सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,450 पृष्ठ

पृष्ठ 1844, कुल 2450 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 1844

ब्रह्मोवाच
भवतोऽपि सुराः सर्वे भागं दास्यन्ति वै प्रभो ।
क्रियतां प्रतिसंहारः सर्वदेवेश्वर त्वया ॥ ४५ ॥
ब्रह्माजी बोले— सर्वदेवेश्वर! प्रभो! अब आप अपने बढ़े हुए उस क्रोधको शान्त कीजिये। आजसे सब देवता आपको भी यज्ञका भाग दिया करेंगे ॥ ४५ ॥
इमा हि देवताः सर्वा ऋषयश्च परंतप ।
तव क्रोधान्महादेव न शान्तिमुपलेभिरे ॥ ४६ ॥
शत्रुओंको संताप देनेवाले महादेव! ये सब देवता और ऋषि आपके क्रोधसे संतप्त होकर कहीं शान्ति नहीं पा रहे हैं ॥ ४६ ॥
यश्चैष पुरुषो जातः स्वेदात् ते विबुधोत्तम ।
ज्वरो नामैष धर्मज्ञ लोकेषु प्रचरिष्यति ॥ ४७ ॥
धर्मज्ञ देवेश्वर! आपके पसीनेसे जो यह पुरुष प्रकट हुआ है, इसका नाम होगा ज्वर। यह समस्त लोकोंमें विचरण करेगा ॥ ४७ ॥
एकीभूतस्य न त्वस्य धारणे तेजसः प्रभो ।
समर्था सकला पृथ्वी बहुधा सृज्यतामयम् ॥ ४८ ॥
प्रभो! आपका तेजरूप यह ज्वर जबतक एक रूपमें रहेगा, तबतक यह सारी पृथ्वी इसे धारण करनेमें समर्थ न हो सकेगी। अतः इसे अनेक रूपोंमें विभक्त कर दीजिये ॥ ४८ ॥
इत्युक्तो ब्रह्मणा देवो भागे चापि प्रकल्पिते ।
भगवन्तं तथेत्याह ब्रह्माणममितौजसम् ॥ ४९ ॥
जब ब्रह्माजीने इस प्रकार कहा और यज्ञमें भाग मिलनेकी भी व्यवस्था हो गयी, तब महादेवजी अमिततेजस्वी भगवान् ब्रह्मासे इस प्रकार बोले—‘तथास्तु’ ऐसा ही हो ॥
परां च प्रीतिमगमदुत्स्मयंश्च पिनाकधृक् ।
अवाप च तदा भागं यथोक्तं ब्रह्मणा भवः ॥ ५० ॥
पिनाकधारी शिवको उस समय बड़ी प्रसन्नता हुई और वे मुस्कराने लगे। जैसा कि ब्रह्माजीने कहा था, उसके अनुसार उन्होंने यज्ञमें भाग प्राप्त कर लिया ॥
ज्वरं च सर्वधर्मज्ञो बहुधा व्यसृजत् तदा ।
शान्त्यर्थं सर्वभूतानां शृणु तच्चापि पुत्रक ॥ ५१ ॥
वत्स युधिष्ठिर! उस समय समस्त धर्मोंके ज्ञाता भगवान् शिवने सम्पूर्ण प्राणियोंकी शान्तिके लिये ज्वरको अनेक रूपोंमें बाँट दिया, उसे भी सुन लो ॥ ५१ ॥
शीर्षाभितापो नागानां पर्वतानां शिलाजतु ।
अपां तु नीलिकां विद्यान्निर्मोकं भुजगेषु च ॥ ५२ ॥
खोरकः सौरभेयाणामूषरं पृथिवीतले ।