महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व
Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
श्रीकृष्णद्वारा भगवान् शङ्करके माहात्म्यका वर्णन
षष्ट्यधिकशततमोऽध्यायः
श्रीकृष्णद्वारा भगवान् शङ्करके माहात्म्यका वर्णन
युधिष्ठिर उवाच
दुर्वाससः प्रसादात् ते यत् तदा मधुसूदन ।
अवाप्तमिह विज्ञानं तन्मे व्याख्यातुमर्हसि ॥ १ ॥
युधिष्ठिरने पूछा— मधुसूदन! उस समय दुर्वासाके प्रसादसे इहलोकमें आपको जो विज्ञान प्राप्त हुआ, उसे विस्तारपूर्वक मुझे बताइये ॥ १ ॥
महाभाग्यं च यत् तस्य नामानि च महात्मनः ।
तत् त्वत्तो ज्ञातुमिच्छामि सर्वं मतिमतां वर ॥ २ ॥
बुद्धिमानोंमें श्रेष्ठ श्रीकृष्ण! उन महात्माके महान् सौभाग्यको और उनके नामोंको मैं यथार्थरूपसे जानना चाहता हूँ। वह सब विस्तारपूर्वक बताइये ॥ २ ॥
वासुदेव उवाच
हन्त ते कीर्तयिष्यामि नमस्कृत्य कपर्दिने ।
यदवाप्तं मया राजन् श्रेयो यच्चार्जितं यशः ॥ ३ ॥
भगवान् श्रीकृष्णने कहा— राजन्! मैं जटाजूटधारी भगवान् शंकरको नमस्कार करके प्रसन्नतापूर्वक यह बता रहा हूँ कि मैंने कौन-सा श्रेय प्राप्त किया और किस यशका उपार्जन किया ॥ ३ ॥
प्रयतः प्रातरुत्थाय यदधीये विशाम्पते ।
प्राञ्जलिः शतरुद्रीयं तन्मे निगदतः शृणु ॥ ४ ॥
प्रजानाथ! मैं प्रतिदिन प्रातःकाल उठकर मन और इन्द्रियोंको संयममें रखते हुए हाथ जोड़कर जिस शतरुद्रियका जप एवं पाठ करता हूँ, उसे बता रहा हूँ; सुनो ॥ ४ ॥
प्रजापतिस्तत् ससृजे तपसोऽन्ते महातपाः ।
शङ्करस्त्वसृजत् तात प्रजाः स्थावरजङ्गमाः ॥ ५ ॥
तात! महातपस्वी प्रजापतिने तपस्याके अन्तमें उस शतरुद्रियकी रचना की और शंकरजीने समस्त चराचर प्राणियोंकी सृष्टि की ॥ ५ ॥
नास्ति किंचित् परं भूतं महादेवाद् विशाम्पते ।
इह त्रिष्वपि लोकेषु भूतानां प्रभवो हि सः ॥ ६ ॥
प्रजानाथ! तीनों लोकोंमें महादेवजीसे बढ़कर दूसरा कोई श्रेष्ठ देवता नहीं है; क्योंकि वे समस्त भूतोंकी उत्पत्तिके कारण हैं ॥ ६ ॥
न चैवोत्सहते स्थातुं कश्चिदग्रे महात्मनः ।
न हि भूतं समं तेन त्रिषु लोकेषु विद्यते ॥ ७ ॥
उन महात्मा शंकरके सामने कोई भी खड़ा होनेका साहस नहीं कर सकता। तीनों लोकोंमें कोई भी प्राणी उनकी समता करनेवाला नहीं है ॥ ७ ॥
गन्धेनापि हि संग्रामे तस्य क्रुद्धस्य शत्रवः ।
विसंज्ञा हतभूयिष्ठा वेपन्ते च पतन्ति च ॥ ८ ॥
संग्राममें जब वे कुपित होते हैं, उस समय उनकी गन्धसे भी सारे शत्रु अचेत और मृतप्राय होकर थर-थर काँपने एवं गिरने लगते हैं ॥ ८ ॥
