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महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,450 पृष्ठ

२८३-

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त्र्यशीत्यधिकद्विशततमोऽध्यायः

शिवजीद्वारा दक्षयज्ञका भंग और उनके क्रोधसे ज्वरकी उत्पत्ति तथा उसके विविध रूप

युधिष्ठिर उवाच

पितामह महाप्राज्ञ सर्वशास्त्रविशारद ।
अस्मिन् वृत्रवधे देव विवक्षा मम जायते ॥ १ ॥
युधिष्ठिरने पूछा— सम्पूर्ण शास्त्रोंके ज्ञानमें निपुण महाप्राज्ञ पितामह! देव! इस वृत्रवधके प्रसंगमें मुझे कुछ पूछनेकी इच्छा हो रही है ॥ १ ॥

ज्वरेण मोहितो वृत्रः कथितस्ते जनाधिप ।
निहतो वासवेनेह वज्रेणेति तदानघ ॥ २ ॥
निष्पाप जनेश्वर! आपने कहा है कि वृत्रासुर ज्वरसे मोहित हो गया था, उसी अवस्थामें इन्द्रने अपने वज्रसे उसे मार डाला ॥ २ ॥

कथमेष महाप्राज्ञ ज्वरः प्रादुर्बभौ कुतः ।
ज्वरोत्पत्तिं निपुणतः श्रोतुमिच्छाम्यहं प्रभो ॥ ३ ॥
महामते! प्रभो! यह ज्वर कैसे और कहाँसे उत्पन्न हुआ? मैं ज्वरकी उत्पत्तिका प्रसंग भलीभाँति सुनना चाहता हूँ ॥ ३ ॥

भीष्म उवाच

शृणु राजन् ज्वरस्येमं सम्भवं लोकविश्रुतम् ।
विस्तरं चास्य वक्ष्यामि यादृशश्चैव भारत ॥ ४ ॥
भीष्मजीने कहा— राजन्! ज्वरकी उत्पत्तिका यह वृत्तान्त सम्पूर्ण लोकोंमें प्रसिद्ध है, सुनो। भारत! यह प्रसंग जैसा है, उसे मैं विस्तारपूर्वक बता रहा हूँ ॥ ४ ॥

पुरा मेरोर्महाराज शृङ्गं त्रैलोक्यपूजितम् ।
ज्योतिष्कं नाम सावित्रं सर्वरत्नविभूषितम् ॥ ५ ॥
अप्रमेयमनाधृष्यं सर्वलोकेषु भारत ।
भरतनन्दन! महाराज! पूर्वकालमें सुमेरु पर्वतका ज्योतिष्क नामसे प्रसिद्ध एक शिखर था, जो सविता (सूर्य) देवतासे सम्बन्ध रखनेके कारण सावित्र कहलाता था। वह सब प्रकारके रत्नोंसे विभूषित, अप्रमेय, समस्त लोकोंके लिये अगम्य और तीनों लोकोंद्वारा पूजित था ॥

