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महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,450 पृष्ठ

नारदजीका श्वेतद्वीपदर्शन, वहाँके निवासियोंके स्वरूपका वर्णन, राजा उपरिचरका चरित्र तथा पाञ्चरात्रकी उत्पत्तिका प्रसङ्ग

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पञ्चत्रिंशदधिकत्रिशततमोऽध्यायः

नारदजीका श्वेतद्वीपदर्शन, वहाँके निवासियोंके स्वरूपका वर्णन, राजा उपरिचरका चरित्र तथा पाञ्चरात्रकी उत्पत्तिका प्रसङ्ग

भीष्म उवाच

स एवमुक्तो द्विपदां वरिष्ठो
नारायणेनोत्तमपूरुषेण ।
जगाद वाक्यं द्विपदां वरिष्ठं
नारायणं लोकहिताधिवासम् ॥ १ ॥

भीष्मजी कहते हैं— युधिष्ठिर! पुरुषोत्तम भगवान् नारायणने जब पुरुषप्रवर नारदजीसे इस प्रकार कहा, तब वे लोकहितके आश्रयभूत पुरुषाग्रगण्य भगवान् नारायणसे यों बोले ॥ १ ॥

नारद उवाच

यदर्थमात्रप्रभवेण जन्म
कृतं त्वया धर्मगृहे चतुर्धा ।
तत् साध्यतां लोकहितार्थमद्य
गच्छामि द्रष्टुं प्रकृतिं तवाद्याम् ॥ २ ॥

नारदजीने कहा— प्रभो! आप समस्त पदार्थोंकी उत्पत्तिके कारण हैं। आपने जिसके लिये धर्मके गृहमें चार स्वरूपोंमें अवतार धारण किया है उस प्रयोजनकी लोकहितके लिये सिद्धि कीजिये। अब मैं (श्वेतद्वीपमें स्थित) आपके आदिविग्रहका दर्शन करने जाता हूँ ॥ २ ॥

पूजां गुरूणां सततं करोमि
परस्य गुह्यं न तु भिन्नपूर्वम् ।
वेदाः स्वधीता मम लोकनाथ
तप्तं तपो नानृतमुक्तपूर्वम् ॥ ३ ॥

लोकनाथ! मैं गुरुजनोंका सदा आदर करता हूँ। किसीकी गुप्त बात पहले कभी दूसरोंके समक्ष प्रकट नहीं की है। मैंने वेदोंका स्वाध्याय किया, तपस्या की और कभी असत्यभाषण नहीं किया है ॥ ३ ॥

गुप्तानि चत्वारि यथागमं मे
शत्रौ च मित्रे च समोऽस्मि नित्यम् ।

तं चादिदेवं सततं प्रपन्न
एकान्तभावेन वृणोम्यजस्रम् ॥ ४ ॥
एभिर्विशेषैः परिशुद्धसत्त्वः
कस्मान्न पश्येयमनन्तमीशम् ।
शास्त्रकी आज्ञाके अनुसार हाथ, पैर, उदर और उपस्थ—इन चारोंकी मैंने रक्षा की है। शत्रु और मित्रके प्रति मैं सदा समानभाव रखता हूँ। इन आदिदेव परमात्मा श्रीनारायणकी निरन्तर शरण लेकर मैं अनन्य-भावसे सदा उन्हींका भजन करता हूँ। इन सब विशेष कारणोंसे मेरा अन्तःकरण शुद्ध हो गया है। ऐसी दशामें मैं उन अनन्त परमेश्वरका दर्शन कैसे नहीं कर सकता हूँ? ॥ ४ १/३ ॥

तत् पारमेष्ठ्यस्य वचो निशम्य
नारायणः शाश्वतधर्मगोप्ता ॥ ५ ॥
गच्छेति तं नारदमुक्तवान् स
सम्पूजयित्वाऽऽत्मविधिक्रियाभिः ।
ब्रह्मपुत्र नारदजीका यह वचन सुनकर सनातन धर्मके रक्षक भगवान् नारायणने उनकी विधिवत् पूजा करके उन्हें जानेकी आज्ञा दे दी ॥ ५ १/३ ॥

