महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व
Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
भरद्वाज और भृगुके संवादमें जगत्की उत्पत्तिका और विभिन्न तत्त्वोंका वर्णन
द्व्यशीत्यधिकशततमोऽध्यायः
भरद्वाज और भृगुके संवादमें जगत्की उत्पत्तिका और विभिन्न तत्त्वोंका वर्णन
युधिष्ठिर उवाच
कुतः सृष्टमिदं विश्वं जगत् स्थावरजङ्गमम् ।
प्रलये च कमभ्येति तन्मे ब्रूहि पितामह ॥ १ ॥
**युधिष्ठिरने पूछा—**पितामह! इस सम्पूर्ण स्थावर-जंगम जगत्की उत्पत्ति कहाँसे हुई है? प्रलयकालमें यह किसमें लीन होता है? यह मुझे बताइये ॥ १ ॥
ससागरः सगगनः सशैलः सबलाहकः ।
सभूमिः साग्निपवनो लोकोऽयं केन निर्मितः ॥ २ ॥
समुद्र, आकाश, पर्वत, मेघ, भूमि, अग्नि और वायुसहित इस संसारका किसने निर्माण किया है? ॥ २ ॥
कथं सृष्टानि भूतानि कथं वर्णविभक्तयः ।
शौचाशौचं कथं तेषां धर्माधर्मविधिः कथम् ॥ ३ ॥
प्राणियोंकी सृष्टि किस प्रकार हुई? वर्णोंका विभाग किस तरह किया गया? उनमें शौच और अशौचकी व्यवस्था कैसे हुई? तथा धर्म और अधर्मका विधान किस प्रकार किया गया? ॥ ३ ॥
कीदृशो जीवतां जीवः क्व वा गच्छन्ति ये मृताः ।
अस्माल्लोकादमुं लोकं सर्वं शंसतु नो भवान् ॥ ४ ॥
जीवित प्राणियोंका जीवात्मा कैसा है? जो मर गये, वे कहाँ चले जाते हैं? इस लोकसे उस लोकमें जानेका क्रम क्या है? ये सब बातें आप हमें बतावें ॥
भीष्म उवाच
अत्राप्युदाहरन्तीममितिहासं पुरातनम् ।
भृगुणाभिहितं शास्त्रं भरद्वाजाय पृच्छते ॥ ५ ॥
**भीष्मजी बोले—**राजन्! विज्ञ पुरुष इस विषयमें एक प्राचीन इतिहासका उदाहरण दिया करते हैं, जिसमें भरद्वाजके प्रश्न करनेपर भृगुके उपदेशका उल्लेख हुआ है ॥ ५ ॥
कैलासशिखरे दृष्ट्वा दीप्यमानं महौजसम् ।
भृगुं महर्षिमासीनं भरद्वाजोऽन्वपृच्छत ॥ ६ ॥
कैलास पर्वतके शिखरपर अपने तेजसे देदीप्यमान होते हुए महातेजस्वी महर्षि भृगुको बैठा देख भरद्वाज मुनिने पूछा— ॥ ६ ॥
ससागरः सगगनः सशैलः सबलाहकः ।
सभूमिः साग्निपवनो लोकोऽयं केन निर्मितः ॥ ७ ॥
‘समुद्र, आकाश, पर्वत, मेघ, भूमि, अग्नि और वायुसहित इस संसारका किसने निर्माण किया है? ॥ ७ ॥
कथं सृष्टानि भूतानि कथं वर्णविभक्तयः ।
शौचाशौचं कथं तेषां धर्माधर्मविधिः कथम् ॥ ८ ॥
‘प्राणियोंकी सृष्टि किस प्रकार हुई? वर्णोंका विभाग किस तरह किया गया? उनमें शौच और अशौचकी व्यवस्था कैसे हुई? तथा धर्म और अधर्मका विधान किस प्रकार किया गया? ॥ ८ ॥
