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महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,450 पृष्ठ

स पत्न्या वचनं श्रुत्वा धर्मयुक्तिसमन्वितम् ।

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षट्चत्वारिंशदधिकशततमोऽध्यायः

कबूतरके द्वारा अतिथि-सत्कार और अपने शरीरका बहेलियेके लिये परित्याग

भीष्म उवाच

स पत्न्या वचनं श्रुत्वा धर्मयुक्तिसमन्वितम् ।
हर्षेण महता युक्तो वाक्यं व्याकुललोचनः ॥ १ ॥
भीष्मजी कहते हैं—राजन्! पत्नीकी वह धर्मके अनुकूल और युक्तियुक्त बात सुनकर कबूतरको बड़ी प्रसन्नता हुई। उसके नेत्रोंमें आनन्दके आँसू छलक आये ॥ १ ॥

तं वै शाकुनिकं दृष्ट्वा विधिदृष्टेन कर्मणा ।
स पक्षी पूजयामास यत्नात् तं पक्षिजीविनम् ॥ २ ॥
उस पक्षीने पक्षियोंकी हिंसासे ही जीवन-निर्वाह करनेवाले उस बहेलियेकी ओर देखकर शास्त्रीय विधिके अनुसार यत्नपूर्वक उसका पूजन किया ॥ २ ॥

उवाच स्वागतं तेऽद्य ब्रूहि किं करवाणि ते ।
संतापश्च न कर्तव्यः स्वगृहे वर्तते भवान् ॥ ३ ॥
और बोला—‘आज आपका स्वागत है। बोलिये, मैं आपकी क्या सेवा करूँ? आपको संताप नहीं करना चाहिये, आप इस समय अपने ही घरमें हैं ॥ ३ ॥

तद् ब्रवीतु भवान् क्षिप्रं किं करोमि किमिच्छसि ।
प्रणयेन ब्रवीमि त्वां त्वं हि नः शरणागतः ॥ ४ ॥
‘अतः शीघ्र बताइये, आप क्या चाहते हैं? मैं आपकी क्या सेवा करूँ? मैं बड़े प्रेमसे पूछ रहा हूँ; क्योंकि आप हमारे घर पधारे हैं ॥ ४ ॥

अरावप्युचितं कार्यमातिथ्यं गृहमागते ।
छेत्तुमप्यागते छायां नोपसंहरते द्रुमः ॥ ५ ॥
‘यदि शत्रु भी घरपर आ जाय तो उसका उचित आदर-सत्कार करना चाहिये। जो काटनेके लिये आया हो, उसके ऊपरसे भी वृक्ष अपनी छाया नहीं हटाता ॥ ५ ॥

शरणागतस्य कर्तव्यमातिथ्यं हि प्रयत्नतः ।
पञ्चयज्ञप्रवृत्तेन गृहस्थेन विशेषतः ॥ ६ ॥
‘यों तो घरपर आये हुए अतिथिका सभीको यत्नपूर्वक आदर-सत्कार करना चाहिये; परंतु पंचयज्ञके अधिकारी गृहस्थका यह प्रधान धर्म है ॥ ६ ॥

पञ्चयज्ञांस्तु यो मोहान्न करोति गृहाश्रमे ।
तस्य नायं न च परो लोको भवति धर्मतः ॥ ७ ॥