ततो विसृष्टः परमेष्ठिपुत्रः
सोऽभ्यर्चयित्वा तमृषिं पुराणम् ॥ ६ ॥
खमुत्पपातोत्तमयोगयुक्त-
स्ततोऽधिमेरौ सहसा निलिल्ये ।
उनसे विदा लेकर ब्रह्मकुमार नारद उन पुरातन ऋषि नारायणका पूजन करके उत्तम योगसे युक्त हो आकाशकी ओर उड़े और सहसा मेरुपर्वतपर पहुँचकर अदृश्य हो गये ॥ ६ १/३ ॥

तत्रावतस्थे च मुनिर्मुहूर्त-
मेकान्तमासाद्य गिरेः स शृङ्गे ॥ ७ ॥
आलोकयन्नुत्तरपश्चिमेन
ददर्श चाप्यद्भुतमुक्त रूपम् ।
मेरुके शिखरपर एकान्त स्थानमें जाकर नारद मुनिने दो घड़ीतक विश्राम किया। फिर वहाँसे उत्तर-पश्चिमकी ओर दृष्टिपात करनेपर उन्होंने पूर्व-वर्णित एक अद्भुत दृश्य देखा ॥ ७ १/३ ॥

क्षीरोदधेर्योत्तरतो हि द्वीपः
श्वेतः स नाम्ना प्रथितो विशालः ॥ ८ ॥
मेरोः सहस्रैः स हि योजनानां
द्वात्रिंशतोर्ध्वं कविभिर्निरुक्तः ।

अनिन्द्रियाश्चानशनाश्च तत्र
निष्पन्दहीनाः सुसुगन्धिनस्ते ॥ ९ ॥
क्षीरसागरके उत्तरभागमें जो श्वेत नामसे प्रसिद्ध विशाल द्वीप है, वह उनके सामने प्रकट हो गया। विद्वानोंने उस द्वीपको मेरुपर्वतसे बत्तीस हजार योजन ऊँचा बताया है। वहाँके निवासी इन्द्रियोंसे रहित, निराहार तथा चेष्टारहित एवं ज्ञानसम्पन्न होते हैं। उनके अंगोंसे उत्तम सुगन्ध निकलती रहती है ॥ ८-९ ॥

श्वेताः पुमांसो गतसर्वपापा-
श्चक्षुर्मुषः पापकृतां नराणाम् ।
वज्रास्थिकायाः सममानोन्माना
दिव्यावयवरूपाः शुभसारोपेताः ॥ १० ॥
छत्राकृतिशीर्षा मेघौघनिनादाः
सममुष्कचतुष्का राजीवच्छतपादाः ।
षष्ट्या दन्तैर्युक्ताः शुक्लैरष्टाभिर्दंष्ट्राभिर्ये
जिह्वाभिर्ये विश्ववक्त्रं लेलिह्यन्ते सूर्यप्रख्यम् ॥ ११ ॥
उस द्वीपमें सब प्रकारके पापोंसे रहित श्वेत वर्णवाले पुरुष निवास करते हैं। उनकी ओर देखनेसे पापी मनुष्योंकी आँखें चौंधिया जाती हैं। उनके शरीर तथा हड्डियाँ वज्रके समान सुदृढ़ होती हैं। वे मान और अपमानको समान समझते हैं। उनके अंग दिव्य होते हैं। वे शुभ (योगके प्रभावसे उत्पन्न) बलसे सम्पन्न होते हैं। उनके मस्तकका आकार छत्रके समान और स्वर मेघोंकी घटाके गर्जनकी भाँति गम्भीर होता है। उनके बराबर-बराबर चार भुजाएँ होती हैं। उनके पैर सैकड़ों कमलसदृश रेखाओंसे सुशोभित होते हैं। उनके मुँहमें साठ सफेद दाँत और आठ दाढ़ें होती हैं। वे सूर्यके समान कान्तिमान् तथा सम्पूर्ण विश्वको अपने मुखमें रखनेवाले महाकालको भी अपनी जिह्वाओंसे चाट लेते हैं ॥ १०-११ ॥

देवं भक्त्या विश्वोत्पन्नं
यस्मात् सर्वे लोकाः सम्प्रसूताः ।
वेदा धर्मा मुनयः शान्ता
देवाः सर्वे तस्य निसर्गः ॥ १२ ॥
जिनसे सम्पूर्ण विश्व उत्पन्न हुआ है, सारे लोक प्रकट हुए हैं, वेद, धर्म, शान्त स्वभाववाले मुनि तथा सम्पूर्ण देवता जिनकी सृष्टि हैं, उन अनन्त शक्ति-सम्पन्न परमेश्वरको श्वेतद्वीपके निवासी भक्तिभावसे अपने हृदयमें धारण करते हैं ॥ १२ ॥

