महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व
Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
अध्याय (पृष्ठ 216)
एकत्रिंशोऽध्यायः
सुवर्णष्ठीवीके जन्म, मृत्यु और पुनर्जीवनका वृत्तान्त
वैशम्पायन उवाच
ततो राजा पाण्डुसुतो नारदं प्रत्यभाषत ।
भगवञ्छ्रोतुमिच्छामि सुवर्णष्ठीविसम्भवम् ॥ १ ॥
**वैशम्पायनजी कहते हैं—**जनमेजय! तदनन्तर पाण्डुपुत्र राजा युधिष्ठिरने नारदजीसे कहा—'भगवन्! मैं सुवर्णष्ठीवीके जन्मका वृत्तान्त सुनना चाहता हूँ' ॥ १ ॥
एवमुक्तस्तु स मुनिर्धर्मराजेन नारदः ।
आचचक्षे यथावृत्तं सुवर्णष्ठीविनं प्रति ॥ २ ॥
धर्मराजके ऐसा कहनेपर नारदमुनिने सुवर्णष्ठीवीके जन्मका यथावत् वृत्तान्त कहना आरम्भ किया ॥ २ ॥
नारद उवाच
एवमेतन्महाबाहो यथायं केशवोऽब्रवीत् ।
कार्यस्यास्य तु यच्छेषं तत् ते वक्ष्यामि पृच्छतः ॥ ३ ॥
**नारदजी बोले—**महाबाहो! भगवान् श्रीकृष्णने इस विषयमें जैसा कहा है, वह सब सत्य है। इस प्रसङ्गमें जो कुछ शेष है, वह तुम्हारे प्रश्नके अनुसार मैं बता रहा हूँ ॥ ३ ॥
अहं च पर्वतश्चैव स्वस्रीयो मे महामुनिः ।
वस्तुकामावभिगतौ सृञ्जयं जयतां वरम् ॥ ४ ॥
मैं और मेरे भानजे महामुनि पर्वत दोनों विजयी वीरोंमें श्रेष्ठ राजा सृंजयके यहाँ निवास करनेके लिये गये ॥
तत्रावां पूजितौ तेन विधिदृष्टेन कर्मणा ।
सर्वकामैः सुविहितौ निवसावोऽस्य वेश्मनि ॥ ५ ॥
वहाँ राजाने हम दोनोंका शास्त्रीय विधिके अनुसार पूजन किया और हमारे लिये सभी मनोवाञ्छित वस्तुओंके प्राप्त होनेकी सुव्यवस्था कर दी। हम दोनों उनके महलमें रहने लगे ॥ ५ ॥
व्यतिक्रान्तासु वर्षासु समये गमनस्य च ।
पर्वतो मामुवाचेदं काले वचनमर्थवत् ॥ ६ ॥
जब वर्षाके चार महीने बीत गये और हमलोगोंके वहाँसे चलनेका समय आया, तब पर्वतने मुझसे समयोचित एवं सार्थक वचन कहा— ॥ ६ ॥
आवामस्य नरेन्द्रस्य गृहे परमपूजितौ ।
उषितौ समये ब्रह्मंस्तद् विचिन्तय साम्प्रतम् ॥ ७ ॥
'मामा! हमलोग राजा सृंजयके घरमें बड़े आदर-सत्कारके साथ रहे हैं, अतः ब्रह्मन्! इस समय इनका कुछ उपकार करनेकी बात सोचिये' ॥ ७ ॥
ततोऽहमब्रुवं राजन् पर्वतं शुभदर्शनम् ।
सर्वमेतत् त्वयि विभो भागिनेयोपपद्यते ॥ ८ ॥
राजन्! तब मैंने शुभदर्शी पर्वत मुनिसे कहा—'भगिनीपुत्र! यह सब तुम्हें ही शोभा देता है ॥ ८ ॥
वरेण च्छन्द्यतां राजा लभतां यद् यदिच्छति ।
आवयोस्तपसा सिद्धिं प्राप्नोतु यदि मन्यसे ॥ ९ ॥
'राजाको मनोवाञ्छित वर देकर संतुष्ट करो। वे जो-जो चाहते हैं, वह सब उन्हें मिले। तुम्हारी राय हो तो हम दोनोंकी तपस्यासे उनके मनोरथकी सिद्धि हो' ॥