जो मोहवश गृहस्थाश्रममें रहते हुए भी पञ्चमहा-यज्ञोंका अनुष्ठान नहीं करता, उसके लिये धर्मके अनुसार न तो यह लोक प्राप्त होता है और न परलोक ही ।। ७ ।।
तद् ब्रूहि मां सुविश्रब्धो यत् त्वं वाचा वदिष्यसि ।
तत् करिष्याम्यहं सर्वं मा त्वं शोके मनः कृथाः ।। ८ ।।
‘अतः तुम पूर्ण विश्वास रखकर मुझसे अपनी बात बताओ, तुम अपने मुँहसे जो कुछ कहोगे, वह सब मैं करूँगा; अतः तुम मनमें शोक न करो’ ।। ८ ।।
तस्य तद् वचनं श्रुत्वा शकुनेर्लुब्धकोऽब्रवीत् ।
बाधते खलु मे शीतं संत्राणं हि विधीयताम् ।। ९ ।।
कबूतरकी यह बात सुनकर व्याधने कहा—‘इस समय मुझे सर्दीका कष्ट है; अतः इससे बचानेका कोई उपाय करो’ ।। ९ ।।
एवमुक्तस्ततः पक्षी पर्णान्यास्तीर्य भूतले ।
यथाशक्त्या हि पर्णेन ज्वलनार्थं द्रुतं ययौ ।। १० ।।
उसके ऐसा कहनेपर पक्षीने पृथिवीपर बहुत-से पत्ते लाकर रख दिये और आग लानेके लिये अपने पंखोंद्वारा यथाशक्ति बड़ी तेजीसे उड़ान लगायी ।। १० ।।
स गत्वाङ्गारकर्म्मान्तं गृहीत्वाग्निमथागमत् ।
ततः शुष्केषु पर्णेषु पावकं सोऽप्यदीपयत् ।। ११ ।।
वह लुहारके घर जाकर आग ले आया और सूखे पत्तोंपर रखकर उसने वहाँ अग्नि प्रज्वलित कर दी ।।
स संदीप्तं महत् कृत्वा तमाह शरणागतम् ।
प्रतापय सुविश्रब्धः स्वगात्राण्यकुतोभयः ।। १२ ।।
इस प्रकार आगको बहुत प्रज्वलित करके कबूतरने शरणागत अतिथिसे कहा—‘भाई! अब तुम्हें कोई भय नहीं है। तुम निश्चिन्त होकर अपने सारे अंगोंको आगसे तपाओ’ ।। १२ ।।
स तथोक्तस्तथेत्युक्त्वा लुब्धो गात्राण्यतापयत् ।
अग्निं प्रत्यागतप्राणस्ततः प्राह विहङ्गमम् ।। १३ ।।
तब उस व्याधने ‘बहुत अच्छा’ कहकर अपने सारे अंगोंको तपाया। अग्निका सेवन करके उसकी जानमें जान आयी। तब वह कबूतरसे कुछ कहनेको उद्यत हुआ ।। १३ ।।
हर्षेण महताऽऽविष्टो वाक्यं व्याकुललोचनः ।
तथेमं शकुनिं दृष्ट्वा विधिदृष्टेन कर्मणा ।। १४ ।।
शास्त्रीय विधिसे सत्कार पा उसने बड़े हर्षमें भरकर डबडबायी हुई आँखोंसे कबूतरकी ओर देखकर कहा— ।। १४ ।।
दत्तमाहारमिच्छामि त्वया क्षुद् बाधते हि माम् ।
स तद्वचः प्रतिश्रुत्य वाक्यमाह विहङ्गमः ।। १५ ।।

न मेऽस्ति विभवो येन नाशयेयं क्षुधां तव ।
उत्पन्नेन हि जीवामो वयं नित्यं वनौकसः ॥ १६ ॥
संचयो नास्ति चास्माकं मुनीनामिव भोजने ।
‘भाई! अब मुझे भूख सता रही है; इसलिये तुम्हारा दिया हुआ कुछ भोजन करना चाहता हूँ।' उसकी बात सुनकर कबूतर बोला—‘भैया! मेरे पास सम्पत्ति तो नहीं है, जिससे मैं तुम्हारी भूख मिटा सकूँ। हमलोग वनवासी पक्षी हैं। प्रतिदिन चुगे हुए चारेसे ही जीवन निर्वाह करते हैं। मुनियोंके समान हमारे पास कोई भोजन का संग्रह नहीं रहता है' ।। १५-१६ १/२ ।।

इत्युक्त्वा तं तदा तत्र विवर्णवदनोऽभवत् ॥ १७ ॥
कथं नु खलु कर्तव्यमिति चिन्तापरस्तदा ।
बभूव भरतश्रेष्ठ गर्हयन् वृत्तिमात्मनः ॥ १८ ॥
ऐसा कहकर कबूतरका मुख कुछ उदास हो गया। वह इस चिन्तामें पड़ गया कि अब मुझे क्या करना चाहिये? भरतश्रेष्ठ! वह अपनी कापोती वृत्तिकी निन्दा करने लगा ।। १७-१८ ।।

