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महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,450 पृष्ठ

२४७-

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सप्तचत्वारिंशदधिकद्विशततमोऽध्यायः

महाभूतादि तत्त्वोंका विवेचन

शुक उवाच

अध्यात्मं विस्तरेणेह पुनरेव वदस्व मे ।
यदध्यात्मं यथा वेद भगवन्नृषिसत्तम ॥ १ ॥
शुकदेवजीने कहा— भगवन्! मुनिश्रेष्ठ! अब पुनः मुझे अध्यात्मज्ञानका विस्तारपूर्वक उपदेश दीजिये। अध्यात्म क्या है और उसे मैं कैसे जानूँगा? ॥ १ ॥

व्यास उवाच

अध्यात्मं यदिदं तात पुरुषस्येह पठ्यते ।
तत् तेऽहं वर्तयिष्यामि तस्य व्याख्यामिमां शृणु ॥ २ ॥
व्यासजीने कहा— तात! मनुष्यके लिये शास्त्रमें जो यह अध्यात्मविषयकी चर्चा की जाती है, उसका परिचय मैं तुम्हें दे रहा हूँ; तुम अध्यात्मकी यह व्याख्या सुनो ॥ २ ॥

भूमिरापस्तथा ज्योतिर्वायुराकाश एव च ।
महाभूतानि भूतानां सागरस्योर्मयो यथा ॥ ३ ॥
पृथ्वी, जल, तेज, वायु और आकाश—ये पाँच महाभूत सम्पूर्ण प्राणियोंके शरीरमें स्थित हैं। जैसे समुद्रकी लहरें उठती और विलीन होती रहती हैं, उसी प्रकार ये पाँचों महाभूत प्राणियोंके शरीरके रूपमें जन्म ग्रहण करते और विलीन होते रहते हैं ॥ ३ ॥

प्रसार्येह यथाङ्गानि कूर्मः संहरते पुनः ।
तद्वन्महान्ति भूतानि यवीयःसु विकुर्वते ॥ ४ ॥
जैसे कछुआ यहाँ अपने अंगोंको सब ओर फैलाकर फिर समेट लेता है, इसी प्रकार ये सारे महाभूत छोटे-छोटे शरीरोंमें विकृत होते—उत्पन्न और विलीन होते रहते हैं ॥ ४ ॥

इति तन्मयमेवेदं सर्वं स्थावरजङ्गमम् ।
सर्गे च प्रलये चैव तस्मिन् निर्दिश्यते तथा ॥ ५ ॥
इस प्रकार यह समस्त स्थावर-जंगम जगत् पंचभूतमय ही है। सृष्टिकालमें पंचभूतोंसे ही सबकी उत्पत्ति होती है और प्रलयके समय उन्हींमें सबका लय बताया जाता है ॥ ५ ॥

महाभूतानि पञ्चैव सर्वभूतेषु भूतकृत् ।
अकरोत् तात वैषम्यं यस्मिन् यदनुपश्यति ॥ ६ ॥
यद्यपि सम्पूर्ण शरीरोंमें पाँच ही भूत हैं तथापि लोगोंको उनमेंसे जिसमें जो वैषम्य दिखायी देता है, उसका कारण यह है कि सम्पूर्ण भूतोंकी सृष्टि करनेवाले ब्रह्माजीने समस्त प्राणियोंमें उनके कर्मानुसार ही न्यूनाधिकरूपमें उन भूतोंका समावेश किया है ॥ ६ ॥

शुक उवाच

अकरोद् यच्छरीरेषु कथं तदुपलक्षयेत् ।
इन्द्रियाणि गुणाः केचित् कथं तानुपलक्षयेत् ॥ ७ ॥
शुकदेवजीने पूछा— पिताजी! देवता, मनुष्य, पशु और पक्षी आदिके शरीरोंमें विधाताने जो वैषम्य किया है, उसको किस प्रकार लक्ष्य किया जाय? शरीरमें इन्द्रियाँ भी हैं और कुछ गुण भी हैं, उन्हें कैसे देखा जाय—उनमेंसे कौन किस महाभूतके कार्य हैं, इसकी पहचान कैसे हो? ॥ ७ ॥

