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महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,450 पृष्ठ

अर्जुनके द्वारा राजदण्डकी महत्ताका वर्णन

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पञ्चदशोऽध्यायः

अर्जुनके द्वारा राजदण्डकी महत्ताका वर्णन

वैशम्पायन उवाच

याज्ञसेन्या वचः श्रुत्वा पुनरेवार्जुनोऽब्रवीत् ।
अनुमान्य महाबाहुं ज्येष्ठं भ्रातरमच्युतम् ॥ १ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं— राजन्! द्रुपदकुमारीका यह वचन सुनकर अपनी मर्यादासे कभी च्युत न होनेवाले बड़े भाई महाबाहु युधिष्ठिरका सम्मान करते हुए अर्जुनने फिर इस प्रकार कहा ॥ १ ॥

अर्जुन उवाच

दण्डः शास्ति प्रजाः सर्वा दण्ड एवाभिरक्षति ।
दण्डः सुप्तेषु जागर्ति दण्डं धर्मं विदुर्बुधाः ॥ २ ॥
अर्जुन बोले— राजन्! दण्ड समस्त प्रजाओंका शासन करता है, दण्ड ही उनकी सब ओरसे रक्षा करता है, सबके सो जानेपर भी दण्ड जागता रहता है; इसलिये विद्वान् पुरुषोंने दण्डको राजाका धर्म माना है ॥ २ ॥

दण्डः संरक्षते धर्मं तथैवार्थं जनाधिप ।
कामं संरक्षते दण्डस्त्रिवर्गो दण्ड उच्यते ॥ ३ ॥
जनेश्वर! दण्ड ही धर्म और अर्थकी रक्षा करता है, वही कामका भी रक्षक है, अतः दण्ड त्रिवर्गरूप कहा जाता है ॥ ३ ॥

दण्डेन रक्ष्यते धान्यं धनं दण्डेन रक्ष्यते ।
एवं विद्वानुपाधत्स्व भावं पश्यस्व लौकिकम् ॥ ४ ॥
दण्डसे धान्यकी रक्षा होती है, उसीसे धनकी भी रक्षा होती है; ऐसा जानकर आप भी दण्ड धारण कीजिये और जगत्के व्यवहारपर दृष्टि डालिये ॥ ४ ॥

राजदण्डभयादेके पापाः पापं न कुर्वते ।
यमदण्डभयादेके परलोकभयादपि ॥ ५ ॥
परस्परभयादेके पापाः पापं न कुर्वते ।
एवं सांसिद्धिके लोके सर्वं दण्डे प्रतिष्ठितम् ॥ ६ ॥
कितने ही पापी राजदण्डके भयसे पाप नहीं करते हैं। कुछ लोग यमदण्डके भयसे, कोई परलोकके भयसे और कितने ही पापी आपसमें एक-दूसरेके भयसे पाप नहीं करते हैं। जगत्की ऐसी ही स्वाभाविक स्थिति है; इसलिये सब कुछ दण्डमें ही प्रतिष्ठित है ॥ ५-६ ॥

दण्डस्यैव भयादेके न खादन्ति परस्परम् ।
अन्धे तमसि मज्जेयुर्यदि दण्डो न पालयेत् ॥ ७ ॥
बहुत-से मनुष्य दण्डके ही भयसे एक-दूसरेको खा नहीं जाते हैं, यदि दण्ड रक्षा न करे तो सब लोग घोर अन्धकारमें डूब जायँ ॥ ७ ॥

यस्माददान्तान् दमयत्यशिष्टान् दण्डयत्यपि ।
दमनाद् दण्डनाच्चैव तस्माद् दण्डं विदुर्बुधाः ॥ ८ ॥
यह उद्दण्ड मनुष्योंका दमन करता और दुष्टोंको दण्ड देता है, अतः उस दमन और दण्डके कारण ही विद्वान् पुरुष इसे दण्ड कहते हैं ॥ ८ ॥

