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सर्वकोश
महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,566 पृष्ठ

पृष्ठ 1237, कुल 2566 में से

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पृष्ठ 1237

न्यायाद् विद्याफलानीच्छेदधर्मं तत्र वर्जयेत् ।।
देवि! ऐसा करनेसे मनुष्य विद्याका फल पा सकता है, अन्यथा नहीं। न्यायसे ही विद्याजनित फलोंको पानेकी इच्छा करे। वहाँ अधर्मको सर्वथा त्याग दे ।।

यदिच्छेद् वार्तया वृत्तिं काङ्क्षेत विधिपूर्वकम् ।
क्षेत्रे जलोपपन्ने च तद्योग्यं कृषिमाचरेत् ।।
यदि वार्त्तावृत्तिके द्वारा जीविका चलानेकी इच्छा हो तो जहाँ सींचनेके लिये जलकी व्यवस्था हो, ऐसे खेतमें तदनुरूप कार्य विधिपूर्वक करे ।।

वाणिज्यं वा यथाकालं कुर्यात् तद्देशयोगतः ।
मूल्यमर्थं प्रयासं च विचार्यैव व्ययोदयौ ।
अथवा यथासमय उस देशकी आवश्यकताके अनुसार वस्तु, उसके मूल्य, व्यय, लाभ और परिश्रम आदिका भलीभाँति विचार करके व्यापार करे ।।

पशुसंजीवनं चैव देशगः पोषयेद् ध्रुवम् ।।
बहुप्रकारा बहवः पशवस्तस्य साधकाः ।।
देशवासी पुरुषको पशुओंका पालन-पोषण भी अवश्य करना चाहिये। अनेक प्रकारके बहुसंख्यक पशु भी उसके लिये अर्थप्राप्तिके साधक हो सकते हैं ।।

यः कश्चित् सेवया वृत्तिं कांक्षेत मतिमान् नरः ।
यतात्मा श्रवणीयानां भवेद् वै सम्प्रयोजकः ।।
जो कोई बुद्धिमान् मनुष्य सेवाद्वारा जीवननिर्वाह करना चाहे तो वह मनको संयममें रखकर श्रवण करनेयोग्य मीठे वचनोंका प्रयोग करे ।।

यथा यथा स तुष्येत तथा संतोषयेत् तु तम् ।
अनुजीविगुणोपेतः कुर्यादात्मानमाश्रितम् ।।
जैसे-जैसे सेव्य स्वामी संतुष्ट रहे, वैसे ही वैसे उसे संतोष दिलावे। सेवकके गुणोंसे सम्पन्न हो अपने आपको स्वामीके आश्रित रखे ।।

विप्रियं नाचरेत् तस्य एषा सेवा समासतः ।।
विप्रयोगात् पुरा तेन गतिमन्यां न लक्षयेत् ।।
स्वामीका कभी अप्रिय न करे, यही संक्षेपसे सेवाका स्वरूप है। उसके साथ वियोग होनेसे पहले अपने लिये दूसरी कोई गति न देखे ।।

कारुकर्म च नाट्यं च प्रायशो नीचयोनिषु ।
तयोरपि यथायोगं न्यायातः कर्मवेतनम् ।।
शिल्पकर्म अथवा कारीगरी और नाट्यकर्म प्रायः निम्न जातिके लोगोंमें चलते हैं। शिल्प और नाट्यमें भी यथायोग्य न्यायानुसार कार्यका वेतन लेना चाहिये ।।

आर्जवेभ्योऽपि सर्वेभ्यः स्वार्जवाद् वेतनं हरेत् ।
अनार्जवादाहरतस्तत् तु पापाय कल्पते ।।