सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
संग्रह पर लौटें

महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,450 पृष्ठ

नारायणकी महिमासम्बन्धी उपाख्यानका उपसंहार

⬅ विषय-सूची (TOC)

षट्चत्वारिंशदधिकत्रिशततमोऽध्यायः

नारायणकी महिमासम्बन्धी उपाख्यानका उपसंहार

वैशम्पायन उवाच

श्रुत्वैतन्नारदो वाक्यं नरनारायणेरितम् ।
अत्यन्तं भक्तिमान् देवे एकान्तित्वमुपेयिवान् ॥ १ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय! नर-नारायणका वह कथन सुनकर भगवान्‌के प्रति नारदजीकी भक्ति बहुत बढ़ गयी। वे उनके अनन्य भक्त हो गये ॥ १ ॥

प्रोष्य वर्षसहस्रं तु नरनारायणाश्रमे ।
श्रुत्वा भगवदाख्यानं दृष्ट्वा च हरिमव्ययम् ॥ २ ॥
हिमवन्तं जगामाशु यत्रास्य स्वक आश्रमः ।
नर-नारायणके आश्रममें भगवान्‌की कथा सुनते और प्रतिदिन अविनाशी श्रीहरिका दर्शन करते हुए जब नारदजीके एक हजार दिव्य वर्ष पूरे हो गये तब वे शीघ्र ही हिमालयपर्वतके उस भागमें चले गये, जहाँ उनका अपना आश्रम था ॥ २ १/२ ॥

तावपि ख्याततपसौ नरनारायणावृषी ॥ ३ ॥
तस्मिन्नेवाश्रमे रम्ये तेपतुस्तप उत्तमम् ।
तत्पश्चात् वे विख्यात तपस्वी नर-नारायण ऋषि भी पुनः उसी रमणीय आश्रममें रहते हुए उत्तम तपस्यामें संलग्न हो गये ॥ ३ १/२ ॥

त्वमप्यमितविक्रान्तः पाण्डवानां कुलोद्वहः ॥ ४ ॥
पावितात्माद्य संवृत्तः श्रुत्वेमामादितः कथाम् ।
जनमेजय! तुम पाण्डवोंके कुलभूषण और अत्यन्त पराक्रमी हो। तुम भी प्रारम्भसे ही इस कथाको सुनकर आज परम पवित्र हो गये हो ॥ ४ १/२ ॥

नैव तस्यापरो लोको नायं पार्थिवसत्तम ॥ ५ ॥
कर्मणा मनसा वाचा यो द्विष्याद् विष्णुमव्ययम् ।
नृपश्रेष्ठ! जो मन, वाणी, और क्रियाद्वारा अविनाशी भगवान् विष्णुके साथ द्वेष रखता है, उसका न इस लोकमें ठिकाना है और न परलोकमें ॥ ५ १/२ ॥

मज्जन्ति पितरस्तस्य नरके शाश्वतीः समाः ॥ ६ ॥
यो द्विष्याद् विबुधश्रेष्ठं देवं नारायणं हरिम् ।
जो देवश्रेष्ठ भगवान् नारायण हरिसे द्वेष करता है, उसके पितर सदाके लिये नरकमें डूब जाते हैं ॥ ६ १/२ ॥

