे ॥ २ ॥
आप भले तो सबहि भलो है, बुरा न काहू कहिये ।
जा के मन कछु बसै बुराई, ता सों भागे रहिये ॥ ३ ॥
लोक बेद का पैंड़ा औरहि, इनकी कौन चलावै ।
आतम मारि पषानै पूजैं, हिरदै दया न आवै ॥ ४ ॥
रहो भरोसे एक राम के, सूरे का मत लीजै ।
संकट पड़े हरज नहिं मानो, जिय का लोभ न कीजै ॥ ५ ॥
किरिया करम अचार भरम है, यही जगत का फंदा ।
माया जाल में बाँधि अँड़ाया१, क्या जानै नर अंधा ॥ ६ ॥
यह संसार बड़ा भौसागर, ता को देखि सकाना२ ।
सरन गये तोहिं अब क्या डर है, कहत मलूक दिवाना ॥ ७ ॥
(१) गिराया। (२) डरा।
उपदेश ५६
॥ शब्द ११ ॥
है हजूर नहिं दूर, हमा-जा भर पूर ।
ज़ाहिरा जहान, जा का ज़हूर पुर नूर ॥ १ ॥
बेसबूह बेनमून, बेवगून ओस्त ।
हमा ओस्त हमा अज़ोस्त, जान-जानाँ दोस्त ॥ २ ॥
शबो रोज़ ज़िकर, फ़िकरही में मशग़ूल ।
तेही दरगाह बीच, पड़े हैं क़बूल ॥ ३ ॥
साहेब है मेरा पीर, क़ुदरत क्या कहिये ।
कहता मलूक बंदा, तक पनाह रहिये ॥ ४ ॥
॥ शब्द १२ ॥
राम कहो राम कहो राम कहो बावरे ।
अवसर न चूक भोंदू, पायो भला दाँव रे ॥ १ ॥
जिन तो को तन दीन्हो, ता को न भजन कीन्हो ।
जनम सिरानो जात, लोहे कैसो ताव रे ॥ २ ॥
रामजी को गाय गाय, रामजी को रिझाव रे ।
रामजी के चरन कमल, चित्त माहिं लाव रे ॥ ३ ॥
कहत मलूकदास, छोड़ दे तैं झूठी आस ।
आनँद मगन होइ के, हरि गुन गाव रे ॥ ४ ॥
॥ शब्द १३ ॥
रस रे निर्गुन राग से, गावै कोइ जाग्रत जोगी ।
अलग रहै संसार से, सो (इस) रस का भोगी ॥ १ ॥
भरम करम सब छाँड़, अनूठा यह मत पूरा ।
सहजै धुन लागी रहै, बाजै अनहद तूरा ॥ २ ॥
लहरैं उठतीं ज्ञान की, बरसै रिमझिम मोती ।
गगन गुफा में बैठ के, देखै जगमग जोती ॥ ३ ॥
सिव नगरी आसन किया, सुन ध्यान लगाया ।
तीनों दसा बिसार के, चौथा पद पाया ॥ ४ ॥
अनुभयं उपजा भय गया, हद तज बेहद लागा ।
घट उँजियारा होइ रहा, जब आतम जागा ॥ ५ ॥
सब रंग खेलै सम रहै, दुबिधा मनहिं न आनै ।
कह मलूक सोइ रावला, मेरे मन मानै ॥ ६ ॥
॥ शब्द १४ ॥
बाजीगरै पसारी बाजी । भूल भुलायो सब का जी ॥१॥
देखा मैं मुल्ला बौराना । नाहक पढ़े किताब कुराना ॥२॥
है हजूर वह दूर बतावै । बाँग जिकिर धौं किसे सुनावै॥३॥
रोजा करै निमाज गुजारै । उरुस¹ करै और आतम मारै ॥४॥
वो भी मुल्ला बड़ा कसाई । जिन तुझको तदबीर सिखाई ॥५॥
है बेपीर औ पीर कहावै । करि मुरीद तदबीर सिखावै ॥६॥
ऐसा मुर्शिद कबहुँ न करिये । खून करावै तिस तें डरिये ॥७॥
अपने मूड़ अजाब चढ़ावै । पैगम्बर का धोखा लावै ॥८॥
ऐसा मुर्शिद करै जो कोई । दोजख जाय परैगा सोई ॥६॥
दरदमंद दुरवेस कहावै । जो मोहिं राम की रीझ बतावै ॥१०॥
साहेब को बैठे लौ लाई । काहू की नहिं करै तमाई२ ॥११॥
