महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व
Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
कृतघ्न गौतमद्वारा मित्र राजधर्माका वध तथा राक्षसोंद्वारा उसकी हत्या और कृतघ्नके मांसको अभक्ष्य बताना
द्विसप्तत्यधिकशततमोऽध्यायः
कृतघ्न गौतमद्वारा मित्र राजधर्माका वध तथा राक्षसोंद्वारा उसकी हत्या और कृतघ्नके मांसको अभक्ष्य बताना
भीष्म उवाच
अथ तत्र महार्चिष्माननलो वातसारथिः ।
तस्याविदूरे रक्षार्थं खगेन्द्रेण कृतोऽभवत् ॥ १ ॥
**भीष्मजी कहते हैं—**राजन्! पक्षिराज राजधर्माने अपने मित्र गौतमकी रक्षाके लिये उससे थोड़ी दूरपर आग प्रज्वलित कर दी थी, जिससे हवाका सहारा पाकर बड़ी-बड़ी लपटें उठ रही थीं ॥ १ ॥
स चापि पार्श्वे सुष्वोप विश्वस्तो बकराट् तदा ।
कृतघ्नस्तु स दुष्टात्मा तं जिघांसुरथाग्रतः ॥ २ ॥
ततोऽलातेन दीप्तेन विश्वस्तं निजघान तम् ।
निहत्य च मुदा युक्तः सोऽनुबन्धं न दृष्टवान् ॥ ३ ॥
बकराजको भी मित्रपर विश्वास था; इसलिये उस समय उसके पास ही सो गया। इधर वह दुष्टात्मा कृतघ्न उसका वध करनेकी इच्छासे उठा और विश्वासपूर्वक सोये हुए राजधर्माको सामनेसे जलती हुई लकड़ी लेकर उसके द्वारा मार डाला। उसे मारकर वह बहुत प्रसन्न हुआ, मित्रके वधसे जो पाप लगता है, उसकी ओर उसकी दृष्टि नहीं गयी ॥ २-३ ॥
स तं विपक्षरोमाणं कृत्वाग्नावपचत् तदा ।
तं गृहीत्वा सुवर्णं च ययौ द्रुततरं द्विजः ॥ ४ ॥
उसने मरे हुए पक्षीके पंख और बाल नोचकर उसे आगमें पकाया और उसे साथमें ले सुवर्णका बोझ सिरपर उठाकर वह ब्राह्मण बड़ी तेजीके साथ वहाँसे चल दिया ॥ ४ ॥
(ततो दाक्षायणीपुत्रं नागतं तं तु भारत ।
विरूपाक्षश्चिन्तयन् वै हृदयेन विदूयता ॥)
भारत! उस दिन दक्षकन्याका पुत्र राजधर्मा अपने मित्र विरूपाक्षके यहाँ न जा सका; इससे विरूपाक्ष व्याकुल हृदयसे उसके लिये चिन्ता करने लगा ।।
ततोऽन्यस्मिन् गते चाह्नि विरूपाक्षोऽब्रवीत् सुतम् ।
न प्रेक्षे राजधर्माणमद्य पुत्र खगोत्तमम् ॥ ५ ॥
तदनन्तर दूसरा दिन भी व्यतीत हो जानेपर विरूपाक्षने अपने पुत्रसे कहा—'बेटा! मैं आज पक्षियोंमें श्रेष्ठ राजधर्माको नहीं देख रहा हूँ ॥ ५ ॥
स पूर्वसंध्यां ब्रह्माणं वन्दितुं याति सर्वदा ।
मां वा दृष्ट्वा कदाचित् स न गच्छति गृहं खगः ॥ ६ ॥
‘वे पक्षिप्रवर प्रतिदिन प्रातःकाल ब्रह्माजीकी वन्दना करनेके लिये जाया करते थे और वहाँसे लौटनेपर मुझसे मिले बिना कभी अपने घर नहीं जाते थे ॥ ६ ॥
उभे द्विरात्रिसंध्ये वै नाभ्यगात् स ममालयम् ।
तस्मान्न शुद्धयते भावो मम स ज्ञायतां सुहृत् ॥ ७ ॥
‘आज दो संध्याएँ व्यतीत हो गयीं; किंतु वह मेरे घरपर नहीं पधारे, अतः मेरे मनमें संदेह पैदा हो गया है। तुम मेरे मित्रका पता लगाओ ॥ ७ ॥
स्वाध्यायेन वियुक्तो हि ब्रह्मवर्चसव्रर्जितः ।