कीदृशो जीवतां जीवः क्व वा गच्छन्ति ये मृताः ।
परलोकमिमं चापि सर्वं शंसितुमर्हसि ॥ ९ ॥
‘जीवित प्राणियोंका जीवात्मा कैसा है? जो मर गये, वे कहाँ चले जाते हैं? तथा यह लोक और परलोक कैसा है? यह सब मुझे बतानेकी कृपा करें’ ॥ ९ ॥
एवं स भगवान् पृष्टो भरद्वाजेन संशयम् ।
ब्रह्मर्षिर्ब्रह्मसंकाशः सर्वं तस्मै ततोऽब्रवीत् ॥ १० ॥
भरद्वाज मुनिके इस प्रकार अपना संशय पूछनेपर ब्रह्माजीके समान तेजस्वी ब्रह्मर्षि भगवान् भृगुने उन्हें सब कुछ बताया ॥ १० ॥
भृगुरुवाच
(नारायणो जगन्मूर्तिरन्तरात्मा सनातनः ।
कूटस्थोऽक्षर अव्यक्तो निर्लेपो व्यापकः प्रभुः ॥
प्रकृतेः परतो नित्यमिन्द्रियैरप्यगोचरः ।
स सिसृक्षुः सहस्रांशादसृजत् पुरुषं प्रभुः ।)
मानसो नाम विख्यातः श्रुतपूर्वो महर्षिभिः ।
अनादिनिधनो देवस्तथाभेद्योऽजरामरः ॥ ११ ॥
**भृगु बोले—**ब्रह्मन्! भगवान् नारायण सम्पूर्ण जगत्स्वरूप हैं। वे ही सबके अन्तरात्मा और सनातन पुरुष हैं। वे ही कूटस्थ, अविनाशी, अव्यक्त, निर्लेप, सर्वव्यापी, प्रभु, प्रकृतिसे परे और इन्द्रियातीत हैं। उन भगवान् नारायणके हृदयमें जब सृष्टिविषयक संकल्पका उदय हुआ तो उन्होंने अपने हजारवें अंशसे एक पुरुषको उत्पन्न किया, महर्षियोंने सर्वप्रथम जिसको इसी नामसे सुना था, जो मानसपुरुषके नामसे प्रसिद्ध है। पूर्वकालमें उत्पन्न वह मानसदेव अनादि, अनन्त, अभेद्य, अजर और अमर है ॥ ११ ॥
अव्यक्त इति विख्यातः शाश्वतोऽथाक्षयोऽव्ययः ।
यतः सृष्टानि भूतानि जायन्ते च म्रियन्ति च ॥ १२ ॥
उसीकी अव्यक्त नामसे प्रसिद्धि है। वही शाश्वत, अक्षय और अविनाशी है। उससे उत्पन्न सब प्राणी जन्मते और मरते रहते हैं ।। १२ ।।
सोऽसृजत् प्रथमं देवो महान्तं नाम नामतः ।
महान् ससर्जाहंकारं स चापि भगवानथ ।। १३ ।।
उस स्वयम्भू देवने पहले महत्तत्त्व (समष्टि बुद्धि) की रचना की। फिर उस महत्तत्त्वस्वरूप भगवान्ने अहंकार (समष्टि अहंकार) की सृष्टि की ।। १३ ।।
आकाशमिति विख्यातं सर्वभूतधरः प्रभुः ।
आकाशादभवद् वारि सलिलादग्निमारुतौ ।
अग्निमारुतसंयोगात् ततः समभवन्मही ।। १४ ।।
सम्पूर्ण भूतोंको धारण करनेवाले अहंकारस्वरूप भगवान्ने शब्दतन्मात्रा रूप आकाशको उत्पन्न किया। आकाशसे जल और जलसे अग्नि एवं वायुकी उत्पत्ति हुई। अग्नि और वायुके संयोगसे इस पृथिवीका प्रादुर्भाव हुआ* ।। १४ ।।
ततस्तेजोमयं दिव्यं पद्मं सृष्टं स्वयम्भुवा ।
तस्मात् पद्मात् समभवद् ब्रह्मा वेदमयो निधिः ।। १५ ।।