घोरं च निनदं तस्य पर्जन्यनिनदोपमम् ।
श्रुत्वा विशीर्येद् हृदयं देवानामपि संयुगे ॥ ९ ॥
संग्राममें मेघगर्जनाके समान गम्भीर उनका घोर सिंहनाद सुनकर देवताओंका भी हृदय विदीर्ण हो सकता है ॥ ९ ॥
यांश्च घोरेण रूपेण पश्येत् क्रुद्धः पिनाकधृत् ।
न सुरा नासुरा लोके न गन्धर्वा न पन्नगाः ॥ १० ॥
कुपिते सुखमेधन्ते तस्मिन्नपि गुहागताः ।
पिनाकधारी रुद्र कुपित होकर जिन्हें भयंकररूपसे देख लें, उनके भी हृदयके टुकड़े-टुकड़े हो जायँ। संसारमें भगवान् शंकरके कुपित हो जानेपर देवता, असुर, गन्धर्व और नाग यदि भागकर गुफामें छिप जायँ तो भी सुखसे नहीं रह सकते ॥ १० १/२ ॥
प्रजापतेश्च दक्षस्य यजतो वितते क्रतौ ॥ ११ ॥
विव्याध कुपितो यज्ञं निर्भयस्तु भवस्तदा ।
धनुषा बाणमुत्सृज्य सघोषं विननाद च ॥ १२ ॥
प्रजापति दक्ष जब यज्ञ कर रहे थे, उस समय उनका यज्ञ आरम्भ होनेपर कुपित हुए भगवान् शंकरने निर्भय होकर उनके यज्ञको अपने बाणोंसे बींध डाला और धनुषसे बाण छोड़कर गम्भीर स्वरमें सिंहनाद किया ॥ ११-१२ ॥
ते न शर्म कुतः शान्तिं विषादं लेभिरे सुराः ।
विद्धे च सहसा यज्ञे कुपिते च महेश्वरे ॥ १३ ॥
इससे देवता बेचैन हो गये, फिर उन्हें शान्ति कैसे मिले। जब यज्ञ सहसा बाणोंसे बिंध गया और महेश्वर कुपित हो गये तब बेचारे देवता विषादमें डूब गये ॥ १३ ॥
तेन ज्यातलघोषेण सर्वे लोकाः समाकुलाः ।
बभूवुरवशाः पार्थ विषेदुश्च सुरसुराः ॥ १४ ॥
पार्थ! उनके धनुषकी प्रत्यंचाके शब्दसे समस्त लोक व्याकुल और विवश हो उठे और सभी देवता एवं असुर विषादमें मग्न हो गये ॥ १४ ॥
आपश्चक्षुभिरे चैव चकम्पे च वसुन्धरा ।
व्यद्रवन् गिरयश्चापि द्यौः पफाल च सर्वशः ॥ १५ ॥
समुद्र आदिका जल क्षुब्ध हो उठा, पृथ्वी काँपने लगी, पर्वत पिघलने लगे और आकाश सब ओरसे फटने-सा लगा ॥ १५ ॥
अन्धेन तमसा लोकाः प्रावृता न चकाशिरे ।
प्रणष्टा ज्योतिषां भाश्व सह सूर्येण भारत ॥ १६ ॥
समस्त लोक घोर अन्धकारसे आवृत होनेके कारण प्रकाशित नहीं होते थे। भारत! ग्रहों और नक्षत्रोंका प्रकाश सूर्यके साथ ही नष्ट (अदृश्य) हो गया ॥ १६ ॥
भृशं भीतास्ततः शान्तिं चक्रुः स्वस्त्ययनानि च ।
ऋषयः सर्वभूतानामात्मनश्च हितैषिणः ॥ १७ ॥
सम्पूर्ण भूतोंका और अपना भी हित चाहनेवाले ऋषि अत्यन्त भयभीत हो शान्ति एवं स्वस्तिवाचन आदि कर्म करने लगे ॥ १७ ॥
ततः सोऽभ्यद्रवद् देवान् रुद्रो रौद्रपराक्रमः ।
भगस्य नयने क्रुद्धः प्रहारेण व्यशातयत् ॥ १८ ॥
