महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व
Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
सज्जनोंके चरित्रके विषयमें दृष्टान्तरूपसे एक महर्षि और कुत्तेकी कथा
षोडशाधिकशततमोऽध्यायः
सज्जनोंके चरित्रके विषयमें दृष्टान्तरूपसे एक महर्षि और कुत्तेकी कथा
युधिष्ठिर उवाच
(न सन्ति कुलजा यत्र सहायाः पार्थिवस्य तु ।
अकुलीनाश्च कर्तव्या न वा भरतसत्तम ॥)
युधिष्ठिरने पूछा— भरतश्रेष्ठ! जहाँ राजाके पास अच्छे कुलमें उत्पन्न सहायक नहीं हैं, वहाँ वह नीच कुलके मनुष्योंको सहायक बना सकता है या नहीं? ।।
भीष्म उवाच
अत्राप्युदाहरन्तीममितिहासं पुरातनम् ।
निदर्शनं परं लोके सज्जानाचरिते सदा ॥ १ ॥
भीष्मजीने कहा— युधिष्ठिर! इस विषयमें जानकार लोग एक प्राचीन इतिहासका उदाहरण दिया करते हैं, जो लोकमें सत्पुरुषोंके आचरणके सम्बन्धमें सदा उत्तम आदर्श माना जाता है ॥ १ ॥
अस्यैवार्थस्य सदृशं यच्छ्रुतं मे तपोवने ।
जामदग्न्यस्य रामस्य यदुक्तमृषिसत्तमैः ॥ २ ॥
मैंने तपोवनमें इस विषयके अनुरूप बातें सुनी हैं, जिन्हें श्रेष्ठ महर्षियोंने जमदग्निनन्दन परशुरामजीसे कहा था ॥ २ ॥
वने महति कस्मिंश्चिदमनुष्यनिषेविते ।
ऋषिर्मूलफलाहारो नियतो नियतेन्द्रियः ॥ ३ ॥
किसी महान् निर्जन वनमें फल-मूलका आहार करके रहनेवाले एक नियमपरायण जितेन्द्रिय महर्षि रहते थे ॥ ३ ॥
दीक्षादमपरः शान्तः स्वाध्यायपरमः शुचिः ।
उपवासविशुद्धात्मा सततं सत्त्वमास्थितः ॥ ४ ॥
वे उत्तम व्रतकी दीक्षा लेकर इन्द्रियसंयम और मनोनिग्रह करते हुए प्रतिदिन पवित्रभावसे वेद-शास्त्रोंके स्वाध्यायमें लगे रहते थे। उपवाससे उनका अन्तःकरण शुद्ध हो गया था। वे सदा सत्त्वगुणमें स्थित थे ॥ ४ ॥
तस्य संदृश्य सद्भावमुपविष्टस्य धीमतः ।
सर्वे सत्त्वाः समीपस्था भवन्ति वनचारिणः ॥ ५ ॥
एक जगह बैठे हुए उन बुद्धिमान् महर्षिके सद्भावको देखकर सभी वनचारी जीव-जन्तु उनके निकट आया करते थे॥ ५॥
सिंहव्याघ्रगणाः क्रूरा मत्ताश्चैव महागजाः ।
द्वीपिनः खड्गभल्लूका ये चान्ये भीमदर्शनाः ॥ ६ ॥
क्रूर स्वभाववाले सिंह और व्याघ्र, बड़े-बड़े मतवाले हाथी, चीते, गैंडे, भालू तथा और भी जो भयानक दिखायी देनेवाले जानवर थे, वे सब उनके पास आते थे॥ ६॥
ते सुखप्रश्नदाः सर्वे भवन्ति क्षतजाशनाः ।
तस्यर्षेः शिष्यवच्चैव न्यग्भूताः प्रियकारिणः ॥ ७ ॥
यद्यपि वे सारे-के-सारे मांसाहारी हिंसक जानवर थे, तो भी उस ऋषिके शिष्यकी भाँति नीचे सिर किये उनके पास बैठते थे, उनके सुख और स्वास्थ्यकी बात पूछते थे और सदा उनका प्रिय करते थे॥ ७॥