वाचा दण्डो ब्राह्मणानां क्षत्रियाणां भुजार्पणम् ।
दानदण्डाः स्मृता वैश्या निर्दण्डः शूद्र उच्यते ॥ ९ ॥
यदि ब्राह्मण अपराध करे तो वाणीसे उसको अपमानित करना ही उसका दण्ड है, क्षत्रियको भोजनमात्रके लिये वेतन देकर उससे काम लेना उसका दण्ड है, वैश्योंसे जुर्मानाके रूपमें धन वसूल करना उनका दण्ड है, परंतु शूद्र दण्डरहित कहा गया है। उससे सेवा लेनेके सिवा और कोई दण्ड उसके लिये नहीं है ॥ ९ ॥

असम्मोहाय मर्त्यानामर्थसंरक्षणाय च ।
मर्यादा स्थापिता लोके दण्डसंज्ञा विशाम्पते ॥ १० ॥
प्रजानाथ! मनुष्योंको प्रमादसे बचाने और उनके धनकी रक्षा करनेके लिये लोकमें जो मर्यादा स्थापित की गयी है, उसीका नाम दण्ड है ॥ १० ॥

यत्र श्यामो लोहिताक्षो दण्डश्चरति सूद्यतः ।
प्रजास्तत्र न मुह्यन्ते नेता चेत् साधु पश्यति ॥ ११ ॥
दण्डनीयपर ऐसी जोरकी मार पड़ती है कि उसकी आँखोंके सामने अँधेरा छा जाता है; इसलिये दण्डको काला कहा गया है। दण्ड देनेवालेकी आँखें क्रोधसे लाल रहती हैं; इसलिये उसे लोहिताक्ष कहते हैं। ऐसा दण्ड जहाँ सर्वथा शासनके लिये उद्यत होकर विचरता रहता है और नेता या शासक अच्छी तरह अपराधोंपर दृष्टि रखता है, वहाँ प्रजा प्रमाद नहीं करती ॥ ११ ॥

ब्रह्मचारी गृहस्थश्च वानप्रस्थश्च भिक्षुकः ।
दण्डस्यैव भयादेते मनुष्या वर्त्मनि स्थिताः ॥ १२ ॥
ब्रह्मचारी, गृहस्थ, वानप्रस्थ और संन्यासी—ये सभी मनुष्य दण्डके ही भयसे अपने-अपने मार्गपर स्थिर रहते हैं ॥ १२ ॥

नाभीतो यजते राजन् नाभीतो दातुमिच्छति ।
नाभीतः पुरुषः कश्चित् समये स्थातुमिच्छति ॥ १३ ॥
राजन्! बिना भयके कोई यज्ञ नहीं करता है, बिना भयके कोई दान नहीं करना चाहता है, और दण्डका भय न हो तो कोई पुरुष मर्यादा या प्रतिज्ञाके पालनपर भी स्थिर नहीं

