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महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,566 पृष्ठ

[त्रिवर्गका निरूपण तथा कल्याणकारी आचार-व्यवहारका वर्णन]

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[त्रिवर्गका निरूपण तथा कल्याणकारी आचार-व्यवहारका वर्णन]
श्रीमहेश्वर उवाच

विद्या वार्ता च सेवा च कारुत्वं नाट्यता तथा ।
इत्येते जीवनार्थाय मर्त्यानां विहिताः प्रिये ॥
**श्रीमहेश्वरने कहा—**प्रिये! विद्या, वार्ता, सेवा, शिल्पकला और अभिनय-कला—ये मनुष्योंके जीवन-निर्वाहके लिये पाँच वृत्तियाँ बनायी गयी हैं॥

विद्यायोगस्तु सर्वेषां पूर्वमेव विधीयते ।
कार्याकार्यं विजानन्ति विद्यया देवि नान्यथा ॥
देवि! सभी मनुष्योंके लिये विद्याका योग पहले ही निश्चित कर दिया जाता है। विद्यासे लोग कर्तव्य और अकर्तव्यको जानते हैं, अन्यथा नहीं॥

विद्यया स्फीयते ज्ञानं ज्ञानात् तत्त्वविदर्शनम् ।
दृष्टतत्त्वो विनीतात्मा सर्वार्थस्य च भाजनम् ॥
विद्यासे ज्ञान बढ़ता है, ज्ञानसे तत्त्वका दर्शन होता है और तत्त्वका दर्शन कर लेनेके पश्चात् मनुष्य विनीतचित्त होकर समस्त पुरुषार्थोंका भाजन हो जाता है॥

शक्यं विद्याविनीतेन लोके संजीवनं शुभम् ॥
आत्मानं विद्यया तस्मात् पूर्वं कृत्वा तु भाजनम् ।
वश्येन्द्रियो जितक्रोधो भूतात्मानं तु भावयेत् ॥
विद्यासे विनीत हुआ पुरुष संसारमें शुभ जीवन बिता सकता है; अतः अपने आपको पहले विद्याद्वारा पुरुषार्थका भाजन बनाकर क्रोधविजयी एवं जितेन्द्रिय पुरुष सम्पूर्ण भूतोंके आत्मा-परमात्माका चिन्तन करे॥

भावयित्वा तदाऽऽत्मानं पूजनीयः सतामपि ॥
कुलानुवृत्तं वृत्तं वा पूर्वमात्मा समाश्रयेत् ।
परमात्माका चिन्तन करके मनुष्य सत्पुरुषोंके लिये भी पूजनीय बन जाता है। जीवात्मा पहले कुल-परम्परासे चले आते हुए सदाचारका ही आश्रय ले॥

यदि चेद् विद्यया चैव वृत्तिं काङ्क्षेतधात्मनः ॥
राजविद्यां तु वा देवि लोकविद्यामथापि वा ।
तीर्थतश्चापि गृह्णीयाच्छुश्रूषादिगुणैर्युतः ॥
ग्रन्थतश्चार्थतश्चैव दृढं कुर्यात् प्रयत्नतः ॥
देवि! यदि विद्यासे अपनी जीविका चलानेकी इच्छा हो तो शुश्रूषा आदि गुणोंसे सम्पन्न हो किसी गुरुसे राजविद्या अथवा लोकविद्याकी शिक्षा ग्रहण करे और उसे ग्रन्थ एवं अर्थके अभ्यासद्वारा प्रयत्नपूर्वक दृढ़ करे॥

एवं विद्याफलं देवि प्राप्नुयान्नान्यथा नरः ।

न्यायाद् विद्याफलानीच्छेदधर्मं तत्र वर्जयेत् ।।
देवि! ऐसा करनेसे मनुष्य विद्याका फल पा सकता है, अन्यथा नहीं। न्यायसे ही विद्याजनित फलोंको पानेकी इच्छा करे। वहाँ अधर्मको सर्वथा त्याग दे ।।

यदिच्छेद् वार्तया वृत्तिं काङ्क्षेत विधिपूर्वकम् ।
क्षेत्रे जलोपपन्ने च तद्योग्यं कृषिमाचरेत् ।।
यदि वार्त्तावृत्तिके द्वारा जीविका चलानेकी इच्छा हो तो जहाँ सींचनेके लिये जलकी व्यवस्था हो, ऐसे खेतमें तदनुरूप कार्य विधिपूर्वक करे ।।

