महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व
Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
गणतन्त्र राज्यका वर्णन और उसकी नीति
सप्ताधिकशततमोऽध्यायः
गणतन्त्र राज्यका वर्णन और उसकी नीति
युधिष्ठिर उवाच
ब्राह्मणक्षत्रियविशां शूद्राणां च परंतप ।
धर्मवृत्तं च वित्तं च वृत्त्युपायाः फलानि च ।। १ ।।
राज्ञां वित्तं च कोशं च कोशसंचयनं जयः ।
अमात्यगुणवृत्तिश्च प्रकृतीनां च वर्धनम् ।। २ ।।
षाड्गुण्यगुणकल्पश्च सेनावृत्तिस्तथैव च ।
परिज्ञानं च दुष्टस्य लक्षणं च सतामपि ।। ३ ।।
समहीनाधिकानां च यथावल्लक्षणं च यत् ।
मध्यमस्य च तुष्ट्यर्थं यथा स्थेयं विवर्धता ।। ४ ।।
क्षीणग्रहणवृत्तिश्च यथाधर्मं प्रकीर्तितम् ।
लघुना देशरूपेण ग्रन्थयोगेन भारत ।। ५ ।।
युधिष्ठिरने कहा— परंतप भरतनन्दन! आपने ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, और शूद्रोंके धर्ममय आचार, धन, जीविकाके उपाय तथा धर्म आदिके फल बताये हैं। राजाओंके धन, कोश, कोश-संग्रह, शत्रुविजय, मन्त्रीके गुण और व्यवहार, प्रजावर्गकी उन्नति, संधि-विग्रह आदि छः गुणोंके प्रयोग, सेनाके बर्ताव, दुष्टोंकी पहचान, सत्पुरुषोंके लक्षण, जो अपने समान, अपनेसे हीन तथा अपनेसे उत्कृष्ट हैं—उन सब लोगोंके यथावत् लक्षण, मध्यम वर्गको संतुष्ट रखनेके लिये उन्नतिशील राजाको कैसे रहना चाहिये—इसका निर्देश, दुर्बल पुरुषको अपनाने और उसके लिये जीविकाकी व्यवस्था करनेकी आवश्यकता—इन सब विषयोंका आपने देशाचार और शास्त्रके अनुसार संक्षेपसे धर्मके अनुकूल प्रतिपादन किया है ।। १—५ ।।
विजिगीषोस्तथा वृत्तमुक्तं चैव तथैव ते ।
गणानां वृत्तिमिच्छामि श्रोतुं मतिमतां वर ।। ६ ।।
बुद्धिमानोंमें श्रेष्ठ पितामह! आपने विजया-भिलाषी राजाके बर्तावका भी वर्णन कर दिया है। अब मैं गणों (गणतन्त्र राज्यों)-का बर्ताव एवं वृतान्त सुनना चाहता हूँ ।। ६ ।।
यथा गणाः प्रवर्धन्ते न भिद्यन्ते च भारत ।
अरींश्च विजिगीषन्ते सुहृदः प्राप्नुवन्ति च ।। ७ ।।
भारत! गणतन्त्र-राज्योंकी जनता जिस प्रकार अपनी उन्नति करती है, जिस प्रकार आपसमें मतभेद या फूट नहीं होने देती, जिस तरह शत्रुओंपर विजय पाना चाहती है और
जिस उपायसे उसे सुहृदोंकी प्राप्ति होती है—ये सारी बातें सुननेके लिये मेरी बड़ी इच्छा है॥ ७॥
भेदमूलो विनाशो हि गणानामुपलक्षये ।
मन्त्रसंवरणं दुःखं बहूनामिति मे मतिः ॥ ८॥
मैं देखता हूँ, संघबद्ध राज्योंके विनाशका मूल कारण है आपसकी फूट। मेरा विश्वास है कि बहुत-से मनुष्योंके जो समुदाय हैं, उनके लिये किसी गुप्त मन्त्रणा या विचारको छिपाये रखना बहुत ही कठिन है॥
एतदिच्छाम्यहं श्रोतुं निखिलेन परंतप ।