तत आहूय राजानं संजयं जयतां वरम् ।
पर्वतोऽनुमतो वाक्यमुवाच कुरुपुङ्गव ॥ १० ॥
कुरुश्रेष्ठ! तब मेरी अनुमति ले पर्वतने विजयी वीरोंमें श्रेष्ठ राजा सृंजयको बुलाकर कहा— ॥ १० ॥
प्रीतौ स्वो नृप सत्कारैर्भवदार्जवसम्भृतैः ।
आवाभ्यामभ्यनुज्ञातो वरं नृवर चिन्तय ॥ ११ ॥
'नरेश्वर! हम दोनों तुम्हारे द्वारा सरलतापूर्वक किये गये सत्कारसे बहुत प्रसन्न हैं। हम तुम्हें आज्ञा देते हैं कि तुम इच्छानुसार कोई वर सोचकर माँग लो ॥ ११ ॥
देवानांमविहिंसायां न भवेन्मानुषक्षयम् ।
तद् गृहाण महाराज पूजार्हो नौ मतो भवान् ॥ १२ ॥
महाराज! कोई ऐसा वर माँग लो, जिससे न तो देवताओंकी हिंसा हो और न मनुष्योंका संहार ही हो सके। तुम हमारी दृष्टिमें आदरके योग्य हो' ॥ १२ ॥
संजय उवाच
प्रीतौ भवन्तौ यदि मे कृतमेतावता मम ।
एष एव परो लाभो निर्वृत्तौ मे महाफलः ॥ १३ ॥
**संजयने कहा—**ब्रह्मन्! यदि आप दोनों प्रसन्न हैं तो मैं इतनेसे ही कृतकृत्य हो गया। यही हमारे लिये महान् फलदायक परम लाभ सिद्ध हो गया ॥ १३ ॥
तमेवंवादिनं भूयः पर्वतः प्रत्यभाषत ।
वृणीष्व राजन् संकल्पं यत् ते हृदि चिरं स्थितम् ॥ १४ ॥
राजन्! ऐसी बात कहनेवाले राजा सृंजयसे पर्वतमुनिने फिर कहा—'राजन्! तुम्हारे हृदयमें जो चिरकालसे संकल्प हो, वही माँग लो' ॥ १४ ॥
संजय उवाच
अभीप्सामि सुतं वीरं वीरवन्तं दृढव्रतम् ।
आयुष्मन्तं महाभागं देवराजसमद्युतिम् ॥ १५ ॥
संजय बोले— भगवन्! मैं एक ऐसा पुत्र पाना चाहता हूँ, जो वीर, बलवान्, दृढ़तापूर्वक उत्तम व्रतका पालन करनेवाला, आयुष्मान्, परम सौभाग्यशाली और देवराज इन्द्रके समान तेजस्वी हो ॥ १५ ॥
पर्वत उवाच
भविष्यत्येष ते कामो न त्वायुष्मान् भविष्यति ।
देवराजाभिभूत्यर्थं संकल्पो ह्येष ते हृदि ॥ १६ ॥
पर्वतने कहा— राजन्! तुम्हारा यह मनोरथ पूर्ण होगा, परंतु वह पुत्र दीर्घायु नहीं हो सकेगा; क्योंकि देवराज इन्द्रको पराजित करनेके लिये तुम्हारे हृदयमें यह संकल्प उठा है ॥ १६ ॥
ख्यातः सुवर्णष्ठीवीति पुत्रस्तव भविष्यति ।
रक्ष्यश्च देवराजात् स देवराजसमद्युतिः ॥ १७ ॥
तुम्हारा वह पुत्र सुवर्णष्ठीवीके नामसे विख्यात तथा देवराज इन्द्रके समान तेजस्वी होगा। तुम्हें देवराजसे सदा उसकी रक्षा करनी चाहिये ॥ १७ ॥
तच्छ्रुत्वा संजयो वाक्यं पर्वतस्य महात्मनः ।
प्रसादयामास तदा नैतदेवं भवेदिति ॥ १८ ॥
आयुष्मान् मे भवेत् पुत्रो भवतस्तपसा मुने ।
