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महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,450 पृष्ठ

व्यासजीका शंख और लिखितकी कथा सुनाते हुए राजा सुद्युम्नके दण्डधर्मपालनका महत्त्व सुनाकर युधिष्ठिरको राजधर्ममें ही दृढ़ रहनेकी आज्ञा देना

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त्रयोविंशोऽध्यायः

व्यासजीका शंख और लिखितकी कथा सुनाते हुए राजा सुद्युम्नके दण्डधर्मपालनका महत्त्व सुनाकर युधिष्ठिरको राजधर्ममें ही दृढ़ रहनेकी आज्ञा देना

वैशम्पायन उवाच

एवमुक्तस्तु कौन्तेयो गुडाकेशेन पाण्डवः ।
नोवाच किंचित् कौरव्यस्ततो द्वैपायनोऽब्रवीत् ॥ १ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं— राजन्! निद्राविजयी अर्जुनके ऐसा कहनेपर भी कुरुकुलनन्दन पाण्डुपुत्र कुन्तीकुमार युधिष्ठिर जब कुछ न बोले, तब द्वैपायन व्यासजीने इस प्रकार कहा ॥ १ ॥

व्यास उवाच

बीभत्सोर्वचनं सौम्य सत्यमेतद् युधिष्ठिर ।
शास्त्रदृष्टः परो धर्मः स्थितो गार्हस्थ्यमाश्रितः ॥ २ ॥
व्यासजी बोले— सौम्य युधिष्ठिर! अर्जुनने जो बात कही है, वह ठीक है। शास्त्रोक्त परमधर्म गृहस्थ-आश्रमका ही आश्रय लेकर टिका हुआ है ॥ २ ॥

स्वधर्मं चर धर्मज्ञ यथाशास्त्रं यथाविधि ।
न हि गार्हस्थ्यमुत्सृज्य तवारण्यं विधीयते ॥ ३ ॥
धर्मज्ञ युधिष्ठिर! तुम शास्त्रके कथनानुसार विधिपूर्वक स्वधर्मका ही आचरण करो। तुम्हारे लिये गृहस्थ-आश्रमको छोड़कर वनमें जानेका विधान नहीं है ॥ ३ ॥

गृहस्थं हि सदा देवाः पितरोऽतिथयस्तथा ।
भृत्याश्चैवोपजीवन्ति तान् भरस्व महीपते ॥ ४ ॥
पृथ्वीनाथ! देवता, पितर, अतिथि और भृत्यगण सदा गृहस्थका ही आश्रय लेकर जीवन-निर्वाह करते हैं; अतः तुम उनका भरण-पोषण करो ॥ ४ ॥

वयांसि पशवश्चैव भूतानि च जनाधिप ।
गृहस्थैरेव धार्यन्ते तस्माच्छ्रेष्ठो गृहाश्रमी ॥ ५ ॥
जनेश्वर! पशु, पक्षी तथा अन्य प्राणी भी गृहस्थोंसे ही पालित होते हैं; अतः गृहस्थ ही सबसे श्रेष्ठ है ॥ ५ ॥

सोऽयं चतुर्णामेतेषामाश्रमाणां दुराचरः ।
तं चराद्य विधिं पार्थ दुश्चरं दुर्बलेन्द्रियैः ॥ ६ ॥

युधिष्ठिर! चारों आश्रमोंमें यह गृहस्थाश्रम ही ऐसा है, जिसका ठीक-ठीक पालन करना बहुत कठिन है। जिनकी इन्द्रियाँ दुर्बल हैं, उनके द्वारा गृहस्थ-धर्मका आचरण दुष्कर है। तुम अब उसी दुष्कर धर्मका पालन करो ॥ ६ ॥

वेदज्ञानं च ते कृत्स्नं तपश्चाचरितं महत् ।
पितृपैतामहं राज्यं धुर्यवद् वोढुमर्हसि ॥ ७ ॥