रहना चाहता है ॥ १३ ॥
नाच्छित्त्वा परमर्माणि नाकृत्वा कर्म दुष्करम् ।
नाहत्वा मत्स्यघातीव प्राप्नोति महतीं श्रियम् ॥ १४ ॥
मछली मारनेवाले मल्लाहोंकी तरह दूसरोंके मर्मस्थानोंका उच्छेद और दुष्कर कर्म किये बिना तथा बहुसंख्यक प्राणियोंको मारे बिना कोई बड़ी भारी सम्पत्ति नहीं प्राप्त कर सकता ॥ १४ ॥
नाघ्नतः कीर्तिरस्तीह न वित्तं न पुनः प्रजाः ।
इन्द्रो वृत्रवधेनैव महेन्द्रः समपद्यत ॥ १५ ॥
जो दूसरोंका वध नहीं करता, उसे इस संसारमें न तो कीर्ति मिलती है, न धन प्राप्त होता है और न प्रजा ही उपलब्ध होती है। इन्द्र वृत्रासुरका वध करनेसे ही महेन्द्र हो गये ॥ १५ ॥
य एव देवा हन्तारस्तांल्लोकोऽर्चयते भृशम् ।
हन्ता रुद्रस्तथा स्कन्दः शक्रोऽग्निर्वरुणो यमः ॥ १६ ॥
हन्ता कालस्तथा वायुर्मृत्युर्वैश्रवणो रविः ।
वसवो मरुतः साध्या विश्वेदेवाश्च भारत ॥ १७ ॥
एतान् देवान् नमस्यन्ति प्रतापप्रणता जनाः ।
जो देवता दूसरोंका वध करनेवाले हैं, उन्हींकी संसार अधिक पूजा करता है। रुद्र, स्कन्द, इन्द्र, अग्नि, वरुण, यम, काल, वायु, मृत्यु, कुबेर, सूर्य, वसु, मरुद्गण, साध्य तथा विश्वेदेव—ये सब देवता दूसरोंका वध करते हैं; इनके प्रतापके सामने नतमस्तक होकर सब लोग इन्हें नमस्कार करते हैं ॥ १६-१७ १/२ ॥
न ब्रह्माणं न धातारं न पूषाणं कथंचन ॥ १८ ॥
मध्यस्थान् सर्वभूतेषु दान्तान् शमपरायणान् ।
यजन्ते मानवाः केचित् प्रशान्ताः सर्वकर्मसु ॥ १९ ॥
परंतु ब्रह्मा, धाता और पूषाकी कोई किसी तरह भी पूजा-अर्चा नहीं करते हैं; क्योंकि वे सम्पूर्ण प्राणियोंके प्रति समभाव रखनेके कारण मध्यस्थ, जितेन्द्रिय एवं शान्तिपरायण हैं। जो शान्त स्वभावके मनुष्य हैं, वे ही समस्त कर्मोंमें इन धाता आदिकी पूजा करते हैं ॥
न हि पश्यामि जीवन्तं लोके कञ्चिदहिंसया ।
सत्त्वैः सत्त्वा हि जीवन्ति दुर्बलैर्बलवत्तराः ॥ २० ॥
संसारमें किसी भी ऐसे पुरुषको मैं नहीं देखता जो अहिंसासे जीविका चलाता हो। क्योंकि प्रबल जीव दुर्बल जीवोंद्वारा जीवन-निर्वाह करते हैं ॥ २० ॥
नकुलो मूषिकानत्ति बिडालो नकुलं तथा ।
बिडालमत्ति श्वा राजन् श्वानं व्यालमृगस्तथा ॥ २१ ॥

राजन्! नेवला चूहेको खा जाता है और नेवलेको बिलाव। बिलावको कुत्ता और कुत्तेको चीता चबा जाता है ॥ २१ ॥

तानत्ति पुरुषः सर्वान् पश्य कालो यथागतः ।
प्राणस्यान्नमिदं सर्वं जङ्गमं स्थावरं च यत् ॥ २२ ॥
परंतु इन सबको मनुष्य मारकर खा जाता है। देखो, कैसा काल आ गया है? यह सम्पूर्ण चराचर जगत् प्राणका अन्न है ॥ २२ ॥

विधानं दैवविहितं तत्र विद्वान् न मुह्यति ।
यथा सृष्टोऽसि राजेन्द्र तथा भवितुमर्हसि ॥ २३ ॥
यह सब दैवका विधान है। इसमें विद्वान् पुरुषको मोह नहीं होता है। राजेन्द्र! आपको विधाताने जैसा बनाया है, (जिस जाति और कुलमें आपको जन्म दिया है) वैसा ही आपको होना चाहिये ॥ २३ ॥

विनीतक्रोधहर्षा हि मन्दा वनमुपाश्रिताः ।
विना वधं न कुर्वन्ति तापसाः प्राणयापनम् ॥ २४ ॥
जिनमें क्रोध और हर्ष दोनों ही नहीं रह गये हैं, वे मन्दबुद्धि क्षत्रिय वनमें जाकर तपस्वी बन जाते हैं। परंतु बिना हिंसा किये वे भी जीवन-निर्वाह नहीं कर पाते हैं ॥ २४ ॥

उदके बहवः प्राणाः पृथिव्यां च फलेषु च ।
न च कश्चिन्न तान् हन्ति किमन्यत् प्राणयापनात् ॥ २५ ॥
जलमें बहुतेरे जीव हैं, पृथ्वीपर तथा वृक्षके फलोंमें भी बहुत-से कीड़े होते हैं। कोई भी ऐसा मनुष्य नहीं है, जो इनमेंसे किसीको कभी न मारता हो। यह सब जीवन-निर्वाहके सिवा और क्या है? ॥ २५ ॥