यथा च ते न भिद्येरंस्तच्च मे वद पार्थिव ॥ ९ ॥
'परंतप राजन्! इन सारी बातोंको मैं पूर्णरूपसे सुनना चाहता हूँ। किस प्रकार वे संघ या गण आपसमें फूटते नहीं हैं, यह मुझे बताइये ॥ ९ ॥
भीष्म उवाच
गणानां च कुलानां च राज्ञां भरतसत्तम ।
वैरसंदीपनावेतौ लोभामर्षौ नराधिप ॥ १० ॥
भीष्मजीने कहा—भरतश्रेष्ठ! नरेश्वर! गणोंमें, कुलोंमें तथा राजाओंमें वैरकी आग प्रज्वलित करनेवाले ये दो ही दोष हैं—लोभ और अमर्ष ॥ १० ॥
लोभमेको हि वृणुते ततोऽमर्षमनन्तरम् ।
तौ क्षयव्ययसंयुक्तावन्योन्यं च विनाशिनौ ॥ ११॥
पहले एक मनुष्य लोभका वरण करता है (लोभवश दूसरेका धन लेना चाहता है), तदनन्तर दूसरेके मनमें अमर्ष पैदा होता है; फिर वे दोनों लोभ और अमर्षसे प्रभावित हुए व्यक्ति समुदाय, धन और जनकी बड़ी भारी हानि उठाकर एक-दूसरेके विनाशक बन जाते हैं॥ ११ ॥
चारमन्त्रबलादानैः सामदानविभेदनैः ।
क्षयव्ययभयोपायैः प्रकर्षन्तीतरेतरम् ॥ १२॥
वे भेद लेनेके लिये गुप्तचरोंको भेजते हैं, गुप्त मन्त्रणाएँ करते तथा सेना एकत्र करनेमें लग जाते हैं। साम, दान और भेदनीतिके प्रयोग करते हैं, तथा जन-संहार, अपार धनराशिके व्यय एवं अनेक प्रकारके भय उपस्थित करनेवाले विविध उपायोंद्वारा एक-दूसरेको दुर्बल कर देते हैं ॥ १२ ॥
तत्रादानेन भिद्यन्ते गणाः संघातवृत्तयः ।
भिन्ना विमनसः सर्वे गच्छन्त्यरिवशं भयात् ॥ १३ ॥
संघबद्ध होकर जीवन-निर्वाह करनेवाले गणराज्यके सैनिकोंको भी यदि समयपर भोजन और वेतन न मिले तो भी वे फूट जाते हैं। फूट जानेपर सबके मन एक-दूसरेके
विपरीत हो जाते हैं और वे सबके सब भयके कारण शत्रुओंके अधीन हो जाते हैं ॥ १३ ॥
भेदे गणा विनश्युर्हि भिन्नास्तु सुजयाः परैः ।
तस्मात् संघातयोगेन प्रयतेरन् गणाः सदा ॥ १४ ॥
आपसमें फूट होनेसे ही संघ या गणराज्य नष्ट हुए हैं। फूट होनेपर शत्रु उन्हें अनायास ही जीत लेते हैं; अतः गणोंको चाहिये कि वे सदा संघबद्ध—एकमत होकर ही विजयके लिये प्रयत्न करें ॥ १४ ॥
अर्थाश्चैवाधिगम्यन्ते संघातबलपौरुषैः ।
बाह्याश्च मैत्रीं कुर्वन्ति तेषु संघातवृत्तिषु ॥ १५ ॥
जो सामूहिक बल और पुरुषार्थसे सम्पन्न हैं, उन्हें अनायास ही सब प्रकारके अभीष्ट पदार्थोंकी प्राप्ति हो जाती है। संघबद्ध होकर जीवन-निर्वाह करनेवाले लोगोंके साथ संघसे बाहरके लोग भी मैत्री स्थापित करते हैं ॥
ज्ञानवृद्धाः प्रशंसन्ति शुश्रूषन्तः परस्परम् ।
विनिवृत्ताभि संधानाः सुखमेधन्ति सर्वशः ॥ १६ ॥
ज्ञानवृद्ध पुरुष गणराज्यके नागरिकोंकी प्रशंसा करते हैं। संघबद्ध लोगोंके मनमें आपसमें एक-दूसरेको ठगनेकी दुर्भावना नहीं होती। वे सभी एक-दूसरेकी सेवा करते हुए सुखपूर्वक उन्नति करते हैं ॥ १६ ॥
