मलूकदास जी की बानी (बेलवेडियर प्रेस, इलाहाबाद - ज्ञानपरोछी, साखी एवं अमर पद संग्रह)
Malukdas Ji Ki Bani: Belvedere Steam Printing Press Allahabad
सन्त मलूकदास (सम्पादक: बेलवेडियर प्रेस) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंसाखी २६
तेरोई एक भरोस मलूक को तेरे समान न दूजो जसी है।
एहो मुरारि पुकारि कहौं अब मेरी हँसी नहिं तेरो हँसी है ॥२॥
साखी
॥ गुरुदेव ॥
जीती बाजी गुर प्रताप तें, माया मोह निवार।
कहैं मलूक गुरु कृपा तें, उतरा भवजल पार ॥ १ ॥
सुखद पंथ गुरुदेव यह, दीन्हो मोहिं बताय ।
ऐसो ऊपट१ पाय अब, जग मग चलै बलाय ॥ २ ॥
भ्रम भागा गुरु बचन सुनि, मोह रहा नहिं लेस।
तब माया छल हित किया, महा मोहनी भेस ॥ ३ ॥
ता को आवत देखि कै, कही बात समुझाय ।
अब मैं आया हरि सरन, तेरी कछु न बसाय ॥ ४ ॥
मलूका सोई पीर है, जो जानै पर पीर ।
जो पर पीर न जानही, सो फकीर बेपीर ॥ ५ ॥
बहुतक पीर कहावते, बहुत करत हैं भेस ।
यह मन कहर खोदाय का, मारे सो दुरवेस ॥ ६ ॥
पीर पीर सब कोई कहे, पीरे चीन्हत नाहिं ।
जिन्दा पीर को मारि के, मुरदहिं ढूँढ़न जाहिं ॥७ ॥
॥ साध जन ॥
जहाँ जहाँ बच्छा फिरै, तहाँ तहाँ फिरै गाय ।
कहैं मलूक जहाँ संत जन, तहाँ रमैया जाय ॥ ८ ॥
भेष फकीरी जे करै, मन नहिं आवै हाथ ।
दिल फकीर जे हो रहे, साहेब तिनके साथ ॥ ६ ॥
॥ नाम ॥
जीवहुँ तें प्यारे अधिक, लागैं मोहीं राम ।
बिन हरि नाम नहीं मुझे, और किसी से काम ॥१०॥
(१) ऊपरवार।