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सर्वकोश
महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,566 पृष्ठ

पृष्ठ 1083, कुल 2566 में से

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पृष्ठ 1083

परमान्नेन यो दद्यात् पितॄणामौपहारिकम् ॥ ३५ ॥
गजच्छायायां पूर्वस्यां कुतपे दक्षिणामुखः ।
यदा भाद्रपदे मासि भवते बहुले मघा ॥ ३६ ॥
श्रूयतां तस्य दानस्य यादृशो गुणविस्तरः ।
कृतं तेन महच्छ्राद्धं वर्षाणीह त्रयोदश ॥ ३७ ॥
**विश्वामित्र बोले—**देवताओ! यह धर्मसम्बन्धी परम गोपनीय रहस्य सुनो, जब भाद्रपदमासके कृष्णपक्षमें त्रयोदशी तिथिको मघा नक्षत्रका योग हो, उस समय जो मनुष्य दक्षिणाभिमुख हो कुतप कालमें (मध्याह्नके बाद आठवें मुहूर्तमें) जब कि हाथीकी छाया पूर्व दिशाकी ओर पड़ रही हो, उस छायामें ही स्थित हो पितरोंके निमित्त उपहारके रूपमें उत्तम अन्नका दान करता है, उस दानका जैसा विस्तृत फल बताया गया है, वह सुनो। दान करनेवाले उस पुरुषने इस जगत्‌में तेरह वर्षोंके लिये पितरोंका महान् श्राद्ध सम्पन्न कर दिया, ऐसा जानना चाहिये ॥ ३५—३७ ॥

गाव ऊचुः
बहुले समंगे ह्यकुतोऽभये च
क्षेमे च सख्येव हि भूयसी च ।
यथा पुरा ब्रह्मपुरे सवत्सा
शतक्रतोर्वज्रधरस्य यज्ञे ॥ ३८ ॥
भूयश्च या विष्णुपदे स्थिता या
विभावसोश्चापि पथे स्थिता या ।
देवाश्च सर्वे सह नारदेन
प्रकुर्वते सर्वसहेति नाम ॥ ३९ ॥
**गौओंने कहा—**पूर्वकालमें ब्रह्मलोकके भीतर वज्रधारी इन्द्रके यज्ञमें 'बहुले! समंगे! अकुतोभये! क्षेमे! सखी, भूयसी' इन नामोंका उच्चारण करके बछड़ोंसहित गौओंकी स्तुति की गयी थी, फिर जो-जो गौएँ आकाशमें स्थित थीं और जो सूर्यके मार्गमें विद्यमान थीं, नारदसहित सम्पूर्ण देवताओंने उनका 'सर्वसहा' नाम रख दिया ॥ ३८-३९ ॥
मन्त्रेणैतेनाभिवन्देत यो वै
विमुच्यते पापकृतेन कर्मणा ।
लोकानवाप्नोति पुरंदरस्य
गवां फलं चन्द्रमसो द्युतिं च ॥ ४० ॥
ये दोनों श्लोक मिलकर एक मन्त्र है। उस मन्त्रसे जो गौओंकी वन्दना करता है, वह पापकर्मसे मुक्त हो जाता है। गोसेवाके फलस्वरूप उसे इन्द्रलोककी प्राप्ति होती है तथा वह चन्द्रमाके समान कान्तिलाभ करता है ॥ ४० ॥