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महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,450 पृष्ठ

यज्ञमें आहुतिके लिये अजका अर्थ अन्न है, बकरा नहीं—इस बातको जानते हुए भी पक्षपात करनेके कारण राजा उपरिचरके अधःपतनकी और भगवत्कृपासे उनके पुनरुत्थानकी कथ

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सप्तत्रिंशदधिकत्रिशततमोऽध्यायः

यज्ञमें आहुतिके लिये अजका अर्थ अन्न है, बकरा नहीं—इस बातको जानते हुए भी पक्षपात करनेके कारण राजा उपरिचरके अधःपतनकी और भगवत्कृपासे उनके पुनरुत्थानकी कथा

युधिष्ठिर उवाच

यदा भागवतोऽत्यर्थमासीद् राजा महान् वसुः ।
किमर्थं स परिभ्रष्टो विवेश विवरं भुवः ॥ १ ॥
युधिष्ठिरने पूछा— पितामह! राजा वसु जब भगवान्‌के अत्यन्त भक्त और महान् पुरुष थे, तब वे स्वर्गसे भ्रष्ट होकर पातालमें कैसे प्रविष्ट हुए? ॥ १ ॥

भीष्म उवाच

अत्राप्युदाहरन्तीममितिहासं पुरातनम् ।
ऋषीणां चैव संवादं त्रिदशानां च भारत ॥ २ ॥
भीष्मजीने कहा— भरतनन्दन! इस विषयमें ज्ञानीजन ऋषियों और देवताओंके संवादरूप इस प्राचीन इतिहासको उद्धृत किया करते हैं— ॥ २ ॥
अजेन यष्टव्यमिति प्राहुर्देवा द्विजोत्तमान् ।
स च छागोऽप्यजो ज्ञेयो नान्यः पशुरिति स्थितिः ॥ ३ ॥
‘अजके द्वारा यज्ञ करना चाहिये—ऐसा विधान है।' ऐसा कहकर देवताओंने वहाँ आये हुए सभी श्रेष्ठ ब्रह्मर्षियोंसे कहा, 'यहाँ अजका अर्थ बकरा समझना चाहिये, दूसरा पशु नहीं, ऐसा निश्चय है' ॥ ३ ॥

ऋषय ऊचुः

बीजैर्यज्ञेषु यष्टव्यमिति वै वैदिकी श्रुतिः ।
अजसंज्ञानि बीजानि छागं नो हन्तुमर्हथ ॥ ४ ॥
ऋषियोंने कहा— देवताओ! यज्ञोंमें बीजोंद्वारा यजन करना चाहिये, ऐसी वैदिकी श्रुति है। बीजोंका ही नाम अज है; अतः बकरेका वध करना हमें उचित नहीं है ॥ ४ ॥
नैष धर्मः सतां देवा यत्र वध्येत वै पशुः ।
इदं कृतयुगं श्रेष्ठं कथं वध्येत वै पशुः ॥ ५ ॥
देवताओ! जहाँ कहीं भी यज्ञमें पशुका वध हो, वह सत्पुरुषोंका धर्म नहीं है। यह श्रेष्ठ सत्ययुग चल रहा है। इसमें पशुका वध कैसे किया जा सकता है? ॥

भीष्म उवाच

तेषां संवदतामेवमृषीणां विबुधैः सह ।
मार्गगतो नृपश्रेष्ठस्तं देशं प्राप्तवान् वसुः ॥ ६ ॥
भीष्मजी कहते हैं— राजन्! इस प्रकार जब ऋषियोंका देवताओंके साथ संवाद चल रहा था, उसी समय नृपश्रेष्ठ वसु भी उस मार्गसे आ निकले और उस स्थानपर पहुँच गये ॥ ६ ॥

अन्तरिक्षचरः श्रीमान् समग्रबलवाहनः ।
तं दृष्ट्वा सहसाऽऽयान्तं वसुं ते त्वन्तरिक्षगम् ॥ ७ ॥
ऊचुर्द्विजातयो देवानेष च्छेत्स्यति संशयम् ।
यज्वा दानपतिः श्रेष्ठः सर्वभूतहितप्रियः ॥ ८ ॥
श्रीमान् राजा उपरिचर अपनी सेना और वाहनोंके साथ आकाशमार्गसे चलते थे। उन अन्तरिक्षचारी वसुको सहसा आते देख ब्रह्मर्षियोंने देवताओंसे कहा—'ये नरेश हमलोगोंका संदेह दूर कर देंगे; क्योंकि ये यज्ञ करनेवाले, दानपति, श्रेष्ठ तथा सम्पूर्ण भूतोंके हितैषी एवं प्रिय हैं ॥ ७-८ ॥