पाँच तत्त से रहै नियारा । सो दुर्वेस खोदा का प्यारा ॥१२॥
जो प्यासे कों देवै पानी । बड़ी बंदगी मोहमद मानी ॥१३॥
जो भूखे को अन्न खवावै । सो सिताब³ साहेब को पावै॥१४॥
अपने मन तदबीर कराई । साहेब के दर होय बड़ाई ॥१५॥
जो फकीर ऐसा कोइ होय । फिरै बेबाक न पूछे कोय ॥१६॥
छोड़ै गुस्सा जीवत मरै । तेहिं इजराइल सिजदा करै॥१७॥
अपना सा दुख सब का जानै । दास मलूका ता को मानै ॥१८॥
(१) नियाज, कुर्बानी । (२) लालच । (३) जल्द ।
मिश्रित २१
॥ मिश्रित ॥
॥ शब्द १ ॥
अब मैं अनुभव पदहिं समाना ॥टेक॥
सब देवन को भर्म भुलाना, अविगति हाथ बिकाना ॥ १ ॥
पहिला पद है देई देवा, दूजा नेम अचारा ।
तीजे पद में सब जग बंधा, चौथा अपरम्पारा ॥ २ ॥
सुन्न महल में महल हमारा, निरगुन सेज बिंछाई ।
चेला गुरु दोउ सैन करत हैं, बड़ी असाइस१ पाई ॥ ३ ॥
एक कहै चल तीरथ जइये, (एक) ठाकुरद्वार बतावै ।
परम जोति के देखे संतो, अब कछु नजर न आवै ॥ ४ ॥
आवा गवन का संसय छूटा, काटी जम की फाँसी ।
कह मलूक मैं यही जानिके, मित्र कियो अबिनासी ॥ ५ ॥
॥ शब्द २ ॥
सबहिन के हम सबै हमारे । जीव जंतु मोहिं लगैं पियारे । १ ।
तीनों लोक हमारी माया । अंत कतहूँसे कोई नहि लाया । २ ।
छत्तिस पवन हमारी जात । हमहीं दिन और हमहीं रात । ३
२२ मलूकदासजी की बानी
हमहीं रावन हमहीं कंस । हमहीं मारा अपना बंस ॥३॥
हमहिं जियावैं हमहीं मारैं । हमहीं बोरैं हमहीं तारैं ॥४॥
जहाँ तहाँ सब जोति हमारी । हमहिं पुरुष हमहीं है नारी ॥५॥
ऐसी बिधि कोई लव लावै । सो अविगत से टहल करावै ॥६॥
सहै कुसबद और सुमिरै नाँव । सब जग देखै एकै भाव ॥७॥
या पद का कोई करै निबेरा । कह मलूक मैं ता का चेरा ॥८॥
॥ शब्द ३ ॥
बाबा मन का है सिर तले ॥ टेक ॥
माया के अभिमान भूले, गर्ब ही में गले ॥ १ ॥
जिभ्या कारन खून कीये, बाँधि जमपुर चले ॥ २ ॥
रामजी सों भये बेमुख, अगिन अपनी जले ॥ ३ ॥
हरि भजे से भये निरभय, टारहू नहिं टरे ॥ ४ ॥
कह मलूका जहँ गरीबी, तेई सब से भले ॥ ५ ॥
॥ शब्द ४ ॥
तू साहेब लीये खड़ा, बन्दा नासबूरा ।
जैसा जिसको चाहिये, देता भरपूरा ॥ १ ॥
लाख करोड़ जो गाँठि में, तौ भी यह रोवै ।
मरता मारे फिकिर के, सुख कबहुँ न सोवै ॥ २ ॥
आँखें फेरै बुरी भाँति, देखत डर लागै ।
लेखा जो कौड़ी चले, दिन चारक जागे ॥ ३ ॥
बिन संतोष दुखी भया, बहुते भरमाया ।
कहत मलूक यह जानकर, सरनागति आया ॥ ४ ॥
॥ शब्द ५ ॥
राम मैं ससा भयो तन धरि के ।
प्रभु की सरन में कीन्ह बिलावट आनि घुसा मैं डरिके ॥ १ ॥
कुकरा पाँच पचीस कुकरिया सदा रहें मोहिं घेरे ।
ठाढ़ होउँ तौ पिंडुरी पकरैं बैठे आँखि गुरेरैं ॥ २ ॥