तुम्हें वेदका पूरा-पूरा ज्ञान है, तुमने बड़ी भारी तपस्या की है। इसलिये अपने पिता-पितामहोंके इस राज्यका भार तुम्हें एक धुरन्धर पुरुषकी भाँति वहन करना चाहिये ॥ ७ ॥

तपो यज्ञस्तथा विद्या भैक्ष्यमिन्द्रियसंयमः ।
ध्यानमेकान्तशीलत्वं तुष्टिर्ज्ञानं च शक्तितः ॥ ८ ॥
ब्राह्मणानां महाराज चेष्टा संसिद्धिकारिका ।

महाराज! तप, यज्ञ, विद्या, भिक्षा, इन्द्रियसंयम, ध्यान, एकान्तवासका स्वभाव, संतोष और यथाशक्ति शास्त्रज्ञान—ये सब गुण तथा चेष्टाएँ ब्राह्मणोंके लिये सिद्धि प्रदान करनेवाली हैं ॥ ८ १/२ ॥

क्षत्रियाणां तु वक्ष्यामि तवापि विदितं पुनः ॥ ९ ॥
यज्ञो विद्या समुत्थानमसंतोषः श्रयं प्रति ।
दण्डधारणमुग्रत्वं प्रजानां परिपालनम् ॥ १० ॥
वेदज्ञानं तथा कृत्स्नं तपः सुचरितं तथा ।
द्रविणोपार्जनं भूरि पात्रे च प्रतिपादनम् ॥ ११ ॥
एतानि राज्ञां कर्माणि सुकृतानि विशाम्पते ।
इमं लोकममुं चैव साधयन्तीति नः श्रुतम् ॥ १२ ॥

प्रजानाथ! अब मैं पुनः क्षत्रियोंके धर्म बता रहा हूँ, यद्यपि वह तुम्हें भी ज्ञात है। यज्ञ, विद्याभ्यास, शत्रुओंपर चढ़ाई करना, राजलक्ष्मीकी प्राप्तिसे कभी संतुष्ट न होना, दुष्टोंको दण्ड देनेके लिये उद्यत रहना, क्षत्रियतेजसे सम्पन्न रहना, प्रजाकी सब ओरसे रक्षा करना, समस्त वेदोंका ज्ञान प्राप्त करना, तप, सदाचार, अधिक द्रव्योपार्जन और सत्पात्रको दान देना—ये सब राजाओंके कर्म हैं, जो सुन्दर ढंगसे किये जानेपर उनके इहलोक और परलोक दोनोंको सफल बनाते हैं, ऐसा हमने सुना है ॥ ९—१२ ॥

एषां ज्यायस्तु कौन्तेय दण्डधारणमुच्यते ।
बलं हि क्षत्रिये नित्यं बले दण्डः समाहितः ॥ १३ ॥

कुन्तीनन्दन! इनमें भी दण्ड धारण करना राजाका प्रधान धर्म बताया जाता है; क्योंकि क्षत्रियमें बलकी नित्य स्थिति है और बलमें ही दण्ड प्रतिष्ठित होता है ॥ १३ ॥

एता विद्याः क्षत्रियाणां राजन् संसिद्धिकारिकाः ।
अपि गाथामिमां चापि बृहस्पतिरगायत ॥ १४ ॥

राजन्! ये विद्याएँ (धार्मिक क्रियाएँ) क्षत्रियोंको सदा सिद्धि प्रदान करनेवाली हैं। इस विषयमें बृहस्पतिजीने इस गाथाका भी गान किया है ॥ १४ ॥

भूमिरेतौ निगिरति सर्पं बिलशयानिव ।
राजानं चाविरोद्धारं ब्राह्मणं चाप्रवासिनम् ॥ १५ ॥
‘जैसे साँप बिलमें रहनेवाले चूहे आदि जीवोंको निगल जाता है, उसी प्रकार विरोध न करनेवाले राजा और परदेशमें न जानेवाले ब्राह्मण—इन दो व्यक्तियोंको भूमि निगल जाती है ॥ १५ ॥