उसके बाद उस स्वयम्भू मानसदेवने पहले एक तेजोमय दिव्य कमल उत्पन्न किया। उसी कमलसे वेदमय निधिरूप ब्रह्माजी प्रकट हुए ।। १५ ।।
अहंकार इति ख्यातः सर्वभूतात्मभूतकृत् ।
ब्रह्मा वै स महातेजा य एते पञ्च धातवः ।। १६ ।।
वे अहंकार नामसे भी विख्यात हैं और समस्त भूतोंके आत्मा तथा उन भूतोंकी सृष्टि करनेवाले हैं। ये जो पाँच महाभूत हैं, इनके रूपमें महातेजस्वी ब्रह्मा ही प्रकट हुए हैं ।। १६ ।।
शैलास्तस्यास्थिसंज्ञास्तु मेदो मांसं च मेदिनी ।
समुद्रास्तस्य रुधिरमाकाशमुदरं तथा ।। १७ ।।
पर्वत उनकी हड्डियाँ हैं, पृथ्वी उनका मेद और मांस है। समुद्र उनका रुधिर है और आकाश उदर है ।।
पवनश्चैव निःश्वासस्तेजोऽग्निर्निम्नगाः शिराः ।
अग्नीषोमौ तु चन्द्रार्कौ नयने तस्य विश्रुते ।। १८ ।।
वायु निःश्वास है, अग्नि तेज है, नदियाँ नाड़ियाँ हैं, सूर्य और चन्द्रमा जिन्हें अग्नि और सोम भी कहते हैं, ब्रह्माजीके नेत्रोंके रूपमें प्रसिद्ध हैं ।। १८ ।।
नभश्चोर्ध्वं शिरस्तस्य क्षितिः पादौ भुजौ दिशः ।
दुर्विज्ञेयो ह्यचिन्त्यात्मा सिद्धैरपि न संशयः ।। १९ ।।
आकाशका ऊपरी भाग उनका सिर है, पृथ्वी पैर है और दिशाएँ भुजाएँ हैं। वे अचिन्त्यस्वरूप ब्रह्मा सिद्ध पुरुषोंके लिये भी दुर्विज्ञेय हैं, इसमें संशय नहीं है ।।
स एष भगवान् विष्णुरनन्त इति विश्रुतः ।
सर्वभूतात्मभूतस्थो दुर्विज्ञेयोऽकृतात्मभिः ॥ २० ॥
वह स्वयम्भू ही भगवान् विष्णु हैं, जो अनन्त नामसे प्रसिद्ध हैं, वे ही सम्पूर्ण भूतोंके अन्तःकरणमें अन्तर्यामी आत्माके रूपमें विद्यमान हैं। जिनका हृदय शुद्ध नहीं है, उनके लिये इनके स्वरूपको ठीक-ठीक जानना बहुत कठिन है ॥ २० ॥
अहंकारस्य यः स्रष्टा सर्वभूतभवाय वै ।
यतः समभवद् विश्वं पृष्टोऽहं यदिह त्वया ॥ २१ ॥
वे ही सम्पूर्ण भूतोंकी उत्पत्तिके लिये प्राकृत अहंकारकी सृष्टि करनेवाले हैं। तुमने मुझसे जो पूछा था कि इस विश्वकी उत्पत्ति किससे हुई है, वह सब मैंने तुम्हें बता दिया ॥ २१ ॥
भरद्वाज उवाच
गगनस्य दिशां चैव भूतलस्यानिलस्य वा ।
कान्यत्र परिमाणानि संशयं छिन्धि तत्त्वतः ॥ २२ ॥
भरद्वाजने पूछा— प्रभो! आकाश, दिशा, पृथ्वी और वायुका कितना-कितना परिमाण है? यह ठीक-ठीक बताकर मेरा संशय दूर कीजिये ॥ २२ ॥
भृगुरुवाच
अनन्तमेतदाकाशं सिद्धदैवतसेवितम् ।
रम्यं नानाश्रयाकीर्णं यस्यान्तो नाधिगम्यते ॥ २३ ॥
भृगुजीने कहा— मुने! यह आकाश तो अनन्त है, इसमें अनेकानेक सिद्ध और देवता निवास करते हैं। इसमें उनके भिन्न-भिन्न लोक भी स्थित हैं। यह बड़ा ही रमणीय है और इतना महान् है कि कहीं इसका अन्त नहीं मिलता ॥ २३ ॥