मिश्रित २३
कलुवा कबरा मोतिया झबरा बुचवा मोहिं डेरवावे ।
जब तें लियो तिहारो पीछा कोऊ निकट न आवे ॥ ३ ॥
इन पाँचो में देखा बिष ही एकौ नहिं मन माना ।
काटि काटि मैं कीन्ह अहेरा कहत मलूक दिवाना ॥ ४ ॥
॥ शब्द ६ ॥
बन्दे दुनियाँ की दीन गँवाया१ ।
सो दुनियाँ तेरे संग न लागी, मूड़ अजाब चढ़ाया ॥ १ ॥
करम जो लागा बदी खलक की, किन तुझको फर्माया ।
गुनहगार तूँ हुआ सरासर, दोजख बाँध चलाया ॥ २ ॥
खाक सेती जिन पैदा कीन्हा, सो साहेब बिसराया ।
मोहकम२ मार पड़ी गुरजन की, तब कछु जवाब न आया ॥ ३ ॥
अब किसहूँ को दोष न दीजै, गन्दा अमल कमाया ।
कह मलूक जस खिदमत पहुँचा, सोई नतीजा पाया ॥ ४ ॥
॥ शब्द ७ ॥
मन नहिं तौलै यार, का रे तौलै बनियाँ ॥ टेक ॥
घाट बाट सोध लेइ, सम रहै नकुनियाँ३ ।
बिसरै ना सुरति, नाहिं फेरि होय तनियाँ ॥ १ ॥
पाँच औ पचीस चोर, लूटिहैं दुकनियाँ ।
सुनहि ना गोहार कोउ, हाकिम हैरनियाँ ॥ २ ॥
कहत मलूकदास, तौलै जब चार रास ।
साहेब मिल साहु होय, मिलै तब दमनियाँ४ ॥ ३ ॥
॥ शब्द ८ ॥
दीन-बंधु दीना-नाथ मेरी तन हेरिये ॥ टेक ॥
भाई नाहि बन्धु नाहिं कुटुम परिवार नाहिं,
ऐसा कोई मित्र नाहिं जाके ढिग जाइये ॥ १ ॥
(१) स्वार्थ के लिये परमार्थ खोया । (२) भारी । (३) डण्डी के सिरे । (४) दाम ।
२४ मलूकदासजी की बानी
सोने की सलैया नाहिं रूपे का रुपैया नाहिं,
कौड़ी पैसा गाँठ नहीं जासे कछु लीजिये ॥ २ ॥
खेती नाहिं बारी नाहिं बनिज ब्यौपार नाहिं,
ऐसा कोई साहु नाहिं जासों कछु माँगिये ॥ ३ ॥
कहत मलूकदास छोड़दे पराई आस,
राम धनी पाय के अब का की सरन जाइये ॥ ४ ॥
कबित्त
( १ )
परम दयाल राया राय परसोत्तम जी,
ऐसो प्रभु छाँड़ि और कौन के कहाइये ॥ १ ॥
सीतल सुभाव जा के तामस को लेस नहीं,
मधुर बचन कहि राखै समझाइये ॥ २ ॥
भक्त - बछल गुन - सागर कला - निधान,
जाको जस पाँत नित बेदन में गाइये ॥ ३ ॥
कहत मलूक बल जाउँ ऐसे दरस की,
अधम - उधार जा के देखे सुख पाइये ॥ ४ ॥
( २ )
जौन कोई भूखा गोपाल की मोहब्बत का।
तौन दुर्वेसन का पैंड़ा निराला है ॥ १ ॥
रहते महजूज१ वे तो साहेब की सूरत पर।
दुनियाँ को तर्क२ मार दीन को सम्हाला है ॥ २ ॥
किसी से न करें सवाल उनका कुछ और ख्याल।
फिरते अलमस्त वजूद३ भी बिसारा है ॥ ३ ॥
कहता मलूक उन्हें सूझता है बेचुगून४।
किसी की गरज नहीं अन्दर अँधियारा है ॥ ४ ॥
(१) पगे हुए। (२) त्याग कर। (३) देंह। (४) बेचून। (५) बेमिस्ल।
कवित्त २५
( ३ )
माला कहाँ औ कहाँ तसबीह,
अब चेत इनहिं कर टेक न टेकै ॥ १ ॥
काफिर कौन मलेच्छ कहावत,
संध्या निवाज समय करि देखै ॥ २ ॥
है जमराज कहाँ जबरील है,
काजी है आप हिसाब के लेखै ॥ ३ ॥