न च तं पर्वतः किंचिदुवाचेन्द्रव्यपेक्षया ॥ १९ ॥
महात्मा पर्वतका यह वचन सुनकर संजयने उन्हें प्रसन्न करनेकी चेष्टा करते हुए कहा—‘ऐसा न हो। मुने! आपकी तपस्यासे मेरा पुत्र दीर्घजीवी होना चाहिये।’ परंतु इन्द्रका ख्याल करके पर्वत मुनि कुछ नहीं बोले ॥ १८-१९ ॥
तमहं नृपतिं दीनमब्रुवं पुनरेव च ।
स्मर्त्तव्योऽस्मि महाराज दर्शयिष्यामि ते सुतम् ॥ २० ॥
अहं ते दयितं पुत्रं प्रेतराजवशं गतम् ।
पुनर्दास्यामि तद्रूपं मा शुचः पृथिवीपते ॥ २१ ॥
तब मैंने दीन हुए उस नरेशसे कहा—‘महाराज! संकटके समय मुझे याद करना। मैं तुम्हारे पुत्रको तुमसे मिला दूँगा। पृथ्वीनाथ! चिन्ता न करो। यमराजके वशमें पड़े हुए तुम्हारे उस प्रिय पुत्रको मैं पुनः उस रूपमें लाकर तुम्हें दे दूँगा’ ॥ २०-२१ ॥
एवमुक्त्वा तु नृपतिं प्रयातौ स्वो यथेप्सितम् ।
संजयश्च यथाकामं प्रविवेश स्वमन्दिरम् ॥ २२ ॥
राजासे ऐसा कहकर हम दोनों अपने अभीष्ट स्थानको चल दिये और राजा सृंजयने अपने इच्छानुसार महलमें प्रवेश किया ॥ २२ ॥
संजयस्याथ राजर्षेः कस्मिंश्चित् कालपर्यये ।
जज्ञे पुत्रो महावीर्यस्तेजसा प्रज्वलन्निव ॥ २३ ॥
तदनन्तर किसी समय राजर्षि सृंजयके एक पुत्र हुआ, जो अपने तेजसे प्रज्वलित-सा हो रहा था। वह महान् बलशाली था ॥ २३ ॥
ववृधे स यथाकालं सरसीव महोत्पलम् ।
बभूव काञ्चनष्ठीवी यथार्थं नाम तस्य तत् ॥ २४ ॥
जैसे सरोवरमें कमल बढ़ता है, उसी प्रकार वह राजकुमार यथासमय बढ़ने लगा। वह मुखसे स्वर्ण उगलनेके कारण सुवर्णष्ठीवी नामसे प्रसिद्ध हुआ। उसका वह नाम सार्थक था ॥ २४ ॥
तदद्भुततमं लोके पप्रथे कुरुसत्तम ।
बुबुधे तच्च देवेन्द्रो वरदानं महर्षितः ॥ २५ ॥
कुरुश्रेष्ठ! उसका वह अत्यन्त अद्भुत वृत्तान्त सारे जगत्में फैल गया। देवराज इन्द्रको भी यह मालूम हो गया कि वह बालक महर्षि पर्वतके वरदानका फल है ॥
ततः स्वाभिभवाद् भीतो बृहस्पतिमते स्थितः ।
कुमारस्यान्तरप्रेक्षी बभूव बलवृत्रहा ॥ २६ ॥
तदनन्तर अपनी पराजयसे डरकर बृहस्पतिकी सम्मतिके अनुसार चलते हुए बल और वृत्रासुरका वध करनेवाले इन्द्र उस राजकुमारके वधका अवसर देखने लगे ॥ २६ ॥
चोदयामास तद् वज्रं दिव्यास्त्रं मूर्तिमत् स्थितम् ।
व्याघ्रो भूत्वा जहीमं त्वं राजपुत्रमिति प्रभो ॥ २७ ॥
प्रवृद्धः किल वीर्येण मामेषोऽभिभविष्यति ।
संजयस्य सुतो वज्र यथैनं पर्वतोऽब्रवीत् ॥ २८ ॥
प्रभो! इन्द्रने मूर्तिमान् होकर सामने खड़े हुए अपने दिव्य अस्त्र वज्रसे कहा—'वज्र! तुम बाघ बनकर इस राजकुमारको मार डालो। जैसा कि इसके विषयमें पर्वतने बताया है, बड़ा होनेपर सृंजयका यह पुत्र अपने पराक्रमसे मुझे परास्त कर देगा' ॥ २७-२८ ॥