सूक्ष्मयोनीनि भूतानि तर्कगम्यानि कानिचित् ।
पक्ष्मणोऽपि निपातेन येषां स्यात् स्कन्धपर्ययः ॥ २६ ॥
कितने ही ऐसे सूक्ष्म योनिके जीव हैं जो अनुमानसे ही जाने जाते हैं। मनुष्यकी पलकोंके गिरनेमात्रसे जिनके कंधे टूट जाते हैं (ऐसे जीवोंकी हिंसासे कोई कहाँ-तक बच सकता है?) ॥ २६ ॥

ग्रामान् निष्क्रम्य मुनयो विगतक्रोधमत्सराः ।
वने कुटुम्बर्धर्माणो दृश्यन्ते परिमोहिताः ॥ २७ ॥
कितने ही मुनि क्रोध और ईर्ष्यासे रहित हो गाँवसे निकलकर वनमें चले जाते हैं, और वहीं मोहवश गृहस्थधर्ममें अनुरक्त दिखायी देते हैं ॥ २७ ॥

भूमिं भित्त्वौषधीश्छित्त्वा वृक्षादीनण्डजान् पशून् ।
मनुष्यास्तन्वते यज्ञांस्ते स्वर्गं प्राप्नुवन्ति च ॥ २८ ॥
मनुष्य धरतीको खोदकर तथा ओषधियों, वृक्षों, लताओं, पक्षियों और पशुओंका उच्छेद करके यज्ञका अनुष्ठान करते हैं, और वे स्वर्गमें भी चले जाते हैं ॥

दण्डनीत्यां प्रणीतायां सर्वे सिद्ध्यन्त्युपक्रमाः ।
कौन्तेय सर्वभूतानां तत्र मे नास्ति संशयः ॥ २९ ॥
कुन्तीनन्दन! दण्डनीतिका ठीक-ठीक प्रयोग होनेपर समस्त प्राणियोंके सभी कार्य अच्छी तरह सिद्ध होते हैं, इसमें मुझे संशय नहीं है ॥ २९ ॥

दण्डश्चेन्न भवेल्लोके विनश्येयुरिमाः प्रजाः ।
जले मत्स्यानिवाभक्ष्यन् दुर्बलान् बलवत्तराः ॥ ३० ॥
यदि संसारमें दण्ड न रहे तो यह सारी प्रजा नष्ट हो जाय; और जैसे जलमें बड़े मत्स्य छोटी मछलियोंको खा जाते हैं उसी प्रकार प्रबल जीव दुर्बल जीवोंको अपना आहार बना लें ॥ ३० ॥

सत्यं चेदं ब्रह्मणा पूर्वमुक्तं
दण्डः प्रजा रक्षति साधु नीतः ।
पश्याग्नयश्च प्रतिशाम्य भीताः
संतर्जिता दण्डभयाज्ज्वलन्ति ॥ ३१ ॥
ब्रह्माजीने पहले ही इस सत्यको बता दिया है कि अच्छी तरह प्रयोगमें लाया हुआ दण्ड प्रजाजनोंकी रक्षा करता है। देखो, जब आग बुझने लगती है तब वह फूँककी फटकार पड़नेपर डर जाती और दण्डके भयसे फिर प्रज्वलित हो उठती है ॥ ३१ ॥

अन्धं तम इवेदं स्यान्न प्राज्ञायत किंचन ।
दण्डश्चेन्न भवेल्लोके विभजन् साध्वसाधुनी ॥ ३२ ॥
यदि संसारमें भले-बुरेका विभाग करनेवाला दण्ड न हो तो सब जगह अंधेर मच जाय और किसीको कुछ सूझ न पड़े ॥ ३२ ॥

येऽपि सम्भिन्नमर्यादा नास्तिका वेदनिन्दकाः ।
तेऽपि भोगाय कल्पन्ते दण्डेनाशु निपीडिताः ॥ ३३ ॥
जो धर्मकी मर्यादा नष्ट करके वेदोंकी निन्दा करनेवाले नास्तिक मनुष्य हैं, वे भी डंडे पड़नेपर उससे पीड़ित हो शीघ्र ही राहपर आ जाते हैं—मर्यादापालनके लिये तैयार हो जाते हैं ॥ ३३ ॥