धर्मिष्ठान् व्यवहारांश्च स्थापयन्तश्च शास्त्रतः ।
यथावत् प्रतिपश्यन्तो विवर्धन्ते गणोत्तमाः ॥ १७ ॥
गणराज्यके श्रेष्ठ नागरिक शास्त्रके अनुसार धर्मानुकूल व्यवहारोंकी स्थापना करते हैं। वे यथोचित दृष्टिसे सबको देखते हुए उन्नतिकी दिशामें आगे बढ़ते जाते हैं ॥ १७ ॥
पुत्रान् भ्रातॄन् निगृह्णन्तो विनयन्तश्च तान् सदा ।
विनीतांश्च प्रगृह्णन्तो विवर्धन्ते गणोत्तमाः ॥ १८ ॥
गणराज्यके श्रेष्ठ पुरुष पुत्रों और भाइयोंको भी यदि वे कुमार्गपर चलें तो दण्ड देते हैं। सदा उन्हें उत्तम शिक्षा प्रदान करते हैं और शिक्षित हो जानेपर उन सबको बड़े आदरसे अपनाते हैं। इसलिये वे विशेष उन्नति करते हैं ॥ १८ ॥
चारमन्त्रविधानेषु कोशसंनिचयेषु च ।
नित्ययुक्ता महाबाहो वर्धन्ते सर्वतो गणाः ॥ १९ ॥
महाबाहु युधिष्ठिर! गणराज्यके नागरिक गुप्तचर या दूतका काम करने, राज्यके हितके लिये गुप्त मन्त्रणा करने, विधान बनाने तथा राज्यके लिये कोश-संग्रह करने आदिके लिये सदा उद्यत रहते हैं, इसीलिये सब ओरसे उनकी उन्नति होती है ॥ १९ ॥
प्राज्ञान् शूरान् महोत्साहान् कर्मसु स्थिरपौरुषान् ।
मानयन्तः सदा युक्ता विवर्धन्ते गणा नृप ॥ २० ॥
नरेश्वर! संघराज्यके सदस्य सदा बुद्धिमान्, शूरवीर, महान् उत्साही और सभी कार्योंमें दृढ़ पुरुषार्थका परिचय देनेवाले लोगोंका सदा सम्मान करते हुए राज्यकी उन्नतिके लिये उद्योगशील बने रहते हैं। इसीलिये वे शीघ्र आगे बढ़ जाते हैं ।। २० ।।
द्रव्यवन्तश्च शूराश्च शस्त्रज्ञाः शास्त्रपारगाः ।
कृच्छ्रास्वापत्सु सम्मूढान् गणाः संतारयन्ति ते ।। २१ ।।
गणराज्यके सभी नागरिक धनवान्, शूरवीर, अस्त्र-शस्त्रोंके ज्ञाता तथा शास्त्रोंके पारंगत विद्वान् होते हैं। वे कठिन विपत्तिमें पड़कर मोहित हुए लोगोंका उद्धार करते रहते हैं ।। २१ ।।
क्रोधो भेदो भयं दण्डः कर्षणं निग्रहो वधः ।
नयत्यरिवशं सद्यो गणान् भरतसत्तम ।। २२ ।।
भरतश्रेष्ठ! संघराज्यके लोगोंमें यदि क्रोध, भेद (फूट), भय, दण्डप्रहार, दूसरोंको दुर्बल बनाने, बन्धनमें डालने या मार डालनेकी प्रवृत्ति पैदा हो जाय तो वह उन्हें तत्काल शत्रुओंके वशमें डाल देती है ।। २२ ।।
तस्मान्मानयितव्यास्ते गणमुख्याः प्रधानतः ।
लोकयात्रा समायत्ता भूयसी तेषु पार्थिव ।। २३ ।।
राजन्! इसलिये तुम्हें गणराज्यके जो प्रधान-प्रधान अधिकारी हैं, उन सबका सम्मान करना चाहिये; क्योंकि लोकयात्राका महान् भार उनके ऊपर अवलम्बित है ।।
मन्त्रगुप्तिः प्रधानेषु चारश्चामित्रकर्षण ।
न गणाः कृत्स्नशो मन्त्रं श्रोतुमर्हन्ति भारत ।। २४ ।।