पाप औ पुन्य जमा कर बूझत,
देत हिसाब कहाँ धरि फेकै ॥ ४ ॥
दास मलूक कहा भरमौ तुम,
राम रहीम कहावत एकै ॥ ५ ॥
( ४ )
माला कहाँ और कहाँ तसबीह,
अब चेत इनहिं कर टेक न टेकी ॥ १ ॥
बाँधे डोल अकास पताल लौं,
भूलन जात कहे हरि सेती ॥ २ ॥
लोक की लाज में होत अकाज है,
कौन सहै मेरे साँसत एती ॥ ३ ॥
दास मलूक दिन दुइ की बात है,
पायो राम छुट्यो जम सेती ॥ ४ ॥
( ५ )
बीर रघुबीर पैगम्बर खोदा मेरे,
कादिर करीम काजी माया मत खोई है ॥ १ ॥
राम मेरे प्रान रहमान मेरे दीन इमान,
भूल गयो भैया सब लोक लाज धोई है ॥ २ ॥
कहत मलूक मैं तो दुबिधा न जानौ दूजी,
जोई मेरे मन में नैनन में सोई है ॥ ३ ॥
४
हरि हजरत मोहिं माधव मकुन्द की सौं,
छाँड़ि केसवराय मेरो दूसरो न कोई है ॥ ४ ॥
( ६ )
जिसके दीदार को मुसाफिरी को दिल हुआ ।
बहुत खूब ऐसा जो नगींच१ कर पाइये ॥ १ ॥
खाब सी दुनियाँ को दिल कौन करै सात पाँच२ ।
बन्दे हैं जिसके क्यों न तिसके कहलाइये ॥ २ ॥
अगम अगोचर सबहिन में रहता नियार ।
जा को जस नीत बत्त संतन बार बार गाइये ॥ ३ ॥
कहता मलूक महबूब पिया खूब यार ।
सिर लगाय जमीं में सिरदा३ कराइये ॥ ४ ॥
( ७ )
बार बार करता हूँ नसीहत मैं तेरी तईं ।
क्यों बे हरामखोर साँईं तू बिसारा है ॥ १ ॥
जिसका नित नोन खात मुतलक भी ना डरात ।
अच्छा वजूद पाय औरत से हारा है ॥ २ ॥
कौल से बेकौल हुआ किसी की न लेत दुआ ।
दोजख४ के लिये दिल कौन कौन मारा है ॥ ३ ॥
कहता मलूक अब तोबा कर साहेब से ।
छाँड़ि दे कुराह जिन जारे पर जारा है ॥ ४ ॥
( ८ )
बंदा तैं गंदा गुनाह करै बार बार ।
साँईं तू सिरजनहार मन में न आनिये ॥ १ ॥
हाथ कछु मेरे नाहीं हाथ सब तेरे साँईं ।
खलक के हिसाब बीच मुझको मत सानिये ॥ २ ॥
(१) पास । (२) हैरान, डाँवाडोल । (३) सिजदा । (४) पेट ।
कबित्त २७
रहम की नजर कर कुरहम दिल से दूर कर ।
किसी के कहे सुने चुगलो मत मानिये ॥ ३ ॥
कहता मलूक मैं रहता पनाह तेरी ।
दाता दयाल मुझे अपना कर जानिये ॥ ४ ॥
( ६ )
गाफिल है बंदा गुनाह करै बार बार ।
काम पड़े साहेब धौं कैसा फरमावैगा ॥ १ ॥
आखिर जमाने को डरता है मेरा दिल ।
जब जबरील१ हाथ गुर्ज लिये आवैगा ॥ २ ॥
खाब सी दुनियाँ दिल को न करै सात पाँच ।
काली पीली आँखें कर फिरिस्ता दिखलावैगा ॥ ३ ॥
कहता मलूक किसी मुल्क में बचाव नहीं ।
अब कीजै किरपा तब मेरे मन भावैगा ॥ ४ ॥
( १० )
भील कद करी थी भलाई जिया आप जान ।
फील कद हुआ था मुरीद कहु किसका ॥ १ ॥
गीध कद ज्ञान की किताब का किनारा छुवा ।
व्याध और बधिक निसाफ२ कहु तिसका ॥ २ ॥
नाग कद माला लैके बंदगी करी थी बैठ ।
मुझको भी लगा था अजामिल का हिसका ॥ ३ ॥
