मलूकदास जी की बानी (बेलवेडियर प्रेस, इलाहाबाद - ज्ञानपरोछी, साखी एवं अमर पद संग्रह)
Malukdas Ji Ki Bani: Belvedere Steam Printing Press Allahabad
सन्त मलूकदास (सम्पादक: बेलवेडियर प्रेस) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१८ मलूकदासजी की बानी
हाथ पसारे आँधर जाता, पानी परहि न भाई ।
माँगे तैं मकु मीच भली, अस जीने कौन बड़ाई ॥ २ ॥
माँगे तैं जग नाक सिकोरे, गोबिंद भला न मानै ।
अनमाँगे राम गले लगावै, बिरला जन कोइ जानै ॥ ३ ॥
जब लग जिव का लोभ न छूटै, तब लग तजै न माया ।
घर घर द्वार फिरै माया के, पूरा गुरु नहिं पाया ॥ ४ ॥
यह मैं कही जे हरि रँग राते, संसारी को नाहीं ।
संसारी तो लालच बंधा, देस देसान्तर जाहीं ॥ ५ ॥
जो माँगे सो कछू न पावै, बिन माँगे हरि देता ।
कहैं मलूक निःकाम भजै जे, ते आपन करि लेता ॥ ६ ॥
॥ शब्द १० ॥
मन तैं इतने भरम गँवावो ।
चलत बिदेस बिप्र जनि पूछो, दिन का दोष न लावो ॥ १ ॥
संझा होय करो तुम भोजन, बिनु दीपक के बारे ।
जौन कहैं असुरन की बेरिया, मूढ़ दई के मारे ॥ २ ॥
आप भले तो सबहि भलो है, बुरा न काहू कहिये ।
जा के मन कछु बसै बुराई, ता सों भागे रहिये ॥ ३ ॥
लोक बेद का पैंड़ा औरहि, इनकी कौन चलावै ।
आतम मारि पषानै पूजैं, हिरदै दया न आवै ॥ ४ ॥
रहो भरोसे एक राम के, सूरे का मत लीजै ।
संकट पड़े हरज नहिं मानो, जिय का लोभ न कीजै ॥ ५ ॥
किरिया करम अचार भरम है, यही जगत का फंदा ।
माया जाल में बाँधि अँड़ाया१, क्या जानै नर अंधा ॥ ६ ॥
यह संसार बड़ा भौसागर, ता को देखि सकाना२ ।
सरन गये तोहिं अब क्या डर है, कहत मलूक दिवाना ॥ ७ ॥
(१) गिराया। (२) डरा।