तदनन्तर भयानक पराक्रमी रुद्र देवताओंकी ओर दौड़े। उन्होंने क्रोधपूर्वक प्रहार करके भगदेवताके नेत्र नष्ट कर दिये ॥ १८ ॥
पूषणं चाभिदुद्राव पादेन च रुषान्वितः ।
पुरोडाशं भक्षयतो दशनान् वै व्यशातयत् ॥ १९ ॥
फिर उन्होंने रोषमें भरकर पैदल ही पूषादेवताका पीछा किया और पुरोडाश भक्षण करनेवाले उनके दाँतोंको तोड़ डाला ॥ १९ ॥
ततः प्रणेमुर्देवास्ते वेपमानाः स्म शङ्करम् ।
पुनश्च संदधे रुद्रो दीप्तं सुनिशितं शरम् ॥ २० ॥
तब सब देवता काँपते हुए वहाँ भगवान् शंकरको प्रणाम करने लगे। इधर रुद्रदेवने पुनः एक प्रज्वलित एवं तीखे बाणका संधान किया ॥ २० ॥
रुद्रस्य विक्रमं दृष्ट्वा भीता देवाः सहर्षिभिः ।
ततः प्रसादयामासुः शर्वं ते विबुधोत्तमाः ॥ २१ ॥
रुद्रका पराक्रम देखकर ऋषियोंसहित सम्पूर्ण देवता थर्रा उठे। फिर उन श्रेष्ठ देवताओंने भगवान् शिवको प्रसन्न किया ॥ २१ ॥
जेपुश्च शतरुद्रीयं देवाः कृत्वाञ्जलिं तदा ।
संस्तूयमानस्त्रिदशैः प्रसाद महेश्वरः ॥ २२ ॥
उस समय देवतालोग हाथ जोड़कर शतरुद्रियका जप करने लगे। देवताओंके द्वारा अपनी स्तुति की जानेपर महेश्वर प्रसन्न हो गये ॥ २२ ॥
रुद्रस्य भागं यज्ञे च विशिष्टं ते त्वकल्पयन् ।
भयेन त्रिदशा राजन् शरणं च प्रपेदिरे ॥ २३ ॥
राजन्! देवतालोग भयके मारे भगवान् शंकरकी शरणमें गये। उन्होंने यज्ञमें रुद्रके लिये विशिष्ट भागकी कल्पना की (यज्ञावशिष्ट सारी सामग्री रुद्रके अधिकारमें दे दी) ॥ २३ ॥
तेन चैव हि तुष्टेन स यज्ञः संधितोऽभवत् ।
यद् यच्चापहृतं तत्र तत्तथैवान्वजीवयत् ॥ २४ ॥
भगवान् शंकरके संतुष्ट होनेपर वह यज्ञ पुनः पूर्ण हुआ। उसमें जिस-जिस वस्तुको नष्ट किया गया था, उन सबको उन्होंने पुनः पूर्ववत् जीवित कर दिया ॥ २४ ॥
असुराणां पुराण्यासंत्रीणि वीर्यवतां दिवि ।
आयसं राजतं चैव सौवर्णमपि चापरम् ॥ २५ ॥
पूर्वकालमें बलवान् असुरोंके तीन पुर (विमान) थे; जो आकाशमें विचरते रहते थे। उनमेंसे एक लोहेका, दूसरा चाँदीका और तीसरा सोनेका बना हुआ था ॥ २५ ॥
नाशकत् तानि मघवा जेतुं सर्वायुधैरपि ।
अथ सर्वेऽमरा रुद्रं जग्मुः शरणमर्दिताः ॥ २६ ॥
इन्द्र अपने सम्पूर्ण अस्त्र-शस्त्रोंका प्रयोग करके भी उन पुरोंपर विजय न पा सके। तब पीड़ित हुए समस्त देवता रुद्रदेवकी शरणमें गये ॥ २६ ॥
तत ऊचुर्महात्मानो देवाः सर्वे समागताः ।
रुद्र रौद्रा भविष्यन्ति पशवः सर्वकर्मसु ॥ २७ ॥
जहि दैत्यान् सह पुरैर्लोकांस्त्रायस्व मानद ।