सुद्युम्नश्चापि राजर्षिः श्रूयते दण्डधारणात् ।
प्राप्तवान् परमां सिद्धिं दक्षः प्राचेतसो यथा ॥ १६ ॥
सुना जाता है कि राजर्षि सुद्युम्नने दण्डधारणके द्वारा ही प्रचेताकुमार दक्षके समान परम सिद्धि प्राप्त कर ली ॥

युधिष्ठिर उवाच

भगवन् कर्मणा केन सुद्युम्नो वसुधाधिपः ।
संसिद्धिं परमां प्राप्तः श्रोतुमिच्छामि तं नृपम् ॥ १७ ॥
युधिष्ठिरने पूछा— भगवन्! पृथिवीपति सुद्युम्नने किस कर्मसे परम सिद्धि प्राप्त कर ली थी। मैं उन नरेशका चरित्र सुनना चाहता हूँ ॥ १७ ॥

व्यास उवाच

अत्राप्युदाहरन्तीममितिहासं पुरातनम् ।
शंखश्च लिखितश्चास्तां भ्रातरौ संशितव्रतौ ॥ १८ ॥
व्यासजीने कहा— युधिष्ठिर! इस विषयमें लोग इस प्राचीन इतिहासका उदाहरण दिया करते हैं—शंख और लिखित नामवाले दो भाई थे। दोनों ही कठोर व्रतका पालन करनेवाले तपस्वी थे ॥ १८ ॥

तयोरावसथावास्तां रमणीयौ पृथक् पृथक् ।
नित्यपुष्पफलैर्वृक्षैरुपेतो बाहुदामनु ॥ १९ ॥
बाहुदा नदीके तटपर उन दोनोंके अलग-अलग परम सुन्दर आश्रम थे, जो सदा फल-फूलोंसे लदे रहनेवाले वृक्षोंसे सुशोभित थे ॥ १९ ॥

ततः कदाचिल्लिखितः शंखस्याश्रममागतः ।
यदृच्छयाथ शंखोऽपि निष्क्रान्तोऽभवदाश्रमात् ॥ २० ॥
एक दिन लिखित शंखके आश्रमपर आये। दैवेच्छासे शंख भी उसी समय आश्रमसे बाहर निकल गये थे ॥

सोऽभिगम्याश्रमं भ्रातुः शंखस्य लिखितस्तदा ।
फलानि पातयामास सम्यक्परिणतान्युत ॥ २१ ॥