ऊर्ध्वं गतेरधस्तात्तु चन्द्रादित्यौ न दृश्यतः ।
तत्र देवाः स्वयं दीप्ता भास्वराभाग्निवर्चसः ॥ २४ ॥
ऊपर तथा नीचे जानेसे जहाँ सूर्य और चन्द्रमा नहीं दिखायी देते, वहाँ सूर्य और अग्निके समान तेजस्वी देवता स्वयं अपने प्रकाशसे ही प्रकाशित होते हैं ॥ २४ ॥
ते चाप्यन्तं न पश्यन्ति नभसः प्रथितौजसः ।
दुर्गमत्वादनन्तत्वादिति मे विद्धि मानद ॥ २५ ॥
मानद! परंतु वे तेजस्वी नक्षत्रस्वरूप देवता भी इस आकाशका अन्त नहीं देख पाते; क्योंकि यह दुर्गम और अनन्त है, यह बात तुम्हें मेरे मुखसे सुनकर अच्छी तरह समझ लेनी चाहिये ॥ २५ ॥
उपरिष्टोपरिष्टात्तु प्रज्वलद्भिः स्वयंप्रभैः ।
निरुद्धमेतदाकाशमप्रमेयं सुरैरपि ॥ २६ ॥
ऊपर-ऊपर प्रकाशित होनेवाले स्वयंप्रकाश देवताओंसे यह अप्रमेय आकाश भी भरा हुआ-सा प्रतीत होता है ॥ २६ ॥
पृथिव्यन्ते समुद्रास्तु समुद्रान्ते तमः स्मृतम् ।
तमसोऽन्ते जलं प्राहुर्जलस्यान्तेऽग्निरेव च ॥ २७ ॥
पृथ्वीके अन्तमें समुद्र हैं। समुद्रके अन्तमें घोर अन्धकार है। अन्धकारके अन्तमें जल है और जलके अन्तमें अग्निकी स्थिति बतायी गयी है ॥ २७ ॥
रसातलान्ते सलिलं जलान्ते पन्नगाधिपाः ।
तदन्ते पुनराकाशमाकाशान्ते पुनर्जलं ॥ २८ ॥
रसातलके अन्तमें जल है। जलके अन्तमें नागराज शेष हैं। उनके अन्तमें पुनः आकाश और आकाशके ही अन्तभागमें पुनः जल है ॥ २८ ॥
एवमन्तं भगवतः प्रमाणं सलिलस्य च ।
अग्निमारुततोयेभ्यो दुर्ज्ञेयं दैवतैरपि ॥ २९ ॥
इस प्रकार भगवान्का, आकाशका, जलका तथा अग्नि और वायुका भी अन्त और परिमाण जानना देवताओंके लिये भी अत्यन्त कठिन है ॥ २९ ॥
अग्निमारुततोयानां वर्णाः क्षितितलस्य च ।
आकाशादवगृह्यन्ते भिद्यन्तेऽतत्त्वदर्शनात् ॥ ३० ॥
अग्नि, वायु, जल और पृथ्वी—इनके रंग-रूप आकाशसे ही गृहीत होते हैं; अतः उससे भिन्न नहीं हैं। तत्त्वज्ञान न होनेसे ही उनमें भेदकी प्रतीति होती है ॥
पठन्ति चैव मुनयः शास्त्रेषु विविधेषु च ।
त्रैलोक्ये सागरे चैव प्रमाणं विहितं यथा ॥ ३१ ॥
अदृश्याय त्वगम्याय कः प्रमाणमुदाहरेत् ।
सिद्धानां देवतानां च यदा परिमिता गतिः ॥ ३२ ॥
ऋषियोंने विविध शास्त्रोंमें तीनों लोकों और समुद्रोंके विषयमें तो कुछ निश्चित प्रमाण बताया भी है; परंतु जो दृष्टिसे परे हैं और जहाँतक इन्द्रियोंकी पहुँच नहीं है, उस परमात्माका परिमाण कोई कैसे बतायेगा? आखिर इन सिद्धों और देवताओंका ज्ञान भी तो परिमित ही है ॥ ३१-३२ ॥