व्यास उवाच

एतत् ते वर्तयिष्यामि यथावदनुपूर्वशः ।
शृणु तत् त्वमिहैकाग्रो यथातत्त्वं यथा च तत् ॥ ८ ॥
व्यासजीने कहा— बेटा! मैं इस विषयका क्रमशः और यथावत्रूपसे प्रतिपादन करूँगा। यह समस्त विषय तत्त्वतः जैसा है, वह सब तुम यहाँ एकाग्रचित्त होकर सुनो ॥ ८ ॥
शब्दः श्रोत्रं तथा खानि त्रयमाकाशसम्भवम् ।
प्राणश्चेष्टा तथा स्पर्श एते वायुगुणास्त्रयः ॥ ९ ॥
शब्द, श्रोत्रेन्द्रिय तथा शरीरके सम्पूर्ण छिद्र—ये तीनों वस्तुएँ आकाशसे उत्पन्न हुई हैं। प्राण, चेष्टा तथा स्पर्श—ये तीनों वायुके गुण (कार्य) हैं ॥ ९ ॥
रूपं चक्षुर्विपाकश्च त्रिधा ज्योतिर्विधीयते ।
रसोऽथ रसनं स्नेहो गुणास्त्वेते त्रयोऽम्भसः ॥ १० ॥
रूप, नेत्र और जठरानल—इन तीन रूपोंमें अग्निका ही कार्य प्रकट हुआ है। रस, रसना और स्नेह—ये तीनों जलके कार्य हैं ॥ १० ॥
घ्रेयं घ्राणं शरीरं च भूमेरेते गुणास्त्रयः ।
एतावानिन्द्रियग्रामैर्व्याख्यातः पाञ्चभौतिकः ॥ ११ ॥
गन्ध, नासिका और शरीर—ये तीनों भूमिके गुण हैं। इस प्रकार इन्द्रियसमुदायसहित यह शरीर पाञ्चभौतिक बताया गया है ॥ ११ ॥
वायोः स्पर्शो रसोऽद्भ्यश्च ज्योतिषो रूपमुच्यते ।
आकाशप्रभवः शब्दो गन्धो भूमिगुणः स्मृतः ॥ १२ ॥
स्पर्श वायुका, रस जलका और रूप तेजका गुण बताया जाता है एवं शब्द आकाशका और गन्ध भूमिका गुण माना गया है ॥ १२ ॥
मनो बुद्धिः स्वभावश्च त्रय एते स्वयोनिजाः ।
न गुणानतिवर्तन्ते गुणेभ्यः परमागताः ॥ १३ ॥

मन, बुद्धि और स्वभाव (अहंभाव)-ये तीनों अपने कारणभूत पूर्वसंस्कारोंसे उत्पन्न हुए हैं। ये तीनों पाञ्चभौतिक होते हुए भी भूतोंके अन्य कार्य जो श्रोत्रादि हैं, उनसे श्रेष्ठ हैं तो भी गुणोंका सर्वथा उल्लंघन नहीं कर पाते हैं ॥ १३ ॥
यथा कूर्म इहाङ्गानि प्रसार्य विनियच्छति ।
एवमेवेन्द्रियग्रामं बुद्धिः सृष्ट्वा नियच्छति ॥ १४ ॥
जैसे कछुआ यहाँ अपने अंगोंको फैलाकर फिर समेट लेता है, उसी प्रकार बुद्धि सम्पूर्ण इन्द्रियोंको विषयोंकी ओर फैलाकर फिर उन्हें वहाँसे हटा लेती है ॥ १४ ॥
यदूर्ध्वं पादतलयोरवाङ्मूर्ध्नश्च पश्यति ।
एतस्मिन्नेव कृत्ये तु वर्तते बुद्धिरुत्तमा ॥ १५ ॥
पैरोंसे ऊपर और मस्तकसे नीचे मनुष्य जो कुछ देखता है अर्थात् सम्पूर्ण शरीरको जो अहंभावसे देखना है, इस कार्यमें उत्तम बुद्धि प्रवृत्त होती है। तात्पर्य यह कि शरीरमें जो अहंभावका अनुभव है, वह बुद्धिका ही रूपान्तर है ॥ १५ ॥
गुणान् नेनीयते बुद्धिर्बुद्धिरेवेन्द्रियाण्यपि ।
मनःषष्ठानि सर्वाणि बुद्ध्यभावे कुतो गुणाः ॥ १६ ॥
बुद्धि ही शब्द आदि गुणोंको श्रोत्र आदि इन्द्रियोंके पास बार-बार ले जाती है और बुद्धि ही मनसहित सम्पूर्ण इन्द्रियोंको विषयोंके पास पुनः-पुनः खींच ले जाती है; यदि इनके साथ बुद्धि न रहे तो इन्द्रियोंद्वारा शब्द आदि विषयोंका अनुभव कैसे हो सकता है ॥
इन्द्रियाणि नरे पञ्च षष्ठं तु मन उच्यते ।
सप्तमीं बुद्धिमेवाहुः क्षेत्रज्ञं पुनरष्टमम् ॥ १७ ॥
मनुष्यके शरीरमें पाँच इन्द्रियाँ हैं। छठा तत्त्व मन है। सातवाँ तत्त्व बुद्धि और आठवाँ क्षेत्रज्ञ बताया गया है ॥ १७ ॥
चक्षुरालोचनायैव संशयं कुरुते मनः ।
बुद्धिर्ध्यवसानाय साक्षी क्षेत्रज्ञ उच्यते ॥ १८ ॥
आँख देखनेका काम करती है, (यह उपलक्षण है। इससे सभी इन्द्रियोंके कार्यका लक्ष्य कराया गया है) मन संदेह करता है और बुद्धि उसका निश्चय करती है; किंतु क्षेत्रज्ञ (आत्मा) उन सबका साक्षी कहलाता है ॥
रजस्तमश्च सत्त्वं च यत्र एते स्वयोनिजाः ।
समाः सर्वेषु भूतेषु तान् गुणानुपलक्षयेत् ॥ १९ ॥
रजोगुण, तमोगुण और सत्वगुण—ये तीनों अपने कारणभूत मूल प्रकृतिसे प्रकट हुए हैं; वे तीनों गुण सब प्राणियोंमें समानरूपसे रहते हैं। उनकी पहचान उनके कार्योंद्वारा करे ॥ १९ ॥
तत्र यत् प्रीतिसंयुक्तं किंचिदात्मनि लक्षयेत् ।
प्रशान्तमिव संशुद्धं सत्त्वं तदुपधारयेत् ॥ २० ॥