कथंस्विदन्यथा ब्रूयादेष वाक्यं महान् वसुः ।
एवं ते संविदं कृत्वा विबुधा ऋषयस्तथा ॥ ९ ॥
अपृच्छन् सहिताभ्येत्य वसुं राजानमन्तिकात् ।
'ये महान् पुरुष वसु शास्त्रके विपरीत वचन कैसे कह सकते हैं।' ऐसी सम्मति करके देवताओं और ऋषियोंने एक साथ राजा वसुके पास आकर अपना प्रश्न उपस्थित किया— ॥ ९ १/२ ॥

भो राजन् केन यष्टव्यमजेनाहोस्विदौषधैः ॥ १० ॥
एतन्नः संशयं छिन्धि प्रमाणं नो भवान् मतः ।
'राजन्! किसके द्वारा यज्ञ करना चाहिये? बकरेके द्वारा अथवा अन्नद्वारा? हमारे इस संदेहका आप निवारण करें। हमलोगोंकी रायमें आप ही प्रामाणिक व्यक्ति हैं' ॥ १० १/२ ॥

स तान् कृताञ्जलिर्भूत्वा परिपप्रच्छ वै वसुः ॥ ११ ॥
कस्य वै को मतः कामो ब्रूत सत्यं द्विजोत्तमाः ।
तब राजा वसुने हाथ जोड़कर उन सबसे पूछा—'विप्रवरो! आपलोग सच-सच बताइये, आपलोगोंमेंसे किस पक्षको कौन-सा मत अभीष्ट है? कौन अजका अर्थ बकरा मानता है और कौन अन्न?' ॥ ११ १/२ ॥

ऋषय ऊचुः

धान्यैर्यष्टव्यमित्येव पक्षोऽस्माकं नराधिप ॥ १२ ॥
देवानां तु पशुः पक्षो मतो राजन् वदस्व नः ।

ऋषि बोले—नरेश्वर! हमलोगोंका पक्ष यह है कि अन्नसे यज्ञ करना चाहिये तथा देवताओंका पक्ष यह है कि छाग नामक पशुके द्वारा यज्ञ होना चाहिये। राजन्! अब आप हमें अपना निर्णय बताइये॥ १२१/३॥

भीष्म उवाच

देवानां तु मतं ज्ञात्वा वसुना पक्षसंश्रयात् ॥ १३॥
छागेनाजेन यष्टव्यमेवमुक्तं वचस्तदा ।
भीष्मजी कहते हैं—राजन्! देवताओंका मत जानकर राजा वसुने उन्हींका पक्ष लेकर कह दिया कि अजका अर्थ है, छाग (बकरा); अतः उसीके द्वारा यज्ञ करना चाहिये॥ १३१/३॥

कुपितास्ते ततः सर्वे मुनयः सूर्यवर्चसः ॥ १४॥
ऊचुर्वसुं विमानस्थं देवपक्षार्थवादिनम् ।
यह सुनकर वे सभी सूर्यके समान तेजस्वी ऋषि कुपित हो उठे और विमानपर बैठकर देवपक्षकी बात कहनेवाले वसुसे बोले—॥ १४१/३॥

सुरपक्षो गृहीतस्ते यस्मात् तस्माद् दिवः पत ॥ १५॥
अद्यप्रभृति ते राजन्नाकाशे विहता गतिः ।
अस्मच्छापाभिघातेन महीं भित्त्वा प्रवेक्ष्यसि ॥ १६॥
‘राजन्! तुमने यह जानकर भी कि अजका अर्थ अन्न है, देवताओंका पक्ष लिया है; इसलिये स्वर्गसे नीचे गिर जाओ। आजसे तुम्हारी आकाशमें विचरनेकी शक्ति नष्ट हो गयी। हमारे शापके आघातसे तुम पृथ्‍वीको भेदकर पातालमें प्रवेश करोगे॥ १५-१६॥