युधिष्ठिर उवाच
अनिन्द्रिया निराहारा अनिष्पन्दाः सुगन्धिनः ।
कथं ते पुरुषा जाताः का तेषां गतिरुत्तमा ॥ १३ ॥

युधिष्ठिरने पूछा— पितामह! श्वेतद्वीपमें रहनेवाले पुरुष इन्द्रिय, आहार, तथा चेष्टासे रहित क्यों होते हैं? उनके शरीरसे सुन्दर गन्ध क्यों निकलती है? उनकी उत्पत्ति किस प्रकार हुई है तथा वे किस उत्तम गतिको प्राप्त होते हैं? ।। १३ ।।
ये च मुक्ता भवन्तीह नरा भरतसत्तम ।
तेषां लक्षणमेतद्धि तच्छ्वेतद्वीपवासिनाम् ।। १४ ।।
तस्मान्मे संशयं छिन्धि परं कौतूहलं हि मे ।
त्वं हि सर्वकथारामस्त्वां चैवोपाश्रिता वयम् ।। १५ ।।
भरतश्रेष्ठ! इस लोकसे मुक्त होनेवाले पुरुषोंका शास्त्रोंमें जो लक्षण बताया गया है, वैसा ही आपने श्वेतद्वीपके निवासियोंका भी बताया है। इसलिये मुझे संदेह होता है, अतः मेरे इस संशयका निवारण कीजिये। इसे जाननेके लिये मेरे मनमें बड़ी उत्कण्ठा है। आप सम्पूर्ण ज्ञानमयी कथाओंमें रस लेनेवाले हैं और हम आपके शरणागत हैं ।। १४-१५ ।।

भीष्म उवाच

विस्तीर्णेषा कथा राजन् श्रुता मे पितृसंनिधौ ।
यैषा तव हि वक्तव्या कथासारो हि सा मता ।। १६ ।।
भीष्मजी कहते हैं— राजन्! यह कथा बहुत विस्तृत है। इसे मैंने अपने पिताजीके निकट सुना था। इस समय जो कथा तुम्हारे सामने कहनी है, वह सम्पूर्ण कथाओंकी सारभूत मानी गयी है ।। १६ ।।
(शान्तनोः कथयामास नारदो मुनिसत्तमः ।
राज्ञा पृष्टः पुरा प्राह तत्राहं श्रुतवान् पुरा ।।)
पूर्वकालमें मेरे पिता महाराज शान्तनुके पूछनेपर मुनिश्रेष्ठ नारदजीने उनसे यह कथा कही थी। उसी समय वहाँ मैंने भी इसे सुना था ।।
राजोपरिचरो नाम बभूवाधिपतिर्भुवः ।
आखण्डलसखः ख्यातो भक्तो नारायणं हरिम् ।। १७ ।।
पहलेकी बात है, इस पृथ्वीपर एक उपरिचर नामक राजा राज्य करते थे। वे इन्द्रके मित्र और पापहारी भगवान् नारायणके विख्यात भक्त थे ।। १७ ।।
धार्मिको नित्यभक्तश्च पितुर्नित्यमतन्द्रितः ।
साम्राज्यं तेन सम्प्राप्तं नारायणवरात् पुरा ।। १८ ।।
वे धर्मात्मा तथा पिताके नित्य भक्त थे। आलस्यका उनमें सर्वथा अभाव था। पूर्वकालमें भगवान् नारायणके वरसे उन्होंने भूमण्डलका साम्राज्य प्राप्त किया था ।। १८ ।।
सात्वतं विधिमास्थाय प्राक् सूर्यमुखनिःसृतम् ।
पूजयामास देवेशं तच्छेषेण पितामहान् ।। १९ ।।

