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सर्वकोश
मलूकदास जी की बानी (बेलवेडियर प्रेस, इलाहाबाद - ज्ञानपरोछी, साखी एवं अमर पद संग्रह)

मलूकदास जी की बानी (बेलवेडियर प्रेस, इलाहाबाद - ज्ञानपरोछी, साखी एवं अमर पद संग्रह)

Malukdas Ji Ki Bani: Belvedere Steam Printing Press Allahabad

सन्त मलूकदास (सम्पादक: बेलवेडियर प्रेस) द्वारा

DevanagariHindipublished45 पृष्ठ

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पृष्ठ 32

मिश्रित २३
कलुवा कबरा मोतिया झबरा बुचवा मोहिं डेरवावे ।
जब तें लियो तिहारो पीछा कोऊ निकट न आवे ॥ ३ ॥
इन पाँचो में देखा बिष ही एकौ नहिं मन माना ।
काटि काटि मैं कीन्ह अहेरा कहत मलूक दिवाना ॥ ४ ॥
॥ शब्द ६ ॥
बन्दे दुनियाँ की दीन गँवाया१ ।
सो दुनियाँ तेरे संग न लागी, मूड़ अजाब चढ़ाया ॥ १ ॥
करम जो लागा बदी खलक की, किन तुझको फर्माया ।
गुनहगार तूँ हुआ सरासर, दोजख बाँध चलाया ॥ २ ॥
खाक सेती जिन पैदा कीन्हा, सो साहेब बिसराया ।
मोहकम२ मार पड़ी गुरजन की, तब कछु जवाब न आया ॥ ३ ॥
अब किसहूँ को दोष न दीजै, गन्दा अमल कमाया ।
कह मलूक जस खिदमत पहुँचा, सोई नतीजा पाया ॥ ४ ॥
॥ शब्द ७ ॥
मन नहिं तौलै यार, का रे तौलै बनियाँ ॥ टेक ॥
घाट बाट सोध लेइ, सम रहै नकुनियाँ३ ।
बिसरै ना सुरति, नाहिं फेरि होय तनियाँ ॥ १ ॥
पाँच औ पचीस चोर, लूटिहैं दुकनियाँ ।
सुनहि ना गोहार कोउ, हाकिम हैरनियाँ ॥ २ ॥
कहत मलूकदास, तौलै जब चार रास ।
साहेब मिल साहु होय, मिलै तब दमनियाँ४ ॥ ३ ॥
॥ शब्द ८ ॥
दीन-बंधु दीना-नाथ मेरी तन हेरिये ॥ टेक ॥
भाई नाहि बन्धु नाहिं कुटुम परिवार नाहिं,
ऐसा कोई मित्र नाहिं जाके ढिग जाइये ॥ १ ॥
(१) स्वार्थ के लिये परमार्थ खोया । (२) भारी । (३) डण्डी के सिरे । (४) दाम ।