तदा गौणमनन्तस्य नामानन्तेति विश्रुतम् ।
नामधेयानुरूपस्य मानसस्य महात्मनः ॥ ३३ ॥
अतः परमात्मा मानसदेव अपने नामके अनुरूप ही अनन्त हैं। उनका सुप्रसिद्ध अनन्त नाम उनके गुणके अनुसार ही है ॥ ३३ ॥
यदा तु दिव्यं तद् रूपं हसते वर्धते पुनः ।
कोऽन्यस्तद्वेदितुं शक्तो योऽपि स्यात् तद्विधोऽपरः ॥ ३४ ॥
जब उन परमात्माका वह दिव्यस्वरूप उनकी मायासे कभी बहुत छोटा हो जाता है और कभी बहुत बढ़ जाता है, तब कोई उनसे भिन्न दूसरा उन्हींके समान प्रतिभाशाली कौन है, जो कि उस स्वरूपका यथार्थ परिमाण जान सके अर्थात् ऐसा कोई नहीं है ॥ ३४ ॥
ततः पुष्करतः सृष्टः सर्वज्ञो मूर्तिमान् प्रभुः ।
ब्रह्मा धर्ममयः पूर्वः प्रजापतिरनुत्तमः ॥ ३५ ॥
तदनन्तर पूर्वोक्त कमलसे सर्वज्ञ, मूर्तिमान्, प्रभाव-शाली, परम उत्तम तथा प्रथम प्रजापति धर्ममय ब्रह्माका प्रादुर्भाव हुआ ॥ ३५ ॥
भरद्वाज उवाच
पुष्कराद् यदि सम्भूतो ज्येष्ठं भवति पुष्करम् ।
ब्रह्माणं पूर्वजं चाह भवान् संदेह एव मे ॥ ३६ ॥
भरद्वाजने पूछा— प्रभो! यदि ब्रह्माजी कमलसे प्रकट हुए तब तो कमल ही ज्येष्ठ प्रतीत होता है; परंतु आपने ब्रह्माजीको पूर्वज बताया है; अतः यह संदेह मेरे मनमें बना ही रह गया ॥ ३६ ॥
भृगुरुवाच
मानसस्येह या मूर्तिर्ब्रह्मत्वं समुपागता ।
तस्यासनविधानार्थं पृथिवी पद्ममुच्यते ॥ ३७ ॥
भृगुने कहा— मुने! मानसदेवका जो स्वरूप बताया गया है, वही ब्रह्मरूपमें प्रकट है। उन्हीं ब्रह्माजीके आसनके लिये इस पृथ्वीको ही पद्म (कमल) कहते हैं ॥ ३७ ॥
कर्णिका तस्य पद्मस्य मेरुर्गगनमुच्छ्रितः ।
तस्य मध्ये स्थितो लोकान् सृजते जगतः प्रभुः ॥ ३८ ॥
इस कमलकी कर्णिका मेरुपर्वत है, जो आकाशमें बहुत ऊँचेतक गया है। उसी पर्वतके मध्यभागमें स्थित होकर जगदीश्वर ब्रह्मा सम्पूर्ण लोकोंकी सृष्टि करते हैं ॥
इति श्रीमहाभारते शान्तिपर्वणि मोक्षधर्मपर्वणि भृगुभरद्वाजसंवादे
द्व्यशीत्यधिकशततमोऽध्यायः ॥ १८२ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत शान्तिपर्वके अन्तर्गत मोक्षधर्मपर्वमें भृगु और भरद्वाजका संवादविषयक एक सौ बयासीवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १८२ ॥
(दाक्षिणात्य अधिक पाठके २ श्लोक मिलाकर कुल ४० श्लोक हैं)
* यहाँ जो सृष्टिका क्रम बताया गया है, वह श्रुतिसम्मत क्रमसे भिन्न है। श्रुतिने आकाशसे वायु, वायुसे अग्नि, अग्निसे जल और जलसे पृथ्वीकी उत्पत्तिका क्रम बताया है।