वाणिज्यं वा यथाकालं कुर्यात् तद्देशयोगतः ।
मूल्यमर्थं प्रयासं च विचार्यैव व्ययोदयौ ।
अथवा यथासमय उस देशकी आवश्यकताके अनुसार वस्तु, उसके मूल्य, व्यय, लाभ और परिश्रम आदिका भलीभाँति विचार करके व्यापार करे ।।

पशुसंजीवनं चैव देशगः पोषयेद् ध्रुवम् ।।
बहुप्रकारा बहवः पशवस्तस्य साधकाः ।।
देशवासी पुरुषको पशुओंका पालन-पोषण भी अवश्य करना चाहिये। अनेक प्रकारके बहुसंख्यक पशु भी उसके लिये अर्थप्राप्तिके साधक हो सकते हैं ।।

यः कश्चित् सेवया वृत्तिं कांक्षेत मतिमान् नरः ।
यतात्मा श्रवणीयानां भवेद् वै सम्प्रयोजकः ।।
जो कोई बुद्धिमान् मनुष्य सेवाद्वारा जीवननिर्वाह करना चाहे तो वह मनको संयममें रखकर श्रवण करनेयोग्य मीठे वचनोंका प्रयोग करे ।।

यथा यथा स तुष्येत तथा संतोषयेत् तु तम् ।
अनुजीविगुणोपेतः कुर्यादात्मानमाश्रितम् ।।
जैसे-जैसे सेव्य स्वामी संतुष्ट रहे, वैसे ही वैसे उसे संतोष दिलावे। सेवकके गुणोंसे सम्पन्न हो अपने आपको स्वामीके आश्रित रखे ।।

विप्रियं नाचरेत् तस्य एषा सेवा समासतः ।।
विप्रयोगात् पुरा तेन गतिमन्यां न लक्षयेत् ।।
स्वामीका कभी अप्रिय न करे, यही संक्षेपसे सेवाका स्वरूप है। उसके साथ वियोग होनेसे पहले अपने लिये दूसरी कोई गति न देखे ।।

कारुकर्म च नाट्यं च प्रायशो नीचयोनिषु ।
तयोरपि यथायोगं न्यायातः कर्मवेतनम् ।।
शिल्पकर्म अथवा कारीगरी और नाट्यकर्म प्रायः निम्न जातिके लोगोंमें चलते हैं। शिल्प और नाट्यमें भी यथायोग्य न्यायानुसार कार्यका वेतन लेना चाहिये ।।

आर्जवेभ्योऽपि सर्वेभ्यः स्वार्जवाद् वेतनं हरेत् ।
अनार्जवादाहरतस्तत् तु पापाय कल्पते ।।