एते बदराहों को बदी करी थी माफ ।
जन मलूक अजाती पर एतो करी रिस का ॥ ४ ॥
( ११ )
मेहर की कफनी औ कुताह भी मेहर का ।
मेहर का मुतंगा३ इस कमर में लगाइये ॥ १ ॥
(१) मौत का फिरिश्ता। (२) इन्साफ। (३) मूँझ की करधनी जो साधू लोग पहिनते हैं।
३८ मलूकदासजी की बानी
मेहर का जामा और तोमा१ भी मेहर का।
मेहर का आपा इस दिल को पिलाइये ॥ २ ॥
मेहर का आसा२ और तमासा भी मेहर का।
मेहर के महल बिच मेहरबान को मनाइये ॥ ३ ॥
कहता मलूक बन्दे कहर की लहर में।
कोटिक बह गये बिन मेहर मेहरबान किस राह से पाइये ॥४॥
( १२ )
अदम कबित्त का जिसकी कबिताई करूँ,
याद करूँ उसको जिन पैदा मुझे किया है ॥ १ ॥
गर्भ बास पाला आतस में नहिं जाला,
तिसको मैं बिसारूँ तो मैं किसकी आस जिया हूँ ॥ २ ॥
नालत इस दुनियाँ को जो दीन से बेदीन करै,
खाक ऐसे खाने जिन ईमान बेंच लिया है ॥ ३ ॥
कहता मलूक मैं बिकाना हरि मूरत पर,
जिस के दीदार से जुड़ाता मेरा हिया है ॥ ४ ॥
( १३ )
सुपने के सुख देख मोह रहे मूढ़ नर,
जानत हमारे दिन ऐसहिं बिहायँगे ॥ १ ॥
क्या करेंगे भोग अच्छी सुन्दरी रमेंगे नित्त,
छाँह कौ लै चारि जून खूँद खूँद खायँगे ॥ २ ॥
सीकरा सो काल है कलसरी३ सी लपेट लेहै,
चंगुल के तले दबे चिचयायँगे ॥ ३ ॥
कहत मलूकदास लेखा देत होइहै दुक्ख,
बड़े दरबार जाय अन्त पछितायँगे ॥ ४ ॥
( १४ )
दीन-दयाल सुनी जब तैं तब तैं हिया में कछु ऐसी बसी है।
तेरो कहाय के जाउँ कहाँ मैं तेरे हित की पट४ खैंच कसी है ॥१॥
(१) तोंबा। (२) डण्डा, छड़ी। (३) गौरैया चिड़िया। (४) पटका।
साखी २६
तेरोई एक भरोस मलूक को तेरे समान न दूजो जसी है।
एहो मुरारि पुकारि कहौं अब मेरी हँसी नहिं तेरो हँसी है ॥२॥
साखी
॥ गुरुदेव ॥
जीती बाजी गुर प्रताप तें, माया मोह निवार।
कहैं मलूक गुरु कृपा तें, उतरा भवजल पार ॥ १ ॥
सुखद पंथ गुरुदेव यह, दीन्हो मोहिं बताय ।
ऐसो ऊपट१ पाय अब, जग मग चलै बलाय ॥ २ ॥
भ्रम भागा गुरु बचन सुनि, मोह रहा नहिं लेस।
तब माया छल हित किया, महा मोहनी भेस ॥ ३ ॥
ता को आवत देखि कै, कही बात समुझाय ।
अब मैं आया हरि सरन, तेरी कछु न बसाय ॥ ४ ॥
मलूका सोई पीर है, जो जानै पर पीर ।
जो पर पीर न जानही, सो फकीर बेपीर ॥ ५ ॥
बहुतक पीर कहावते, बहुत करत हैं भेस ।
यह मन कहर खोदाय का, मारे सो दुरवेस ॥ ६ ॥
पीर पीर सब कोई कहे, पीरे चीन्हत नाहिं ।
जिन्दा पीर को मारि के, मुरदहिं ढूँढ़न जाहिं ॥७ ॥
॥ साध जन ॥
जहाँ जहाँ बच्छा फिरै, तहाँ तहाँ फिरै गाय ।
कहैं मलूक जहाँ संत जन, तहाँ रमैया जाय ॥ ८ ॥
भेष फकीरी जे करै, मन नहिं आवै हाथ ।
दिल फकीर जे हो रहे, साहेब तिनके साथ ॥ ६ ॥
