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महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,450 पृष्ठ

ब्रह्माजीके नीतिशास्त्रका तथा राजा पृथुके चरित्रका वर्णन

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एकोनषष्टितमोऽध्यायः

ब्रह्माजीके नीतिशास्त्रका तथा राजा पृथुके चरित्रका वर्णन

वैशम्पायन उवाच

ततः कल्यं समुत्थाय कृतपूर्वाह्निकक्रियाः ।
ययुस्ते नगराकारै रथैः पाण्डवयादवाः ॥ १ ॥

**वैशम्पायनजी कहते हैं—**जनमेजय! तदनन्तर दूसरे दिन सबेरे उठकर पाण्डव और यदुवंशी वीर पूर्वाह्नकालके नित्यकर्म पूर्ण करनेके अनन्तर नगराकार विशाल रथोंपर सवार हो हस्तिनापुरसे चल दिये ॥ १ ॥

प्रतिपद्य कुरुक्षेत्रं भीष्ममासाद्य चानघ ।
सुखां च रजनीं पृष्ट्वा गाङ्गेयं रथिनां वरम् ॥ २ ॥
व्यासादीनभिवाद्यर्षीन् सर्वैस्तैश्चाभिनन्दिताः ।
निषेदुरभितो भीष्मं परिवार्य समन्ततः ॥ ३ ॥

निष्पाप नरेश! कुरुक्षेत्रमें जा रथियोंमें श्रेष्ठ गङ्गा-नन्दन भीष्मजीके पास पहुँचकर उनसे सुखपूर्वक रात बीतनेका समाचार पूछकर व्यास आदि महर्षियोंको प्रणाम करके उन सबके द्वारा अभिनन्दित हो वे पाण्डव और श्रीकृष्ण भीष्मजीको सब ओरसे घेरकर उनके पास ही बैठ गये ॥ २-३ ॥

ततो राजा महातेजा धर्मराजो युधिष्ठिरः ।
अब्रवीत् प्राञ्जलिर्भीष्मं प्रतिपूज्य यथाविधि ॥ ४ ॥

तब महातेजस्वी राजा धर्मराज युधिष्ठिरने भीष्मजीका विधिपूर्वक पूजन करके उनसे दोनों हाथ जोड़कर कहा ॥ ४ ॥

युधिष्ठिर उवाच

य एष राजन् राजेति शब्दश्चरति भारत ।
कथमेष समुत्पन्नस्तन्मे ब्रूहि परंतप ॥ ५ ॥

**युधिष्ठिर बोले—**शत्रुओंको संताप देनेवाले भरत-वंशी नरेश! लोकमें जो यह राजा शब्द चल रहा है, इसकी उत्पत्ति कैसे हुई है? यह मुझे बतानेकी कृपा करें ॥ ५ ॥

तुल्यपाणिभुजग्रीवस्तुल्यबुद्धीन्द्रियात्मकः ।
तुल्यदुःखसुखात्मा च तुल्यपृष्ठमुखोदरः ॥ ६ ॥
तुल्यशुक्रास्थिमज्जा च तुल्यमांसासृगेव च ।
निःश्वासोच्छ्वासतुल्यश्चतुल्यप्राणशरीरवान् ॥ ७ ॥
समानजन्ममरणः समः सर्वैर्गुणैर्नृणाम् ।

विशिष्टबुद्धीन् शूरांश्च कथमेकोऽधितिष्ठति ॥ ८ ॥
जिसे हम राजा कहते हैं, वह सभी गुणोंमें दूसरोंके समान ही है। उसके हाथ, बाँह और गर्दन भी औरोंकी ही भाँति हैं। बुद्धि और इन्द्रियाँ भी दूसरे लोगोंके ही तुल्य हैं। उसके मनमें भी दूसरे मनुष्योंके समान ही सुख-दुःखका अनुभव होता है। मुँह, पेट, पीठ, वीर्य, हड्डी, मज्जा, मांस, रक्त, उच्छ्वास, निःश्वास, प्राण, शरीर, जन्म और मरण आदि सभी बातें राजामें भी दूसरोंके समान ही हैं। फिर वह विशिष्ट बुद्धि रखनेवाले अनेक शूरवीरोंपर अकेला ही कैसे अपना प्रभुत्व स्थापित कर लेता है? ॥ ६—८ ॥

कथमेको महीं कृत्स्नां शूरवीरार्यसंकुलाम् ।
रक्षत्यपि च लोकस्य प्रसादमभिवाञ्छति ॥ ९ ॥
अकेला होनेपर भी वह शूरवीर एवं सत्पुरुषोंसे भरी हुई इस सारी पृथ्वीका कैसे पालन करता है और कैसे सम्पूर्ण जगत्की प्रसन्नता चाहता है? ॥ ९ ॥