मुहूर्ताल्लब्धसंज्ञस्तु स पक्षी पक्षिघातिनम् ।
उवाच तर्पयिष्ये त्वां मुहूर्तं प्रतिपालय ॥ १९ ॥
थोड़ी देरमें उसे कुछ याद आया और उस पक्षीने बहेलिये से कहा—‘अच्छा, थोड़ी देरतक ठहरिये। मैं आपकी तृप्ति करूँगा' ।। १९ ।।

इत्युक्त्वा शुष्कपर्णैस्तु समुज्ज्वल्य हुताशनम् ।
हर्षेण महताऽऽविष्टः स पक्षी वाक्यमब्रवीत् ॥ २० ॥
ऐसा कहकर उसने सूखे पत्तोंसे पुनः आग प्रज्वलित की और बड़े हर्षमें भर कर व्याधसे कहा— ।। २० ।।

ऋषीणां देवतानां च पितॄणां च महात्मनाम् ।
श्रुतः पूर्वं मया धर्मो महानतिथिपूजने ॥ २१ ॥
‘मैंने ऋषियों, देवताओं, पितरों तथा महात्माओंके मुखसे पहले सुना है कि अतिथिकी पूजा करनेमें महान् धर्म है ।। २१ ।।

कुरुष्वानुग्रहं सौम्य सत्यमेतद् ब्रवीमि ते ।
निश्चिता खलु मे बुद्धिरतिथिप्रतिपूजने ॥ २२ ॥
‘सौम्य! अतः मैंने भी आज अतिथिकी उत्तम पूजा करनेका निश्चय कर लिया है। आप मुझे ही ग्रहण करके मुझपर कृपा कीजिये। यह मैं आपसे सच्ची बात कहता हूँ' ।। २२ ।।

ततः कृतप्रतिज्ञो वै स पक्षी प्रहसन्निव ।
तमग्निं त्रिःपरिक्रम्य प्रविवेश महामतिः ॥ २३ ॥

ऐसा कहकर अतिथि-पूजनकी प्रतिज्ञा करके उस परम बुद्धिमान् पक्षीने तीन बार अग्निदेवकी परिक्रमा की, और हँसते हुए-से आगमें प्रवेश किया ।। २३ ।।

अग्निमध्ये प्रविष्टं तु लुब्धो दृष्ट्वा तु पक्षिणम् ।
चिन्तयामास मनसा किमिदं वै मया कृतम् ।। २४ ।।
पक्षीको आगके भीतर घुसा हुआ देख व्याध मन-ही-मन चिन्ता करने लगा कि मैंने यह क्या कर डाला? ।। २४ ।।

अहो मम नृशंसस्य गर्हितस्य स्वकर्मणा ।
अधर्मः सुमहान् घोरो भविष्यति न संशयः ।। २५ ।।
अहो! अपने कर्मसे निन्दित हुए मुझ क्रूरकर्मा व्याधके जीवनमें यह सबसे भयंकर और महान् पाप होगा, इसमें संशय नहीं है ।। २५ ।।

एवं बहुविधं भूरि विललाप स लुब्धकः ।
गर्हयन् स्वानि कर्माणि द्विजं दृष्ट्वा तथागतम् ।। २६ ।।
इस प्रकार कबूतरकी वैसी अवस्था देखकर अपने कर्मोंकी निन्दा करते हुए उस व्याधने अनेक प्रकारकी बातें कहकर बहुत विलाप किया ।। २६ ।।

इति श्रीमहाभारते शान्तिपर्वणि आपद्धर्मपर्वणि कपोतलुब्धकसंवादे षट्चत्वारिंशदधिकशततमोऽध्यायः ।। १४६ ।।
इस प्रकार श्रीमहाभारत शान्तिपर्वके अन्तर्गत आपद्धर्मपर्वमें कबूतर और व्याधका संवादविषयक एक सौ छियालीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ।। १४६ ।।