सरल व्यवहारवाले सभी मनुष्योंसे सरलतासे ही वेतन लेना चाहिये। कुटिलतासे वेतन लेनेवालेके लिये वह पापका कारण बनता है॥
सर्वेषां पूर्वमारम्भांश्चिन्तयेन्न्यायपूर्वकम्।
आत्मशक्तिमुपायांश्च देशकालौ च युक्तितः॥
कारणानि प्रवासं च प्रक्षेपं च फलोदयम्।
एवमादीनि संचिन्त्य दृष्ट्वा दैवानुकूलताम्।
अतः परं समारम्भेद् यत्रात्महितमाहितम्॥
जीविका-साधनके जितने उपाय हैं, उन सबके आरम्भोंपर पहले न्यायपूर्वक विचार करे। अपनी शक्ति, उपाय, देश, काल, कारण, प्रवास, प्रक्षेप और फलोदय आदिके विषयमें युक्तिपूर्वक विचार एवं चिन्तन करके दैवकी अनुकूलता देखकर जिसमें अपना हित निहित दिखायी दे, उसी उपायका आलम्बन करे॥
वृत्तिमेवं समासाद्य तां सदा परिपालयेत्।
दैवमानुषविघ्नेभ्यो न पुनर्भ्रश्यते यथा॥
इस प्रकार अपने लिये जीविकावृत्ति चुनकर उसका सदा ही पालन करे और ऐसा प्रयत्न करे, जिससे वह दैव और मानुष विघ्नोंसे पुनः उसे छोड़ न बैठे॥
पालयन् वर्धयन् भुञ्जांस्तां प्राप्य न विनाशयेत्।
क्षीयते गिरिसंकाशमश्रतो ह्यनपेक्षया॥
रक्षा, वृद्धि और उपभोग करते हुए उस वृत्तिको पाकर नष्ट न करे। यदि रक्षा आदिकी चिन्ता छोड़कर केवल उपभोग ही किया जाय तो पर्वत-जैसी धनराशि भी नष्ट हो जाती है॥
आजीवेभ्यो धनं प्राप्य चतुर्था विभजेद् बुधः।
धर्मायार्थाय कामाय आपत्प्रशमनाय च॥
आजीविकाके उपायोंसे धनका उपार्जन करके विद्वान् पुरुष धर्म, अर्थ, काम तथा संकट-निवारण—इन चारोंके उद्देश्यसे उस धनके चार भाग करे॥
चतुर्ष्वपि विभागेषु विधानं शृणु भामिनि॥
यज्ञार्थं चान्नदानार्थं दीनानुग्रहकारणात्॥
देवब्राह्मणपूजार्थं पितृपूजार्थमेव च॥
मूलार्थं संनिवासार्थं क्रियानित्यैश्च धार्मिकैः।
एवमादिषु चान्येषु धर्मार्थं संत्यजेद् धनम्॥
भामिनि! इन चारों विभागोंमें भी जैसा विधान है, उसे सुनो। यज्ञ करने, दीन-दुःखियोंपर अनुग्रह करके अन्न देने, देवताओं, ब्राह्मणों तथा पितरोंकी पूजा करने, मूलधनकी रक्षा करने, सत्पुरुषोंके रहने तथा क्रियापरायण धर्मात्मा पुरुषोंके सहयोगके लिये तथा इसी प्रकार अन्यान्य सत्कर्मोंके उद्देश्यसे धर्मार्थ धनका दान करे॥

धर्मकार्ये धनं दद्यादनवेक्ष्य फलोदयम् ।
ऐश्वर्यस्थानलाभार्थं राजवाल्लभ्यकारणात् ।।
वार्तायां च समारम्भेऽमात्यमित्रपरिग्रहे ।
आवाहे च विवाहे च पूर्णानां वृत्तिकारणात् ।।
अर्थोदयसमावाप्तावनर्थस्य विघातने ।
एवमादिषु चान्येषु अर्थार्थं विसृजेद् धनम् ।।
फलकी प्राप्तिका विचार न करके धर्मके कार्यमें धन देना चाहिये। ऐश्वर्यपूर्ण स्थानकी प्राप्तिके लिये, राजाका प्रिय होनेके लिये, कृषि, गोरक्षा अथवा वाणिज्यके आरम्भके लिये, मन्त्रियों और मित्रोंके संग्रहके लिये, आमन्त्रण और विवाहके लिये, पूर्ण पुरुषोंकी वृत्तिके लिये, धनकी उत्पत्ति एवं प्राप्तिके लिये तथा अनर्थके निवारण और ऐसे ही अन्य कार्योंके लिये अर्थार्थ धनका त्याग करना चाहिये ।।

अनुबन्धं हेतुयुक्तं दृष्ट्वा वित्तं परित्यजेत् ।
अनर्थं बाधते ह्यर्थो अर्थं चैव फलान्युत ।।
हेतुयुक्त अनुबन्ध (सकारण सम्बन्ध) देखकर उसके लिये धनका त्याग करना चाहिये। अर्थ अनर्थका निवारण करता है तथा धन एवं अभीष्ट फलकी प्राप्ति कराता है ।।

नाधनाः प्राप्नुवन्त्यर्थं नरा यत्नशतैरपि ।
तस्माद् धनं रक्षितव्यं दातव्यं च विधानतः ।।
निर्धन मनुष्य सैकड़ों यत्न करके भी धन नहीं पा सकते। अतः धनकी रक्षा करनी चाहिये तथा विधिपूर्वक उसका दान करना चाहिये ।।

शरीरपोषणार्थाय आहारस्य विशेषणे ।
एवमादिषु चान्येषु कामार्थं विसृजेद् धनम् ।।
शरीरके पोषणके लिये विशेष प्रकारके आहारकी व्यवस्था तथा ऐसे ही अन्य कार्योंके निमित्त कामार्थ धनका व्यय करना उचित है ।।