सर्वो दण्डजितो लोको दुर्लभो हि शुचिर्जनः ।
दण्डस्य हि भयाद् भीतो भोगायैव प्रवर्तते ॥ ३४ ॥
सारा जगत् दण्डसे विवश होकर ही रास्तेपर रहता है; क्योंकि स्वभावतः सर्वथा शुद्ध मनुष्य मिलना कठिन है। दण्डके भयसे डरा हुआ मनुष्य ही मर्यादा-पालनमें प्रवृत्त होता है ॥ ३४ ॥

चातुर्वर्ण्यप्रमोदाय सुनीतिनयनाय च ।
दण्डो विधात्रा विहितो धर्मार्थौ भुवि रक्षितुम् ॥ ३५ ॥

विधाताने दण्डका विधान इस उद्देश्यसे किया है कि चारों वर्णोंके लोग आनन्दसे रहें, सबमें अच्छी नीतिका बर्ताव हो तथा पृथ्वीपर धर्म और अर्थकी रक्षा रहे ।।
यदि दण्डान्न बिभीयुर्वयांसि श्वापदानि च ।
अद्युः पशून् मनुष्यांश्च यज्ञार्थानि हवींषि च ।। ३६ ।।
यदि पक्षी और हिंसक जीव दण्डके भयसे डरते न होते तो वे पशुओं, मनुष्यों और यज्ञके लिये रखे हुए हविष्योंको खा जाते ।। ३६ ।।
न ब्रह्मचार्यधीयीत कल्याणी गौर्न दुह्यते ।
न कन्योद्वहनं गच्छेद यदि दण्डो न पालयेत् ।। ३७ ।।
यदि दण्ड मर्यादाकी रक्षा न करे तो ब्रह्मचारी वेदोंके अध्ययनमें न लगे, सीधी गौ भी दूध न दुहावे और कन्या ब्याह न करे ।। ३७ ।।
विष्वग्लोपः प्रवर्तेत भिद्येरन् सर्वसेतवः ।
ममत्वं न प्रजानीयुर्यदि दण्डो न पालयेत् ।। ३८ ।।
यदि दण्ड मर्यादाका पालन न करावे तो चारों ओरसे धर्म-कर्मका लोप हो जाय, सारी मर्यादाएँ टूट जायँ और लोग यह भी न जानें कि कौन वस्तु मेरी है और कौन नहीं? ।। ३८ ।।
न संवत्सरसत्राणि तिष्ठेयुरकुतोभयाः ।
विधिवद् दक्षिणावन्ति यदि दण्डो न पालयेत् ।। ३९ ।।
यदि दण्ड धर्मका पालन न करावे तो विधि-पूर्वक दक्षिणाओंसे युक्त संवत्सरयज्ञ भी बेखटके न होने पावे ।। ३९ ।।
चरेयुर्नाश्रमे धर्मं यथोक्तं विधिमाश्रिताः ।
न विद्यां प्राप्नुयात् कश्चिद् यदि दण्डो न पालयेत् ।। ४० ।।
यदि दण्ड मर्यादाका पालन न करावे तो लोग आश्रमोंमें रहकर विधिपूर्वक शास्त्रोक्त धर्मका पालन न करें और कोई विद्या भी न पढ़ सके ।। ४० ।।
न चोष्ट्रा न बलीवर्दा नाश्वाश्वतरगर्दभाः ।
युक्ता वहेयुर्यानानि यदि दण्डो न पालयेत् ।। ४१ ।।
यदि दण्ड कर्तव्यका पालन न करावे तो ऊँट, बैल, घोड़े, खच्चर और गदहे रथोंमें जोत दिये जानेपर भी उन्हें ढोकर ले न जायँ ।। ४१ ।।
न प्रेष्या वचनं कुर्युर्न बाला जातु कर्हिचित् ।
न तिष्ठेद् युवती धर्मे यदि दण्डो न पालयेत् ।। ४२ ।।
यदि दण्ड धर्म और कर्तव्यका पालन न करावे तो सेवक स्वामीकी बात न माने, बालक भी कभी माँ-बापकी आज्ञाका पालन न करें और युवती स्त्री भी अपने सतीधर्ममें स्थिर न रहे ।। ४२ ।।
दण्डे स्थिताः प्रजाः सर्वा भयं दण्डे विदुर्बुधाः ।

