महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व
Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
प्रीतिं धर्मविशेषेण कीर्तिमाप्नोति शाश्वतीम् ॥ १ ॥
पञ्चाशीतितमोऽध्यायः
राजाकी व्यावहारिक नीति, मन्त्रिमण्डलका संगठन, दण्डका औचित्य तथा दूत, द्वारपाल, शिरोरक्षक, मन्त्री और सेनापतिके गुण
युधिष्ठिर उवाच
कथं स्विदिह राजेन्द्र पालयन् पार्थिवः प्रजाः ।
प्रीतिं धर्मविशेषेण कीर्तिमाप्नोति शाश्वतीम् ॥ १ ॥
युधिष्ठिरने पूछा— राजेन्द्र! इस जगत्में राजा किस प्रकार धर्मविशेषके द्वारा प्रजाका पालन करे, जिससे वह लोगोंका प्रेम और अक्षय कीर्ति प्राप्त कर सके? ॥ १ ॥
भीष्म उवाच
व्यवहारेण शुद्धेन प्रजापालनतत्परः ।
प्राप्य धर्मं च कीर्तिं च लोकानाप्नोत्युभौ शुचिः ॥ २ ॥
भीष्मजीने कहा— राजन्! जो राजा बाहर-भीतरसे पवित्र रहकर शुद्ध व्यवहारसे प्रजापालनमें तत्पर रहता है, वह धर्म और कीर्ति प्राप्त करके इहलोक और परलोक दोनोंको सुधार लेता है ॥ २ ॥
युधिष्ठिर उवाच
कीदृशैर्व्यवहारैस्तु कैश्च व्यवहरेन्नृपः ।
एतत्पृष्टो महाप्राज्ञ यथावद् वक्तुमर्हसि ॥ ३ ॥
युधिष्ठिरने पूछा— महामते! राजाको किस-किस प्रकारके लोगोंसे किस-किस प्रकारका बर्ताव काममें लाना चाहिये? मेरे इस प्रश्नका आप यथावत्रूपसे समाधान करें ॥ ३ ॥
ये चैव पूर्वं कथिता गुणास्ते पुरुषं प्रति ।
नैकस्मिन् पुरुषे ह्येते विद्यन्त इति मे मतिः ॥ ४ ॥
मेरी तो ऐसी मान्यता है कि पहले आपने पुरुषके लिये जिन गुणोंका वर्णन किया है, वे सब किसी एक पुरुषमें नहीं मिल सकते ॥ ४ ॥
भीष्म उवाच
एवमेतन्महाप्राज्ञ यथा वदसि बुद्धिमन् ।
दुर्लभः पुरुषः कश्चिदेभिर्युक्तो गुणैः शुभैः ॥ ५ ॥
**भीष्मजीने कहा—**महाप्राज्ञ! परम बुद्धिमान् युधिष्ठिर! तुम जैसा कहते हो, वह ठीक ऐसा ही है। वस्तुतः इन सभी शुभ गुणोंसे सम्पन्न किसी एक पुरुषका मिलना कठिन है॥ ५॥
किंतु संक्षेपतः शीलं प्रयत्नेनेह दुर्लभम्।
वक्ष्यामि तु यथामात्यान् यादृशांश्च करिष्यसि॥ ६॥
इसलिये तुम जिस भावसे जैसे मन्त्रियोंको संगठित करोगे अर्थात् करना चाहते हो, उनका दुर्लभ शील-स्वभाव जैसा होना चाहिये—इस बातको मैं प्रयत्नपूर्वक संक्षेपसे बताऊँगा॥ ६॥
चतुरो ब्राह्मणान् वैद्यान् प्रगल्भान् स्नातकान् शुचीन्।
क्षत्रियांश्च तथा चाष्टौ बलिनः शस्त्रपाणिनः॥ ७॥