तदनन्तर वहाँ पधारे हुए सम्पूर्ण महामना देवताओंने रुद्रदेवसे कहा—'भगवन् रुद्र! पशुतुल्य असुर हमारे समस्त कर्मोंके लिये भयंकर हो गये हैं और भविष्यमें भी ये हमें भय देते रहेंगे। अतः मानद! हमारी प्रार्थना है कि आप तीनों पुरोंसहित समस्त दैत्योंका नाश और लोकोंकी रक्षा करें' ॥ २७ १/२ ॥
स तथोक्तस्तथेत्युक्त्वा कृत्वा विष्णुं शरोत्तमम् ॥ २८ ॥
शल्यमग्निं तथा कृत्वा पुङ्खं वैवस्वतं यमम् ।
वेदान् कृत्वा धनुः सर्वान् ज्यां च सावित्रिमुत्तमाम् ॥ २९ ॥
ब्रह्माणं सारथिं कृत्वा विनियुज्य च सर्वशः ।
त्रिपर्वणा त्रिशल्येन तेन तानि बिभेद सः ॥ ३० ॥
उनके ऐसा कहनेपर भगवान् शिवने 'तथास्तु' कहकर उनकी बात मान ली और भगवान् विष्णुको उत्तम बाण, अग्निको उस बाणका शल्य, वैवस्वत यमको पंख, समस्त वेदोंको धनुष, गायत्रीको उत्तम प्रत्यंचा और ब्रह्माको सारथि बनाकर सबको यथावत् रूपसे अपने-अपने कार्योंमें नियुक्त करके तीन पर्व और तीन शल्यवाले उस बाणके द्वारा उन तीनों पुरोंको विदीर्ण कर डाला ॥ २८—३० ॥
शरेणादित्यवर्णेन कालाग्निसमतेजसा ।
तेऽसुराः सपुरास्तत्र दग्धा रुद्रेण भारत ॥ ३१ ॥
भारत! वह बाण सूर्यके समान कान्तिमान् और प्रलयाग्निके समान तेजस्वी था। उसके द्वारा रुद्रदेवने उन तीनों पुरोंसहित वहाँके समस्त असुरोंको जलाकर भस्म कर दिया ॥ ३१ ॥
तं चैवाङ्कगतं दृष्ट्वा बालं पञ्चशिखं पुनः ।
उमा जिज्ञासमाना वै कोऽयमित्यब्रवीत् तदा ॥ ३२ ॥
फिर वे पाँच शिखावाले बालकके रूपमें प्रकट हुए और उमादेवी उन्हें अंकमें लेकर देवताओंसे पूछने लगीं—‘पहचानो, ये कौन हैं?’ ॥ ३२ ॥
असूयतश्च शक्रस्य वज्रेण प्रहरिष्यतः ।
स वज्रं स्तम्भयामास तं बाहुं परिघोपमम् ॥ ३३ ॥
उस समय इन्द्रको बड़ी ईर्ष्या हुई। वे वज्रसे उस बालकपर प्रहार करना ही चाहते थे कि उसने परिघके समान मोटी उनकी उस बाँहको वज्रसहित स्तम्भित कर दिया ॥ ३३ ॥
न सम्बुबुधिरे चैव देवास्तं भुवनेश्वरम् ।
सप्रजापतयः सर्वे तस्मिन् मुमुहुरीश्वरे ॥ ३४ ॥
समस्त देवता और प्रजापति उन भुवनेश्वर महादेवजीको न पहचान सके। सबको उन ईश्वरके विषयमें मोह छा गया ॥ ३४ ॥
ततो ध्यात्वा च भगवान् ब्रह्मा तममितौजसम् ।
अयं श्रेष्ठ इति ज्ञात्वा ववन्दे तमुमापतिम् ॥ ३५ ॥
तब भगवान् ब्रह्माने ध्यान करके उन अमित-तेजस्वी उमापतिको पहचान लिया और ‘ये ही सबसे श्रेष्ठ देवता हैं’ ऐसा जानकर उन्होंने उनकी वन्दना की ॥ ३५ ॥
ततः प्रसादयामासुरुमां रुद्रं च ते सुराः ।