एवमुक्तस्तु शक्रेण वज्रः परपुरञ्जयः ।
कुमारमन्तरप्रेक्षी नित्यमेवान्वपद्यत ॥ २९ ॥
इन्द्रके ऐसा कहनेपर शत्रुओंकी नगरीपर विजय पानेवाला वज्र मौका देखता हुआ सदा उस राजकुमारके आस-पास ही रहने लगा ॥ २९ ॥
संजयोऽपि सुतं प्राप्य देवराजसमद्युतिम् ।
हृष्टः सान्तःपुरो राजा वननित्यो बभूव ह ॥ ३० ॥
सृंजय भी देवराजके समान पराक्रमी पुत्र पाकर रानी-सहित बड़े प्रसन्न हुए और निरन्तर वनमें ही रहने लगे।
ततो भागीरथीतीरे कदाचिन्निर्जने वने ।
धात्रीद्वितीयो बालः स क्रीडार्थं पर्यधावत ॥ ३१ ॥
तदनन्तर एक दिन निर्जन वनमें गङ्गाजीके तटपर वह बालक धायको साथ लेकर खेलनेके लिये गया और इधर-उधर दौड़ने लगा ॥ ३१ ॥
पञ्चवर्षकदेशीयो बालो नागेन्द्रविक्रमः ।
सहसोत्पतितं व्याघ्रमाससाद महाबलम् ॥ ३२ ॥
उस बालककी अवस्था अभी पाँच वर्षकी थी तो भी वह गजराजके समान पराक्रमी था। वह सहसा उछलकर आये हुए एक महाबली बाघके पास जा पहुँचा ॥ ३२ ॥
स बालस्तेन निष्पिष्टो वेपमानो नृपात्मजः ।
व्यसुः पपात मेदिन्यां ततो धात्री विचुक्रुशे ॥ ३३ ॥
उस बाघने वहाँ काँपते हुए राजकुमारको गिराकर पीस डाला। वह प्राणशून्य होकर पृथ्वीपर गिर पड़ा। यह देखकर धाय चिल्ला उठी ॥ ३३ ॥
हत्वा तु राजपुत्रं स तत्रैवान्तरधीयत ।
शार्दूलो देवराजस्य माययान्तर्हितस्तदा ॥ ३४ ॥
राजकुमारकी हत्या करके देवराज इन्द्रका भेजा हुआ वह वज्ररूपी बाघ मायासे वहीं अदृश्य हो गया ॥
धात्र्यास्तु निनदं श्रुत्वा रुदत्याः परमार्तवत् ।
अभ्यधावत तं देशं स्वयमेव महीपतिः ॥ ३५ ॥
रोती हुई धायका वह आर्तनाद सुनकर राजा सृंजय स्वयं ही उस स्थानपर दौड़े हुए आये ॥ ३५ ॥
स ददर्श शयानं तं गतासुं पीतशोणितम् ।
कुमारं विगतानन्दं निशाकरमिव च्युतम् ॥ ३६ ॥
उन्होंने देखा, राजकुमार प्राणशून्य होकर आकाशसे गिरे हुए चन्द्रमाकी भाँति पड़ा है। उसका सारा रक्त बाघके द्वारा पी लिया गया है और वह आनन्दहीन हो गया है ॥ ३६ ॥
स तमुत्सङ्गमारोप्य परिपीडितमानसः ।
पुत्रं रुधिरसंसिक्तं पर्यदेवयदातुरः ॥ ३७ ॥
खूनसे लथपथ हुए उस बालकको गोदमें लेकर व्यथितचित्त हुए राजा सृंजय व्याकुल होकर विलाप करने लगे ॥
ततस्ता मातरस्तस्य रुदत्यः शोककर्शिताः ।
अभ्यधावन्त तं देशं यत्र राजा स सृंजयः ॥ ३८ ॥
तदनन्तर शोकसे पड़ित हो उसकी माताएँ रोती हुई उस स्थानकी ओर दौड़ीं, जहाँ राजा सृंजय विलाप करते थे ।।
ततः स राजा सस्मार मामेव गतमानसः ।