वैश्यान् वित्तेन सम्पन्नानेकविंशतिसंख्यया।
त्रींश्च शूद्रान् विनीतांश्च शुचीन् कर्मणि पूर्वके॥ ८॥
अष्टाभिश्च गुणैर्युक्तं सूतं पौराणिकं तथा।
पञ्चाशद्वर्षवयसं प्रगल्भमनसूयकम्॥ ९॥
श्रुतिस्मृतिसमायुक्तं विनीतं समदर्शिनम्।
कार्ये विवदमानानां शक्तमर्थेष्वलोलुपम्॥ १०॥
वर्जितं चैव व्यसनैः सुघोरैः सप्तभिर्भृशम्।
अष्टानां मन्त्रिणां मध्ये मन्त्रं राजोपधारयेत्॥ ११॥
राजाको चाहिये कि जो वेदविद्याके विद्वान्, निर्भीक, बाहर-भीतरसे शुद्ध एवं स्नातक हों, ऐसे चार ब्राह्मण, शरीरसे बलवान् तथा शस्त्रधारी आठ क्षत्रिय, धन-धान्यसे सम्पन्न इक्कीस वैश्य, पवित्र आचार-विचारवाले तीन विनयशील शूद्र तथा आठ³ गुणोंसे युक्त एवं पुराणविद्याको जाननेवाला एक सूत जातिका मनुष्य—इन सब लोगोंका एक मन्त्रिमण्डल बनावे। उस सूतकी अवस्था लगभग पचास वर्षकी हो और वह निर्भीक, दोषदृष्टिसे रहित, श्रुतियों और स्मृतियोंके ज्ञानसे सम्पन्न, विनयशील, समदर्शी, वादी-प्रतिवादीके मामलोंका निपटारा करनेमें समर्थ, लोभरहित और अत्यन्त भयंकर सात³ प्रकारके दुर्व्यसनोंसे बहुत दूर रहनेवाला हो। ऐसे आठ मन्त्रियोंके बीचमें राजा गुप्त मन्त्रणा करे॥ ७—११॥
ततः सम्प्रेषयेद् राष्ट्रे राष्ट्रियाय च दर्शयेत्।
अनेन व्यवहारेण द्रष्टव्यास्ते प्रजाः सदा॥ १२॥
इन सबकी रायसे जो बात निश्चित हो, उसको देशमें प्रचारित करे और राष्ट्रके प्रत्येक नागरिकको इसका ज्ञान करा दे। युधिष्ठिर! इस प्रकारके व्यवहारसे तुम्हें सदा प्रजावर्गकी देख-रेख करनी चाहिये॥ १२॥
न चापि गूढं द्रव्यं ते ग्राह्यं कार्योपघातकम्।
कार्ये खलु विपन्ने त्वां सोऽधर्मस्तांश्च पीडयेत् ॥ १३ ॥
राजन्! तुमको किसीका कोई गुप्त धन ग्रहण नहीं करना चाहिये; क्योंकि वह तुम्हारे कर्तव्य—न्यायधर्मका नाश करनेवाला होगा। यदि कहीं वास्तवमें तुम्हारे न्यायधर्मका नाश हुआ तो वह अधर्म तुम्हें और तुम्हारे मन्त्रियोंको बड़े कष्टमें डाल देगा ॥ १३ ॥
विद्रवेच्चैव राष्ट्रं ते श्येनात् पक्षिगणा इव ।
परिस्रवेच्च सततं नौर्विशीर्णेव सागरे ॥ १४ ॥
फिर तो तुम्हें अन्यायी मानकर राष्ट्रकी सारी प्रजा तुमसे उसी प्रकार दूर भागेगी, जैसे बाज पक्षीके डरसे दूसरे पक्षी भागते हैं तथा जैसे टूटी हुई नाव समुद्रमें कहाँकी कहाँ बह जाती है, उसी प्रकार प्रजा धीरे-धीरे तुम्हारा राज्य छोड़कर अन्यत्र चली जायगी ॥ १४ ॥