पितृशेषेण विप्रांश्च संविभज्याश्रितांश्च सः ।
शेषान्नभुक् सत्यपरः सर्वभूतेष्वहिंसकः ॥ २० ॥
जो पहले भगवान् सूर्यके मुखसे प्रकट हुआ था, उस वैष्णव शास्त्रोक्त विधिका आश्रय ले वे प्रथम तो देवेश्वर भगवान् नारायणका पूजन करते। फिर उनकी सेवासे बचे हुए पदार्थोंसे पितरोंका, पितरोंकी सेवासे बचे हुए पदार्थोंसे ब्राह्मणोंका तथा अन्य आश्रितजनोंका विभागपूर्वक सत्कार करते थे। सबको देनेके अनन्तर बचे हुए अन्नका भोजन करते थे, सत्यमें तत्पर रहते और किसी भी प्राणीकी हिंसा नहीं करते थे ॥ १९-२० ॥
सर्वभावेन भक्तः स देवदेवं जनार्दनम् ।
अनादिमध्यनिधनं लोककर्तारमव्ययम् ॥ २१ ॥
वे आदि, मध्य और अन्तसे रहित, अविनाशी, लोककर्ता देवदेव जनार्दनके भजनमें सम्पूर्णभावसे लगे रहते थे ॥ २१ ॥
तस्य नारायणे भक्तिं वहतोऽमित्रकर्षणः ।
एकशय्यासनं देवो दत्तवान् देवराट् स्वयम् ॥ २२ ॥
भगवान् नारायणमें भक्ति रखनेवाले उस शत्रुसूदन नरेशपर प्रसन्न हो देवराज इन्द्र उन्हें अपने साथ एक शय्या और एक आसनपर बिठाया करते थे ॥ २२ ॥
आत्मराज्यं धनं चैव कलत्रं वाहनं तथा ।
यत्तद्भागवतं सर्वमिति तत् प्रोक्षितं सदा ॥ २३ ॥
राजा उपरिचरने अपने राज्य, धन, स्त्री और वाहन आदि सब उपकरणोंको भगवान्‌की ही वस्तु समझकर सब उन्हींको समर्पित कर रखा था ॥ २३ ॥
काम्यनैमित्तिका राजन् यज्ञियाः परमक्रियाः ।
सर्वाः सात्वतमास्थाय विधिं चक्रे समाहितः ॥ २४ ॥
राजन्! वे सदा सावधान रहकर सकाम और नैमित्तिक यज्ञोंकी सम्पूर्ण क्रियाओंको वैष्णवशास्त्रोक्त विधिसे सम्पन्न किया करते थे ॥ २४ ॥
पाञ्चरात्रविदो मुख्यास्तस्य गेहे महात्मनः ।
प्रायणं भगवत्प्रोक्तं भुञ्जते वाग्रभोजनम् ॥ २५ ॥
उन महात्मा नरेशके घरमें पाञ्चरात्र शास्त्रके मुख्य-मुख्य विद्वान् सदा मौजूद रहते थे; और भगवान्‌को समर्पित किया हुआ प्रसाद अथवा भोज्य पदार्थ सबसे पहले वे ही भोजन करते थे ॥ २५ ॥
तस्य प्रशासतो राज्यं धर्मेणामित्रघातिनः ।
नानृता वाक् समभवन्मनो दुष्टं न चाभवत् ॥ २६ ॥
न च कायेन कृतवान् स पापं परमाण्वपि ।

धर्मपूर्वक राज्यका शासन करते हुए उन शत्रुघाती नरेशने न तो कभी असत्य भाषण किया और न कभी उनका मन ही बुरे विचारोंसे दूषित हुआ। अपने शरीरके द्वारा उन्होंने कभी छोटे-से-छोटा पाप भी नहीं किया था ।। २६ १/२ ।।

ये हि ते ऋषयः ख्याताः सप्त चित्रशिखण्डिनः ।। २७ ।।
तैरेकमतिभिर्भूत्वा यत् प्रोक्तं शास्त्रमुत्तमम् ।
वेदैश्चतुर्भिः समितं कृतं मेरौ महागिरौ ।। २८ ।।
आस्यैः सप्तभिरुद्गीर्णं लोकधर्ममनुत्तमम् ।
मरीचिरत्र्यङ्गिरसौ पुलस्त्यः पुलहः क्रतुः ।
वसिष्ठश्च महातेजास्ते हि चित्रशिखण्डिनः ।। २९ ।।