॥ नाम ॥
जीवहुँ तें प्यारे अधिक, लागैं मोहीं राम ।
बिन हरि नाम नहीं मुझे, और किसी से काम ॥१०॥
(१) ऊपरवार।
३० मलूकदासजी की बानी
कह मलूक हम जबहि तें, लीन्ही हरि की ओट ।
सोवत हैं सुख नींद भरि, डारि भरम की पोट ॥११॥
उहाँ न कबहुँ जाइये, जहाँ न हरि का नाम ।
डीगंबर१ के गाँव में, धोबी का क्या काम ॥१२॥
राम राम के नाम को, जहाँ नहीं लवलेस ।
पानी तहाँ न पीजिये, परिहरिये सो देस ॥१३॥
गाँठो सत कुपीन२ में, सदा फिरै निःसंक ।
नाम अमल माता रहे, गिने इन्द्र को रंक ॥१४॥
राम नाम जिन जानिया, तेई बड़े सपूत ।
एक राम के भजन बिन, काँगा३ फिरै कपूत ॥१५॥
राम नाम एकै रती, पाप के कोटि पहाड़ ।
ऐसी महिमा नाम की, जारि करै सब छार ॥१६॥
राम नाम औषध करो, हिरदै राखो याद ।
संकट में लौ लाइये, दुर करै सब व्याध ॥१७॥
धर्महिं का सौदा भला, दाया जग व्योहार ।
राम नाम की हाट ले, बैठा खोल किवार ॥१८॥
रहूँ भरोसे राम के, बनिजे४ कबहुँ न जावँ ।
दास मलूका यों कहै, हरि बिड़वे५ मैं खावँ ॥१६॥
साहेब मेरा सिर खड़ा, पलक पलक सुधि ले ।
जबहीं गुरु किरपा करें, तबहिं राम कछु दे ॥२०॥
मोदी सब संसार है, साहेब राजा राम ।
जा पर चिट्ठो ऊतरे, सोई खरचे दाम ॥२१॥
औरहिं चिन्ता करन दे, तू मत मारै आह ।
जा के मोदी राम से, ताहि कहा परवाह ॥२२॥
(१) नागा। (२) लँगोटी। (३) कंगाल । (४) ब्यौपार को । (५) कमाय ।
साखी ३१
॥ बिनती ॥
नमो निरंजन निरंकार, अविगति पुरुष अलेख ।
जिन संतन के हित धर्यो, जुग जुग नाना भेख ॥२३॥
हरि भक्तन के काज हित, जुग जुग करी सहाय ।
सो सिव सेस न कहि सकै, कहा कहूँ मैं गाय ॥२४॥
राम राय असरन सरन, मोहिं आपन करि लेहु ।
संतन सँग सेवा करौं, भक्ति मजूरी देहु ॥२५॥
भक्ति मजूरी दीजिये, कीजै भवजल पार ।
बोरत है माया मुझे, गहे बाँह वरियार ॥२६॥
॥ प्रेम ॥
प्रेम नेम जिन ना कियो, जीतो नाहीं मैन १ ।
अलख पुरुष जिन ना लख्यो, छार परो तेहि नैन ॥२७॥
कठिन पियाला प्रेम का, पिये जो हरि के हाथ ।
चारो जुग माता रहै, उतरै जिय के साथ ॥२८॥
बिना अमल माता रहै, बिन लस्कर बलवंत ।
बिना विलायत साहेबी, अंत माहिं बेअंत ॥२६॥
रात न आवै नींदड़ी, थरथर काँपै जीव ।
ना जानूँ क्या करेगा, जालिम मेरा पीव ॥३०॥
करै भक्ति भगवंत की, करै कबहूँ नहिं चूक ।
हरि रस में राचो रहै, साँची भक्ति मलूक ॥३१॥
मलूक सो माता सुंदरी, जहाँ भक्त औतार ।
और सकल बाँझे भई, जनमे खर कतवार ॥३२॥
सोई पूत सपूत है, जो भक्ति करे चित लाय ।
जरा मरन तें छुटि परै, अजर अमर होइ जाय ॥३३॥
सब बाजे हिरदे बजैं, प्रेम पखावज तार ।
मंदिर ढूँढ़त को फिरै, मिल्यो बजावनहार ॥३४॥
(१) कामदेव ।