जब अपनेमें कुछ प्रसन्नतायुक्त विशुद्ध और शान्त-सा भाव दिखायी दे, तब यह निश्चय करे कि सत्त्वगुण प्रवृत्त हुआ है ॥ २० ॥
यत् तु संतापसंयुक्तं काये मनसि वा भवेत्।
प्रवृत्तं रज इत्येवं तत्र चाप्युपलक्षयेत् ॥ २१ ॥
शरीर अथवा मनमें जब कुछ संतापयुक्त भाव दृष्टिगोचर हो, तब वहाँ यह समझ लेना चाहिये कि रजोगुणकी प्रवृत्ति हो रही है ॥ २१ ॥
यत् तु सम्मोहसंयुक्तमव्यक्तविषयं भवेत्।
अप्रतर्क्यमविज्ञेयं तमस्तदुपधार्यताम् ॥ २२ ॥
जब मोहयुक्त भाव मनपर छा जाय, किसी भी विषयमें कोई बात स्पष्ट न जान पड़े, जब तर्क भी काम न दे और किसी तरह कोई बात समझमें न आवे, तब समझना चाहिये कि तमोगुण प्रवृत्त हुआ है ॥ २२ ॥
प्रहर्षः प्रीतिरानन्दः साम्यं स्वस्थात्मचित्तता।
अकस्माद् यदि वा कस्माद् वर्तन्ते सात्त्विका गुणाः ॥ २३ ॥
जब अतिशय हर्ष, प्रेम, आनन्द, समता और स्वस्थचित्तता—ये सद्गुण अकस्मात् या किसी कारणवश विकसित हों, तब समझना चाहिये कि ये सात्त्विक गुण हैं ॥ २३ ॥
अभिमानो मृषावादो लोभो मोहस्तथाक्षमा।
लिङ्गानि रजसस्तानि वर्तन्ते हेत्वहेतुतः ॥ २४ ॥
अभिमान, असत्यभाषण, लोभ, मोह और असहनशीलता—ये दोष चाहे किसी कारणसे प्रकट हुए हों अथवा बिना कारणके हर एक परिस्थितिमें रजोगुणके ही चिह्न माने गये हैं ॥ २४ ॥
तथा मोहः प्रमादश्च निद्रा तन्द्रा प्रबोधिता।
कथंचिदभिवर्तन्ते विज्ञेयास्तामसा गुणाः ॥ २५ ॥
इसी प्रकार मोह, प्रमाद, निद्रा, तन्द्रा और अज्ञान जिस किसी कारणसे हो जायँ, उन्हे तमोगुणका कार्य जानना चाहिये ॥ २५ ॥

इति श्रीमहाभारते शान्तिपर्वणि मोक्षधर्मपर्वणि शुकानुप्रश्ने
सप्तचत्वारिंशदधिकद्विशततमोऽध्यायः ॥ २४७ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत शान्तिपर्वके अन्तर्गत मोक्षधर्मपर्वमें शुकदेवका अनुप्रश्नविषयक दो सौ सैंतालीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ २४७ ॥