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महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,450 पृष्ठ

नागराजका घर लौटना, पत्नीके साथ उनकी धर्मविषयक बातचीत तथा पत्नीका उनसे ब्राह्मणको दर्शन देनेके लिये अनुरोध

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एकोनषष्ट्यधिकत्रिशततमोऽध्यायः

नागराजका घर लौटना, पत्नीके साथ उनकी धर्मविषयक बातचीत तथा पत्नीका उनसे ब्राह्मणको दर्शन देनेके लिये अनुरोध

भीष्म उवाच

अथ काले बहुतिथे पूर्णे प्राप्तो भुजङ्गमः ।
दत्ताभ्यनुज्ञः स्वं वेश्म कृतकर्मा विवस्वता ॥ १ ॥

भीष्मजी कहते हैं—युधिष्ठिर! तदनन्तर कई दिनोंका समय पूरा होनेपर जब नागराजका काम पूरा हो गया, तब सूर्यदेवकी आज्ञा पाकर वे अपने घरको लौटे ॥ १ ॥

तं भार्याप्युपचक्राम पादशौचादिभिर्गुणैः ।
उपपन्नां च तां साध्वीं पन्नगः पर्यपृच्छत ॥ २ ॥

वहाँ नागराजकी पत्नी पैर धोनेके लिये जल—पाद्य आदि उत्तम सामग्रियोंके साथ पतिकी सेवामें उपस्थित हुई। अपनी साध्वी पत्नीको समीप आयी देख नागराजने पूछा— ॥ २ ॥

अथ त्वमसि कल्याणि देवतातथिपूजने ।
पूर्वमुक्तेन विधिना युक्ता युक्तेन मत्समम् ॥ ३ ॥

'कल्याणि! मेरे द्वारा बतायी हुई उपयुक्त विधिसे युक्त हो तुम मेरे ही समान देवताओं और अतिथियोंके पूजनमें तत्पर तो रही हो न? ॥ ३ ॥

न खल्वस्यकृतार्थेन स्त्रीबुद्ध्या मार्दवीकृता ।
मद्वियोगेन सुश्रोणि विमुक्ता धर्मसेतुना ॥ ४ ॥

'सुन्दरि! मेरे वियोगने तुम्हें शिथिल तो नहीं कर दिया था? तुम्हारी स्त्री-बुद्धिके कारण कहीं धर्मकी मर्यादा असफल या अरक्षित तो नहीं रह गयी और उसके कारण तुम धर्म-पालनसे विमुख या दूर तो नहीं हो गयी? ॥ ४ ॥

नागभार्योवाच

शिष्याणां गुरुशुश्रूषा विप्राणां वेदधारणम् ।
भृत्यानां स्वामिवचनं राज्ञो लोकानुपालनम् ॥ ५ ॥

नागपत्नीने कहा—शिष्योंका धर्म है गुरुकी सेवा करना, ब्राह्मणोंका धर्म है वेदोंको धारण करना, सेवकोंका धर्म है स्वामीकी आज्ञाका पालन तथा राजाका धर्म है प्रजावर्गका सतत संरक्षण ॥ ५ ॥

सर्वभूतपरित्राणं क्षत्रधर्म इहोच्यते ।

वैश्यानां यज्ञसंवृत्तिरातिथेयसमन्विता ॥ ६ ॥
इस जगत्में समस्त प्राणियोंकी रक्षा करना क्षत्रिय-धर्म बताया जाता है। अतिथि-सत्कारके साथ-साथ यज्ञोंका अनुष्ठान करना वैश्योंका धर्म कहा गया है ॥ ६ ॥

विप्रक्षत्रियवैश्यानां शुश्रूषा शूद्रकर्म तत् ।
गृहस्थधर्मो नागेन्द्र सर्वभूतहितैषिता ॥ ७ ॥
नागराज! ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य—तीनों वर्णोंकी सेवा करना शूद्रका कर्तव्य बताया गया है और समस्त प्राणियोंके हितकी इच्छा रखना गृहस्थका धर्म है ॥ ७ ॥

नियताहारता नित्यं व्रतचर्या यथाक्रमम् ।
धर्मो हि धर्मसम्बन्धादिन्द्रियाणां विशेषतः ॥ ८ ॥
नियमित आहारका सेवन और विधिवत् व्रतका पालन सबका धर्म है। धर्म-पालनके सम्बन्धसे इन्द्रियोंकी विशेषरूपसे शुद्धि होती है ॥ ८ ॥