एकस्य तु प्रसादेन कृत्स्नो लोकः प्रसीदति ।
व्याकुले चाकुलः सर्वो भवतीति विनिश्चयः ॥ १० ॥
यह निश्चित रूपसे देखा जाता है कि एकमात्र राजाकी प्रसन्नतासे ही सारा जगत् प्रसन्न होता है और उस एकके ही व्याकुल होनेपर सब लोग व्याकुल हो जाते हैं ॥ १० ॥

एतदिच्छाम्यहं श्रोतुं तत्त्वेन भरतर्षभ ।
कृत्स्नं तन्मे यथातत्त्वं प्रब्रूहि वदतां वर ॥ ११ ॥
भरतश्रेष्ठ! इसका क्या कारण है? यह मैं यथार्थरूपसे सुनना चाहता हूँ। वक्ताओंमें श्रेष्ठ पितामह! यह सारा रहस्य मुझे यथावत् रूपसे बताइये ॥ ११ ॥

नैतत् कारणमल्पं हि भविष्यति विशाम्पते ।
यदेकस्मिन् जगत् सर्वं देववद् याति संनतिम् ॥ १२ ॥
प्रजानाथ! यह सारा जगत् जो एक ही व्यक्तिको देवताके समान मानकर उसके सामने नतमस्तक हो जाता है, इसका कोई स्वल्प कारण नहीं हो सकता ॥ १२ ॥

भीष्म उवाच

नियतस्त्वं नरव्याघ्र शृणु सर्वमशेषतः ।
यथा राज्यं समुत्पन्नमादौ कृतयुगेऽभवत् ॥ १३ ॥
**भीष्मजीने कहा—**पुरुषसिंह! आदि सत्ययुगमें जिस प्रकार राजा और राज्यकी उत्पत्ति हुई, वह सारा वृत्तान्त तुम एकाग्र होकर सुनो ॥ १३ ॥

न वै राज्यं न राजाऽऽसीन्न च दण्डो न दाण्डिकः ।
धर्मेणैव प्रजाः सर्वा रक्षन्ति स्म परस्परम् ॥ १४ ॥
पहले न कोई राज्य था, न राजा, न दण्ड था और न दण्ड देनेवाला, समस्त प्रजा धर्मके द्वारा ही एक-दूसरेकी रक्षा करती थी ॥ १४ ॥

पाल्यमानास्तथान्योन्यं नरा धर्मेण भारत ।
खेदं परमुपाजग्मुस्ततस्तान् मोह आविशत् ॥ १५ ॥
भारत! सब मनुष्य धर्मके द्वारा परस्पर पालित और पोषित होते थे। कुछ दिनोंके बाद सब लोग पारस्परिक संरक्षणके कार्यमें महान् कष्टका अनुभव करने लगे; फिर उन सबपर मोह छा गया ॥ १५ ॥

ते मोहवशमापन्ना मनुजा मनुजर्षभ ।
प्रतिपत्तिविमोहाच्च धर्मस्तेषामनीनशत् ॥ १६ ॥
नरश्रेष्ठ! जब सारे मनुष्य मोहके वशीभूत हो गये, तब कर्तव्याकर्तव्यके ज्ञानसे शून्य होनेके कारण उनके धर्मका नाश हो गया ॥ १६ ॥

नष्टायां प्रतिपत्तौ च मोहवश्या नरास्तदा ।
लोभस्य वशमापन्नाः सर्वे भरतसत्तम ॥ १७ ॥
भरतभूषण! कर्तव्याकर्तव्यका ज्ञान नष्ट हो जानेपर मोहके वशीभूत हुए सब मनुष्य लोभके अधीन हो गये ॥

अप्राप्तस्याभिमर्शं तु कुर्वन्तो मनुजास्ततः ।
कामो नामापरस्तत्र प्रत्यपद्यत वै प्रभो ॥ १८ ॥
फिर जो वस्तु उन्हें प्राप्त नहीं थी, उसे पानेका वे प्रयत्न करने लगे। प्रभो! इतनेहीमें वहाँ काम नामक दूसरे दोषने उन्हें घेर लिया ॥ १८ ॥

तांस्तु कामवशं प्राप्तान् रागो नाम समस्पृशत् ।
रक्ताश्च नाभ्यजानन्त कार्याकार्ये युधिष्ठिर ॥ १९ ॥
युधिष्ठिर! कामके अधीन हुए उन मनुष्योंपर क्रोध नामक शत्रुने आक्रमण किया। क्रोधके वशीभूत होकर वे यह न जान सके कि क्या कर्तव्य है और क्या अकर्तव्य? ॥ १९ ॥