कथं नाम भवेद् द्वेष्य आत्मा लोकस्य कस्यचित् ॥ ७ ॥

आत्मा हि पुरुषव्याघ्र ज्ञेयो विष्णुरिति स्थितिः ।
पुरुषसिंह! भगवान् विष्णुको सबका आत्मा जानना चाहिये। यही वास्तविक स्थिति है। कोई भी मनुष्य भला अपने आत्माके साथ द्वेष कैसे कर सकता है? ।। ७ १/२ ।।
य एष गुरुरस्माकमृषिर्गन्धवतीसुतः ।। ८ ।।
तेनैतत् कथितं तात माहात्म्यं परमव्ययम् ।
तस्माच्छ्रुतं मया चेदं कथितं च तवानघ ।। ९ ।।
तात! ये जो हमलोगोंके गुरु गन्धवतीपुत्र महर्षि व्यास बैठे हैं, इन्होंने ही भगवान्‌के परम उत्तम अविनाशी माहात्म्यका वर्णन किया है। निष्पाप! उन्हींसे मैंने यह सब सुना है और मेरेद्वारा तुमको भी कहा गया है ।। ८-९ ।।
नारदेन तु सम्प्राप्तः सरहस्यः ससंग्रहः ।
एष धर्मो जगन्नाथात् साक्षान्नारायणान्नृप ।। १० ।।
नरेश्वर! देवर्षि नारदने तो रहस्य और संग्रह-सहित इस धर्मको साक्षात् जगदीश्वर नारायणसे ही प्राप्त किया था ।। १० ।।
एवमेष महान् धर्मः स ते पूर्वं नृपोत्तम ।
कथितो हरिगीतासु समासविधिकल्पितः ।। ११ ।।
नृपश्रेष्ठ! इस प्रकार यह महान् धर्म मैंने तुम्हें पहले हरिगीतामें संक्षेपसे बताया है ।। ११ ।।
कृष्णद्वैपायनं व्यासं विद्धि नारायणं भुवि ।
को ह्यन्यः पुरुषव्याघ्र महाभारतकृद् भवेत् ।। १२ ।।
पुरुषसिंह! तुम कृष्णद्वैपायन व्यासको इस भूतलपर नारायणका ही स्वरूप समझो। भला, भगवान्‌के सिवा दूसरा कौन महाभारतका कर्ता हो सकता है? ।। १२ ।।
धर्मान् नानाविधांश्चैव को ब्रूयात् तमृते प्रभुम् ।। १३ ।।
वर्ततां ते महायज्ञो यथा संकल्पितस्त्वया ।
संकल्पिताश्वमेधस्त्वं श्रुतधर्मश्च तत्त्वतः ।। १४ ।।
भगवान्‌के सिवा दूसरा कौन ऐसा है, जो नाना प्रकारके धर्मोंका वर्णन कर सके? तुम्हारा यह महान् यज्ञ, जैसा कि तुमने संकल्प कर रखा है, निरन्तर चालू रहे। तुमने अश्वमेध-यज्ञ करनेका संकल्प लिया है और सब धर्मोंका यथार्थ रूपसे श्रवण किया है ।। १३-१४ ।।

सौतिरुवाच

एतत् तु महदाख्यानं श्रुत्वा पार्थिवसत्तमः ।
ततो यज्ञसमाप्त्यर्थं क्रियाः सर्वाः समारभत् ।। १५ ।।

