महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व
Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
अध्याय (पृष्ठ 352)
त्रिपञ्चाशत्तमोऽध्यायः
भगवान् श्रीकृष्णकी प्रातश्चर्या, सात्यकिद्वारा उनका संदेश पाकर भाइयोंसहित युधिष्ठिरका उन्हींके साथ कुरुक्षेत्रमें पधारना
वैशम्पायन उवाच
ततः शयनमाविश्य प्रसुप्तो मधुसूदनः ।
याममात्रार्धशेषायां यामिन्यां प्रत्यबुध्यत ॥ १ ॥
**वैशम्पायनजी कहते हैं—**जनमेजय! तदनन्तर मधुसूदन भगवान् श्रीकृष्ण एक सुन्दर शय्याका आश्रय लेकर सो गये। जब आधा पहर रात बीतनेको बाकी रह गयी, तब वे जागकर उठ बैठे ॥ १ ॥
स ध्यानपथमाविश्य सर्वज्ञानानि माधवः ।
अवलोक्य ततः पश्चाद् दध्यौ ब्रह्म सनातनम् ॥ २ ॥
तत्पश्चात् ध्यानमार्गमें स्थित हो माधव सम्पूर्ण ज्ञानोंको प्रत्यक्ष करके अपने सनातन ब्रह्मस्वरूपका चिन्तन करने लगे ॥ २ ॥
ततः स्तुतिपुराणज्ञा रक्तकण्ठाः सुशिक्षिताः ।
अस्तुवन् विश्वकर्माणं वासुदेवं प्रजापतिम् ॥ ३ ॥
इसी समय स्तुति और पुराणोंके ज्ञाता, मधुरकण्ठवाले, सुशिक्षित सूत-मागध और वन्दीजन विश्वनिर्माता, प्रजापालक उन भगवान् वासुदेवकी स्तुति करने लगे ॥ ३ ॥
पठन्ति पाणिस्वनिकास्तथा गायन्ति गायनाः ।
शङ्खांश्च मृदङ्गांश्च प्रवादयन्ति सहस्रशः ॥ ४ ॥
हाथसे वीणा आदि बजानेवाले पुरुष स्तुतिपाठ करने लगे, गायक गीत गाने लगे और सहस्रों मनुष्य शंख एवं मृदङ्ग बजाने लगे ॥ ४ ॥
वीणापणववेणूनां स्वनश्चातिमनोरमः ।
सहास इव विस्तीर्णः शुश्रुवे तस्य वेश्मनः ॥ ५ ॥
वीणा, पणव तथा मुरलीका अत्यन्त मनोरम स्वर इस तरह सुनायी देने लगा, मानो उस महलका अट्टहास सब ओर फैल रहा हो ॥ ५ ॥
ततो युधिष्ठिरस्यापि राज्ञो मङ्गलसंहिताः ।
उच्चेरुरर्मधुरा वाचो गतिवादित्रनिःस्वनाः ॥ ६ ॥
तत्पश्चात् राजा युधिष्ठिरके भवनसे भी मधुर, मङ्गलमयी वाणी तथा गीत-वाद्यकी ध्वनि प्रकट होने लगी ॥ ६ ॥
तत उत्थाय दाशार्हः स्नातः प्राञ्जलिरच्युतः ।
जप्त्वा गुह्यं महाबाहुरग्नीनाश्रित्य तस्थिवान् ॥ ७ ॥
तत्पश्चात् अपनी मर्यादासे कभी च्युत न होने वाले महाबाहु भगवान् श्रीकृष्णने शय्यासे उठकर स्नान किया, फिर गूढ़ गायत्री-मन्त्रका जप करके हाथ जोड़े हुए अग्निके समीप जा बैठे ॥ ७ ॥
ततः सहस्रं विप्राणां चतुर्वेदविदां तथा ।
गवां सहस्रेणैकैकं वाचयामास माधवः ॥ ८ ॥
वहाँ अग्निहोत्र करनेके अनन्तर भगवान् माधवने चारों वेदोंके विद्वान् एक हजार ब्राह्मणोंको बुलाकर प्रत्येकको एक-एक हजार गौएँ दान कीं और उनसे वेदमन्त्रोंका पाठ एवं स्वस्तिवाचन कराया ॥ ८ ॥
मङ्गलालम्भनं कृत्वा आत्मानमवलोक्य च ।
आदर्शे विमले कृष्णस्ततः सात्यकिमब्रवीत् ॥ ९ ॥
इसके बाद माङ्गलिक वस्तुओंका स्पर्श करके भगवान्ने स्वच्छ दर्पणमें अपने स्वरूपका दर्शन किया और सात्यकिसे कहा— ॥ ९ ॥
