मलूकदास जी की बानी (बेलवेडियर प्रेस, इलाहाबाद - ज्ञानपरोछी, साखी एवं अमर पद संग्रह)
Malukdas Ji Ki Bani: Belvedere Steam Printing Press Allahabad
सन्त मलूकदास (सम्पादक: बेलवेडियर प्रेस) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंसाखी ३१
॥ बिनती ॥
नमो निरंजन निरंकार, अविगति पुरुष अलेख ।
जिन संतन के हित धर्यो, जुग जुग नाना भेख ॥२३॥
हरि भक्तन के काज हित, जुग जुग करी सहाय ।
सो सिव सेस न कहि सकै, कहा कहूँ मैं गाय ॥२४॥
राम राय असरन सरन, मोहिं आपन करि लेहु ।
संतन सँग सेवा करौं, भक्ति मजूरी देहु ॥२५॥
भक्ति मजूरी दीजिये, कीजै भवजल पार ।
बोरत है माया मुझे, गहे बाँह वरियार ॥२६॥
॥ प्रेम ॥
प्रेम नेम जिन ना कियो, जीतो नाहीं मैन १ ।
अलख पुरुष जिन ना लख्यो, छार परो तेहि नैन ॥२७॥
कठिन पियाला प्रेम का, पिये जो हरि के हाथ ।
चारो जुग माता रहै, उतरै जिय के साथ ॥२८॥
बिना अमल माता रहै, बिन लस्कर बलवंत ।
बिना विलायत साहेबी, अंत माहिं बेअंत ॥२६॥
रात न आवै नींदड़ी, थरथर काँपै जीव ।
ना जानूँ क्या करेगा, जालिम मेरा पीव ॥३०॥
करै भक्ति भगवंत की, करै कबहूँ नहिं चूक ।
हरि रस में राचो रहै, साँची भक्ति मलूक ॥३१॥
मलूक सो माता सुंदरी, जहाँ भक्त औतार ।
और सकल बाँझे भई, जनमे खर कतवार ॥३२॥
सोई पूत सपूत है, जो भक्ति करे चित लाय ।
जरा मरन तें छुटि परै, अजर अमर होइ जाय ॥३३॥
सब बाजे हिरदे बजैं, प्रेम पखावज तार ।
मंदिर ढूँढ़त को फिरै, मिल्यो बजावनहार ॥३४॥
(१) कामदेव ।