तान्युपादाय विस्रब्धो भक्षयामास स द्विजः ।
भाई शंखके आश्रममें जाकर लिखितने खूब पके हुए बहुत-से फल तोड़कर गिराये और उन सबको लेकर वे ब्रह्मर्षि बड़ी निश्चिन्तताके साथ खाने लगे ॥ २१ १/२ ॥
तस्मिंश्च भक्षयत्येव शंखोऽप्याश्रममागतः ॥ २२ ॥
भक्षयन्तं तु तं दृष्ट्वा शंखो भ्रातरमब्रवीत् ।
कुतः फलान्यवाप्तानि हेतुना केन खादसि ॥ २३ ॥
वे खा ही रहे थे कि शंख भी आश्रमपर लौट आये। भाईको फल खाते देख शंखने उनसे पूछा—'तुमने ये फल कहाँसे प्राप्त किये हैं और किसलिये तुम इन्हें खा रहे हो?' ॥ २२-२३ ॥
सोऽब्रवीद् भ्रातरं ज्येष्ठमुपसृत्याभिवाद्य च ।
इत एव गृहीतानि मयेति प्रहसन्निव ॥ २४ ॥
लिखितने निकट जाकर बड़े भाईको प्रणाम किया और हँसते हुए-से इस प्रकार कहा—'भैया! मैंने ये फल यहींसे लिये हैं' ॥ २४ ॥
तमब्रवीत् तथा शंखस्तीव्ररोषसमन्वितः ।
स्तेयं त्वया कृतमिदं फलान्याददता स्वयम् ॥ २५ ॥
तब शंखने तीव्र रोषमें भरकर कहा—'तुमने मुझसे पूछे बिना स्वयं ही फल लेकर यह चोरी की है ॥ २५ ॥
गच्छ राजानमासाद्य स्वकर्म कथयस्व वै ।
अदत्तादानमेवं हि कृतं पार्थिवसत्तम ॥ २६ ॥
स्तेनं मां त्वं विदित्वा च स्वधर्ममनुपालय ।
शीघ्रं धारय चौरस्य मम दण्डं नराधिप ॥ २७ ॥
'अतः तुम राजाके पास जाओ और अपनी करतूत उन्हें कह सुनाओ। उनसे कहना—'नृपश्रेष्ठ! मैंने इस प्रकार बिना दिये हुए फल ले लिये हैं, अतः मुझे चोर समझकर अपने धर्मका पालन कीजिये। नरेश्वर! चोरके लिये जो नियत दण्ड हो, वह शीघ्र मुझे प्रदान कीजिये' ॥
इत्युक्तस्तस्य वचनात् सुद्युम्नं स नराधिपम् ।
अभ्यगच्छन्महाबाहो लिखितः संशितव्रतः ॥ २८ ॥
महाबाहो! बड़े भाईके ऐसा कहनेपर उनकी आज्ञासे कठोर व्रतका पालन करनेवाले लिखित मुनि राजा सुद्युम्नके पास गये ॥ २८ ॥
सुद्युम्नस्त्वन्तपालेभ्यः श्रुत्वा लिखितमागतम् ।
अभ्यगच्छत् सहामात्यः पद्भ्यामेव जनेश्वरः ॥ २९ ॥
सुद्युम्नने द्वारपालोंसे जब यह सुना कि लिखित मुनि आये हैं तो वे नरेश अपने मन्त्रियोंके साथ पैदल ही उनके निकट गये ॥ २९ ॥

तमब्रवीत् समागम्य स राजा धर्मवित्तमम् ।
किमागमनमाचक्ष्व भगवन् कृतमेव तत् ॥ ३० ॥
राजाने उन धर्मज्ञ मुनिसे मिलकर पूछा—‘भगवन्! आपका शुभागमन किस उद्देश्यसे हुआ है? यह बताइये और उसे पूरा हुआ ही समझिये’ ॥ ३० ॥

एवमुक्तः स विप्रर्षिः सुद्युम्नमिदमब्रवीत् ।
प्रतिश्रुत्य करिष्येति श्रुत्वा तत् कर्तुमर्हसि ॥ ३१ ॥
उनके इस तरह कहनेपर विप्रर्षि लिखितने सुद्युम्नसे यों कहा—‘राजन्! पहले यह प्रतिज्ञा कर लो कि ‘हम करेंगे’ उसके बाद मेरा उद्देश्य सुनो और सुनकर उसे तत्काल पूरा करो ॥ ३१ ॥

अनिसृष्टानि गुरुणा फलानि मनुजर्षभ ।
भक्षितानि महाराज तत्र मां शाधि मा चिरम् ॥ ३२ ॥
‘नरश्रेष्ठ! मैंने बड़े भाईके दिये बिना ही उनके बगीचेसे फल लेकर खा लिये हैं; महाराज! इसके लिये मुझे शीघ्र दण्ड दीजिये’ ॥ ३२ ॥