तद्व्रतस्तत्र मे शंका हन्यात् तं स द्विजाधमः ॥ ८ ॥
‘वह अधम ब्राह्मण गौतम स्वाध्यायरहित और ब्रह्मतेजसे शून्य था तथा हिंसक जान पड़ता था। उसीपर मेरा संदेह है। कहीं वह मेरे मित्रको मार न डाले ॥ ८ ॥
दुराचारस्तु दुर्बुद्धिरिङ्गितैर्लक्षितो मया ।
निष्कृपो दारुणाकारो दुष्टो दस्युरिवाधमः ॥ ९ ॥
‘उसकी चेष्टाओंसे मैंने लक्षित किया तो वह मुझे दुर्बुद्धि एवं दुराचारी तथा दयाहीन प्रतीत होता था। वह आकारसे ही बड़ा भयानक और दुष्ट दस्युके समान अधम जान पड़ता था ॥ ९ ॥
गौतमः स गतस्तत्र तेनोद्विग्नं मनो मम ।
पुत्र शीघ्रमितो गत्वा राजधर्मनिवेशनम् ॥ १० ॥
ज्ञायतां स विशुद्धात्मा यदि जीवति मा चिरम् ।
‘नीच गौतम यहाँसे लौटकर फिर उन्हींके निवास-स्थानपर गया था; इसलिये मेरे मनमें उद्वेग हो रहा है। बेटा! तुम शीघ्र यहाँसे राजधर्माके घरपर जाओ और पता लगाओ कि वे शुद्धात्मा पक्षिराज जीवित हैं या नहीं। इस कार्यमें विलम्ब न करो’ ॥ १० १/२ ॥
स एवमुक्तस्त्वरितो रक्षोभिः सहितो ययौ ॥ ११ ॥
न्यग्रोधं तत्र चापश्यत् कङ्कालं राजधर्मणः ।
पिताकी ऐसी आज्ञा पाकर वह तुरंत ही राक्षसोंके साथ उस वटवृक्षके पास गया। वहाँ उसे राजधर्माका कंकाल अर्थात् उसके पंख, हड्डियों और पैरोंका समूह दिखायी दिया ॥ ११ १/२ ॥
स रुदन्नगमत् पुत्रो राक्षसेन्द्रस्य धीमतः ॥ १२ ॥
त्वरमाणः परं शक्त्या गौतमग्रहणाय वै ।
बुद्धिमान् राक्षसराजका पुत्र राजधर्माकी यह दशा देखकर रो पड़ा और उसने पूरी शक्ति लगाकर गौतमको शीघ्र पकड़नेकी चेष्टा की ॥ १२ १/२ ॥
ततोऽविदूरे जगृहुर्गौतमं राक्षसास्तदा ॥ १३ ॥
राजधर्मशरीरं च पक्षास्थिचरणोज्झितम् ।
तदनन्तर कुछ ही दूर जानेपर राक्षसोंने गौतमको पकड़ लिया। साथ ही उन्हें पंख, पैर और हड्डियोंसे रहित राजधर्माकी लाश भी मिल गयी ॥ १३ १/२ ॥
तमादायाथ रक्षांसि द्रुतं मेरुव्रजं ययुः ॥ १४ ॥
राज्ञश्च दर्शयामासुः शरीरं राजधर्मणः ।
कृतघ्नं परुषं तं च गौतमं पापकारिणम् ॥ १५ ॥
गौतमको लेकर वे राक्षस शीघ्र ही मेरुव्रजमें गये। वहाँ उन्होंने राजाको राजधर्माका मृत शरीर दिखाया और पापाचारी कृतघ्न गौतमको भी सामने खड़ा कर दिया ॥
रुरोद राजा तं दृष्ट्वा सामात्यः सपुरोहितः ।
आर्तनादश्च सुमहानभूत् तस्य निवेशने ॥ १६ ॥
सस्त्रीकुमारं च पुरं बभूवास्वस्थमानसम् ।
अपने मित्रको इस दशामें देखकर मन्त्री और पुरोहितोंके साथ राजा विरूपाक्ष फूट-फूटकर रोने लगे। उनके महलमें महान् आर्तनाद गूँजने लगा। स्त्री और बच्चोंसहित सारे नगरमें शोक छा गया। किसीका भी मन स्वस्थ न रहा ॥
अथाब्रवीन्नृपः पुत्रं पापोऽयं वध्यतामिति ॥ १७ ॥
अस्य मांसैरिमे सर्वे विहरन्तु यथेष्टतः ।
तब राजाने अपने पुत्रको आज्ञा दी—'बेटा! इस पापीको मार डालो। ये समस्त राक्षस इसके मांसका यथेष्ट उपयोग करें ॥ १७ १/२ ॥