(अब मैं जिस प्रकार तन्त्र, स्मृति और आगमकी उत्पत्ति हुई है, उसे बताता हूँ, सुनो—) मरीचि, अत्रि, अंगिरा, पुलस्त्य, पुलह, क्रतु और महातेजस्वी वसिष्ठ—ये सात प्रसिद्ध ऋषि चित्रशिखण्डी कहलाते हैं। ये जो चित्रशिखण्डी नामसे विख्यात सात ऋषि हैं, इन्होंने महागिरि मेरुपर एकमत होकर जिस उत्तम शास्त्रका प्रवचन एवं निर्माण किया, वह चारों वेदोंके समान आदरणीय एवं प्रमाणभूत है। उसमें सात मुखोंसे प्रकट हुए उत्तम लोकधर्मकी व्याख्या हुई है ।। २७—२९ ।।

सप्त प्रकृतयो ह्येतास्तथा स्वायम्भुवोऽष्टमः ।
एताभिर्धार्यते लोकस्ताभ्यः शास्त्रं विनिःसृतम् ।। ३० ।।
एकाग्रमनसो दान्ता मुनयः संयमे रताः ।
भूतभव्यभविष्यज्ञाः सत्यधर्मपरायणाः ।। ३१ ।।

ये सातों ऋषि प्रकृतिके सात रूप हैं अर्थात् प्रजाके स्रष्टा हैं। आठवाँ ब्रह्मा है। ये सब मिलकर इस सम्पूर्ण जगत्को धारण करते हैं। इन्हींके द्वारा शास्त्रका प्राकट्य हुआ है। ये सब-के-सब ऋषि एकाग्रचित्त, जितेन्द्रिय, संयमपरायण, भूत, भविष्य और वर्तमानके ज्ञाता तथा सत्य-धर्ममें तत्पर रहनेवाले हैं ।। ३०-३१ ।।

इदं श्रेय इदं ब्रह्म इदं हितमनुत्तमम् ।
लोकान् संचिन्त्य मनसा ततः शास्त्रं प्रचक्रिरे ।। ३२ ।।

इन्होंने मन-ही-मन यह सोचकर कि अमुक साधनसे जगत्का कल्याण होगा, अमुकसे परमात्माकी प्राप्ति होगी तथा अमुक उपायसे संसारका सर्वोत्तम हितसाधन होगा, शास्त्रकी रचना की ।। ३२ ।।

तत्र धर्मार्थकामा हि मोक्षः पश्चाच्च कीर्तितः ।
मर्यादा विविधाश्चैव दिवि भूमौ च संस्थिताः ।। ३३ ।।

उसमें पहले धर्म, अर्थ, और कामका फिर मोक्षका भी वर्णन है तथा स्वर्ग एवं मर्त्यलोकमें प्रचलित नाना प्रकारकी मर्यादाओंका भी प्रतिपादन किया गया है ।। ३३ ।।

आराध्य तपसा देवं हरिं नारायणं प्रभुम् ।

दिव्यं वर्षसहस्रं वै सर्वे ते ऋषिभिः सह ।। ३४ ।।
नारायणानुशास्ता हि तदा देवी सरस्वती ।
विवेश तानृषीन् सर्वाँल्लोकानां हितकाम्यया ।। ३५ ।।
उपर्युक्त ऋषियोंने अन्य ऋषियोंके साथ एक हजार दिव्य वर्षोंतक तपस्या करके भगवान् नारायणकी आराधना की थी। उससे प्रसन्न होकर भगवान्ने सरस्वतीदेवीको उनके पास भेजा। नारायणकी आज्ञासे सम्पूर्ण लोकोंका हित करनेके लिये उस समय सरस्वती देवीने उन सम्पूर्ण ऋषियोंके भीतर प्रवेश किया था ।। ३४-३५ ।।

ततः प्रवर्तिता सम्यक् तपोविद्भिर्द्विजातिभिः ।
शब्दे चार्थे च हेतौ च एषा प्रथमसर्गजा ।। ३६ ।।
तब उन तपस्वी ब्राह्मणोंने शब्द, अर्थ और हेतुसे युक्त वाणीका प्रयोग किया। यह उनकी प्रथम रचना थी ।। ३६ ।।

आदावेव हि तच्छास्त्रमोंकारस्वरपूजितम् ।
ऋषिभिः श्रावितं यत्र तत्र कारुणिको ह्यसौ ।। ३७ ।।
उस शास्त्रके आरम्भमें ही ॐकार स्वरका प्रयोग किया गया है। ऋषियोंने सबसे पहले जहाँ उस शास्त्रको सुनाया, वहाँ वे करुणामय भगवान् विराजमान् थे ।।

