मलूकदास जी की बानी (बेलवेडियर प्रेस, इलाहाबाद - ज्ञानपरोछी, साखी एवं अमर पद संग्रह)
Malukdas Ji Ki Bani: Belvedere Steam Printing Press Allahabad
सन्त मलूकदास (सम्पादक: बेलवेडियर प्रेस) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१२ मलूकदासजी की बानी
झूठा नाता लोग लगावै । मन मेरे परतीत न आवै ॥४॥
जबहीं भेजे तबहिं बुलावै । हुकुम भया कोइ रहन न पावै ॥५॥
उलटत पलटत जग की अँचली१। जैसे फेरै पान तमोली ॥६॥
कहत मलूक रह्यो मोहिं घेरे । अब माया के जाउँ न नेरे ॥७॥
॥ शब्द ५ ॥
देखा सब जग ब्याकुल राम । नित उठि दग्धै क्रोध औ काम॥१॥
तुम तो प्रभु जी रहे छिपाय । पाँच मवासी दियो लगाय ॥२॥
एक घड़ी काहु कल ना देय । ज्ञान ध्यान आपुइ हरि लेय ॥३॥
देंह धरे का बड़ा जँजाल । जहँ तहँ फिरता गिरसे काल ॥४॥
आई अचानक करत घात । जिव लै भागत कहत बात ॥५॥
या पापी तें कोउ न बाच । नित उठि पेट नचावै नाच ॥६॥
या का उत्तर देवो मोहि । कैसे के कोउ मिलै तोहिं ॥७॥
जियत नरक है गर्भ बास । उपजत बिनसत बड़ी त्रास ॥८॥
कह मलूक यह बिनती मोरी । इन्हें छोड़ि बल जाऊँ तोरी ॥६॥
॥ शब्द ६ ॥
बाबा मुरदे मूँड़ उठाया ।
लागी अंग बाय दुनियाँ की, राम राय बिसराया ॥ १ ॥
आये पहिरि करम की बेड़ी, हाथ हाथ करि गाढ़ी ।
फूले फिरें जनु अमर भये हैं, प्रीति विषय सों बाढ़ी ॥ २ ॥
काहू के मन चार पाँच की, काहू के मन बीस ।
काहू के मन सात आठ की, सब बाँधे जगदीस ॥ ३ ॥
अब भये सौतिन२ हाथ केरे, घर बीघा३ सौ कीन्ह ।
मेरी मेरी कहि उमर गँवाई, कबहुँ राम ना चीन्ह ॥ ४ ॥
दिना चार के घोड़े सोड़े, दिना चार के हाथी ।
कहत मलूका दिना चार में, बिछुरि जायँगे साथी ॥ ५ ॥
(१) आँचल । (२) माया । (३) बिगहा ।