पापाचारः पापकर्मा पापात्मा पापसाधनः ॥ १८ ॥
हन्तव्योऽयं मम मतिर्भवद्भिरिति राक्षसाः ।
'राक्षसो! यह पापाचारी, पापकर्मा और पापात्मा है। इसके सारे साधन पापमय हैं; अतः तुम्हें इसका वध कर देना चाहिये, यही मेरा मत है' ॥ १८ १/२ ॥
इत्युक्ता राक्षसेन्द्रेण राक्षसा घोरविक्रमाः ॥ १९ ॥
नैच्छन्त तं भक्षयितुं पापकर्माणमित्युत ।
राक्षसराजके इस प्रकार आदेश देनेपर भी भयानक पराक्रमी राक्षसोंने गौतमको खानेकी इच्छा नहीं की; क्योंकि वह घोर पापाचारी था ॥ १९ १/२ ॥
दस्यूनां दीयतामेष साध्वद्य पुरुषाधमः ॥ २० ॥
इत्यूचुस्ते महाराज राक्षसेन्द्रं निशाचराः ।
शिरोभिः प्रणताः सर्वे व्याहरन् राक्षसाधिपम् ॥ २१ ॥
न दातुमर्हसि त्वं नो भक्षणायस्य किल्विषम् ।
महाराज! उन निशाचरोंने राक्षसराजसे कहा—'प्रभो! इस नराधमका मांस दस्युओंको दे दिया जाय, आप हमें इसका पाप खानेके लिये न दें' इस प्रकार समस्त राक्षसोंने राक्षसराजके चरणोंमें मस्तक रखकर प्रार्थना की॥ २०-२१ १/२॥
एवमस्त्विति तानाह राक्षसेन्द्रो निशाचरान्॥ २२॥
दस्यूनां दीयतामेष कृतघ्नोऽद्यैव राक्षसाः।
यह सुनकर राक्षसराजने उन निशाचरोंसे कहा—'राक्षसो! ऐसा ही सही, इस कृतघ्नको आज ही डाकुओंके हवाले कर दो'॥ २२ १/२॥
इत्युक्ता राक्षसास्तेन शूलपट्टिशपाणयः॥ २३॥
कृत्वा तं खण्डशः पापं दस्युभ्यः प्रददुस्तदा।
राजाकी ऐसी आज्ञा पाकर हाथमें शूल और पट्टिश धारण किये राक्षसोंने पापी गौतमके टुकड़े-टुकड़े करके उसे दस्युओंको सौंप दिया॥ २३ १/२॥
दस्यवश्चापि नैच्छन्त तमत्तुं पापकारिणम्।
क्रव्यादा अपि राजेन्द्र कृतघ्नं नोपभुञ्जते॥ २४॥
राजेन्द्र! उन दस्युओंने भी उस पापाचारीका मांस खानेकी इच्छा नहीं की। मांसाहारी जीव-जन्तु भी कृतघ्नका मांस काममें नहीं लेते हैं॥ २४॥
ब्रह्मघ्ने च सुरापे च चौरे भग्नव्रते तथा।
निष्कृतिर्विहिता राजन् कृतघ्ने नास्ति निष्कृतिः॥ २५॥
राजन्! ब्रह्महत्यारे, शराबी, चोर तथा व्रतभङ्ग करने वालोंके लिये शास्त्रमें प्रायश्चित्तका विधान है; परंतु कृतघ्नके उद्धारका कोई उपाय नहीं बताया गया है॥
मित्रद्रोही नृशंसश्च कृतघ्नश्च नराधमः।
क्रव्यादैः कृमिभिश्चैव न भुज्यन्ते हि तादृशाः॥ २६॥
मित्रद्रोही, नृशंस, नराधम तथा कृतघ्न—ऐसे मनुष्योंका मांस मांसभक्षी जीव-जन्तु तथा कीड़े भी नहीं खाते हैं॥ २६॥
इति श्रीमहाभारते शान्तिपर्वणि आपद्धर्मपर्वणि कृतघ्नोपाख्याने
द्विसप्तत्यधिकशततमोऽध्यायः॥ १७२॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत शान्तिपर्वके अन्तर्गत आपद्धर्मपर्वमें कृतघ्नका उपाख्यानविषयक एक सौ बहत्तरवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ १७२॥
(दाक्षिणात्य अधिक पाठका १ श्लोक मिलाकर कुल २७ श्लोक हैं)