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महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,450 पृष्ठ

युधिष्ठिरने पूछा—सदाचारके ज्ञाता पितामह! मोक्षधर्मको जाननेवाले मिथिलानरेश जनकने मानवभोगोंका परित्याग करके किस प्रकारके आचरणसे मोक्ष प्राप्त किया? ॥ १

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अष्टादशाधिकद्विशततमोऽध्यायः

राजा जनकके दरबारमें पञ्चशिखका आगमन और उनके द्वारा नास्तिक मतोंके निराकरणपूर्वक शरीरसे भिन्न आत्माकी नित्य सत्ताका प्रतिपादन

युधिष्ठिर उवाच

केन वृत्तेन वृत्तज्ञ जनको मिथिलाधिपः ।
जगाम मोक्षं मोक्षज्ञो भोगानुत्सृज्य मानुषान् ॥ १ ॥

**युधिष्ठिरने पूछा—**सदाचारके ज्ञाता पितामह! मोक्षधर्मको जाननेवाले मिथिलानरेश जनकने मानवभोगोंका परित्याग करके किस प्रकारके आचरणसे मोक्ष प्राप्त किया? ॥ १ ॥

भीष्म उवाच

अत्राप्युदाहरन्तीममितिहासं पुरातनम् ।
येन वृत्तेन धर्मज्ञः स जगाम महत्सुखम् ॥ २ ॥

**भीष्मजीने कहा—**राजन्! इस विषयमें विज्ञ पुरुष इस प्राचीन इतिहासका उदाहरण दिया करते हैं, जिसके आचरणसे धर्मज्ञ राजा जनक महान् सुख (मोक्ष) को प्राप्त हुए थे ॥ २ ॥

जनको जनदेवस्तु मिथिलायां जनाधिपः ।
और्ध्वदेहिकधर्माणामौसीद् युक्तो विचिन्तने ॥ ३ ॥

प्राचीन कालकी बात है, मिथिलामें जनकवंशी राजा जनदेव राज्य करते थे। वे सदा देह-त्यागके पश्चात् आत्माके अस्तित्वरूप धर्मोंके ही चिन्तनमें लगे रहते थे ॥ ३ ॥

तस्य स्म शतमाचार्या वसन्ति सततं गृहे ।
दर्शयन्तः पृथग्धर्मान् नानाश्रमनिवासिनः ॥ ४ ॥

उनके दरबारमें सौ आचार्य बराबर रहा करते थे, जो विभिन्न आश्रमोंके निवासी थे और उन्हें भिन्न-भिन्न धर्मोंका उपदेश देते रहते थे ॥ ४ ॥

स तेषां प्रेत्यभावे च प्रेत्यजातौ विनिश्चये ।
आगमस्थः स भूयिष्ठमात्मतत्त्वे न तुष्यति ॥ ५ ॥

‘इस शरीरको त्याग देनेके पश्चात् जीवकी सत्ता रहती है या नहीं, अथवा देह-त्यागके बाद उसका पुनर्जन्म होता है या नहीं’, इस विषयमें उन आचार्योंका जो सुनिश्चित सिद्धान्त था, वे लोग आत्मतत्त्वके विषयमें जैसा विचार उपस्थित करते थे, उससे शास्त्रानुयायी राजा जनदेवको विशेष संतोष नहीं होता था ॥ ५ ॥

तत्र पञ्चशिखो नाम कापिलेयो महामुनिः ।
परिधावन् महीं कृत्स्नां जगाम मिथिलामथ ॥ ६ ॥
एक बार कपिलाके पुत्र महामुनि पंचशिख सारी पृथ्वीकी परिक्रमा करते हुए मिथिलामें जा पहुँचे ॥ ६ ॥

सर्वसंन्यासधर्माणां तत्त्वज्ञानविनिश्चये ।
सुपर्यवसितार्थश्च निर्द्वन्द्वो नष्टसंशयः ॥ ७ ॥
वे सम्पूर्ण संन्यास-धर्मोंके ज्ञाता और तत्त्वज्ञानके निर्णयमें एक सुनिश्चित सिद्धान्तके पोषक थे। उनके मनमें किसी प्रकारका संदेह नहीं था। वे निर्द्वन्द्व होकर विचरा करते थे ॥ ७ ॥

ऋषीणामाहुरेकं तं यं कामानाहृतं नृषु ।
शाश्वतं सुखमत्यन्तमन्विच्छन्तं सुदुर्लभम् ॥ ८ ॥
उन्हें ऋषियोंमें अद्वितीय बताया जाता है। वे कामनासे सर्वथा शून्य थे। वे मनुष्योंके हृदयमें अपने उपदेशद्वारा अत्यन्त दुर्लभ सनातन सुखकी प्रतिष्ठा करना चाहते थे ॥ ८ ॥