बभूव स तदा बाहुर्बलहन्तुर्यथा पुरा ॥ ३६ ॥
तत्पश्चात् उन देवताओंने उमादेवी और भगवान् रुद्रको प्रसन्न किया। तब इन्द्रकी वह बाँह पूर्ववत् हो गयी ॥ ३६ ॥
स चापि ब्राह्मणो भूत्वा दुर्वासा नाम वीर्यवान् ।
द्वारवत्यां मम गृहे चिरं कालमुपावसत् ॥ ३७ ॥
वे ही पराक्रमी महादेव दुर्वासा नामक ब्राह्मण बनकर द्वारकापुरीमें मेरे घरके भीतर दीर्घकालतक टिके रहे ॥ ३७ ॥
विप्रकारान् प्रयुङ्क्ते स्म सुबहून् मम वेश्मनि ।
तानुदारतया चाहं चक्षमे चातिदुःसहान् ॥ ३८ ॥
उन्होंने मेरे महलमें मेरे विरुद्ध बहुत-से अपराध किये। वे सभी अत्यन्त दुःसह थे तो भी मैंने उदारतापूर्वक क्षमा किया ॥ ३८ ॥
स वै रुद्रः स च शिवः सोऽग्निः सर्वः स सर्वजित् ।
स चैवेन्द्रश्च वायुश्च सोऽश्विनौ स च विद्युतः ॥ ३९ ॥
वे ही रुद्र हैं, वे ही शिव हैं, वे ही अग्नि हैं, वे ही सर्वस्वरूप और सर्वविजयी हैं। वे ही इन्द्र और वायु हैं, वे ही अश्विनीकुमार और विद्युत् हैं ॥ ३९ ॥
स चन्द्रमाः स चेशानः स सूर्यो वरुणश्च सः।
स कालः सोऽन्तको मृत्युः स यमो रात्र्यहानि च ॥ ४० ॥
वे ही चन्द्रमा, वे ही ईशान, वे ही सूर्य, वे ही वरुण, वे ही काल, वे ही अन्तक, वे ही मृत्यु, वे ही यम तथा वे ही रात और दिन हैं ॥ ४० ॥
मासार्धमासा ऋतवः संध्ये संवत्सरश्च सः।
स धाता स विधाता च विश्वकर्मा स सर्ववित् ॥ ४१ ॥
मास, पक्ष, ऋतु, संध्या और संवत्सर भी वे ही हैं। वे ही धाता, विधाता, विश्वकर्मा और सर्वज्ञ हैं ॥ ४१ ॥
नक्षत्राणि गृहाश्चैव दिशोऽथ प्रदिशस्तथा।
विश्वमूर्तिरमेयात्मा भगवान् परमद्युतिः ॥ ४२ ॥
नक्षत्र, गृह, दिशा, विदिशा भी वे ही हैं। वे ही विश्वरूप, अप्रमेयात्मा, षड्विध ऐश्वर्यसे युक्त एवं परम तेजस्वी हैं ॥ ४२ ॥
एकधा च द्विधा चैव बहुधा च स एव हि।
शतधा सहस्रधा चैव तथा शतसहस्रधा ॥ ४३ ॥
उनके एक, दो, अनेक, सौ, हजार और लाखों रूप हैं ॥ ४३ ॥
ईदृशः स महादेवो भूयश्च भगवानतः।
न हि शक्या गुणा वक्तुमपि वर्षशतैरपि ॥ ४४ ॥
भगवान् महादेव ऐसे प्रभावशाली हैं, बल्कि इससे भी बढ़कर हैं। सैकड़ों वर्षोंमें भी उनके गुणोंका वर्णन नहीं किया जा सकता ॥ ४४ ॥
इति श्रीमहाभारते अनुशासनपर्वणि दानधर्मपर्वणि ईश्वरप्रशंसा नाम षष्ट्यधिकशततमोऽध्यायः ॥ १६० ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत अनुशासनपर्वके अन्तर्गत दानधर्मपर्वमें ईश्वरकी प्रशंसा नामक एक सौ साठवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १६० ॥