सुद्युम्न उवाच

प्रमाणं चेन्मतो राजा भवतो दण्डधारणे ।
अनुज्ञायामपि तथा हेतुः स्याद् ब्राह्मणर्षभ ॥ ३३ ॥
सुद्युम्नने कहा—ब्राह्मणशिरोमणे! यदि आप दण्ड देनेमें राजाको प्रमाण मानते हैं तो वह क्षमा करके आपको लौट जानेकी आज्ञा दे दे, इसका भी उसे अधिकार है ॥ ३३ ॥

स भवानभ्यनुज्ञातः शुचिकर्मा महाव्रतः ।
ब्रूहि कामानतोऽन्यांस्त्वं करिष्यामि हि ते वचः ॥ ३४ ॥
आप पवित्र कर्म करनेवाले और महान् व्रतधारी हैं। मैंने अपराधको क्षमा करके आपको जानेकी आज्ञा दे दी। इसके सिवा, यदि दूसरी कामनाएँ आपके मनमें हों तो उन्हें बताइये, मैं आपकी आज्ञाका पालन करूँगा ॥

व्यास उवाच

संछन्द्यमानो ब्रह्मर्षिः पार्थिवेन महात्मना ।
नान्यं स वरयामास तस्माद् दण्डादृते वरम् ॥ ३५ ॥
व्यासजीने कहा—महामना राजा सुद्युम्नके बारंबार आग्रह करनेपर भी ब्रह्मर्षि लिखितने उस दण्डके सिवा दूसरा कोई वर नहीं माँगा ॥ ३५ ॥

ततः स पृथिवीपालो लिखितस्य महात्मनः ।
करौ प्रच्छेदयामास धृतदण्डो जगाम सः ॥ ३६ ॥
तब उन भूपालने महामना लिखितके दोनों हाथ कटवा दिये। दण्ड पाकर लिखित वहाँसे चले गये ॥ ३६ ॥

स गत्वा भ्रातरं शंखमार्तरूपोऽब्रवीदिदम् ।
धृतदण्डस्य दुर्बुद्धेर्भावांस्तत् क्षन्तुमर्हति ॥ ३७ ॥
अपने भाई शंखके पास जाकर लिखितने आर्त होकर कहा—‘भैया! मैंने दण्ड पा लिया। मुझ दुर्बुद्धिके उस अपराधको आप क्षमा कर दें’ ॥ ३७ ॥

शंख उवाच

न कुप्ये तव धर्मज्ञ न त्वं दूषयसे मम ।
सुनिर्मलं कुलं ब्रह्मन्नस्मिन् जगति विश्रुतम् ।
धर्मस्तु ते व्यतिक्रान्तस्ततस्ते निष्कृतिः कृता ॥ ३८ ॥
शंख बोले—धर्मज्ञ! मैं तुमपर कुपित नहीं हूँ। तुम मेरा कोई अपराध नहीं करते हो। ब्रह्मन्! हम दोनोंका कुल इस जगत्में अत्यन्त निर्मल एवं निष्कलंक रूपमें विख्यात है। तुमने धर्मका उल्लंघन किया था, अतः उसीका प्रायश्चित्त किया है ॥ ३८ ॥
त्वं गत्वा बाहुदां शीघ्रं तर्पयस्व यथाविधि ।
देवानृषीन् पितॄंश्चैवं मा चाधर्मे मनः कृथाः ॥ ३९ ॥
अब तुम शीघ्र ही बाहुदा नदीके तटपर जाकर विधिपूर्वक देवताओं, ऋषियों और पितरोंका तर्पण करो। भविष्यमें फिर कभी अधर्मकी ओर मन न ले जाना ॥
तस्य तद् वचनं श्रुत्वा शंखस्य लिखितस्तदा ।
अवगाह्यापगां पुण्यामुदकार्थं प्रचक्रमे ॥ ४० ॥
प्रादुरास्तां ततस्तस्य करौ जलजसंनिभौ ।
शंखकी वह बात सुनकर लिखितने उस समय पवित्र नदी बाहुदामें स्नान किया और पितरोंका तर्पण करनेके लिये चेष्टा आरम्भ की। इतनेहीमें उनके कमल-सदृश सुन्दर दो हाथ प्रकट हो गये ॥ ४० १/२ ॥
ततः स विस्मितो भ्रातुर्दर्शयामास तौ करौ ॥ ४१ ॥
ततस्तमब्रवीच्छंखस्तपसेदं कृतं मया ।
मा च तेऽत्र विशंकाभूद् दैवमत्र विधीयते ॥ ४२ ॥
तदनन्तर लिखितने चकित होकर अपने भाईको वे दोनों हाथ दिखाये। तब शंखने उनसे कहा—‘भाई! इस विषयमें तुम्हें शंका नहीं होनी चाहिये। मैंने तपस्यासे तुम्हारे हाथ उत्पन्न किये हैं। यहाँ दैवका विधान ही सफल हुआ है ॥ ४१-४२ ॥

