महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व
Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1209, कुल 2566 में से
संदर्भ में पढ़ेंदेवि! फिर वह स्वर्गलोकसे नीचे आनेपर मनुष्य-जातिके भीतर महान् भोगोंसे सम्पन्न कुलमें जन्म लेता है और धन-धान्यसे सम्पन्न होता है॥ ७॥
तत्र कामगुणैः सर्वैः समुपेतो मुदा युतः ।
महाभोगो महाकोशो धनी भवति मानवः ॥ ८ ॥
मानवयोनिमें वह समस्त कमनीय गुणोंसे सम्पन्न एवं प्रसन्न होता है। उसके पास महान् भोगसामग्री संचित रहती है। उसका खजाना भी विशाल होता है। वह मनुष्य सभी दृष्टियोंसे धनवान् होता है॥ ८॥
एते देवि महाभागाः प्राणिनो दानशीलिनः ।
ब्रह्मणा वै पुरा प्रोक्ताः सर्वस्य प्रियदर्शनाः ॥ ९ ॥
देवि! ये दानशील प्राणी ही ऐसे महान् सौभाग्यसे सम्पन्न होते हैं। पूर्वकालमें ब्रह्माजीने इनका ऐसा ही परिचय दिया है। दाता मनुष्य सभीकी दृष्टिमें प्रिय होते हैं॥ ९॥
अपरे मानवा देवि प्रदानकृपणा द्विजैः ।
याचिता न प्रयच्छन्ति विद्यमानेऽप्यबुद्धयः ॥ १० ॥
देवि! दूसरे बहुत-से मनुष्य दान देनेमें कृपण होते हैं। वे मन्दबुद्धि मानव ब्राह्मणोंके माँगनेपर अपने पास धन होते हुए भी उन्हें कुछ नहीं देते॥ १०॥
दीनान्धकृपणान् दृष्ट्वा भिक्षुकानतिथीनपि ।
याच्यमाना निवर्तन्ते जिह्वालोभसमन्विताः ॥ ११ ॥
वे दीनों, अन्धों, दरिद्रों, भिखमंगों और अतिथियोंको देखते ही हट जाते हैं। उनके याचना करनेपर भी जिह्वाकी लोलुपताके कारण उन्हें अन्न नहीं देते॥ ११॥
न धनानि न वासांसि न भोगान् न च काञ्चनम् ।
न गावो नान्नविकृतिं प्रयच्छन्ति कदाचन ॥ १२ ॥
वे न धन, न वस्त्र, न भोग, न सुवर्ण, न गौ और न अन्नकी बनी हुई नाना प्रकारकी खाद्य वस्तुओंका कभी दान करते हैं॥ १२॥
अप्रवृत्ताश्च ये लुब्धा नास्तिका दानवर्जिताः ।
एवंभूता नरा देवि निरयं यान्त्यबुद्धयः ॥ १३ ॥
देवि! ऐसे अकर्मण्य, लोभी, नास्तिक तथा दानधर्मसे दूर रहनेवाले बुद्धिहीन मनुष्य नरकमें पड़ते हैं॥ १३॥
ते वै मनुष्यतां यान्ति यदा कालस्य पर्ययात् ।
धनरिक्ते कुले जन्म लभन्ते स्वल्पबुद्धयः ॥ १४ ॥
यदि कालचक्रके फेरसे वे मन्दबुद्धि मानव पुनः मनुष्ययोनिमें जन्म लेते हैं तो निर्धन कुलमें ही उत्पन्न होते हैं॥ १४॥
क्षुत्पिपासापरीताश्च सर्वलोकबहिष्कृताः ।
निराशाः सर्वभोगेभ्यो जीवन्त्यधर्मजीविकाम् ॥ १५ ॥