सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
मलूकदास जी की बानी (बेलवेडियर प्रेस, इलाहाबाद - ज्ञानपरोछी, साखी एवं अमर पद संग्रह)

मलूकदास जी की बानी (बेलवेडियर प्रेस, इलाहाबाद - ज्ञानपरोछी, साखी एवं अमर पद संग्रह)

Malukdas Ji Ki Bani: Belvedere Steam Printing Press Allahabad

सन्त मलूकदास (सम्पादक: बेलवेडियर प्रेस) द्वारा

DevanagariHindipublished45 पृष्ठ

पृष्ठ 24, कुल 45 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 24

उपदेश १५
॥ शब्द २ ॥
ऐ अजीज ईमान तू, काहे को खोवै ।
हिय राखै दरगाह में, तो प्यारा होवै ॥ १ ॥
यह दुनियाँ नाचीज के, जो आसिक होवै ।
भूलै जात खोदाय को, सिर धुन धुन रोवै ॥ २ ॥
इस दुनियाँ नाचीज के, तालिब हैं कुत्ते ।
लज्जत में मोहित हुए, दुख सहे बहुते ॥ ३ ॥
जब लगि अपने आप को, तहकीक न जानै ।
दास मलूका रब्ब को, क्योंकर पहिचानै ॥ ४ ॥
॥ शब्द ३ ॥
साधो भाई अपनी करनी नाहीं ॥ टेक ॥
जे करनी का करैं भरोसा, ते जम के घर जाहीं ॥ १ ॥
ना जानूँ धौं कहाँ मुए थे, ना जानूँ कहँ आये ।
ना जानूँ हरि गर्भ बसेरा, कौने भाँति बनाये ॥ २ ॥
महा कठिन यह हरि की माया, या तें कौन बचावै ।
जौन कहै जड़ मूलहिं त्यागी, तिन को हाथ लगावै ॥ ३ ॥
यह संसार बड़ो भौसागर, प्रलय काल ते भारी ।
बूड़त तें या सोई बाचै, जेहि राखै करतारी ॥ ४ ॥
लच्छ गऊ दे अन्न खात थे, राजा नृग से प्यारे ।
पुन्न करत जमा और गँवाई, लै गिरगिट कै डारे ॥ ५ ॥
गौतम नारि बड़ी पतिबरता, बहुते कीन्हे दाना ।
करनी करि बैकुंठ न पैठी, काहे भई पषाना ॥ ६ ॥
मारहु मान छेम करि बैठो, छोड़ो गर्व गुमाना ।
आपा मेटो राम भजो तुम, कहत मलूक दिवाना ॥ ७ ॥
॥ शब्द ४ ॥
आपा खोज रे जिय भाई ।
आपा खोजे त्रिभुवन सूझै, अंधकार मिटि जाई ॥ १ ॥