प्रजाः पालयतोऽसम्यग्धर्मेणेह भूपतेः ।
हार्दं भयं सम्भवति स्वर्गश्चास्य विरुद्ध्यते ॥ १५ ॥
जो राजा अन्याय एवं अधर्मपूर्वक प्रजाका पालन करता है, उसके हृदयमें भय बना रहता है तथा उसका परलोक भी बिगड़ जाता है ॥ १५ ॥
अथ योऽधर्मतः पाति राजामात्योऽथ वाऽऽत्मजः ।
धर्मासने संनियुक्तो धर्ममूले नरर्षभ ॥ १६ ॥
कार्येष्वधिकृताः सम्यगकुर्वन्तो नृपानुगाः ।
आत्मानं पुरतः कृत्वा यान्त्यधः सहपार्थिवाः ॥ १७ ॥
नरश्रेष्ठ! धर्म ही जिसकी जड़ है, उस धर्मासन अथवा न्यायासनपर बैठकर जो राजा, मन्त्री अथवा राजकुमार धर्म-पूर्वक प्रजाकी रक्षा नहीं करता तथा राजाका अनुसरण करनेवाले राज्यके दूसरे अधिकारी भी यदि अपनेको सामने रखकर प्रजाके साथ उचित बर्ताव नहीं करते हैं तो वे राजाके साथ ही स्वयं भी नरकमें गिर जाते हैं ॥ १६-१७ ॥
बलात्कृतानां बलिभिः कृपणं बहु जल्पताम् ।
नाथो वै भूमिपो नित्यमनाथानां नृणां भवेत् ॥ १८ ॥
बलवानोंके बलात्कार (अत्याचार) से पीड़ित हो अत्यन्त दीनभावसे पुकार मचाते हुए अनाथ मनुष्योंको आश्रय देनेवाला उनका संरक्षक या स्वामी राजा ही होता है ॥
ततः साक्षिबलं साधु द्वैधवादकृतं भवेत् ।
असाक्षिकमनाथं वा परीक्ष्यं तद् विशेषतः ॥ १९ ॥
जब कोई अभियोग उपस्थित हो और उसमें उभय पक्षद्वारा दो प्रकारकी बातें कही जायँ, तब उसमें यथार्थताका निर्णय करनेके लिये साक्षीका बल श्रेष्ठ माना गया है (अर्थात् मौकेका गवाह बुलाकर उससे सच्ची बात जाननेका प्रयत्न करना चाहिये)। यदि कोई गवाह न हो तथा उस मामलेकी पैरवी करनेवाला कोई मालिक-मुख्तार न दिखायी दे तो राजाको स्वयं ही विशेष प्रयत्न करके उसकी छानबीन करनी चाहिये ॥ १९ ॥
अपराधानुरूपं च दण्डं पापेषु धारयेत् ।
वियोजयेद् धनैर्ऋद्धानधनानथ बन्धनैः ॥ २० ॥
तत्पश्चात् अपराधियोंको अपराधके अनुरूप दण्ड देना चाहिये। अपराधी धनी हो तो उसको उसकी सम्पत्तिसे वञ्चित कर दे और निर्धन हो तो उसे बन्दी बनाकर कारागारमें डाल दे ॥ २० ॥
विनयेच्चापि दुर्द्वृत्तान् प्रहारैरपि पार्थिवः ।
सान्त्वेनोपप्रदानेन शिष्टांश्च परिपालयेत् ॥ २१ ॥
जो अत्यन्त दुराचारी हों, उन्हें मार-पीटकर भी राजा राहपर लानेका प्रयत्न करे तथा जो श्रेष्ठ पुरुष हों, उन्हें मीठी वाणीसे सान्त्वना देते हुए सुख-सुविधाकी वस्तुएँ अर्पित करके उनका पालन करे ॥ २१ ॥