अहं कस्य कुतो वापि कः को मे ह भवेदिति ।
प्रयोजनमतिर्नित्यमेवं मोक्षाश्रमे वसेत् ॥ ९ ॥
‘मैं किसका हूँ? कहाँसे आया हूँ, मेरा कौन है? तथा इस जीवनका प्रयोजन क्या है?’ इत्यादि बातोंका सदा विचार करते हुए ही संन्यासीको संन्यास-आश्रममें रहना चाहिये ॥ ९ ॥

पतिव्रतात्वं भार्यायाः परमो धर्म उच्यते ।
त्वोपदेशान्नागेन्द्र तच्च तत्त्वेन वेद्मि वै ॥ १० ॥
नागराज! पत्नीके लिये पातिव्रत्य ही सबसे बड़ा धर्म कहा जाता है। आपके उपदेशसे अपने उस धर्मको मैं अच्छी तरह समझती हूँ ॥ १० ॥

साहं धर्मं विजानन्ती धर्मनित्ये त्वयि स्थिते ।
सत्पथं कथमुत्सृज्य यास्यामि विपथं पथः ॥ ११ ॥
जब आप—मेरे पतिदेव सदा धर्मपर स्थित रहते हैं, तब धर्मको जानती हुई भी मैं कैसे सन्मार्गका त्याग करके कुमार्गपर पैर रखूँगी? ॥ ११ ॥

देवतानां महाभाग धर्मचर्या न हीयते ।
अतिथीनां च सत्कारे नित्ययुक्तास्म्यतन्द्रिता ॥ १२ ॥
महाभाग! देवताओंकी आराधना Confirmed: आराधनारूप धर्मचर्यामें कोई कमी नहीं आयी है, अतिथियोंके सत्कारमें भी मैं सदा आलस्य छोड़कर लगी रही हूँ ॥ १२ ॥

सप्ताष्टदिवसास्त्वद्य विप्रस्येहागतस्य वै ।
तच्च कार्यं न मे ख्याति दर्शनं तव काङ्क्षति ॥ १३ ॥
परंतु आज पंद्रह दिनसे एक ब्राह्मणदेवता यहाँ पधारे हुए हैं। वे मुझसे अपना कोई कार्य नहीं बता रहे हैं। केवल आपका दर्शन चाहते हैं ॥ १३ ॥

गोमत्यास्त्वेष पुलिने त्वद्दर्शनसमुत्सुकः ।

आसीनो वर्तयन् ब्रह्म ब्राह्मणः संशितव्रतः ॥ १४ ॥
वे कठोर व्रतका पालन करनेवाले ब्राह्मण वेदोंका पारायण करते हुए आपके दर्शनके लिये उत्सुक हो गोमतीके किनारे बैठे हुए हैं ॥ १४ ॥
अहं त्वनेन नागेन्द्र सत्यपूर्वं समाहिता ।
प्रस्थाप्यो मत्सकाशं स सम्प्राप्तो भुजगोत्तमः ॥ १५ ॥
नागराज! उन्होंने मुझसे पहले सच्ची प्रतिज्ञा करा ली है कि नागराजके आते ही तुम उन्हें मेरे पास भेज देना ॥ १५ ॥
एतच्छ्रुत्वा महाप्राज्ञ तत्र गन्तुं त्वमर्हसि ।
दातुमर्हसि वा तस्य दर्शनं दर्शनश्रवः ॥ १६ ॥
महाप्राज्ञ नागराज! मेरी यह बात सुनकर अब आपको वहाँ जाना चाहिये और ब्राह्मणदेवताको दर्शन देना चाहिये ॥ १६ ॥

इति श्रीमहाभारते शान्तिपर्वणि मोक्षधर्मपर्वणि उञ्छवृत्त्युपाख्याने
एकोनषष्ट्यधिकत्रिशततमोऽध्यायः ॥ ३५९ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत शान्तिपर्वके अन्तर्गत मोक्षधर्मपर्वमें उञ्छवृत्तिका
उपाख्यानविषयक तीन सौ उनसठवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ३५९ ॥