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सर्वकोश
महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,566 पृष्ठ

पृष्ठ 1124, कुल 2566 में से

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पृष्ठ 1124

राजा सुमन्युने भक्ष्य, भोज्य पदार्थोंके पर्वत-जैसे कितने ही ढेर लगाकर उन्हें शाण्डिल्यको दान दिया था। जिससे उन्होंने स्वर्गलोकमें स्थान प्राप्त कर लिया ।।
नाम्ना च द्युतिमान् नाम शाल्वराजो महाद्युतिः ।
दत्त्वा राज्यमृचीकाय गतो लोकाननुत्तमान् ॥ २३ ॥
महातेजस्वी शाल्वराज द्युतिमान् महर्षि ऋचीकको राज्य देकर सर्वोत्तम लोकोंमें चले गये ।। २३ ।।
मदिराश्वश्च राजर्षिर्दत्त्वा कन्यां सुमध्यमाम् ।
हिरण्यहस्ताय गतो लोकान् देवैरधिष्ठितान् ॥ २४ ॥
राजर्षि मदिराश्व अपनी सुन्दरी कन्या विप्रवर हिरण्यहस्तको देकर देवताओंके लोकमें चले गये ।।
लोमपादश्च राजर्षिः शान्तां दत्त्वा सुतां प्रभुः ।
ऋष्यशृङ्गाय विपुलैः सर्वैः कामैरयुज्यत ॥ २५ ॥
प्रभावशाली राजर्षि लोमपादने मुनिवर ऋष्यशृंगको अपनी शान्ता नामवाली कन्या दान की थी, इससे उनकी सम्पूर्ण कामनाएँ पूर्णरूपसे सफल हुईं ।। २५ ।।
कौत्साय दत्त्वा कन्यां तु हंसीं नाम यशस्विनीम् ।
गतोऽक्षयानतो लोकान् राजर्षिश्च भगीरथः ॥ २६ ॥
राजर्षि भगीरथ अपनी यशस्विनी कन्या हंसीका कौत्स ऋषिको दान करके अक्षय लोकोंमें गये हैं ।। २६ ।।
दत्त्वा शतसहस्रं तु गवां राजा भगीरथः ।
सवत्सानां कोहलाय गतो लोकाननुत्तमान् ॥ २७ ॥
राजा भगीरथने कोहल नामक ब्राह्मणको एक लाख सवत्सा गौएँ दान कीं, जिससे उन्हें उत्तम लोकोंकी प्राप्ति हुई ।। २७ ।।
एते चान्ये च बहवो दानेन तपसा च ह ।
युधिष्ठिर गताः स्वर्गं विवर्तन्ते पुनः पुनः ॥ २८ ॥
युधिष्ठिर! ये तथा और भी बहुत-से राजा दान और तपस्याके प्रभावसे बारंबार स्वर्गलोकको जाते और पुनः वहाँसे इस लोकमें लौट आते हैं ।। २८ ।।
तेषां प्रतिष्ठिता कीर्तिर्यावत् स्थास्यति मेदिनी ।
गृहस्थैर्दानतपसा यैर्लोका वै विनिर्जिताः ॥ २९ ॥
जिन गृहस्थोंने दान और तपस्याके बलसे उत्तम लोकोंपर विजय पायी है, उनकी कीर्ति इस लोकमें तबतक प्रतिष्ठित रहेगी, जबतक कि यह पृथ्वी स्थिर रहेगी ।। २९ ।।
शिष्टानां चरितं ह्येतत् कीर्तितं मे युधिष्ठिर ।
दानयज्ञप्रजासङ्गैरैते हि दिवमास्थिताः ॥ ३० ॥