लिखित उवाच

किं तु नाहं त्वया पूतः पूर्वमेव महाद्युते ।
यस्य ते तपसो वीर्यमीदृशं द्विजसत्तम ॥ ४३ ॥
तब लिखितने पूछा—महातेजस्वी द्विजश्रेष्ठ! जब आपकी तपस्याका ऐसा बल है तो आपने पहले ही मुझे पवित्र क्यों नहीं कर दिया? ॥ ४३ ॥

शंख उवाच

एवमेतन्मया कार्यं नाहं दण्डधरस्तव ।
स च पूतो नरपतिस्त्वं चापि पितृभिः सह ॥ ४४ ॥
**शंख बोले—**भाई! यह ठीक है, मैं ऐसा कर सकता था; परंतु मुझे तुम्हें दण्ड देनेका अधिकार नहीं है। दण्ड देनेका कार्य तो राजाका ही है। इस प्रकार दण्ड देकर राजा सुद्युम्न और उस दण्डको स्वीकार करके तुम पितरोंसहित पवित्र हो गये ॥ ४४ ॥

व्यास उवाच

स राजा पाण्डवश्रेष्ठ श्रेयान् वै तेन कर्मणा ।
प्राप्तवान् परमां सिद्धिं दक्षः प्राचेतसो यथा ॥ ४५ ॥
**व्यासजी कहते हैं—**पाण्डवश्रेष्ठ युधिष्ठिर! उस दण्ड-प्रदानरूपी कर्मसे राजा सुद्युम्न उच्चतम पदको प्राप्त हुए। उन्होंने प्रचेताओँके पुत्र दक्षकी भाँति परम सिद्धि प्राप्त की थी ॥ ४५ ॥

एष धर्मः क्षत्रियाणां प्रजानां परिपालनम् ।
उत्पथोऽन्यो महाराज मा स्म शोके मनः कृथाः ॥ ४६ ॥
महाराज! प्रजाजनोंका पूर्णरूपसे पालन करना ही क्षत्रियोंका मुख्य धर्म है। दूसरा काम उसके लिये कुमार्गके तुल्य है; अतः तुम मनको शोकमें न डुबाओ ॥

भ्रातुरस्य हितं वाक्यं शृणु धर्मज्ञ सत्तम ।
दण्ड एव हि राजेन्द्र क्षत्रधर्मो न मुण्डनम् ॥ ४७ ॥
धर्मके ज्ञाता सत्पुरुष! तुम अपने भाईकी हितकर बात सुनो। राजेन्द्र! दण्ड-धारण ही क्षत्रिय-धर्मके अन्तर्गत है, मूँड़ मुड़ाकर संन्यासी बनना नहीं ॥ ४७ ॥

इति श्रीमहाभारते शान्तिपर्वणि राजधर्मानुशासनपर्वणि व्यासवाक्ये
त्रयोविंशोऽध्यायः ॥ २३ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत शान्तिपर्वके अन्तर्गत राजधर्मानुशासनपर्वमें व्यासवाक्यविषयक
तेईसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ २३ ॥