तत्र देवो गिरितटे हेमधातुविभूषिते ॥ ६ ॥
पर्यङ्क इव विभ्राजन्नुपविष्टो बभूव ह ।

शैलराजसुता चास्य नित्यं पार्श्वे स्थिता बभौ ॥ ७ ॥
सुवर्णमय धातुसे विभूषित उस पर्वतशिखरके तटपर बैठे हुए महादेवजी उसी प्रकार अपूर्व शोभा पाते थे मानो किसी सुन्दर पर्यङ्कपर बैठे हों। वहीं प्रतिदिन उनके वामपार्श्वमें रहकर गिरिराजनन्दिनी भगवती पार्वती भी अनुपम शोभा पाती थीं ॥ ६-७ ॥
तथा देवा महात्मानो वसवश्चामितौजसः ।
तथैव च महात्मानावश्विनौ भिषजां वरौ ।
तथा वैश्रवणो राजा गुह्यकैरभिसंवृतः ॥ ८ ॥
यक्षाणामीश्वरः श्रीमान् कैलासनिलयः प्रभुः ।
(शङ्खपद्मनिधिभ्यां च ऋद्ध्या परमया सह ।)
उपासन्त महात्मानमुशना च महामुनिः ॥ ९ ॥
इसी प्रकार वहाँ बहुत-से महामनस्वी देवता, अमित तेजस्वी वसुगण, चिकित्सकोंमें श्रेष्ठ महामना अश्विनीकुमार, शंखनिधि, पद्मनिधि तथा उत्तम ऋद्धिके साथ गुह्यकोंसे घिरे हुए कैलासवासी यक्षपति प्रभुतासम्पन्न श्रीमान् राजा कुबेर तथा महामुनि शुक्राचार्य—ये सभी परमात्मा महादेवजीकी उपासना किया करते थे ॥ ८-९ ॥
सनत्कुमारप्रमुखास्तथैव च महर्षयः ।
अङ्गिरःप्रमुखाश्चैव तथा देवर्षयोऽपरे ॥ १० ॥
विश्वावसुश्च गन्धर्वस्तथा नारदपर्वतौ ।
अप्सरोगणसंघाश्च समाजग्मुरनेकणः ॥ ११ ॥
सनत्कुमार आदि महर्षि, अंगिरा आदि तथा अन्य देवर्षि, विश्वावसु गन्धर्व, नारद, पर्वत और अप्सराओंके अनेक समुदाय उस पर्वतपर महादेवजीकी आराधनाके लिये आया करते थे ॥ १०-११ ॥
ववौ सुखः शिवो वायुर्नानागन्धवहः शुचिः ।
सर्वर्तुकुसुमोपेताः पुष्पवन्तो द्रुमास्तथा ॥ १२ ॥
वहाँ नाना प्रकारकी सुगन्धको फैलानेवाली, पवित्र, सुखद एवं मंगलमयी वायु चलती रहती थी। सभी ऋतुओंके फूलोंसे सुशोभित होनेवाले खिले हुए वृक्ष उस शिखरकी शोभा बढ़ाते थे ॥ १२ ॥
तथा विद्याधराश्चैव सिद्धाश्चैव तपोधनाः ।
महादेवं पशुपतिं पर्युपासन्त भारत ॥ १३ ॥
भारत! तपस्याके धनी सिद्ध और विद्याधर भी वहाँ पशुपति महादेवजीकी उपासनामें तत्पर रहते थे ॥
भूतानि च महाराज नानारूपधराण्यथ ।
राक्षसाश्च महारौद्राः पिशाचाश्च महाबलाः ॥ १४ ॥
बहुरूपधरा हृष्टा नानाप्रहरणोद्यताः ।

देवस्यानुचरास्तत्र तस्थिरे चानलोपमाः ॥ १५ ॥
महाराज! अनेक रूप धारण करनेवाले भूत, महाभयंकर राक्षस, महाबली और बहुत-से रूप धारण करनेवाले पिशाच, जो महादेवजीके अनुचर थे, वहाँ हर्षमें भरकर नाना प्रकारके अस्त्र-शस्त्र लिये खड़े रहते थे। वे सब-के-सब अग्निके समान तेजस्वी थे ॥

नन्दी च भगवांस्तत्र देवस्यानुमते स्थितः ।
प्रगृह्य ज्वलितं शूलं दीप्यमानः स्वतेजसा ॥ १६ ॥
महादेवजीकी आज्ञासे भगवान् नन्दी अपने तेजसे देदीप्यमान हो हाथमें प्रज्वलित शूल लेकर वहाँ खड़े रहते थे ॥ १६ ॥

गङ्गा च सरितां श्रेष्ठा सर्वतीर्थजलोद्भवा ।
पर्युपासत तं देवं रूपिणी कुरुनन्दन ॥ १७ ॥
कुरुनन्दन! समस्त तीर्थोंके जलोंको लेकर प्रकट हुई सरिताओंमें श्रेष्ठ गङ्गाजी वहाँ दिव्यरूप धारण करके देवाधिदेव महादेवजीकी आराधना करती थीं ॥ १७ ॥

स एवं भगवांस्तत्र पूज्यमानः सुरर्षिभिः ।
देवैश्च सुमहातेजा महादेवो व्यतिष्ठत ॥ १८ ॥
इस प्रकार देवताओं और देवर्षियोंसे पूजित होते हुए महातेजस्वी भगवान् महादेव वहाँ नित्य विराजमान थे ॥