अगम्यागमनं चैव वाच्यावाच्यं तथैव च ।
भक्ष्याभक्ष्यं च राजेन्द्र दोषादोषं च नात्यजन् ॥ २० ॥
राजेन्द्र! उन्होंने अगम्यागमन, वाच्य-अवाच्य, भक्ष्य-अभक्ष्य तथा दोष-अदोष कुछ भी नहीं छोड़ा ॥ २० ॥

विप्लुते नरलोके वै ब्रह्म चैव ननाश ह ।
नाशाच्च ब्रह्मणो राजन् धर्मो नाशमथागमत् ॥ २१ ॥
इस प्रकार मनुष्यलोकमें धर्मका विप्लव हो जानेपर वेदोंके स्वाध्यायका भी लोप हो गया। राजन्! वैदिक ज्ञानका लोप होनेसे यज्ञ आदि कर्मोंका भी नाश हो गया ॥ २१ ॥

नष्टे ब्रह्मणि धर्मे च देवांस्त्रासः समाविशत् ।
ते त्रस्ता नरशार्दूल ब्रह्माणं शरणं ययुः ॥ २२ ॥

इस प्रकार जब वेद और धर्मका नाश होने लगा, तब देवताओंके मनमें भय समा गया।
पुरुषसिंह! वे भयभीत होकर ब्रह्माजीकी शरणमें गये ॥ २२ ॥
प्रसाद्य भगवन्तं ते देवं लोकपितामहम् ।
ऊचुः प्राञ्जलयः सर्वे दुःखवेगसमाहताः ॥ २३ ॥
लोकपितामह भगवान् ब्रह्माको प्रसन्न करके दुःखके वेगसे पीड़ित हुए समस्त देवता
उनसे हाथ जोड़कर बोले— ॥ २३ ॥
भगवन् नरलोकस्थं ग्रस्तं ब्रह्म सनातनम् ।
लोभमोहादिभिर्भावैस्ततो नो भयमाविशत् ॥ २४ ॥
‘भगवन्! मनुष्यलोकमें लोभ, मोह आदि दूषित भावोंने सनातन वैदिक ज्ञानको
विलुप्त कर डाला है; इसलिये हमें बड़ा भय हो रहा है ॥ २४ ॥
ब्रह्मणश्च प्रणाशेन धर्मो व्यनशदीश्वर ।
ततः स्म समतां याता मर्त्यैस्त्रिभुवनेश्वर ॥ २५ ॥
‘ईश्वर! तीनों लोकोंके स्वामी परमेश्वर! वैदिक ज्ञानका लोप होनेसे यज्ञ-धर्म नष्ट हो
गया। इससे हम सब देवता मनुष्योंके समान हो गये हैं ॥ २५ ॥
अधो हि वर्षमस्माकं नरास्तूर्ध्वप्रवर्षिणः।
क्रियाव्युपरमात् तेषां ततो गच्छाम संशयम् ॥ २६ ॥
‘मनुष्य यज्ञ आदिमें घीकी आहुति देकर हमारे लिये ऊपरकी ओर वर्षा करते थे और
हम उनके लिये नीचेकी ओर पानी बरसाते थे; परंतु अब उनके यज्ञकर्मका लोप हो जानेसे
हमारा जीवन संशयमें पड़ गया है ॥
अत्र निःश्रेयसं यन्नस्तद् ध्यायस्व पितामह ।
त्वत्प्रभावसमुत्थोऽसौ स्वभावो नो विनश्यति ॥ २७ ॥
‘पितामह! अब जिस उपायसे हमारा कल्याण हो सके, वह सोचिये। आपके प्रभावसे
हमें जो दैवस्वभाव प्राप्त हुआ था, वह नष्ट हो रहा है’ ॥ २७ ॥
तानुवाच सुरान् सर्वान् स्वयम्भूर्भगवांस्ततः ।
श्रेयोऽहं चिन्तयिष्यामि व्येतु वो भीःसुरर्षभाः ॥ २८ ॥
तब भगवान् ब्रह्माने उन सब देवताओंसे कहा—‘सुरश्रेष्ठगण! तुम्हारा भय दूर हो जाना
चाहिये। मैं तुम्हारे कल्याणका उपाय सोचूँगा’ ॥ २८ ॥
ततोऽध्यायसहस्राणां शतं चक्रे स्वबुद्धिजम् ।
यत्र धर्मस्तथैवार्थः कामश्चैवाभिवर्णितः ॥ २९ ॥
त्रिवर्ग इति विख्यातो गण एष स्वयम्भुवा ।
तदनन्तर ब्रह्माजीने अपनी बुद्धिसे एक लाख अध्यायोंका एक ऐसा नीतिशास्त्र रचा,
जिसमें धर्म, अर्थ और कामका विस्तारपूर्वक वर्णन है। जिसमें इन वर्गोंका वर्णन हुआ है,
वह प्रकरण ‘त्रिवर्ग’ नामसे विख्यात है ॥