विचार्‍य गुणदोषौ तु त्रयाणां तत्र संत्यजेत् ।
चतुर्थं संनिदध्याच्च आपदर्थं शुचिस्मिते ।।
गुण-दोषका विचार करके धर्म, अर्थ और काम-सम्बन्धी धनोंका तत्तत् कार्योंमें व्यय करना चाहिये। शुचिस्मिते! धनका जो चौथा भाग है, उसे आपत्तिकालके लिये सदा सुरक्षित रखे ।।

राज्यभ्रंशविनाशार्थं दुर्भिक्षार्थं च शोभने ।
महाव्याधिविमोक्षार्थं वार्धक्यस्यैव कारणात् ।।
शत्रूणां प्रतिकाराय साहसैश्चाप्यमर्षणात् ।।
प्रस्थाने चान्य देशार्थमापदां विप्रमोक्षणे ।
एवमादि समुद्दिश्य संनिदध्यात् स्वकं धनम् ।।

शोभने! राज्य-विध्वंसका निवारण करने, दुर्भिक्षके समय काम आने, बड़े-बड़े रोगोंसे छुटकारा पाने, बुढ़ापेमें जीवन-निर्वाह करने, साहस और अमर्षपूर्वक शत्रुओंसे बदला लेने, विदेश-यात्रा करने तथा सब प्रकारकी आपत्तियोंसे छुटकारा पाने आदिके उद्देश्यसे अपने धनको अपने निकट बचाये रखना चाहिये ।।
सुखमर्थवतां लोके कृच्छ्राणां विप्रमोक्षणम् ।
धन संकटोंसे छुड़ानेवाला है, इसलिये इस जगत्में धनवानोंको सुख होता है ।।
धन्यं यशस्यमायुष्यं स्वर्ग्यं च परमं यशः ।
त्रिवर्गो हि वशे युक्तः सर्वेषां शं विधीयते ।।
तथा संवर्तमानास्तु लोकयोर्हितमाप्नुयुः ।।
वह धन यश, आयु तथा स्वर्गकी प्राप्ति करानेवाला है। इतना ही नहीं, वह परम यशस्वरूप है। धर्म, अर्थ और काम यह त्रिवर्ग कहलाता है। वह जिनके वशमें होता है, उन सबके लिये कल्याणकारी होता है। ऐसा बर्ताव करनेवाले लोग उभय लोकमें अपना हित साधन करते हैं ।।
काल्योत्थानं च शौचं च देवब्राह्मणभक्तितः ।
गुरूणामेव शुश्रूषा ब्राह्मणेष्वाभिवादनम् ।।
प्रत्युत्थानं च वृद्धानां देवस्थानप्रणामनम् ।
आभिमुख्यं पुरस्कृत्य अतिथीनां च पूजनम् ।।
वृद्धोपदेशकरणं श्रवणं हितपथ्ययोः ।
पोषणं भृत्यवर्गस्य सान्त्वदानपरिग्रहैः ।।
न्यायतः कर्मकरणमन्यायाहितवर्जितम् ।
सम्यग्वृत्तं स्वदारेषु दोषाणां प्रतिषेधनम् ।।
पुत्राणां विनयं कुर्यात् तत्तत्कार्यनियोजनम् ।
वर्जनं चाशुभार्थानां शुभानां जोषणं तथा ।।
कुलोचितानां धर्माणां यथावत् परिपालनम् ।
कुलसंधारणं चैव पौरुषेणैव सर्वशः ।
एवमादि शुभं सर्वं तस्य वृत्तमिति स्थितम् ।।
प्रातःकाल उठना, शौच-स्नान करके शुद्ध होना, देवताओं और ब्राह्मणोंमें भक्ति रखते हुए गुरुजनोंकी सेवा तथा ब्राह्मण-वर्गको प्रणाम करना, बड़े-बूढ़ोंके आनेपर उठकर उनका स्वागत करना, देवस्थानमें मस्तक झुकाना, अतिथियोंके सम्मुख होकर उनका उचित आदर-सत्कार करना, बड़े-बूढ़ोंके उपदेशको मानना और आचरणमें लाना, उनके हितकर और लाभदायक वचनोंको सुनना, भृत्यवर्गको सान्त्वना और अभीष्ट वस्तुका दान देकर अपनाते हुए उसका पालन-पोषण करना, न्याययुक्त कर्म करना, अन्याय और अहितकर कार्यको त्याग देना, अपनी स्त्रीके साथ अच्छा बर्ताव करना, दोषोंका निवारण करना,