कस्यचित् त्वथ कालस्य दक्षो नाम प्रजापतिः ।
पूर्वोक्तेन विधानेन यक्ष्यमाणोऽन्वपद्यत ॥ १९ ॥
कुछ कालके अनन्तर दक्ष नामसे प्रसिद्ध प्रजापतिने पूर्वोक्त शास्त्रीय विधानके अनुसार यज्ञ करनेका संकल्प लेकर उसके लिये तैयारी आरम्भ कर दी ॥ १९ ॥

ततस्तस्य मखं देवाः सर्वे शक्रपुरोगमाः ।
गमनाय समागम्य बुद्धिमापेदिरे तदा ॥ २० ॥
उस समय इन्द्र आदि सब देवताओंने दक्ष प्रजापतिके यज्ञमें जानेके लिये परस्पर मिलकर निश्चय किया ॥

ते विमानैर्महात्मानो ज्वलनार्कसमप्रभैः ।
देवस्यानुमतेऽगच्छन् गङ्गाद्वारमिति श्रुतिः ॥ २१ ॥
वे महामनस्वी देवता सूर्य और अग्निके समान तेजस्वी विमानोंपर बैठकर महादेवजीकी आज्ञा ले गङ्गाद्वार (हरिद्वार) को गये—यह बात हमारे सुननेमें आयी है ॥ २१ ॥

प्रस्थिता देवता दृष्ट्वा शैलराजसुता तदा ।
उवाच वचनं साध्वी देवं पशुपतिं पतिम् ॥ २२ ॥
देवताओंको प्रस्थित हुआ देख सती साध्वी गिरिराजनन्दिनी उमाने अपने स्वामी पशुपति महादेवजीसे पूछा— ॥ २२ ॥

भगवन् क्व नु यान्त्येते देवाः शक्रपुरोगमाः ।
ब्रूहि तत्त्वेन तत्त्वज्ञ संशयो मे महानयम् ॥ २३ ॥
'भगवन्! ये इन्द्र आदि देवता कहाँ जा रहे हैं? तत्त्वज्ञ परमेश्वर! ठीक-ठीक बताइये। मेरे मनमें यह महान् संशय उत्पन्न हुआ है' ॥ २३ ॥

महेश्वर उवाच

दक्षो नाम महाभागे प्रजानां पतिरुत्तमः ।
हयमेधेन यजते तत्र यान्ति दिवौकसः ॥ २४ ॥
महेश्वरने कहा— महाभागे! श्रेष्ठ प्रजापति दक्ष अश्वमेध यज्ञ करते हैं; उसीमें ये सब देवता जा रहे हैं ॥

उमोवाच

यज्ञमेतं महादेव किमर्थं नाधिगच्छसि ।
केन वा प्रतिषेधेन गमनं ते न विद्यते ॥ २५ ॥
उमा बोलीं— महादेव! इस यज्ञमें आप क्यों नहीं पधार रहे हैं? किस प्रतिबन्धके कारण आपका वहाँ जाना नहीं हो रहा है? ॥ २५ ॥

महेश्वर उवाच

सुरैरेव महाभागे पूर्वमेतदनुष्ठितम् ।
यज्ञेषु सर्वेषु मम न भाग उपकल्पितः ॥ २६ ॥
महेश्वरने कहा— महाभागे! देवताओंने ही पहले ऐसा निश्चय किया था। उन्होंने सभी यज्ञोंमेंसे किसीमें भी मेरे लिये भाग नियत नहीं किया ॥ २६ ॥

पूर्वोथायोपपन्नेन मार्गेण वरवर्णिनि ।
न मे सुराः प्रयच्छन्ति भागं यज्ञस्य धर्मतः ॥ २७ ॥
सुन्दरि! पूर्वनिश्चित नियमके अनुसार धर्मकी दृष्टिसे ही देवतालोग यज्ञमें मुझे भाग नहीं अर्पित करते हैं ॥ २७ ॥

उमोवाच

भगवन् सर्वभूतेषु प्रभावाभ्यधिको गुणैः ।
अजय्यश्चाप्यधृष्यश्च तेजसा यशसा श्रिया ॥ २८ ॥
अनेन ते महाभाग प्रतिषेधेन भागतः ।
अतीव दुःखमुत्पन्नं वेपथुश्च ममानघ ॥ २९ ॥
उमाने कहा— भगवन्! आप समस्त प्राणियोंमें सबसे अधिक प्रभावशाली, गुणवान्, अजेय, अधृष्य, तेजस्वी, यशस्वी तथा श्रीसम्पन्न हैं। महाभाग! यज्ञमें जो इस प्रकार