गच्छ शैनेय जानीहि गत्वा राजनिवेशनम् ।
अपि सज्जो महातेजा भीष्मं द्रष्टुं युधिष्ठिरः ॥ १० ॥
‘शिनिनन्दन! जाओ, राजमहलमें जाकर पता लगाओ कि महातेजस्वी राजा युधिष्ठिर भीष्मजीके दर्शनार्थ चलनेके लिये तैयार हो गये क्या?’ ॥ १० ॥
ततः कृष्णस्य वचनात् सात्यकिस्त्वरितो ययौ ।
उपगम्य च राजानं युधिष्ठिरमभाषत ॥ ११ ॥
श्रीकृष्णकी आज्ञा पाकर सात्यकि तुरंत वहाँसे चल दिये और राजा युधिष्ठिरके पास जाकर बोले— ॥ ११ ॥
युक्तो रथवरो राजन् वासुदेवस्य धीमतः ।
समीपमापगेयस्य प्रयास्यति जनार्दनः ॥ १२ ॥
‘राजन्! परम बुद्धिमान् भगवान् वासुदेवका श्रेष्ठ रथ जुतकर तैयार हो गया है। श्रीजनार्दन शीघ्र ही गङ्गानन्दन भीष्मके समीप जानेवाले हैं ॥ १२ ॥
भवत्प्रतीक्षः कृष्णोऽसौ धर्मराज महाद्युते ।
यदत्रानन्तरं कृत्यं तद् भवान् कर्तुमर्हति ॥ १३ ॥
‘महातेजस्वी धर्मराज! भगवान् श्रीकृष्ण आपकी ही प्रतीक्षा कर रहे हैं। अब आप जो उचित समझें, वह कार्य कर सकते हैं’ ॥ १३ ॥
एवमुक्तः प्रत्युवाच धर्मपुत्रो युधिष्ठिरः ।
सात्यकिके इस प्रकार कहनेपर धर्मपुत्र युधिष्ठिरने अर्जुनको यह आदेश दिया ॥ १३ १/२ ॥
युधिष्ठिर उवाच
युज्यतां मे रथवरः फाल्गुनाप्रतिमद्युते ।। १४ ।।
न सैनिकैश्च यातव्यं यास्यामो वयमेव हि ।
न च पीडयितव्यो मे भीष्मो धर्मभृतां वरः ।। १५ ।।
अतः पुरःसराश्चापि निवर्तन्तु धनंजय ।
युधिष्ठिर बोले— अनुपम तेजस्वी अर्जुन! मेरा श्रेष्ठ रथ जोतकर तैयार कराओ। आज सैनिकोंको हमारे साथ नहीं जाना चाहिये। केवल हमलोगोंको ही चलना है। धनंजय! धर्मात्माओंमें श्रेष्ठ भीष्मजीको अधिक भीड़ बढ़ाकर कष्ट देना उचित नहीं है। अतः आगे चलनेवाले सैनिकोंको भी जानेके लिये मना कर देना चाहिये ।। १४-१५½ ।।
अद्यप्रभृति गाङ्गेयः परं गुह्यं प्रवक्ष्यति ।। १६ ।।
अतो नेच्छामि कौन्तेय पृथग्जनसमागमम् ।
कुन्तीनन्दन! आजसे गङ्गाकुमार भीष्मजी धर्मके अत्यन्त गूढ़ रहस्यका उपदेश करेंगे। अतः मैं भिन्न-भिन्न रुचि रखनेवाले साधारण जनसमाजको वहाँ नहीं जुटाना चाहता ।। १६½ ।।
वैशम्पायन उवाच
स तद्वाक्यमथाज्ञाय कुन्तीपुत्रो धनंजयः ।। १७ ।।
युक्तं रथवरं तस्मा आचचक्षे नरर्षभः ।
वैशम्पायनजी कहते हैं— जनमेजय! युधिष्ठिरकी आज्ञा शिरोधार्य करके कुन्तीकुमार नरश्रेष्ठ अर्जुनने वैसा ही किया। फिर आकर उन्हें सूचना दी कि महाराजका श्रेष्ठ रथ तैयार है ।। १७½ ।।
ततो युधिष्ठिरो राजा यमौ भीमार्जुनावपि ।। १८ ।।
भूतानीव समस्तानि ययुः कृष्णनिवेशनम् ।
तदनन्तर राजा युधिष्ठिर, भीमसेन, अर्जुन, नकुल और सहदेव सब एक रथपर आरूढ़ हो श्रीकृष्णके निवासस्थानपर गये, मानो समस्त महाभूत मूर्तिमान् होकर पधारे हों ।। १८½ ।।
आगच्छत्स्रथ कृष्णोऽपि पाण्डवेषु महात्मसु ।। १९ ।।
शैनेयसहितो धीमान् रथमेवान्वपद्यत ।
महात्मा पाण्डवोंके पदार्पण करनेपर सात्यकिसहित बुद्धिमान् भगवान् श्रीकृष्ण भी एक ही रथपर आरूढ़ हो गये ।। १९½ ।।