(विरुद्धं वेदसूत्राणामुक्तं यदि भवेन्नृप ।
वयं विरुद्धवचना यदि तत्र पतामहे ॥)
‘नरेश्वर! तुमने यदि वेद और सूत्रोंके विरुद्ध कहा हो तो हमारा यह शाप अवश्य लागू हो और यदि हम शास्त्रविरुद्ध वचन कहते हों तो हमारा पतन हो जाय’॥

ततस्तस्मिन् मुहूर्तेऽथ राजोपरिचरस्तदा ।
अधो वै सम्बभूवाशु भूमेर्विवरगो नृप ॥ १७॥
राजन्! ऋषियोंके इतना कहते ही उसी क्षण राजा उपरिचर आकाशसे नीचे आ गये और तत्काल पृथ्‍वीके विवरमें प्रवेश कर गये॥ १७॥

स्मृतिस्त्वेनं न हि जहौ तदा नारायणाज्ञया ।
देवास्तु सहिताः सर्वे वसोः शापविमोक्षणम् ॥ १८॥
चिन्तयामासुर्व्यग्राः सुकृतं हि नृपस्य तत् ।
अनेनास्मत्कृते राज्ञा शापः प्राप्तो महात्मना ॥ १९॥

उस समय भी भगवान् नारायणकी आज्ञासे उनकी स्मरणशक्ति उन्हें छोड़ न सकी। इधर सब देवता एकत्र होकर राजाको शापसे छुटकारा दिलानेका उपाय सोचने लगे। वे शान्तभावसे परस्पर बोले—‘राजाने तो पुण्य-ही-पुण्य किया है। उन महात्मा नरेशको हमारे कारणसे ही यह शाप प्राप्त हुआ है ।। १८-१९ ।।

अस्य प्रतिप्रियं कार्यं सहितैर्नो दिवौकसः ।
इति बुद्ध्या व्यवस्याशु गत्वा निश्चयमीश्वराः ॥ २० ॥
ऊचुः संहृष्टमनसो राजोपरिचरं तदा ।
‘देवताओ! हमलोगोंको एक साथ होकर उनका अतिशय प्रिय करना चाहिये।' अपनी बुद्धिके द्वारा ऐसा निश्चय करके वे सभी देवता राजा उपरिचर वसुके पास जाकर प्रसन्नचित्त हो बोले— ।। २० १/२ ।।

ब्रह्मण्यदेवभक्तस्त्वं सुरासुरगुरुर्हरिः ॥ २१ ॥
कामं स तव तुष्टात्मा कुर्याच्छापविमोक्षणम् ।
‘राजन्! तुम ब्रह्मण्यदेव भगवान् विष्णुके भक्त हो और वे श्रीहरि देवता तथा असुर सबके गुरु हैं। उनका मन तुमपर संतुष्ट है; इसलिये वे तुम्हारी इच्छाके अनुसार तुम्हें अवश्य शापसे मुक्त कर देंगे ।। २१ १/२ ।।

मानना तु द्विजातीनां कर्तव्या वै महात्मनाम् ॥ २२ ॥
अवश्यं तपसा तेषां फलितव्यं नृपोत्तम ।
यतस्त्वं सहसा भ्रष्ट आकाशान्मेदिनीतलम् ॥ २३ ॥
‘नृपश्रेष्ठ! तुम्हें महात्मा ब्राह्मणोंका सदा ही समादर करना चाहिये। अवश्य ही यह उनकी तपस्याका फल है; जिससे तुम आकाशसे सहसा भ्रष्ट होकर पातालमें चले आये हो ।। २२-२३ ।।

एकं त्वनुग्रहं तुभ्यं दद्मो वै नृपसत्तम ।
यावत् त्वं शापदोषेण कालमासिष्यसेऽनघ ॥ २४ ॥
भूमेर्विवरगो भूत्वा तावत् त्वं कालमाप्स्यसि ।
यज्ञेषु सुहुतां विप्रैर्वसोधारां समाहितैः ॥ २५ ॥
‘निष्पाप नृपशिरोमणे! हम तुम्हें अपना एक अनुग्रह प्रदान करते हैं। तुम शापदोषके कारण जबतक-जितने समयतक पृथ्वीके विवरमें रहोगे, तबतक एकाग्रचित्त ब्राह्मणोंद्वारा यज्ञोंमें दी हुई वसुधाराकी आहुति तुम्हें प्राप्त होती रहेगी ।। २४-२५ ।।