दत्त्वा च ते सुखप्रश्नं सर्वे यान्ति यथागतम् ।
ग्राम्यस्त्वेकः पशुस्तत्रनाजहात् स महामुनिम् ॥ ८ ॥
वे सब जानवर ऋषिसे उनका कुशल-समाचार पूछकर जैसे आते, वैसे लौट जाते थे; परंतु एक ग्रामीण कुत्ता वहाँ उन महामुनिको छोड़कर कहीं नहीं जाता था॥ ८॥
भक्तोऽनुरक्तः सततमुपवासकृशोऽबलः ।
फलमूलोदकाहारः शान्तः शिष्टाकृतिर्यथा ॥ ९ ॥
वह उन महामुनिका भक्त और उनमें अनुरक्त था; उपवास करनेके कारण दुर्बल एवं निर्बल हो गया था। वह भी फल-मूल और जलका आहार करके रहता, मनको वशमें रखता और साधु-पुरुषोंके समान जीवन बिताता था॥ ९॥
तस्यर्षेरुपविष्टस्य पादमूले महामते ।
मनुष्यवद्गतो भावो स्नेहबद्धोऽभवद् भृशम् ॥ १० ॥
महामते! उन महर्षिके चरणप्रान्तमें बैठे हुए उस कुत्तेके मनमें मनुष्यके समान भाव (स्नेह) हो गया। वह उनके प्रति अत्यन्त स्नेहसे बँध गया॥ १०॥
ततोऽभ्यायान्महावीर्यो द्वीपी क्षतजभोजनः ।
स्वार्थमत्यन्तसंतुष्टः क्रूरकाल इवान्तकः ॥ ११ ॥
तदनन्तर एक दिन कोई महाबली रक्तभोजी चीता अत्यन्त प्रसन्न होकर उस कुत्तेको पकड़नेके लिये क्रूर काल एवं यमराजके समान उधर आ निकला॥ ११॥
लेलिह्यमानस्तृषितः पुच्छास्फोटनतत्परः ।
व्यादितास्यः क्षुधाभुग्नः प्रार्थयानस्तदामिषम् ॥ १२ ॥
वह बारंबार अपने दोनों जबड़े चाटता और पूँछ फटकारता था, उसे प्यास सता रही थी। उसने मुँह फैला रखा था। भूखसे उसकी व्याकुलता बढ़ गयी थी और वह उस कुत्तेका मांस प्राप्त करना चाहता था॥
दृष्ट्वा तं क्रूरमायान्तं जीवितार्थी नराधिप ।
प्रोवाच श्वा मुनिं तत्र तच्छृणुष्व विशाम्पते ॥ १३ ॥
प्रजानाथ! नरेश्वर! उस क्रूर चीतेको आते देख अपनी प्राणरक्षा चाहते हुए वहाँ कुत्तेने मुनिसे जो कुछ कहा, वह सुनो— ॥ १३ ॥
श्वशत्रुर्भगवन्नेष द्वीपी मां हन्तुमिच्छति ।
त्वत्प्रसादाद् भयं न स्यादस्मान्मम महामुने ॥ १४ ॥
तथा कुरु महाबाहो सर्वज्ञस्त्वं न संशयः ।
'भगवन्! यह चीता कुत्तोंका शत्रु है और मुझे मार डालना चाहता है। महामुने! महाबाहो! आप ऐसा करें, जिससे आपकी कृपासे मुझे इस चीतेसे भय न हो। आप सर्वज्ञ हैं, इसमें संशय नहीं है। (अतः मेरी प्रार्थना सुनकर उसको अवश्य पूर्ण करें)' ॥ १४ १/२ ॥
स मुनिस्तस्य विज्ञाय भावज्ञो भयकारणम् ।
रुतज्ञः सर्वसत्त्वानां तमैश्वर्यसमन्वितः ॥ १५ ॥
वे सिद्धिके ऐश्वर्यसे सम्पन्न मुनि सबके मनोभावको जाननेवाले और समस्त प्राणियोंकी बोली समझनेवाले थे। उन्होंने उस कुत्तेके भयका कारण जानकर उससे कहा ॥ १५ ॥
मुनिरुवाच
न भयं द्वीपिनः कार्यं मृत्युतस्ते कथंचन ।
एष श्वरूपरहितो द्वीपी भवसि पुत्रक ॥ १६ ॥