यमाहुः कपिलं सांख्याः परमर्षिं प्रजापतिम् ।
स मन्ये तेन रूपेण विस्मापयति हि स्वयम् ॥ ९ ॥
सांख्यके विद्वान् तो उन्हें साक्षात् प्रजापति महर्षि कपिलका ही स्वरूप बताते हैं। उन्हें देखकर ऐसा जान पड़ता था, मानो सांख्यशास्त्रके प्रवर्तक भगवान् कपिल स्वयं पंचशिखके रूपमें आकर लोगोंको आश्चर्यमें डाल रहे हैं ॥ ९ ॥

आसुरेः प्रथमं शिष्यं यमाहुश्चिरजीविनम् ।
पञ्चस्रोतसि यः सत्रमास्ते वर्षसहस्रिकम् ॥ १० ॥
उन्हें आसुरि मुनिका प्रथम शिष्य और चिरंजीवी बताया जाता है। उन्होंने एक हजार वर्षोंतक मानस यज्ञका अनुष्ठान किया था ॥ १० ॥

तं समासीनमागम्य कापिलं मण्डलं महत् ।
पञ्चस्रोतसि निष्णातः पञ्चरात्रविशारदः ॥ ११ ॥
पञ्चज्ञः पञ्चकृत्पञ्चगुणः पञ्चशिखः स्मृतः ।
पुरुषावस्थमव्यक्तं परमार्थं न्यवेदयत् ॥ १२ ॥
एक समय आसुरि मुनि अपने आश्रममें बैठे हुए थे। इसी समय कपिलमतावलम्बी मुनियोंका महान् समुदाय वहाँ आया और प्रत्येक पुरुषके भीतर स्थित, अव्यक्त एवं परमार्थतत्त्वके विषयमें उनसे कुछ कहनेका अनुरोध करने लगा। उन्हींमें पंचशिख भी थे, जो पाँच स्रोतों (इन्द्रियों) वाले मनके व्यापार (ऊहापोह) में कुशल थे, पंचरात्र आगमके विशेषज्ञ थे, पाँच कोशोंके ज्ञाता और तद्विषयक पाँच प्रकारकी उपासनाओंके जानकार थे। शम, दम, उपरति, तितिक्षा और समाधान—इन पाँच गुणोंसे भी युक्त थे। उन पाँचों

कोशोंसे भिन्न होनेके कारण उनके शिखास्थानीय जो ब्रह्म है, वह पंचशिख कहा गया है। उसके ज्ञाता होनेसे ऋषिको भी 'पंचशिख' माना गया है ।। ११-१२ ।।

इष्टसत्रेण संसिद्धो भूयश्च तपसाऽऽसुरिः ।
क्षेत्रक्षेत्रज्ञयोर्व्यक्तिं बुबुधे देवदर्शनः ।। १३ ।।
आसुरि तपोबलसे दिव्य दृष्टि प्राप्त कर चुके थे। ज्ञानयज्ञके द्वारा सिद्धि प्राप्त करके उन्होंने क्षेत्र और क्षेत्रज्ञके भेदको स्पष्टरूपसे समझ लिया था ।। १३ ।।

यत् तदेकाक्षरं ब्रह्म नानारूपं प्रदृश्यते ।
आसुरिर्मण्डले तस्मिन् प्रतिपेदे तदव्ययम् ।। १४ ।।
जो एकमात्र अक्षर और अविनाशी ब्रह्म नाना रूपोंमें दिखायी देता है, उसका ज्ञान आसुरिने उस मुनिमण्डलीमें प्रतिपादित किया ।। १४ ।।

तस्य पञ्चशिखः शिष्यो मानुष्या पयसा भृतः ।
ब्राह्मणी कपिला नाम काचिदासीत् कुटुम्बिनी ।। १५ ।।
तस्याः पुत्रत्वमागम्य स्त्रियाः स पिबति स्तनौ ।
ततः स कापिलेयत्वं लेभे बुद्धिं च नैष्ठिकीम् ।। १६ ।।
उन्हींके शिष्य पंचशिख थे, जो मानवी स्त्रीके दूधसे पले थे। कपिला नामवाली कोई कुटुम्बिनी ब्राह्मणी थी। उसी स्त्रीके पुत्रभावको प्राप्त होकर वे उसके स्तनोंका दूध पीते थे; अतः कपिलाका पुत्र कहलानेके कारण कापिलेय नामसे उनकी प्रसिद्धि हुई। उन्होंने नैष्ठिक (ब्रह्ममें निष्ठा रखनेवाली) बुद्धि प्राप्त की थी ।। १५-१६ ।।