रथस्थाः संविदं कृत्वा सुखां पृष्ट्वा च शर्वरीम् ।। २० ।।
मेघघोषै रथवरैः प्रययुस्ते नरर्षभाः ।
रथपर बैठे-बैठे ही उन सबने बातचीत की, और एक-दूसरेसे रात्रिके सुखपूर्वक व्यतीत होनेका कुशल-समाचार पूछा। फिर वे नरश्रेष्ठ मेघगर्जनाके समान गम्भीर घोष करनेवाले श्रेष्ठ रथोंद्वारा वहाँसे चल पड़े ॥ २० १/२ ॥
बलाहकं मेघपुष्पं शैब्यं सुग्रीवमेव च ॥ २१ ॥
दारुकश्चोदयामास वासुदेवस्य वाजिनः।
दारुकने वसुदेवनन्दन भगवान् श्रीकृष्णके बलाहक, मेघपुष्प, शैब्य और सुग्रीव नामक घोड़ोंको हाँका ॥ २१ १/२ ॥
ते हया वासुदेवस्य दारुकेण प्रचोदिताः ॥ २२ ॥
गां खुराग्रैस्तथा राजन् लिखन्तः प्रययुस्तदा।
राजन्! उस समय दारुकद्वारा हाँके गये श्रीकृष्णके वे घोड़े अपनी टापोंके अग्रभागसे पृथ्वीपर चिह्न बनाते हुए बड़े वेगसे दौड़े ॥ २२ १/२ ॥
ते ग्रसन्त इवाकाशं वेगवन्तो महाबलाः ॥ २३ ॥
क्षेत्रं धर्मस्य कृत्स्नस्य कुरुक्षेत्रमवातरन्।
उन अश्वोंका बल और वेग महान् था। वे आकाशको पीते हुए-से उड़ चले, और बात-की-बातमें सम्पूर्ण धर्मके क्षेत्रभूत कुरुक्षेत्रमें जा पहुँचे ॥ २३ १/२ ॥
ततो ययुर्यत्र भीष्मः शरतल्पगतः प्रभुः ॥ २४ ॥
आस्ते महर्षिभिः सार्धं ब्रह्मा देवगणैर्यथा।
तदनन्तर वे सब लोग उस स्थानपर गये जहाँपर प्रभावशाली भीष्मजी बाणशय्यापर सो रहे थे। जैसे देवताओंसे घिरे हुए ब्रह्माजी शोभा पाते हैं, उसी प्रकार महर्षियोंके साथ भीष्मजी सुशोभित हो रहे थे ॥ २४ १/२ ॥
ततोऽवतीर्य गोविन्दो रथात् स च युधिष्ठिरः ॥ २५ ॥
भीमो गाण्डीवधन्वा च यमौ सात्यकिरेव च।
ऋषीनभ्यर्चयामासुः करानुद्यम्य दक्षिणान् ॥ २६ ॥
तत्पश्चात् रथसे उतरकर भगवान् श्रीकृष्ण, युधिष्ठिर, भीमसेन, गाण्डीवधारी अर्जुन, नकुल, सहदेव तथा सात्यकिने अपने-अपने दाहिने हाथोंको उठाकर ऋषियोंके प्रति सम्मानका भाव प्रदर्शित किया ॥ २५-२६ ॥
स तैः परिवृतो राजा नक्षत्रैरिव चन्द्रमाः।
अभ्याजगाम गाङ्गेयं ब्रह्माणमिव वासवः ॥ २७ ॥
नक्षत्रोंसे घिरे हुए चन्द्रमाकी भाँति भाइयोंसे घिरे हुए राजा युधिष्ठिर गङ्गानन्दन भीष्मके समीप गये, मानो देवराज इन्द्र ब्रह्माजीके निकट पधारे हों ॥ २७ ॥
शरतल्पे शयानं तमादित्यं पतितं यथा।
स ददर्श महाबाहुं भयाच्चागतसाध्वसः ॥ २८ ॥
शर-शय्यापर सोये हुए महाबाहु भीष्मजी वैसे ही दिखायी दे रहे थे, मानो सूर्यदेव आकाशसे पृथ्वीपर गिर पड़े हों। युधिष्ठिरने उसी अवस्थामें उनका दर्शन किया। उस समय वे भयसे काँप उठे थे ।। २८ ।।
इति श्रीमहाभारते शान्तिपर्वणि राजधर्मानुशासनपर्वणि भीष्माभिगमने त्रिपञ्चाशत्तमोऽध्यायः ।। ५३ ।।
इस प्रकार श्रीमहाभारत शान्तिपर्वके अन्तर्गत राजधर्मानुशासनपर्वमें युधिष्ठिर आदिका भीष्मके समीप गमनविषयक तिरपनवाँ अध्याय पूरा हुआ ।। ५३ ।।