चतुर्थो मोक्ष इत्येव पृथगर्थः पृथग्गुणः ॥ ३० ॥
चौथा वर्ग मोक्ष है; उसके प्रयोजन और गुण इन तीनों वर्गोंसे भिन्न हैं ॥ ३० ॥
मोक्षस्यास्ति त्रिवर्गोऽन्यः प्रोक्तः सत्त्वं रजस्तमः ।
स्थानं वृद्धिः क्षयश्चैव त्रिवर्गश्चैव दण्डजः ॥ ३१ ॥
मोक्षका त्रिवर्ग दूसरा बताया गया है। उसमें सत्त्व, रज और तमकी गणना है। दण्डजनित त्रिवर्ग उससे भिन्न है। स्थान, वृद्धि और क्षय—ये ही उसके भेद हैं (अर्थात् दण्डसे धनियोंकी स्थिति, धर्मात्माओंकी वृद्धि और दुष्टोंका विनाश होता है) ॥ ३१ ॥
आत्मा देशश्च कालश्चाप्युपायाः कृत्यमेव च ।
सहायाः कारणं चैव षड्वर्गो नीतिजः स्मृतः ॥ ३२ ॥
ब्रह्माजीके नीतिशास्त्रमें आत्मा, देश, काल, उपाय, कार्य और सहायक—इन छः वर्गोंका वर्णन है। ये छहों नीतिद्वारा संचालित होनेपर उन्नतिके कारण होते हैं ॥ ३२ ॥
त्रयी चान्वीक्षिकी चैव वार्ता च भरतर्षभ ।
दण्डनीतिश्च विपुला विद्यास्तत्र निदर्शिताः ॥ ३३ ॥
भरतश्रेष्ठ! उस ग्रन्थमें वेदत्रयी (कर्मकाण्ड), आन्वीक्षिकी (ज्ञानकाण्ड), वार्ता (कृषि, गोरक्षा और वाणिज्य) और दण्डनीति—इन विपुल विद्याओंका निरूपण किया गया है ॥ ३३ ॥
अमात्यरक्षा प्रणिधी राजपुत्रस्य लक्षणम् ।
चारश्च विविधोपायः प्रणिधेयः पृथग्विधः ॥ ३४ ॥
साम भेदः प्रदानं च ततो दण्डश्च पार्थिव ।
उपेक्षा पञ्चमी चात्र कात्स्न्येन समुदाहृता ॥ ३५ ॥
ब्रह्माजीके उस नीतिशास्त्रमें मन्त्रियोंकी रक्षा (उन्हें कोई फोड़ न ले, इसके लिये सतर्कता), प्रणिधि (राजदूत), राजपुत्रके लक्षण, गुप्तचरोंके विचरणके विविध उपाय, विभिन्न स्थानोंमें विभिन्न प्रकारके गुप्तचरोंकी नियुक्ति, साम, दान, भेद, दण्ड और उपेक्षा—इन पाँचों उपायोंका पूर्णरूपसे प्रतिपादन किया गया है ॥ ३४-३५ ॥
मन्त्रश्च वर्णितः कृत्स्नस्तथा भेदार्थ एव च ।
विभ्रमश्चैव मन्त्रस्य सिद्ध्यसिद्धोश्च यत् फलम् ॥ ३६ ॥
सब प्रकारकी मन्त्रणा, भेदनीतिके प्रयोगके प्रयोजन, मन्त्रणामें होनेवाले भ्रम या उसके फूटनेके भय तथा मन्त्रणाकी सिद्धि और असिद्धिके फलका भी इस शास्त्रमें वर्णन है ॥ ३६ ॥
संधिश्च त्रिविधाभिख्यो हीनो मध्यस्तथोत्तमः ।
भयसत्कारवित्ताख्यं कात्स्न्येन परिवर्णितम् ॥ ३७ ॥
संधिके तीन भेद हैं—उत्तम, मध्यम और अधम, इनकी क्रमशः वित्तसंधि, सत्कारसंधि और भयसंधि—ये तीन संज्ञाएँ हैं। धन लेकर जो संधि की जाती है, वह वित्तसंधि उत्तम है।