राज्ञो वधं चिकीर्षेद् यस्तस्य चित्रो वधो भवेत् ।
आदीपकस्य स्तेनस्य वर्णसंकरिकस्य च ॥ २२ ॥
जो राजाका वध करनेकी इच्छा करे, जो गाँव या घरमें आग लगावे, चोरी करे अथवा व्यभिचारद्वारा वर्णसंकरता फैलानेका प्रयत्न करे, ऐसे अपराधीका वध अनेक प्रकारसे करना चाहिये ॥ २२ ॥
सम्यक् प्रणयतो दण्डं भूमिपस्य विशाम्पते ।
युक्तस्य वा नास्त्यधर्मो धर्म एव हि शाश्वतः ॥ २३ ॥
प्रजानाथ! जो भलीभाँति विचार करके अपराधीको उचित दण्ड देता है और अपने कर्त्तव्यपालनके लिये सदा उद्यत रहता है, उस राजाको वध और बन्धनका पाप नहीं लगता, अपितु उसे सनातन धर्मकी ही प्राप्ति होती है ॥ २३ ॥
कामकारेण दण्डं तु यः कुर्यादविचक्षणः ।
स इहाकीर्तिसंयुक्तो मृतो नरकमृच्छति ॥ २४ ॥
जो अज्ञानी नरेश बिना विचारे स्वेच्छापूर्वक दण्ड देता है, वह इस लोकमें तो अपयशका भागी होता है और मरनेपर नरकमें पड़ता है ॥ २४ ॥
न परस्य प्रवादेन परेषां दण्डमर्पयेत् ।
आगमानुगमं कृत्वा बध्नीयान्मोक्षयीत वा ॥ २५ ॥
राजा दूसरेके अपराधपर दूसरोंको दण्ड न दे, बल्कि शास्त्रके अनुसार विचार करके अपराध सिद्ध होता हो तो अपराधीको कैद करे और सिद्ध न होता हो तो उसे मुक्त कर दे ॥ २५ ॥
न तु हन्यान्नृपो जातु दूतं कस्याञ्चिदापदि ।
दूतस्य हन्ता निरयमाविशेत् सचिवैः सह ॥ २६ ॥
राजा कभी किसी आपत्तिमें भी किसीके दूतकी हत्या न करे। दूतका वध करनेवाला नरेश अपने मन्त्रियोंसहित नरकमें गिरता है ॥ २६ ॥
यथोक्तवादिनं दूतं क्षत्रधर्मरतो नृपः ।
यो हन्यात् पितरस्तस्य भ्रूणहत्यामवाप्नुयुः ॥ २७ ॥
क्षत्रियधर्ममें तत्पर रहनेवाला जो राजा अपने स्वामीके कथनानुसार यथार्थ बातें कहनेवाले दूतको मार डालता है, उसके पितरोंको भ्रूणहत्याके फलका भोग करना पड़ता है ॥ २७ ॥
कुलीनः शीलसम्पन्नो वाग्मी दक्षः प्रियंवदः ।
यथोक्तवादी स्मृतिमान् दूतः स्यात् सप्तभिर्गुणैः ॥ २८ ॥
राजाके दूतको कुलीन, शीलवान्, वाचाल, चतुर, प्रिय वचन बोलनेवाला, संदेशको ज्यों का-त्यों कह देनेवाला तथा स्मरणशक्तिसे सम्पन्न—इस प्रकार सात गुणोंसे युक्त होना चाहिये ॥ २८ ॥
एतैरेव गुणैर्युक्तः प्रतिहारोऽस्य रक्षिता ।
शिरोरक्षश्च भवति गुणैरेतैः समन्वितः ॥ २९ ॥
राजाके द्वारकी रक्षा करनेवाले प्रतीहारी (द्वारपाल) में भी ये ही गुण होने चाहिये। उसका शिरोरक्षक (अथवा अङ्गरक्षक) भी इन्हीं गुणोंसे सम्पन्न हो ॥ २९ ॥