प्राप्स्यसेऽस्मदनुध्यानान्मा च त्वां ग्लानिरस्पृशत् ।
न क्षुत्पिपासे राजेन्द्र भूमेश्छिद्रे भविष्यतः ॥ २६ ॥
वसोधाराभिपीतत्वात् तेजसाऽऽप्यायितेन च ।
स देवोऽस्मद्वरात् प्रीतो ब्रह्मलोकं हि नेष्यति ॥ २७ ॥

'राजेन्द्र! हमारे चिन्तनसे तुम्हें वसुधाराकी प्राप्ति होगी, जिससे ग्लानि तुम्हारा स्पर्श नहीं कर सकेगी और इस पातालमें रहते हुए भी तुम्हें भूख और प्यासका कष्ट नहीं होगा; क्योंकि वसुधाराका पान करनेसे तुम्हारे तेजकी वृद्धि होती रहेगी। हमारे वरदानसे भगवान् श्रीहरि प्रसन्न हो तुम्हें ब्रह्मलोकमें ले जायँगे'॥
एवं दत्त्वा वरं राज्ञे सर्वे ते च दिवौकसः ।
गताः स्वभवनं देवा ऋषयश्च तपोधनाः ॥ २८ ॥
इस प्रकार राजाको वरदान देकर वे सब देवता तथा तपोधन ऋषि अपने-अपने स्थानको चले गये ॥ २८ ॥
चक्रे वसुस्ततः पूजां विष्वक्सेनाय भारत ।
जप्यं जगौ च सततं नारायणमुखोद्गतम् ॥ २९ ॥
भारत! तदनन्तर वसुने भगवान् विष्वक्सेनकी पूजा आरम्भ की और भगवान् नारायणके मुखसे प्रकट हुए जपनीय मन्त्र (ॐ नमो नारायणाय) का निरन्तर जप करने लगे ॥ २९ ॥
तत्रापि पञ्चभिर्यज्ञैः पञ्चकालानरिंदम ।
अयजद्धरिं सुरपतिं भूमेर्विवरगोऽपि सन् ॥ ३० ॥
शत्रुदमन युधिष्ठिर! वहाँ पातालके विवरमें रहते हुए भी राजा उपरिचर पाँच समय पाँच यज्ञोंद्वारा देवेश्वर श्रीहरिकी आराधना करते थे ॥ ३० ॥
ततोऽस्य तुष्टो भगवान् भक्त्या नारायणो हरिः ।
अनन्यभक्तस्य सततस्तत्परस्य जितात्मनः ॥ ३१ ॥
उन्होंने अपने मनको जीत लिया था और वे सदा भगवान्‌के भजनमें ही लगे रहते थे। अपने उस अनन्य भक्तकी भक्तिसे भगवान् श्रीनारायण हरि बहुत संतुष्ट हुए ॥ ३१ ॥
वरदो भगवान् विष्णुः समीपस्थं द्विजोत्तमम् ।
गरुत्मन्तं महावेगमाबभाषेप्सितं तदा ॥ ३२ ॥
फिर उन वरदायक भगवान् विष्णुने अपने पास ही खड़े हुए महान् वेगशाली पक्षिराज गरुड़से अपनी अभीष्ट बात इस प्रकार कही— ॥ ३२ ॥
द्विजोत्तम महाभाग पश्यतां वचनान्मम ।
सम्राड् राजा वसुर्नाम धर्मात्मा संशितव्रतः ॥ ३३ ॥
'महाभाग पक्षिप्रवर! तुम मेरी आज्ञासे कठोर व्रतका पालन करनेवाले धर्मात्मा सम्राट् राजा वसुके पास जाकर उन्हें देखो ॥ ३३ ॥
ब्राह्मणानां प्रकोपेन प्रविष्टो वसुधातलम् ।
मानितास्ते तु विप्रेन्द्रास्त्वं तु गच्छ द्विजोत्तम ॥ ३४ ॥
'पक्षिराज! वे ब्राह्मणोंके कोपसे पातालमें प्रविष्ट हुए हैं। फिर भी उन्होंने श्रेष्ठ ब्राह्मणोंका सदा सम्मान ही किया है; अतः तुम उनके पास जाओ ॥ ३४ ॥