पुत्रोंको विनय सिखाना, उन्हें भिन्न-भिन्न आवश्यक कार्योंमें लगाना, अशुभ पदार्थोंको त्याग देना, शुभ पदार्थोंका सेवन करना, कुलोचित धर्मोंका यथावत् रूपसे पालन करना और अपने ही पुरुषार्थसे सर्वथा अपने कुलकी रक्षा करना इत्यादि सारे शुभ व्यवहार वृत्त कहे गये हैं ।।

वृद्धसेवी भवेन्नित्यं हितार्थं ज्ञानकाङ्क्षया ।
परार्थं नाहरेद् द्रव्यमनामन्त्र्य तु सर्वदा ॥
प्रतिदिन अपने हितके लिये और ज्ञान-प्राप्तिकी इच्छासे वृद्ध पुरुषोंका सेवन करे। दूसरेके द्रव्यको उससे पूछे बिना कदापि न ले ।।

न याचेत परान् धीरः स्वबाहुबलमाश्रयेत् ।।
स्वशरीरं सदा रक्षेदाहाराचारयोरपि ।
हितं पथ्यं सदाहारं जीर्णं भुञ्जीत मात्रया ॥
धीर पुरुष दूसरेसे याचना न करे। अपने बाहुबलका भरोसा रखे। आहार और आचार-व्यवहारमें भी सदा अपने शरीरकी रक्षा करे। जो भोजन हितकर एवं लाभदायक हो तथा अच्छी तरह पक गया हो, उसीको नियत मात्रामें ग्रहण करे ।।

देवतातिथिसत्कारं कृत्वा सर्वं यथाविधि ।
शेषं भुञ्जेच्छुचिर्भूत्वा न च भाषेत विप्रियम् ।।
देवताओं और अतिथियोंको पूर्णरूपसे विधिपूर्वक सत्कार करके शेष अन्नका पवित्र होकर भोजन करे और कभी किसीसे अप्रिय वचन न बोले ।।

प्रतिश्रयं च पानीयं बलिं भिक्षां च सर्वतः ।
गृहस्थवासी व्रतवान् दद्याद् गाश्चैव पोषयेत् ।।
गृहस्थ पुरुष धर्मपालनका व्रत लेकर अतिथिके लिये ठहरनेका स्थान, जल, उपहार और भिक्षा दे तथा गौओंका पालन-पोषण करे ।।

बहिर्निष्क्रमणं चैव कुर्यात् कारणतोऽपि वा ।
मध्याह्ने वार्धरात्रे वा गमनं नैव रोचयेत् ।।
वह किसी विशेष कारणसे बाहरकी यात्रा भी कर सकता है, परंतु दोपहर या आधी रातके समय उसे प्रस्थान करनेका विचार नहीं करना चाहिये ।।

विषयान् नावगाहेत स्वशक्त्या तु समाचरेत् ।
यथाऽऽयव्ययता लोके गृहस्थानां प्रपूजिता ।।
विषयोंमें डूबा न रहे। अपनी शक्तिके अनुसार धर्माचरण करे। गृहस्थ पुरुषकी जैसी आय हो, उसके अनुसार ही यदि उसका व्यय हो तो लोकमें उसकी प्रशंसा की जाती है ।।

अयशस्करमर्थघ्नं कर्म यत् परपीडनम् ।
भयाद् वा यदि वा लोभान्न कुर्वीत कदाचन ।।

भय अथवा लोभवश कभी ऐसा कर्म न करे जो यश और अर्थका नाशक तथा दूसरोंको पीड़ा देनेवाला हो ।।
बुद्धिपूर्वं समालोक्य दूरतो गुणदोषतः ।
आरभेत तदा कर्म शुभं वा यदि वेतरत् ।।
किसी कर्मके गुण और दोषको दूरसे ही बुद्धिपूर्वक देखकर तदनन्तर उस शुभ कर्मको लाभदायक समझे तो आरम्भ करे या अशुभका त्याग करे ।।
आत्मसाक्षी भवेन्नित्यमात्मनस्तु शुभाशुभे ।
मनसा कर्मणा वाचा न च कांक्षेत पातकम् ।।
अपने शुभ और अशुभ कर्ममें सदा अपने-आपको ही साक्षी माने और मन, वाणी तथा क्रियाद्वारा कभी पाप करनेकी इच्छा न करे ।।
(दाक्षिणात्य प्रतिमें अध्याय समाप्त)