मलूकदास जी की बानी (बेलवेडियर प्रेस, इलाहाबाद - ज्ञानपरोछी, साखी एवं अमर पद संग्रह)
Malukdas Ji Ki Bani: Belvedere Steam Printing Press Allahabad
सन्त मलूकदास (सम्पादक: बेलवेडियर प्रेस) द्वारा
पृष्ठ 26, कुल 45 में से
संदर्भ में पढ़ेंउपदेश १७
साध मंडली बैठि के, मूढ़ जाति बखानी ।
हम बड़ हम बड़ करि मुए, बूड़े बिन पानी ॥ ३ ॥
तब के बाँधे तेई नर, अजहूँ नहिं छूटे।
पकरि पकरि भलि भाँति से, जमदूतन लूटे ॥ ४ ॥
काम क्रोध सब त्यागि के, जो रामै गावै ।
दास मलूका यों कहै, तेहि अलख लखावै ॥ ५ ॥
॥ शब्द ७॥
गर्व न कीजे बावरे, हरि गर्व प्रहारी ।
गर्वहिं तें रावन गया, पाया दुख भारी ॥ १ ॥
जरन खुदी१ रघुनाथ के, मन नाहिं सोहाती ।
जा के जिय अभिमान है, ताकी तोरत छाती ॥ २ ॥
एक दया और दीनता, ले रहिये भाई ।
चरन गहो जाय साध के, रीझै रघुराई ॥ ३ ॥
यही बड़ा उपदेस है, परद्रोह न करिये ।
कहैं मलूक हरि सुमिर के, भौसागर तरिये ॥ ४ ॥
॥ शब्द ८ ॥
ना वह रीझै जप तप कीन्हे, ना आतम को जारे ।
ना वह रीझै धोती टाँगे, ना काया के पखारे ॥ १ ॥
दाया करै धरम मन राखै, घर में रहै उदासी ।
अपना सा दुख सब का जानै, ताहि मिलै अबिनासी ॥ २ ॥
सहै कुसब्द बादहू त्यागै, छाँड़ै गर्व गुमाना ।
यही रीझ मेरे निरंकार की, कहत मलूक दिवाना ॥ ३ ॥
॥ शब्द ६ ॥
सब से लालच का मत खोटा ।
लालच तें बैपारी सिट्ठी, दिन दिन आवै टोटा२ ॥ १ ॥
(१) ईर्षा और आपा । (२) घाटा ।
३