सूतपुत्र कहते हैं— शौनक! वैशम्पायनजीके मुखसे यह महान् उपाख्यान सुनकर राजाओंमें श्रेष्ठ जनमेजयने अपने यज्ञको पूर्ण करनेका सारा कार्य आरम्भ किया ।। १५ ।।
नारायणीयमाख्यानमेतत् ते कथितं मया ।
पृष्टेन शौनकाद्येह नैमिषारण्यवासिषु ।। १६ ।।
शौनक! आज तुम्हारे प्रश्नके अनुसार इन नैमिषा-रण्यनिवासी मुनियोंके समीप मैंने यहाँ यह नारायणका माहात्म्य-सम्बन्धी उपाख्यान तुम्हें सुनाया है ।। १६ ।।
नारदेन पुरा राजन् गुरवे मे निवेदितम् ।
ऋषीणां पाण्डवानां च शृण्वतः कृष्णभीष्मयोः ।। १७ ।।
राजन्! पूर्वकालमें नारदजीने ऋषियों, पाण्डवों, श्रीकृष्ण तथा भीष्मके सुनते हुए यह प्रसंग मेरे गुरु व्यासजीको बताया था ।। १७ ।।
स हि परमगुरुर्जनभुवनपतिः
पृथुधरणिधरः श्रुतिविनयनिधिः ।
शमनियमनिधिर्द्विजपरमहित-
स्तव भवतु गतिर्हरिरमरहितः ।। १८ ।।
वे परम गुरु, जनपति, भुवनपति, विशाल पृथ्वीको धारण करनेवाले, वेदज्ञान और विनयके भण्डार, शम और नियमकी निधि, ब्राह्मणोंके परम हितैषी तथा देवताओंके हितचिन्तक श्रीहरि तुम्हारे आश्रय हों ।। १८ ।।
असुरवधकरस्तपसां निधिः
सुमहतां यशसां च भाजनम् ।
मधुकैटभहा कृतधर्मविदां गतिदो-
ऽभयदो मखभागहरोऽस्तु शरणं स ते ।। १९ ।।
असुरोंका वध करनेवाले, तपस्याकी निधि, विशाल यशके भाजन, मधु और कैटभके हन्ता, सत्ययुगके धर्मोंका ज्ञान रखकर उनका पालन करनेवालोंको सद्गति प्रदान करनेवाले, अभयदाता तथा यज्ञका भाग ग्रहण करनेवाले भगवान् नारायण तुम्हें शरण दें ।। १९ ।।
त्रिगुणो विगुणश्चतुरात्मधरः
पूर्तेष्टयोश्च फलभागहरः ।
विदधातु नित्यमजितोऽतिचलो
गतिमात्मगां सुकृतिनामृषीणाम् ।। २० ।।
जो तीनों गुणोंसे विशिष्ट होते हुए भी निर्गुण हैं, वासुदेव, संकर्षण, प्रद्युम्न और अनिरुद्ध नामक चार विग्रहोंको धारण करनेवाले हैं, इष्ट (यज्ञ-याग आदि), आपूर्त (वापी, कूप, तड़ाग-निर्माण आदि) के फलभागको ग्रहण करनेवाले हैं, जो कभी किसीसे पराजित

नहीं होते तथा धैर्य या मर्यादासे विचलित नहीं होते, वे भगवान् श्रीहरि पुण्यात्मा ऋषियोंको आत्मज्ञानजन्य सद्गति प्रदान करें॥ २०॥

तं लोकसाक्षिणमजं पुरुषं पुराणं
रविवर्णमीश्वरं गतिं बहुशः।
प्रणमध्वमेकमनसो यतः
सलिलोद्भवोऽपि तमृषिं प्रणतः॥ २१॥

जो सम्पूर्ण जगत्‌के साक्षी, अजन्मा, अन्तर्यामी, पुराणपुरुष, सूर्यके समान तेजस्वी, ईश्वर और सब प्रकारसे सबकी गति हैं, उन परमेश्वरको तुम सब लोग एकाग्रचित्त होकर प्रणाम करो; क्योंकि उन वासुदेवस्वरूप नारायण ऋषिको शेषशायी भी प्रणाम करते हैं॥ २१॥

स हि लोकयोनिरमृतस्य पदं
सूक्ष्मं परायणमचलं हि पदम्।
तत्सांख्ययोगिभिरुदारवृतं
बुद्ध्या यतात्मभिरिदं सनातनम्॥ २२॥

वे इस जगत्‌के आदिकारण, अमृतपद (मोक्षके आश्रय) सूक्ष्मस्वरूप, दूसरोंको शरण देनेवाले, अविचल और सनातन पद हैं। उदार शौनक! अपने मनको वशमें रखनेवाले सांख्ययोगी बुद्धिके द्वारा उन्हींका वरण करते हैं॥

इति श्रीमहाभारते शान्तिपर्वणि मोक्षधर्मपर्वणि नारायणीये
षट्चत्वारिंशदधिकत्रिशततमोऽध्यायः॥ ३४६॥
इस प्रकार महाभारत शान्तिपर्वके अन्तर्गत मोक्षधर्मपर्वमें नारायणकी महिमाविषयक तीन सौ छियालीसवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ ३४६॥