ततः प्रसन्नो भगवाननिर्देश्यशरीरगः ।
ऋषीनुवाच तान् सर्वानदृश्यः पुरुषोत्तमः ।। ३८ ।।
तदनन्तर अनिर्वचनीय शरीरमें स्थित भगवान् पुरुषोत्तम प्रसन्न हो अदृश्य रहकर ही उन सब ऋषियोंसे बोले— ।। ३८ ।।

कृतं शतसहस्रं हि श्लोकानामिदमुत्तमम् ।
लोकतन्त्रस्य कृत्स्नस्य यस्माद् धर्मः प्रवर्तते ।। ३९ ।।
'मुनिवरो! तुमलोगोंने एक लाख श्लोकोंका यह उत्तम शास्त्र बनाया है। इससे सम्पूर्ण लोकतन्त्रका धर्म प्रचलित होगा ।। ३९ ।।

प्रवृत्तौ च निवृत्तौ च यस्मादेतद् भविष्यति ।
यजुर्ऋक्सामभिर्जुष्टमथर्वाङ्गिरसैस्तथा ।। ४० ।।
'प्रवृत्ति और निवृत्तिके विषयमें यह ऋक्, यजुः, साम और अथर्व वेदके मन्त्रोंसे अनुमोदित ग्रन्थके समान प्रमाणभूत होगा ।। ४० ।।

यथा प्रमाणं हि मया कृतो ब्रह्मा प्रसादतः ।
रुद्रश्च क्रोधजो विप्रा यूयं प्रकृतयस्तथा ।। ४१ ।।
सूर्याचन्द्रमसौ वायुर्भूमिरापोऽग्निरेव च ।
सर्वे च नक्षत्रगणा यच्च भूताभिशब्दितम् ।। ४२ ।।
अधिकारेषु वर्तन्ते यथास्वं ब्रह्मवादिनः ।
सर्वे प्रमाणं हि यथा तथा तच्छास्त्रमुत्तमम् ।। ४३ ।।

भविष्यति प्रमाणं वै एतन्मदनुशासनम् ।
'ब्राह्मणो! जैसे मेरे प्रसादसे उत्पन्न ब्रह्मा प्रमाणभूत हैं एवं जैसे क्रोधसे उत्पन्न रुद्र, तुम सब प्रजापति, सूर्य, चन्द्रमा, वायु, भूमि, जल, अग्नि, सम्पूर्ण नक्षत्रगण तथा अन्यान्य भूतनामधारी पदार्थ और ब्रह्मवादी ऋषिगण अपने-अपने अधिकारके अनुसार बर्ताव करते हुए प्रमाणभूत माने जाते हैं, उसी प्रकार तुमलोगोंका बनाया हुआ यह उत्तम शास्त्र भी प्रामाणिक माना जायगा, यह मेरी आज्ञा है ।। ४१-४३ १/३ ।।
तस्मात् प्रवक्ष्यते धर्मान् मनुः स्वायम्भुवः स्वयम् ।। ४४ ।।
उशना बृहस्पतिश्चैव यदोत्पन्नौ भविष्यतः ।
तदा प्रवक्ष्यतः शास्त्रं युष्मन्मतिभिरुद्धृतम् ।। ४५ ।।
'स्वायम्भुव मनु स्वयं इसी ग्रन्थके अनुसार धर्मोंका उपदेश करेंगे। शुक्राचार्य और बृहस्पति जब प्रकट होंगे तब वे भी तुम्हारी बुद्धिसे निकले हुए इस शास्त्रका प्रवचन करेंगे ।। ४४-४५ ।।
स्वायम्भुवेषु धर्मेषु शास्त्रे चौशनसे कृते ।
बृहस्पतिमते चैव लोकेषु प्रतिचारिते ।। ४६ ।।
युष्मत्कृतमिदं शास्त्रं प्रजापालो वसुस्ततः ।
बृहस्पतिसकाशाद् वै प्राप्स्यते द्विजसत्तमाः ।। ४७ ।।
'द्विजश्रेष्ठगण! स्वायम्भुव मनुके धर्मशास्त्र, शुक्राचार्यके शास्त्र तथा बृहस्पतिके मतका जब लोकमें प्रचार हो जायगा, तब प्रजापालक वसु (राजा उपरिचर) बृहस्पतिजीसे तुम्हारे बनाये हुए इस शास्त्रका अध्ययन करेगा ।। ४६-४७ ।।
स हि सद्भावितो राजा मद्भक्तश्च भविष्यति ।
तेन शास्त्रेण लोकेषु क्रियाः सर्वाः करिष्यति ।। ४८ ।।
'सत्पुरुषोंद्वारा सम्मानित वह राजा मेरा बड़ा भक्त होगा और लोकमें उसी शास्त्रके अनुसार सम्पूर्ण कार्य करेगा ।। ४८ ।।
एतद्धि युष्मच्छास्त्राणां शास्त्रमुत्तमसंज्ञितम् ।
एतदर्थ्यं च धर्म्यं च रहस्यं चैतदुत्तमम् ।। ४९ ।।
'तुम्हारा बनाया हुआ यह शास्त्र सब शास्त्रोंसे श्रेष्ठ माना जायगा। यह धर्मशास्त्र, अर्थशास्त्र एवं उत्तम रहस्यमय ग्रन्थ है ।। ४९ ।।
अस्य प्रवर्त्तनाच्चैव प्रजावन्तो भविष्यथ ।
स च राजश्रिया युक्तो भविष्यति महान् वसुः ।। ५० ।।
इसके प्रचारसे तुम सब लोग संतानवान् होओगे; अर्थात् तुम्हारी प्रजाकी वृद्धि होगी तथा राजा उपरिचर भी राजलक्ष्मीसे सम्पन्न एवं महान् पुरुष होगा ।। ५० ।।
संस्थिते तु नृपे तस्मिन् शास्त्रमेतत् सनातनम् ।
अन्तर्धास्यति तत् सर्वमेतद् वः कथितं मया ।। ५१ ।।

