मलूकदास जी की बानी (बेलवेडियर प्रेस, इलाहाबाद - ज्ञानपरोछी, साखी एवं अमर पद संग्रह)
Malukdas Ji Ki Bani: Belvedere Steam Printing Press Allahabad
सन्त मलूकदास (सम्पादक: बेलवेडियर प्रेस) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२२ मलूकदासजी की बानी
हमहीं रावन हमहीं कंस । हमहीं मारा अपना बंस ॥३॥
हमहिं जियावैं हमहीं मारैं । हमहीं बोरैं हमहीं तारैं ॥४॥
जहाँ तहाँ सब जोति हमारी । हमहिं पुरुष हमहीं है नारी ॥५॥
ऐसी बिधि कोई लव लावै । सो अविगत से टहल करावै ॥६॥
सहै कुसबद और सुमिरै नाँव । सब जग देखै एकै भाव ॥७॥
या पद का कोई करै निबेरा । कह मलूक मैं ता का चेरा ॥८॥
॥ शब्द ३ ॥
बाबा मन का है सिर तले ॥ टेक ॥
माया के अभिमान भूले, गर्ब ही में गले ॥ १ ॥
जिभ्या कारन खून कीये, बाँधि जमपुर चले ॥ २ ॥
रामजी सों भये बेमुख, अगिन अपनी जले ॥ ३ ॥
हरि भजे से भये निरभय, टारहू नहिं टरे ॥ ४ ॥
कह मलूका जहँ गरीबी, तेई सब से भले ॥ ५ ॥
॥ शब्द ४ ॥
तू साहेब लीये खड़ा, बन्दा नासबूरा ।
जैसा जिसको चाहिये, देता भरपूरा ॥ १ ॥
लाख करोड़ जो गाँठि में, तौ भी यह रोवै ।
मरता मारे फिकिर के, सुख कबहुँ न सोवै ॥ २ ॥
आँखें फेरै बुरी भाँति, देखत डर लागै ।
लेखा जो कौड़ी चले, दिन चारक जागे ॥ ३ ॥
बिन संतोष दुखी भया, बहुते भरमाया ।
कहत मलूक यह जानकर, सरनागति आया ॥ ४ ॥
॥ शब्द ५ ॥
राम मैं ससा भयो तन धरि के ।
प्रभु की सरन में कीन्ह बिलावट आनि घुसा मैं डरिके ॥ १ ॥
कुकरा पाँच पचीस कुकरिया सदा रहें मोहिं घेरे ।
ठाढ़ होउँ तौ पिंडुरी पकरैं बैठे आँखि गुरेरैं ॥ २ ॥