आपको भाग देनेका निषेध किया गया है, इससे मुझे बड़ा दुःख हुआ है। अनघ! इस अपमानसे मेरा सारा शरीर काँप रहा है ॥ २८-२९ ॥

भीष्म उवाच

एवमुक्त्वा तु सा देवी तदा पशुपतिं पतिम् ।
तूष्णींभूताभवद् राजन् दह्यमानेन चेतसा ॥ ३० ॥
**भीष्मजी कहते हैं—**राजन्! अपने पति भगवान् पशुपतिसे ऐसा कहकर पार्वतीदेवी चुप हो गयीं, परंतु उनका हृदय शोकसे दग्ध हो रहा था ॥ ३० ॥

अथ देव्या मतं ज्ञात्वा हृद्गतं यच्चिकीर्षितम् ।
स समाज्ञापयामास तिष्ठ त्वमिति नन्दिनम् ॥ ३१ ॥
पार्वतीदेवीके मनमें क्या है और वे क्या करना चाहती हैं, इस बातको जानकर महादेवजीने नन्दीको आज्ञा दी कि तुम यहीं खड़े रहो ॥ ३१ ॥

ततो योगबलं कृत्वा सर्वयोगेश्वरेश्वरः ।
तं यज्ञं स महातेजा भीमैरनुचरैस्तदा ॥ ३२ ॥
सहसा घातयामास देवदेवः पिनाकधृक् ।
तदनन्तर सम्पूर्ण योगेश्वरोंके भी ईश्वर महातेजस्वी देवाधिदेव पिनाकधारी शिवने योगबलका आश्रय ले अपने भयानक सेवकोंद्वारा उस यज्ञको सहसा नष्ट करा दिया ॥ ३२ १/२ ॥

केचिन्नादानमुञ्चन्त केचिद्धासांश्च चक्रिरे ॥ ३३ ॥
रुधिरेणापरे राजंस्तत्राग्निं समवाकिरन् ।
राजन्! भगवान् शिवके अनुचरोंमेंसे कोई तो जोर-जोरसे सिंहनाद करने लगे, किन्हींने अट्टहास करना आस्मभ कर दिया तथा दूसरे यज्ञाग्निको बुझानेके लिये उसपर रक्तकी वर्षा करने लगे ॥ ३३ १/२ ॥

केचिद् यूपान् समुत्पाट्य बभ्रमुर्विकृताननाः ॥ ३४ ॥
आस्यैरन्ये चाग्रसन्त तथैव परिचारकान् ।
कोई विकराल मुखवाले पार्षद यज्ञके यूरोको उखाड़कर वहाँ चारों ओर चक्कर लगाने लगे। दूसरोंने यज्ञके परिचारकोंको अपने मुखका ग्रास बना लिया ॥ ३४ १/२ ॥

ततः स यज्ञो नृपते वध्यमानः समन्ततः ॥ ३५ ॥
आस्थाय मृगरूपं वै खमेवाभ्यगमत् तदा ।
नरेश्वर! इस प्रकार जब सब ओरसे आघात होने लगा, तब वह यज्ञ मृगका रूप धारण करके आकाशकी ओर ही भाग चला ॥ ३५ १/२ ॥

