महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व
Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 607, कुल 2566 में से
संदर्भ में पढ़ेंजो मनुष्य अनुराधा नक्षत्रमें उपवास करके ओढ़नेका वस्त्र और उत्तम अन्न दान करता है, वह सौ युगोंतक स्वर्गलोकमें सम्मानपूर्वक रहता है ॥ २२ ॥
कालशाकं तु विप्रेभ्यो दत्त्वा मर्त्यः समूलकम् ।
ज्येष्ठायामृद्धिमिष्टां वै गतिमिष्टां स गच्छति ॥ २३ ॥
जो मनुष्य ज्येष्ठा नक्षत्रमें ब्राह्मणोंको समयोचित शाक और मूली दान करता है, वह अभीष्ट समृद्धि और सद्गतिको प्राप्त होता है ॥ २३ ॥
मूले मूलफलं दत्त्वा ब्राह्मणेभ्यः समाहितः ।
पितॄन् प्रीणयते चापि गतिमिष्टां च गच्छति ॥ २४ ॥
मूल नक्षत्रमें एकाग्रचित्त हो ब्राह्मणोंको मूल-फल दान करनेवाला मनुष्य पितरोंको तृप्त करता और अभीष्ट गतिको पाता है ॥ २४ ॥
अथ पूर्वास्वषाढासु दधिपात्राण्युपोषितः ।
कुलवृत्तोपसम्पन्ने ब्राह्मणे वेदपारगे ॥ २५ ॥
पुरुषो जायते प्रेत्य कुले सुबहुगोधने ।
पूर्वाषाढ़ा नक्षत्रमें उपवास करके कुलीन, सदाचारी एवं वेदोंके पारंगत विद्वान् ब्राह्मणको दहीसे भरे हुए पात्रका दान करनेवाला मनुष्य मृत्युके पश्चात् ऐसे कुलमें जन्म लेता है, जहाँ गोधनकी अधिकता होती है ॥
उदमन्थं ससर्पिष्कं प्रभूतमधिफाणितम् ।
दत्त्वोत्तरास्वषाढासु सर्वकामानवाप्नुयात् ॥ २६ ॥
जो उत्तराषाढ़ा नक्षत्रमें जलपूर्ण कलशसहित सत्तूकी बनी हुई खाद्य वस्तु, घी और प्रचुर माखन दान करता है, वह सम्पूर्ण मनोवांछित भोगोंको प्राप्त कर लेता है ॥
दुग्धं त्वभिजिते योगे दत्त्वा मधुघृतप्लुतम् ।
धर्मनित्यो मनीषिभ्यः स्वर्गलोके महीयते ॥ २७ ॥
जो नित्य धर्मपरायण पुरुष अभिजित् नक्षत्रके योगमें मनीषी ब्राह्मणोंको मधु और घीसे युक्त दूध देता है, वह स्वर्गलोकमें सम्मानित होता है ॥ २७ ॥
श्रवणे कम्बलं दत्त्वा वस्त्रान्तरितमेव वा ।
श्वेतेन याति यानेन स्वर्गलोकानसंवृतान् ॥ २८ ॥
जो श्रवण नक्षत्रमें वस्त्रवेष्टित कम्बल दान करता है, वह श्वेत विमानके द्वारा खुले हुए स्वर्गलोकमें जाता है ॥
गोप्रयुक्तं धनिष्ठासु यानं दत्त्वा समाहितः ।
वस्त्रराशिधनं सद्यः प्रेत्य राज्यं प्रपद्यते ॥ २९ ॥
जो धनिष्ठा नक्षत्रमें एकाग्रचित्त होकर बैलगाड़ी, वस्त्र-समूह तथा धन दान करता है, वह मृत्युके पश्चात् शीघ्र ही राज्य पाता है ॥ २९ ॥
गन्धान् शतभिषायोगे दत्त्वा सागुरुचन्दनान् ।