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सर्वकोश
महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,566 पृष्ठ

पृष्ठ 1516, कुल 2566 में से

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पृष्ठ 1516

न हि भूतं समं तेन त्रिषु लोकेषु विद्यते ॥ ७ ॥
उन महात्मा शंकरके सामने कोई भी खड़ा होनेका साहस नहीं कर सकता। तीनों लोकोंमें कोई भी प्राणी उनकी समता करनेवाला नहीं है ॥ ७ ॥

गन्धेनापि हि संग्रामे तस्य क्रुद्धस्य शत्रवः ।
विसंज्ञा हतभूयिष्ठा वेपन्ते च पतन्ति च ॥ ८ ॥
संग्राममें जब वे कुपित होते हैं, उस समय उनकी गन्धसे भी सारे शत्रु अचेत और मृतप्राय होकर थर-थर काँपने एवं गिरने लगते हैं ॥ ८ ॥

घोरं च निनदं तस्य पर्जन्यनिनदोपमम् ।
श्रुत्वा विशीर्येद् हृदयं देवानामपि संयुगे ॥ ९ ॥
संग्राममें मेघगर्जनाके समान गम्भीर उनका घोर सिंहनाद सुनकर देवताओंका भी हृदय विदीर्ण हो सकता है ॥ ९ ॥

यांश्च घोरेण रूपेण पश्येत् क्रुद्धः पिनाकधृत् ।
न सुरा नासुरा लोके न गन्धर्वा न पन्नगाः ॥ १० ॥
कुपिते सुखमेधन्ते तस्मिन्नपि गुहागताः ।
पिनाकधारी रुद्र कुपित होकर जिन्हें भयंकररूपसे देख लें, उनके भी हृदयके टुकड़े-टुकड़े हो जायँ। संसारमें भगवान् शंकरके कुपित हो जानेपर देवता, असुर, गन्धर्व और नाग यदि भागकर गुफामें छिप जायँ तो भी सुखसे नहीं रह सकते ॥ १० १/२ ॥

प्रजापतेश्च दक्षस्य यजतो वितते क्रतौ ॥ ११ ॥
विव्याध कुपितो यज्ञं निर्भयस्तु भवस्तदा ।
धनुषा बाणमुत्सृज्य सघोषं विननाद च ॥ १२ ॥
प्रजापति दक्ष जब यज्ञ कर रहे थे, उस समय उनका यज्ञ आरम्भ होनेपर कुपित हुए भगवान् शंकरने निर्भय होकर उनके यज्ञको अपने बाणोंसे बींध डाला और धनुषसे बाण छोड़कर गम्भीर स्वरमें सिंहनाद किया ॥ ११-१२ ॥

ते न शर्म कुतः शान्तिं विषादं लेभिरे सुराः ।
विद्धे च सहसा यज्ञे कुपिते च महेश्वरे ॥ १३ ॥
इससे देवता बेचैन हो गये, फिर उन्हें शान्ति कैसे मिले। जब यज्ञ सहसा बाणोंसे बिंध गया और महेश्वर कुपित हो गये तब बेचारे देवता विषादमें डूब गये ॥ १३ ॥

तेन ज्यातलघोषेण सर्वे लोकाः समाकुलाः ।
बभूवुरवशाः पार्थ विषेदुश्च सुरसुराः ॥ १४ ॥
पार्थ! उनके धनुषकी प्रत्यंचाके शब्दसे समस्त लोक व्याकुल और विवश हो उठे और सभी देवता एवं असुर विषादमें मग्न हो गये ॥ १४ ॥

आपश्चक्षुभिरे चैव चकम्पे च वसुन्धरा ।
व्यद्रवन् गिरयश्चापि द्यौः पफाल च सर्वशः ॥ १५ ॥