**मुनिने कहा—**बेटा! अपने लिये मृत्युस्वरूप इस चीतेसे तुम्हें किसी प्रकार भय नहीं करना चाहिये। यह लो, तुम अभी कुत्तेके रूपसे रहित चीता हुए जाते हो ॥ १६ ॥
ततः श्वा द्वीपितां नीतो जाम्बूनदनिभाकृतिः ।
चित्राङ्गो विस्फुरद्दंष्ट्रो वने वसति निर्भयः ॥ १७ ॥
तदनन्तर मुनिने कुत्तेको चीता बना दिया। उसकी आकृति सुवर्णके समान चमकने लगी। उसका सारा शरीर चितकबरा हो गया और बड़ी-बड़ी दाढ़ें चमक उठीं। अब वह निर्भय होकर वनमें रहने लगा ॥ १७ ॥
तं दृष्ट्वा सम्मुखे द्वीपी आत्मनः सदृशं पशुम् ।
अविरुद्धस्ततस्तस्य क्षणेन समपद्यत ॥ १८ ॥
चीतेने अपने सामने जब अपने ही समान एक पशुको देखा, तब उसका विरोधी भाव क्षणभरमें दूर हो गया ॥ १८ ॥
ततोऽभ्ययान्महारौद्रो व्यादितास्यः क्षुधान्वितः ।
द्वीपिनं लेलिहद्वक्त्रो व्याघ्रो रुधिरलालसः ॥ १९ ॥
तदनन्तर एक दिन एक महाभयंकर भूखे बाघने उसका रक्त पीनेकी इच्छासे मुँह फैलाकर दोनों जबड़ोंको चाटते हुए उस चीतेका पीछा किया ॥ १९ ॥
व्याघ्रं दृष्ट्वा क्षुधाभुग्नं दंष्ट्रिणं वनगोचरम् ।
द्वीपी जीवितरक्षार्थमृषिं शरणमेयिवान् ॥ २० ॥
बड़ी-बड़ी दाढ़ोंसे युक्त वनचारी बाघको भूखसे कुटिल भाव धारण किये देख वह चीता अपने जीवनकी रक्षाके लिये पुनः ऋषिकी शरणमें आया ॥ २० ॥
संवासजं परं स्नेहमृषिणा कुर्वता तदा ।
स द्वीपी व्याघ्रतां नीतो रिपूणां बलवत्तरः ॥ २१ ॥
तब सहवासजनित उत्तम स्नेहका निर्वाह करते हुए महर्षिने चीतेको बाघ बना दिया। अब वह अपने शत्रुओंके लिये अत्यन्त प्रबल हो उठा ॥ २१ ॥
ततो दृष्ट्वा स शार्दूलो नाहनत् तं विशाम्पते ।
स तु श्वा व्याघ्रतां प्राप्य बलवान् पिशिताशनः ॥ २२ ॥
प्रजानाथ! तदनन्तर वह बाघ उसे अपने समान रूपमें देखकर मार न सका। उधर वह कुत्ता बलवान् बाघ होकर मांसका आहार करने लगा ॥ २२ ॥
न मूलफलभोगेषु स्पृहामप्यकरोत् तदा ।
यथा मृगपतिर्नित्यं प्रकाङ्क्षति वनौकसः ।
तथैव स महाराज व्याघ्रः समभवत् तदा ॥ २३ ॥
महाराज! अब तो उसे फल-मूल खानेकी कभी इच्छा ही नहीं होती थी। जैसे वनराज सिंह प्रतिदिन जन्तुओंका मांस खाना चाहता है, उसी प्रकार वह बाघ भी उस समय मांसभोजी हो गया ॥ २३ ॥
इति श्रीमहाभारते शान्तिपर्वणि राजधर्मानुशासनपर्वणि श्वर्षिसंवादे षोडशाधिकशततमोऽध्यायः ॥ ११६ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत शान्तिपर्वके अन्तर्गत राजधर्मानुशासनपर्वमें कुत्ता और ऋषिका संवादविषयक एक सौ सोलहवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ११६ ॥
(दाक्षिणात्य अधिक पाठका १ श्लोक मिलाकर कुल २४ श्लोक हैं)