भूमेर्विवरसंगुप्तं गरुडेह ममाज्ञया ।
अधश्चरं नृपश्रेष्ठं खेचरं कुरु मा चिरम् ॥ ३५ ॥
‘गरुड! पृथ्वीके विवरमें सुरक्षितरूपसे रहनेवाले इन पातालचारी नृपश्रेष्ठ वसुको तुम मेरी आज्ञासे शीघ्र ही आकाशचारी बना दो’ ॥ ३५ ॥

गरुत्मानथ विक्षिप्य पक्षौ मारुतवेगवान् ।
विवेश विवरं भूमेर्यत्रास्ते पार्थिवो वसुः ॥ ३६ ॥
यह आज्ञा पाकर वायुके समान वेगशाली गरुड अपने दोनों पंख फैलाकर उड़े और पातालमें जहाँ राजा वसु विराजमान थे, घुस गये ॥ ३६ ॥

तत एनं समुत्क्षिप्य सहसा विनतासुतः ।
उत्पपात नभस्तूर्णं तत्र चैनममुञ्चत ॥ ३७ ॥
विनतानन्दन गरुड सहसा राजाको वहाँसे ऊपर उठाकर तुरंत आकाशमें ले उड़े और वहीं इन्हें छोड़ दिया ॥ ३७ ॥

अस्मिन् मुहूर्ते संजज्ञे राजोपरिचरः पुनः ।
सशरीरो गतश्चैव ब्रह्मलोकं नृपोत्तमः ॥ ३८ ॥
उसी क्षण राजा वसु पुनः उपरिचर हो गये। फिर वे नृपश्रेष्ठ सशरीर ब्रह्मलोकमें चले गये ॥ ३८ ॥

एवं तेनापि कौन्तेय वाग्दोषाद् देवताज्ञया ।
प्राप्ता गतिरधस्तात् तु द्विजशापान्महात्मना ॥ ३९ ॥
कुन्तीनन्दन! इस प्रकार उस महामनस्वी नरेशने भी देवताओंकी आज्ञासे वाचिक अपराध करनेके कारण ब्राह्मणोंके शापसे अधोगति प्राप्त की थी ॥ ३९ ॥

केवलं पुरुषस्तेन सेवितो हरीरीश्वरः ।
ततः शीघ्रं जहौ शापं ब्रह्मलोकमवाप च ॥ ४० ॥
फिर उन्होंने केवल पुरुषप्रवर भगवान् श्रीहरिका सेवन किया, जिससे वे उस शापसे शीघ्र ही छूट गये और ब्रह्मलोकमें जा पहुँचे ॥ ४० ॥

भीष्म उवाच

एतत् ते सर्वमाख्यातं सम्भूता मानवा यथा ।
नारदोऽपि यथा श्वेतं द्वीपं स गतवानृषिः ।
तत् ते सर्वं प्रवक्ष्यामि शृणुष्वैकमना नृप ॥ ४१ ॥
भीष्मजी कहते हैं—युधिष्ठिर! श्वेतद्वीपके निवासी पुरुष जैसे हैं, उनकी सारी स्थिति मैंने तुमसे कह सुनायी। अब देवर्षि नारद जिस प्रकार श्वेतद्वीपमें गये, वह सब प्रसंग तुमसे कहूँगा। तुम एकचित्त होकर सुनो ॥

इति श्रीमहाभारते शान्तिपर्वणि मोक्षधर्मपर्वणि नारायणीये
सप्तत्रिंशदधिकत्रिशततमोऽध्यायः ॥ ३३७ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत शान्तिपर्वके अन्तर्गत मोक्षधर्मपर्वमें नारायणकी महिमाका
वर्णनविषयक तीन सौ सैंतीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ३३७ ॥
(दाक्षिणात्य अधिक पाठका १ श्लोक मिलाकर कुल ४२ श्लोक हैं)