एतन्मे भगवानाह कापिलेयस्य सम्भवम् ।
तस्य तत् कापिलेयत्वं सर्ववित्त्वमनुत्तमम् ।। १७ ।।
कापिलेयके जन्मका यह वृत्तान्त मुझे भगवान् ने बताया था। उनके कपिलापुत्र कहलाने और सर्वज्ञ होनेका यही परम उत्तम वृत्तान्त है ।। १७ ।।

सामान्यं जनकं ज्ञात्वा धर्मज्ञो ज्ञानमुत्तमम् ।
उपेत्य शतमाचार्यान् मोहयामास हेतुभिः ।। १८ ।।
धर्मज्ञ पंचशिखने उत्तम ज्ञान प्राप्त किया था। वे राजा जनकको सौ आचार्योंपर समानभावसे अनुरक्त जान उनके दरबारमें गये और वहाँ जाकर उन्होंने अपने युक्तियुक्त वचनोंद्वारा उन सब आचार्योंको मोहित कर दिया ।। १८ ।।

जनकस्त्वभिसंरक्तः कापिलेयानुदर्शनात् ।
उत्सृज्य शतमाचार्यान् पृष्ठतोऽनुजगाम तम् ।। १९ ।।
उस समय महाराज जनक कपिलानन्दन पंच-शिखका ज्ञान देखकर उनके प्रति आकृष्ट हो गये और अपने सौ आचार्योंको छोड़कर उन्हींके पीछे चलने लगे ।। १९ ।।

तस्मै परमकल्याय प्रणताय च धर्मतः ।
अब्रवीत् परमं मोक्षं यत् तत् सांख्येऽभिधीयते ।। २० ।।

तब मुनिवर पंचशिखने राजाको धर्मानुसार चरणोंमें पड़ा देख उन्हें योग्य अधिकारी मानकर परम मोक्षका उपदेश दिया, जिसका सांख्यशास्त्रमें वर्णन है ॥ २० ॥

जातिनिर्वेदमुक्त्वा स कर्मनिर्वेदमब्रवीत् ।
कर्मनिर्वेदमुक्त्वा च सर्वनिर्वेदमब्रवीत् ॥ २१ ॥

उन्होंने 'जातिनिर्वेद'<sup>३</sup> का वर्णन करके 'कर्मनिर्वेद'<sup>३</sup> का उपदेश किया। तत्पश्चात् 'सर्वनिर्वेद'<sup>३</sup> की बात बतायी ॥ २१ ॥

यदर्थं धर्मसंसर्गः कर्मणां च फलोदयः ।
तमनाश्वासिकं मोहं विनाशि चलमध्रुवम् ॥ २२ ॥

उन्होंने कहा—'जिसके लिये धर्मका आचरण किया जाता है, जो कर्मोंके फलका उदय होनेपर प्राप्त होता है, वह इहलोक या परलोकका भोग नश्वर है। उसपर आस्था करना उचित नहीं। वह मोहरूप, चंचल और अस्थिर है' ॥ २२ ॥

दृश्यमाने विनाशे च प्रत्यक्षे लोकसाक्षिके ।
आगमात् परमस्तीति ब्रुवन्नपि पराजितः ॥ २३ ॥

कुछ नास्तिक ऐसा कहा करते हैं कि देहरूपी आत्माका विनाश प्रत्यक्ष देखा जा रहा है। सम्पूर्ण लोक इसका साक्षी है। फिर भी यदि कोई शास्त्रप्रमाणकी ओट लेकर देहसे भिन्न आत्माकी सत्ताका प्रतिपादन करता है तो वह परास्त है; क्योंकि उसका कथन लोकानुभवके विरुद्ध है ॥ २३ ॥

अनात्मा ह्यात्मनो मृत्युः क्लेशो मृत्युर्जरामयः ।
आत्मानं मन्यते मोहात् तदसम्यक् परं मतम् ॥ २४ ॥

आत्माके स्वरूपभूत शरीरका अभाव होना ही उसकी मृत्यु है। इस दृष्टिसे दुःख, वृद्धावस्था तथा नाना प्रकारके रोग—ये सभी आत्माकी मृत्यु ही हैं (क्योंकि इनके द्वारा शरीरका आंशिक विनाश होता रहता है)। फिर भी जो लोग आत्माको देहसे भिन्न मानते हैं, उनकी यह मान्यता बहुत ही असंगत है ॥ २४ ॥