महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व
Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1588, कुल 2566 में से
संदर्भ में पढ़ेंपित्र्यमस्मि तव क्षेत्रं बहु मन्ये च ते भृशम् ।
तवास्मि याज्यतां प्राप्तो भजमानं भजस्व माम् ॥ ७ ॥
**मरुत्त बोले—**विप्रवर! मैं आपके पिताके समयसे ही आपका यजमान हूँ तथा विशेष सम्मान करता हूँ। आपका शिष्य हूँ और आपकी सेवामें तत्पर रहता हूँ। अतः मुझे अपनाइये ॥ ७ ॥
बृहस्पतिरुवाच
अमर्त्यं याजयित्वाहं याजयिष्ये कथं नरम् ।
मरुत्त गच्छ वा मा वा निवृत्तोऽस्म्यद्य याजनात् ॥ ८ ॥
**बृहस्पतिजीने कहा—**मरुत्त! अमरोंका यज्ञ करानेके बाद मैं मरणधर्मा मनुष्योंका यज्ञ कैसे कराऊँगा? तुम जाओ या रहो। अब मैं मनुष्योंका यज्ञकार्य करानेसे निवृत्त हो गया हूँ ॥ ८ ॥
न त्वां याजयितास्म्यद्य वृणु यं त्वमिहेच्छसि ।
उपाध्यायं महाबाहो यस्ते यज्ञं करिष्यति ॥ ९ ॥
महाबाहो! मैं तुम्हारा यज्ञ नहीं कराऊँगा। तुम दूसरे जिसको चाहो उसीको अपना पुरोहित बना लो। जो तुम्हारा यज्ञ करायेगा ॥ ९ ॥
व्यास उवाच
एवमुक्तस्तु नृपतिर्मरुत्तो व्रीडितोऽभवत् ।
प्रत्यागच्छन् सुसंविग्नो ददर्श पथि नारदम् ॥ १० ॥
**व्यासजी कहते हैं—**राजन्! बृहस्पतिजीसे ऐसा उत्तर पाकर महाराज मरुत्तको बड़ा संकोच हुआ। वे बहुत खिन्न होकर लौटे जा रहे थे, उसी समय मार्गमें उन्हें देवर्षि नारदजीका दर्शन हुआ ॥ १० ॥
देवर्षिणा समागम्य नारदेन स पार्थिवः ।
विधिवत् प्राञ्जलिस्तस्थावथैनं नारदोऽब्रवीत् ॥ ११ ॥
देवर्षि नारदके साथ समागम होनेपर राजा मरुत्त यथाविधि हाथ जोड़कर खड़े हो गये। तब नारदजीने उनसे कहा— ॥ ११ ॥
राजर्षे नातिहृष्टोऽसि कच्चित् क्षेमं तवानघ ।
क्व गतोऽसि कुतश्चेदमप्रीतिस्थानमागतम् ॥ १२ ॥
'राजर्षे! तुम अधिक प्रसन्न नहीं दिखायी देते हो। निष्पाप नरेश! तुम्हारे यहाँ कुशल तो है न? कहाँ गये थे और किस कारण तुम्हें यह खेदका अवसर प्राप्त हुआ है? ॥ १२ ॥
श्रोतव्यं चेन्मया राजन् ब्रूहि मे पार्थिवर्षभ ।
व्यपनेष्यामि ते मन्युं सर्वयत्नैर्नराधिप ॥ १३ ॥