तदाहं चिन्तनं ज्ञात्वा गतवांस्तस्य दर्शनम् ।। ३९ ।।
उस समय अचेत-से होकर राजाने मेरा ही स्मरण किया। तब मैंने उनका चिन्तन जानकर उन्हें दर्शन दिया ।।
मयैतानि च वाक्यानि श्रावितः शोकलालसः ।
यानि ते यदुवीरेण कथितानि महीपते ।। ४० ।।
पृथ्वीनाथ! यदुवीर श्रीकृष्णने जो बातें तुम्हारे सामने कही हैं, उन्हींको मैंने उस शोकाकुल राजाको सुनाया ।।
संजीवितश्चापि पुनर्वासवानुमते तदा ।
भवितव्यं तथा तच्च न तच्छक्यमतोऽन्यथा ।। ४१ ।।
फिर इन्द्रकी अनुमतिसे उस बालकको जीवित भी कर दिया। उसकी वैसी ही होनहार थी। उसे कोई पलट नहीं सकता था ॥ ४१ ॥
तत ऊर्ध्वं कुमारस्तु सुवर्णष्ठीवी महायशाः ।
चित्तं प्रसादयामास पितुर्मातुश्च वीर्यवान् ॥ ४२ ॥
तदनन्तर महायशस्वी और शक्तिशाली कुमार सुवर्णष्ठीवीने जीवित होकर पिता और माताके चित्तको प्रसन्न किया ॥ ४२ ॥
कारयामास राज्यं च पितरि स्वर्गते नृप ।
वर्षाणां शतमेकं च सहस्रं भीमविक्रमः ॥ ४३ ॥
नरेश्वर! उस भयानक पराक्रमी कुमारने पिताके स्वर्ग-वासी हो जानेपर ग्यारह सौ वर्षोंतक राज्य किया ॥ ४३ ॥
तत ईजे महायज्ञैर्बहुभिर्भूरिदक्षिणैः ।
तर्पयामास देवांश्च पितूंश्चैव महाद्युतिः ॥ ४४ ॥
तदनन्तर उस महातेजस्वी राजकुमारने बहुत-सी दक्षिणावाले अनेक महायज्ञोंका अनुष्ठान किया और उनके द्वारा देवताओं तथा पितरोंकी तृप्ति की ॥ ४४ ॥
उत्पाद्य च बहून् पुत्रान् कुलसंतानकारिणः ।
कालेन महता राजन् कालधर्ममुपेयिवान् ॥ ४५ ॥
राजन्! इसके बाद उसने बहुत-से वंशप्रवर्तक पुत्र उत्पन्न किये और दीर्घकालके पश्चात् वह काल-धर्मको प्राप्त हुआ ॥ ४५ ॥
स त्वं राजेन्द्र संजातं शोकमेनं निवर्तय ।
यथा त्वां केशवः प्राह व्यासश्च सुमहातपाः ॥ ४६ ॥
पितृपैतामहं राज्यमास्थाय धुरमुद्वह ।
इष्ट्वा पुण्यैर्महायज्ञैरिष्टं लोकमवाप्स्यसि ॥ ४७ ॥
राजेन्द्र! तुम भी अपने हृदयमें उत्पन्न हुए इस शोकको दूर करो तथा भगवान् श्रीकृष्ण और महातपस्वी व्यासजी जैसा कह रहे हैं, उसके अनुसार अपने बाप-दादोंके राज्यपर आरूढ़ हो इसका भार वहन करो; फिर पुण्यदायक महायज्ञोंका अनुष्ठान करके तुम अभीष्ट लोकमें चले जाओगे ॥ ४६-४७ ॥
इति श्रीमहाभारते शान्तिपर्वणि राजधर्मानुशासनपर्वणि सुवर्णष्ठीविसम्भवोपाख्याने एकत्रिंशोऽध्यायः ॥ ३१ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत शान्तिपर्वके अन्तर्गत राजधर्मानुशासनपर्वमें सुवर्णष्ठीवीके जन्मका उपाख्यानविषयक इकतीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ३१ ॥