शत्रुसूदन! भारत! गण या संघके सभी लोग गुप्त मन्त्रणा सुननेके अधिकारी नहीं हैं। मन्त्रणाको गुप्त रखने तथा गुप्तचरोंकी नियुक्तिका कार्य प्रधान-प्रधान व्यक्तियोंके ही अधीन होता है ।। २४ ।।
गणमुख्यैस्तु सम्भूय कार्यं गणहितं मिथः ।
पृथग्गणस्य भिन्नस्य विततस्य ततोऽन्यथा ।। २५ ।।
अर्थाः प्रत्यवसीदन्ति तथानर्था भवन्ति च ।
गणके मुख्य-मुख्य व्यक्तियोंको परस्पर मिलकर समस्त गणराज्यके हितका साधन करना चाहिये; अन्यथा यदि संघमें फूट होकर पृथक्-पृथक् कई दलोंका विस्तार हो जाय तो उसके सभी कार्य बिगड़ जाते और बहुत-से अनर्थ पैदा हो जाते हैं ।। २५ १/२ ।।
तेषामन्योन्यभिन्नानां स्वशक्तिमनुतिष्ठताम् ।। २६ ।।
निग्रहः पण्डितैः कार्यः क्षिप्रमेव प्रधानतः ।
परस्पर फूटकर पृथक्-पृथक् अपनी शक्तिका प्रयोग करनेवाले लोगोंमें जो मुख्य-मुख्य नेता हों, उनका संघराज्यके विद्वान् अधिकारियोंको शीघ्र ही दमन करना चाहिये ।। २६ १/२ ।।
कुलेषु कलहा जाताः कुलवृद्धैरुपेक्षिताः ।। २७ ।।
गोत्रस्य नाशं कुर्वन्ति गणभेदस्य कारकम् ।
कुलोंमें जो कलह होते हैं, उनकी यदि कुलके वृद्ध पुरुषोंने उपेक्षा कर दी तो वे कलह गणोंमें फूट डालकर समस्त कुलका नाश कर डालते हैं ।। २७ १/२ ।।
आभ्यन्तरं भयं रक्ष्यमसारं बाह्यतो भयम् ।। २८ ।।
आभ्यन्तरं भयं राजन् सद्यो मूलानि कृन्तति ।
भीतरी भय दूर करके संघकी रक्षा करनी चाहिये। यदि संघमें एकता बनी रहे तो बाहरका भय उसके लिये निःसार है (वह उसका कुछ भी बिगाड़ नहीं सकता)। राजन्! भीतरका भय तत्काल ही संघराज्यकी जड़ काट डालता है ।। २८ १/२ ।।
अकस्मात् क्रोधमोहाभ्यां लोभाद् वापि स्वभावजात् ।। २९ ।।
अन्योन्यं नाभिभाषन्ते तत्पराभवलक्षणम् ।
अकस्मात् पैदा हुए क्रोध और मोहसे अथवा स्वाभाविक लोभसे भी जब संघके लोग आपसमें बातचीत करना बंद कर दें, तब यह उनकी पराजयका लक्षण है ।। २९ १/२ ।।
जात्या च सदृशाः सर्वे कुलेन सदृशास्तथा ।। ३० ।।
न चोद्योगेन बुद्ध्या वा रूपद्रव्येण वा पुनः ।
भेदाच्चैव प्रदानाच्च भिद्यन्ते रिपुभिर्गणाः ।। ३१ ।।
तस्मात् संघातमेवाहुर्गणानां शरणं महत् ।। ३२ ।।
जाति और कुलमें सभी एक समान हो सकते हैं; परंतु उद्योग, बुद्धि और रूप-सम्पत्तिमें सबका एक-सा होना सम्भव नहीं है। शत्रुलोग गणराज्यके लोगोंमें भेदबुद्धि पैदा करके तथा उनमेंसे कुछ लोगोंको धन देकर भी समूचे संघमें फूट डाल देते हैं; अतः संघबद्ध रहना ही गणराज्यके नागरिकोंका महान् आश्रय है ।। ३०-३२ ।।
इति श्रीमहाभारते शान्तिपर्वणि राजधर्मानुशासनपर्वणि गणवृत्ते
सप्ताधिकशततमोऽध्यायः ।। १०७ ।।
इस प्रकार श्रीमहाभारत शान्तिपर्वके अन्तर्गत राजधर्मानुशासनपर्वमें गणराज्यका बर्तावविषयक एक सौ सातवाँ अध्याय पूरा हुआ ।। १०७ ।।