'उस राजाके दिवंगत होनेके बाद यह सनातन शास्त्र सर्वसाधारणकी दृष्टिसे लुप्त हो जायगा। इसके सम्बन्धमें सारी बातें मैंने तुमलोगोंको बता दीं' ॥ ५१ ॥
एतावदुक्त्वा वचनमदृश्यः पुरुषोत्तमः ।
विसृज्य तानृषीन् सर्वान् कामपि प्रसृतो दिशम् ॥ ५२ ॥
अदृश्यभावसे ऐसी बात कहकर भगवान् पुरुषोत्तम उन समस्त ऋषियोंको वहीं छोड़कर किसी अज्ञात दिशाकी ओर चल दिये ॥ ५२ ॥
ततस्ते लोकपितरः सर्वलोकार्थचिन्तकाः ।
प्रावर्तयन्त तच्छास्त्रं धर्मयोनिं सनातनम् ॥ ५३ ॥
तत्पश्चात् सम्पूर्ण लोकोंका हितचिन्तन करनेवाले उन लोकपिता प्रजापतियोंने धर्मके मूलभूत उस सनातन शास्त्रका जगत्में प्रचार किया ॥ ५३ ॥
उत्पन्नेऽङ्गिरसे चैव युगे प्रथमकल्पिते ।
साङ्गोपनिषदं शास्त्रं स्थापयित्वा बृहस्पतौ ॥ ५४ ॥
जग्मुर्यथेप्सितं देशं तपसे कृतनिश्चयाः ।
धारणाः सर्वलोकानां सर्वधर्मप्रवर्तकाः ॥ ५५ ॥
फिर आदिकल्पके प्रारम्भिक युगमें जब बृहस्पतिका प्रादुर्भाव हुआ, तब उन्होंने साङ्गोपाङ्ग वेद और उपनिषदों-सहित वह शास्त्र उनको पढ़ाया। तदनन्तर सब धर्मोंका प्रचार और समस्त लोकोंको धर्ममर्यादाके भीतर स्थापित करनेवाले वे ऋषिगण तपस्याका निश्चय करके अपने अभीष्ट स्थानको चले गये ॥ ५४-५५ ॥

इति श्रीमहाभारते शान्तिपर्वणि मोक्षधर्मपर्वणि नारायणीये
पञ्चत्रिंशदधिकत्रिशततमोऽध्यायः ॥ ३३५ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत शान्तिपर्वके अन्तर्गत मोक्षधर्मपर्वमें नारायणका महत्त्वविषयक तीन सौ पैंतीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ३३५ ॥
(दाक्षिणात्य अधिक पाठका १ श्लोक मिलाकर कुल ५६ श्लोक हैं)