धर्मशास्त्रार्थतत्त्वज्ञः संधिविग्रहीको भवेत् ।
मतिमान् धृतिमान् ह्रीमान् रहस्यविनिगूहिता ॥ ३० ॥
कुलीनः सत्त्वसम्पन्नः शुक्लोऽमात्यः प्रशस्यते ।
एतैरेव गुणैर्युक्तस्तथा सेनापतिर्भवेत् ॥ ३१ ॥
सन्धि-विग्रहके अवसरको जाननेवाला, धर्मशास्त्रका तत्त्वज्ञ, बुद्धिमान्, धीर, लज्जावान्, रहस्यको गुप्त रखनेवाला, कुलीन, साहसी तथा शुद्ध हृदयवाला मन्त्री ही उत्तम माना जाता है। सेनापति भी इन्हीं गुणोंसे युक्त होना चाहिये ॥ ३०-३१ ॥
व्यूहयन्त्रायुधानां च तत्त्वज्ञो विक्रमान्वितः ।
वर्षशीतोष्णवातानां सहिष्णुः पररन्ध्रवित् ॥ ३२ ॥
इनके सिवा वह व्यूहरचना (मोर्चाबंदी), यन्त्रोंके प्रयोग तथा नाना प्रकारके अन्यान्य अस्त्र-शस्त्रोंको चलानेकी कलाका तत्त्वज्ञ—विशेष जानकार हो, पराक्रमी हो, सर्दी, गर्मी, आँधी और वर्षाके कष्टको धैर्यपूर्वक सहनेवाला तथा शत्रुओंके छिद्रको समझनेवाला हो ॥ ३२ ॥
विश्वासयेत् परांश्चैव विश्वसेच्च न कस्यचित् ।
पुत्रेष्वपि हि राजेन्द्र विश्वासो न प्रशस्यते ॥ ३३ ॥
राजा दूसरोंके मनमें अपने ऊपर विश्वास पैदा करे; परंतु स्वयं किसीका भी विश्वास न करे। राजेन्द्र! अपने पुत्रोंपर भी पूरा-पूरा विश्वास करना अच्छा नहीं माना गया है ॥ ३३ ॥
एतच्छास्त्रार्थतत्त्वं तु मयाऽऽख्यातं तवानघ ।
अविश्वासो नरेन्द्राणां गुह्यं परममुच्यते ॥ ३४ ॥
निष्पाप युधिष्ठिर! यह नीतिशास्त्रका तत्त्व है, जिसे मैंने तुम्हें बताया है। किसीपर भी पूरा विश्वास न करना नरेशोंका परम गोपनीय गुण बताया जाता है ।।
इति श्रीमहाभारते शान्तिपर्वणि राजधर्मानुशासनपर्वणि अमात्यविभागे
पञ्चाशीतितमोऽध्यायः ।। ८५ ।।
इस प्रकार श्रीमहाभारत शान्तिपर्वके अन्तर्गत राजधर्मानुशासनपर्वमें मन्त्रीविभागविषयक पचासीवाँ अध्याय पूरा हुआ ।। ८५ ।।
१. सेवा करनेको सदा तैयार रहना, कही हुई बातको ध्यानसे सुनना, उसे ठीक-ठीक समझना, याद रखना, किस कार्यका कैसा परिणाम होगा-इसपर तर्क करना, यदि अमुक प्रकारसे कार्य सिद्ध न हुआ तो क्या करना चाहिये?—इस तरह वितर्क करना, शिल्प और व्यवहारकी जानकारी रखना और तत्त्वका बोध होना—ये आठ गुण पौराणिक सूतमें होने चाहिये।
२. शिकार, जूआ, परस्त्रीप्रसंग और मदिरापान—ये चार कामजनित दोष और मारना, गाली बकना तथा दूसरेकी चीज खराब कर देना—ये तीन क्रोधजनित दोष मिलकर सात दुर्व्यसन माने गये हैं।