दण्डे स्वर्गो मनुष्याणां लोकोऽयं सुप्रतिष्ठितः ॥ ४३ ॥
दण्डपर ही सारी प्रजा टिकी हुई है, दण्डसे ही भय होता है, ऐसी विद्वानोंकी मान्यता है। मनुष्योंका इहलोक और स्वर्गलोक दण्डपर ही प्रतिष्ठित है ॥ ४३ ॥
न तत्र कूटं पापं वा वञ्चना वापि दृश्यते ।
यत्र दण्डः सुविहितश्चरत्यरिविनाशनः ॥ ४४ ॥
जहाँ शत्रुओंका विनाश करनेवाला दण्ड सुन्दर ढंगसे संचालित हो रहा है, वहाँ छल, पाप और ठगी भी नहीं देखनेमें आती है ॥ ४४ ॥
हविःश्वा प्रलिहेद् दृष्ट्वा दण्डश्चेन्नोद्यतो भवेत् ।
हरेत् काकः पुरोडाशं यदि दण्डो न पालयेत् ॥ ४५ ॥
यदि दण्ड रक्षाके लिये सदा उद्यत न रहे तो कुत्ता हविष्यको देखते ही चाट जाय और यदि दण्ड रक्षा न करे तो कौआ पुरोडाशको उठा ले जाय ॥ ४५ ॥
यदीदं धर्मतो राज्यं विहितं यद्यधर्मतः ।
कार्यस्तत्र न शोको वै भुङ्क्ष्व भोगान् यजस्व च ॥ ४६ ॥
यह राज्य धर्मसे प्राप्त हुआ हो या अधर्मसे, इसके लिये शोक नहीं करना चाहिये। आप भोग भोगिये और यज्ञ कीजिये ॥ ४६ ॥
सुखेन धर्मं श्रीमन्तश्चरन्ति शुचिवाससः ।
संवर्षन्तः फलैर्दानैर्भुञ्जनाश्चान्नमुत्तमम् ॥ ४७ ॥
शुद्ध वस्त्र धारण करनेवाले धनवान् पुरुष सुखपूर्वक धर्मका आचरण करते हैं और उत्तम अन्न भोजन करते हुए फलों और दानोंकी वर्षा करते हैं ॥ ४७ ॥
अर्थे सर्वे समारम्भाः समायात्ता न संशयः ।
स च दण्डे समायत्ततः पश्य दण्डस्य गौरवम् ॥ ४८ ॥
इसमें संदेह नहीं कि सारे कार्य धनके अधीन हैं, परंतु धन दण्डके अधीन है। देखिये, दण्डकी कैसी महिमा है? ॥ ४८ ॥
लोकयात्रार्थमेवेह धर्मप्रवचनं कृतम् ।
अहिंसासाधुहिंसेति श्रेयान् धर्मपरिग्रहः ॥ ४९ ॥
लोकयात्राका निर्वाह करनेके लिये ही धर्मका प्रतिपादन किया गया है। सर्वथा हिंसा न की जाय अथवा दुष्टकी हिंसा की जाय, यह प्रश्न उपस्थित होनेपर जिसमें धर्मकी रक्षा हो, वही कार्य श्रेष्ठ मानना चाहिये* ॥ ४९ ॥
नात्यन्तं गुणवत् किंचिन्न चाप्यत्यन्तनिर्गुणम् ।
उभयं सर्वकार्येषु दृश्यते साध्वसाधु वा ॥ ५० ॥
कोई भी वस्तु ऐसी नहीं है जिसमें सर्वथा गुण-ही-गुण हो। ऐसी भी वस्तु नहीं है जो सर्वथा गुणोंसे वंचित ही हो। सभी कार्योंमें अच्छाई और बुराई दोनों ही देखनेमें आती हैं ॥ ५० ॥

पशूनां वृषणं छित्त्वा ततो भिन्दन्ति मस्तकम् ।
वहन्ति बहवो भारान् बध्नन्ति दमयन्ति च ॥ ५१ ॥
बहुत-से मनुष्य पशुओं (बैलों)-का अण्डकोश काटकर फिर उसके मस्तकपर उगे हुए दोनों सींगोंको भी विदीर्ण कर देते हैं, जिससे वे अधिक बढ़ने न पावें। फिर उनसे भार ढुलाते हैं, उन्हें घरमें बाँधे रखते हैं और नये बच्चेको गाड़ी आदिमें जोतकर उसका दमन करते हैं—उनकी उद्दण्डता दूर करके उनसे काम करनेका अभ्यास कराते हैं ॥ ५१ ॥