तं तु यज्ञं तथारूपं गच्छन्तमुपलभ्य सः ॥ ३६ ॥
धनुरादाय बाणेन तदान्वसरत प्रभुः ।

यज्ञको मृगका रूप धारण करके भागते देख भगवान् शिवने धनुष हाथमें लेकर अपने बाणके द्वारा उसका पीछा किया।। ३६ १/२ ।।
ततस्तस्य सुरेशस्य क्रोधादमिततेजसः ।। ३७ ।।
ललाटात् प्रसृतो घोरः स्वेदबिन्दुर्भभूव ह ।
तस्मिन् पतितमात्रे च स्वेदबिन्दौ तदा भुवि ।। ३८ ।।
प्रादुर्बभूव सुमहानग्निः कालानलोपमः ।
तत्पश्चात् अमिततेजस्वी देवेश्वर महादेवजीके क्रोधके कारण उनके ललाटसे भयंकर पसीनेकी बूँद प्रकट हुई। उस पसीनेके बिन्दुके पृथ्वीपर पड़ते ही कालाग्निके समान विशाल अग्निपुंजका प्रादुर्भाव हुआ ।।
तत्र चाजायत तदा पुरुषः पुरुषर्षभ ।। ३९ ।।
ह्रस्वोऽतिमात्रं रक्ताक्षो हरिश्मश्रुर्विभीषणः ।
पुरुषप्रवर! उस समय उस आगसे एक नाटा-सा पुरुष उत्पन्न हुआ, जिसकी आँखें बहुत ही लाल थीं। दाढ़ी और मूँछके बाल भूरे रंगके थे। वह देखनेमें बड़ा डरावना जान पड़ता था ।। ३९ १/२ ।।
ऊर्ध्वकेशोऽतिरोमाङ्गः श्येनोल्लूकस्तथैव च ।। ४० ।।
करालकृष्णवर्णश्च रक्तवासास्तथैव च ।
तं यज्ञं सुमहामत्त्वोऽदहत् कक्षमिवानलः ।। ४१ ।।
उसके केश ऊपरकी ओर उठे हुए थे। उसके सारे अंग बाज और उल्लूके समान अतिशय रोमावलियोंसे भरे थे। शरीरका रंग काला और विकराल था। उसके वस्त्र लाल रंगके थे। उस महान् शक्तिशाली पुरुषने उस यज्ञको उसी प्रकार दग्ध कर दिया, जैसे आग सूखे काठ या घास फूसके ढेरको जलाकर भस्म कर डालती है ।। ४०-४१ ।।
व्यचरत् सर्वतो देवान् प्राद्रवत् स ऋषींस्तथा ।
देवाश्चाप्याद्रवन् सर्वे ततो भीता दिशो दश ।। ४२ ।।
तत्पश्चात् वह पुरुष सब ओर विचरने लगा और देवताओं तथा ऋषियोंकी ओर दौड़ा। उसे देखकर सब देवता भयभीत हो दसों दिशाओंमें भाग गये ।। ४२ ।।
तेन तस्मिन् विचरता पुरुषेण विशाम्पते ।
पृथिवी ह्यचलद् राजन्नतीव भरतर्षभ ।। ४३ ।।
राजन्! भरतभूषण! प्रजानाथ! उस यज्ञमें विचरते हुए उस पुरुषके पैरोंकी धमकसे यह पृथिवी बड़े जोर-जोरसे काँपने लगी ।। ४३ ।।
हाहाभूतं जगत् सर्वमुपलक्ष्य तदा प्रभुः ।
पितामहो महादेवं दर्शयन् प्रत्यभाषत ।। ४४ ।।
उस समय सारे जगत्में हाहाकार मच गया। यह सब देखकर भगवान् ब्रह्माने महादेवजीको जगत्की यह दुर्दशा दिखाते हुए उनसे इस प्रकार कहा ।। ४४ ।।