एवं पर्याकुले लोके वितथैर्जर्जरीकृते ।
तैस्तैर्न्यायैर्महाराज पुराणं धर्ममाचर ॥ ५२ ॥
महाराज! इस प्रकार सारा जगत् मिथ्या व्यवहारोंसे आकुल और दण्डसे जर्जर हो गया है। आप भी उन्हीं-उन्हीं न्यायोंका अनुसरण करके प्राचीन धर्मका आचरण कीजिये ॥ ५२ ॥

यज देहि प्रजां रक्ष धर्मं समनुपालय ।
अमित्रान् जहि कौन्तेय मित्राणि परिपालय ॥ ५३ ॥
यज्ञ कीजिये, दान दीजिये, प्रजाकी रक्षा कीजिये और धर्मका निरन्तर पालन करते रहिये। कुन्तीनन्दन! आप शत्रुओंका वध और मित्रोंका पालन कीजिये ॥ ५३ ॥

मा च ते निघ्नतः शत्रून् मन्युर्भवतु पार्थिव ।
न तत्र किल्बिषं किंचित् कर्तुर्भवति भारत ॥ ५४ ॥
राजन्! शत्रुओंका वध करते समय आपके मनमें दीनता नहीं आनी चाहिये। भारत! शत्रुओंका वध करनेसे कर्ताको कोई पाप नहीं लगता ॥ ५४ ॥

आततायी हि यो हन्यादाततायिनमागतम् ।
न तेन भ्रूणहा स स्यान्मन्युस्तं मन्युमार्छति ॥ ५५ ॥
जो हाथमें हथियार लेकर मारने आया हो, उस आततायीको जो स्वयं भी आततायी बनकर मार डाले, उससे वह भ्रूण-हत्याका भागी नहीं होता; क्योंकि मारनेके लिये आये हुए उस मनुष्यका क्रोध ही उसका वध करनेवालेके मनमें भी क्रोध पैदा कर देता है ॥ ५५ ॥

अवध्यः सर्वभूतानामन्तरात्मा न संशयः ।
अवध्ये चात्मनि कथं वध्यो भवति कस्यचित् ॥ ५६ ॥
समस्त प्राणियोंका अन्तरात्मा अवध्य है, इसमें संशय नहीं है। जब आत्माका वध हो ही नहीं सकता तब वह किसीका वध्य कैसे होगा? ॥ ५६ ॥

यथा हि पुरुषः शालां पुनः सम्प्रविशेन्नवाम् ।
एवं जीवः शरीराणि तानि तानि प्रपद्यते ॥ ५७ ॥
देहान् पुराणानुत्सृज्य नवान् सम्प्रतिपद्यते ।
एवं मृत्युमुखं प्राहुर्जना ये तत्त्वदर्शिनः ॥ ५८ ॥

जैसे मनुष्य बारंबार नये घरोंमें प्रवेश करता है, उसी प्रकार जीव भिन्न-भिन्न शरीरोंको ग्रहण करता है। पुराने शरीरोंको छोड़कर नये शरीरोंको अपना लेता है। इसीको तत्त्वदर्शी मनुष्य मृत्युका मुख बताते हैं ।।

इति श्रीमहाभारते शान्तिपर्वणि राजधर्मानुशासनपर्वणि अर्जुनवाक्ये पञ्चदशोऽध्यायः ॥ १५ ॥

इस प्रकार श्रीमहाभारत शान्तिपर्वके अन्तर्गत राजधर्मानुशासनपर्वमें अर्जुनवाक्यविषयक पंद्रहवाँ अध्याय पूरा हुआ ।। १५ ।।


* यदि गोशालामें बाघ आ जाय तो उसकी हिंसा ही उचित होगी, क्योंकि उसका वध न करनेसे कितनी ही गौओंकी हिंसा हो जायगी। अतः 'आर्त-रक्षा' रूप धर्मकी सिद्धिके लिये उस हिंसक प्राणीका वध ही वहाँ श्रेयस्कर होगा।