ब्रह्मोवाच
भवतोऽपि सुराः सर्वे भागं दास्यन्ति वै प्रभो ।
क्रियतां प्रतिसंहारः सर्वदेवेश्वर त्वया ॥ ४५ ॥
ब्रह्माजी बोले— सर्वदेवेश्वर! प्रभो! अब आप अपने बढ़े हुए उस क्रोधको शान्त कीजिये। आजसे सब देवता आपको भी यज्ञका भाग दिया करेंगे ॥ ४५ ॥
इमा हि देवताः सर्वा ऋषयश्च परंतप ।
तव क्रोधान्महादेव न शान्तिमुपलेभिरे ॥ ४६ ॥
शत्रुओंको संताप देनेवाले महादेव! ये सब देवता और ऋषि आपके क्रोधसे संतप्त होकर कहीं शान्ति नहीं पा रहे हैं ॥ ४६ ॥
यश्चैष पुरुषो जातः स्वेदात् ते विबुधोत्तम ।
ज्वरो नामैष धर्मज्ञ लोकेषु प्रचरिष्यति ॥ ४७ ॥
धर्मज्ञ देवेश्वर! आपके पसीनेसे जो यह पुरुष प्रकट हुआ है, इसका नाम होगा ज्वर। यह समस्त लोकोंमें विचरण करेगा ॥ ४७ ॥
एकीभूतस्य न त्वस्य धारणे तेजसः प्रभो ।
समर्था सकला पृथ्वी बहुधा सृज्यतामयम् ॥ ४८ ॥
प्रभो! आपका तेजरूप यह ज्वर जबतक एक रूपमें रहेगा, तबतक यह सारी पृथ्वी इसे धारण करनेमें समर्थ न हो सकेगी। अतः इसे अनेक रूपोंमें विभक्त कर दीजिये ॥ ४८ ॥
इत्युक्तो ब्रह्मणा देवो भागे चापि प्रकल्पिते ।
भगवन्तं तथेत्याह ब्रह्माणममितौजसम् ॥ ४९ ॥
जब ब्रह्माजीने इस प्रकार कहा और यज्ञमें भाग मिलनेकी भी व्यवस्था हो गयी, तब महादेवजी अमिततेजस्वी भगवान् ब्रह्मासे इस प्रकार बोले—‘तथास्तु’ ऐसा ही हो ॥
परां च प्रीतिमगमदुत्स्मयंश्च पिनाकधृक् ।
अवाप च तदा भागं यथोक्तं ब्रह्मणा भवः ॥ ५० ॥
पिनाकधारी शिवको उस समय बड़ी प्रसन्नता हुई और वे मुस्कराने लगे। जैसा कि ब्रह्माजीने कहा था, उसके अनुसार उन्होंने यज्ञमें भाग प्राप्त कर लिया ॥
ज्वरं च सर्वधर्मज्ञो बहुधा व्यसृजत् तदा ।
शान्त्यर्थं सर्वभूतानां शृणु तच्चापि पुत्रक ॥ ५१ ॥
वत्स युधिष्ठिर! उस समय समस्त धर्मोंके ज्ञाता भगवान् शिवने सम्पूर्ण प्राणियोंकी शान्तिके लिये ज्वरको अनेक रूपोंमें बाँट दिया, उसे भी सुन लो ॥ ५१ ॥
शीर्षाभितापो नागानां पर्वतानां शिलाजतु ।
अपां तु नीलिकां विद्यान्निर्मोकं भुजगेषु च ॥ ५२ ॥
खोरकः सौरभेयाणामूषरं पृथिवीतले ।

पशूनामपि धर्मज्ञ दृष्टिप्रत्यवरोधनम् ।। ५३ ।।

हाथियोंके मस्तकमें जो ताप या पीड़ा होती है, वही उनका ज्वर है। पर्वतोंका ज्वर

शिलाजीतके रूपमें प्रकट होता है। सेवारको पानीका ज्वर समझना चाहिये। सर्पोंका ज्वर

केंचुल है। गाय-बैलोंके खुरोंमें जो खोरक नामवाला रोग होता है, वही उनका ज्वर है।

पृथ्वीका ज्वर ऊसरके रूपमें प्रकट होता है। धर्मज्ञ युधिष्ठिर! पशुओंकी दृष्टि-शक्तिका जो

अवरोध होता है, वह भी उनका ज्वर ही है ।। ५२-५३ ।।

रन्ध्रागतमथाश्वानां शिखोद्भेदश्च बर्हिणाम् ।

नेत्ररोगः कोकिलस्य ज्वरः प्रोक्तो महात्मना ।। ५४ ।।

घोड़ोंके गलेके छेदमें जो मांसखण्ड बढ़ जाता है, वही उनका ज्वर है। मोरोंकी

शिखाका निकलना ही उनके लिये ज्वर है। कोकिलका जो नेत्ररोग है, उसे भी महात्मा

शिवने ज्वर बताया है ।। ५४ ।।

अवीनां पित्तभेदश्च सर्वेषामिति नः श्रुतम् ।

शुकानामपि सर्वेषां हिक्किका प्रोच्यते ज्वरः ।। ५५ ।।

समस्त भेड़ोंका पित्तभेद भी ज्वर ही है—यह हमारे सुननेमें आया है। समस्त तोतोंके

लिये हिचकीको ही ज्वर बताया गया है ।। ५५ ।।

शार्दूलेष्वथ धर्मज्ञ श्रमो ज्वर इहोच्यते ।

मानुषेषु तु धर्मज्ञ ज्वरो नामैष भारत ।। ५६ ।।

धर्मज्ञ भरतनन्दन! सिंहोंमें थकावटका होना ही ज्वर कहलाता है; परंतु मनुष्योंमें यह

ज्वरके नामसे ही प्रसिद्ध है ।।

मरणे जन्मनि तथा मध्ये चाविशते नरम् ।

एतन्माहेश्वरं तेजो ज्वरो नाम सुदारुणः ।। ५७ ।।

नमस्यश्चैव मान्यश्च सर्वप्राणिभिरीश्वरः ।

अनेन हि समाविष्टो वृत्रो धर्मभृतां वरः ।। ५८ ।।

भगवान् महेश्वरका तेजरूप यह ज्वर अत्यन्त दारुण है। यह मृत्युकालमें, जन्मके

समय तथा बीचमें भी मनुष्योंके शरीरमें प्रवेश कर जाता है। यह सर्वसमर्थ माहेश्वर ज्वर

समस्त प्राणियोंके लिये वन्दनीय और माननीय है। इसीने धर्मात्माओंमें श्रेष्ठ वृत्रासुरके

शरीरमें प्रवेश किया था ।। ५७-५८ ।।

व्यजृम्भत ततः शक्रस्तस्मै वज्रमवासृजत् ।

प्रविश्य वज्रं वृत्रं च दारयामास भारत ।। ५९ ।।

भारत! उस ज्वरसे पीड़ित होकर जब वह जँभाई लेने लगा, उसी समय इन्द्रने उसपर

वज्रका प्रहार किया। वज्रने उसके शरीरमें घुसकर उसे चीर डाला ।। ५९ ।।

दारितश्च स वज्रेण महायोगी महासुरः ।

जगाम परमं स्थानं विष्णोरमिततेजसः ।। ६० ।।

वज्रसे विदीर्ण हुआ महायोगी एवं महान् असुर वृत्र अमिततेजस्वी भगवान् विष्णुके परम धामको चला गया ।। ६० ।।

विष्णुभक्त्या हि तेनेदं जगद् व्याप्तमभूत् तदा ।
तस्माच्च निहतो युद्धे विष्णोः स्थानमवाप्तवान् ।। ६१ ।।
भगवान् विष्णुकी भक्तिके प्रभावसे ही उसने अपनी विशाल कायाद्वारा इस सम्पूर्ण जगत्‌को व्याप्त कर लिया था। अतः युद्धमें मारे जानेपर उसने विष्णुधाम प्राप्त कर लिया ।। ६१ ।।

इत्येष वृत्रमाश्रित्य ज्वरस्य महतो मया ।
विस्तरः कथितः पुत्र किमन्यत् प्रब्रवीमि ते ।। ६२ ।।
बेटा! इस प्रकार वृत्रासुरके वधके प्रसंगसे मैंने महान् माहेश्वर ज्वरकी उत्पत्तिका वृत्तान्त विस्तारपूर्वक कह सुनाया। अब तुमसे और क्या कहूँ? ।। ६२ ।।

इमां ज्वरोत्पत्तिमदीनमानसः
पठेत् सदा यः सुसमाहितो नरः ।
विमुक्तरोगः स सुखी मुदा युतो
लभेत कामान् स यथामनीषितान् ।। ६३ ।।
जो उदारचित्त एवं एकाग्र होकर ज्वरकी उत्पत्तिसे सम्बन्ध रखनेवाली इस कथाको सदा पढ़ता है, वह मनुष्य रोगमुक्त, सुखी एवं प्रसन्न होकर मनोवांछित कामनाओंको प्राप्त कर लेता है ।। ६३ ।।

इति श्रीमहाभारते शान्तिपर्वणि मोक्षधर्मपर्वणि ज्वरोत्पत्तिर्नाम त्र्यशीत्यधिकद्विशततमोऽध्यायः ।। २८३ ।।
इस प्रकार श्रीमहाभारत शान्तिपर्वके अन्तर्गत मोक्षधर्मपर्वमें ज्वरकी उत्पत्तिविषयक दो सौ तिरासीवाँ अध्याय पूरा हुआ ।। २८३ ।।
(दाक्षिणात्य अधिक पाठका १/२ श्लोक मिलाकर कुल ६३ १/२ श्लोक हैं)