महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व
Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
युधिष्ठिरने पूछा—युद्धमें सच्चा पराक्रम प्रकट करनेवाले महाप्राज्ञ पितामह! भगवान् श्रीकृष्ण अविनाशी ईश्वर हैं; मैं पूर्णरूपसे इनके महत्त्वका वर्णन सुनन
नवाधिकद्विशततमोऽध्यायः
भगवान् विष्णुका वराहरूपमें प्रकट होकर देवताओंकी रक्षा और दानवोंका विनाश कर देना तथा नारदको अनुस्मृतिस्तोत्रका उपदेश और नारदद्वारा भगवान्की स्तुति
युधिष्ठिर उवाच
पितामह महाप्राज्ञ युधि सत्यपराक्रम ।
श्रोतुमिच्छामि कार्त्स्न्येन कृष्णमव्ययमीश्वरम् ॥ १ ॥
**युधिष्ठिरने पूछा—**युद्धमें सच्चा पराक्रम प्रकट करनेवाले महाप्राज्ञ पितामह! भगवान् श्रीकृष्ण अविनाशी ईश्वर हैं; मैं पूर्णरूपसे इनके महत्त्वका वर्णन सुनना चाहता हूँ ॥ १ ॥
यच्चास्य तेजः सुमहद् यच्च कर्म पुरा कृतम् ।
तन्मे सर्वं यथातत्त्वं ब्रूहि त्वं पुरुषर्षभ ॥ २ ॥
पुरुषप्रवर! इनका जो महान् तेज है, इन्होंने पूर्वकालमें जो महान् कर्म किया है, वह सब आप मुझे यथार्थरूपसे बताइये ॥ २ ॥
तिर्यग्योनिगतं रूपं कथं धारितवान् प्रभुः ।
केन कार्यनिसर्गेण तमाख्याहि महाबल ॥ ३ ॥
महाबली पितामह! सम्पूर्ण जगत्के प्रभु होकर भी इन्होंने किस निमित्तसे तिर्यग्योनिमें जन्म ग्रहण किया; यह मुझे बताइये ॥ ३ ॥
भीष्म उवाच
पुराहं मृगयां यातो मार्कण्डेयाश्रमे स्थितः ।
तत्रापश्यं मुनिगणान् समासीनान् सहस्रशः ॥ ४ ॥
**भीष्मजीने कहा—**राजन्! पहलेकी बात है, मैं शिकार खेलनेके लिये वनमें गया और मार्कण्डेय मुनिके आश्रमपर ठहरा। वहाँ मैंने सहस्रों मुनियोंको बैठे देखा ॥ ४ ॥
ततस्ते मधुपर्केण पूजां चक्रुरथो मयि ।
प्रतिगृह्य च तां पूजां प्रत्यनन्दमृषीनहम् ॥ ५ ॥
मेरे जानेपर उन महर्षियोंने मधुपर्क समर्पित करके मेरा आतिथ्य-सत्कार किया। मैंने भी उनका सत्कार ग्रहण करके उन सभी महर्षियोंका अभिनन्दन किया ॥ ५ ॥
कथैषा कथिता तत्र कश्यपेन महर्षिणा ।
मनःप्रह्लादिनीं दिव्यां तामिहैकमनाः शृणु ॥ ६ ॥
फिर महर्षि कश्यपने मनको आनन्द प्रदान करनेवाली यह दिव्य कथा मुझे सुनायी। मैं उसे कहता हूँ, तुम एकाग्रचित्त होकर सुनो ॥ ६ ॥
पुरा दानवमुख्या हि क्रोधलोभसमन्विताः ।
बलेन मत्ताः शतशो नरकाद्या महासुराः ॥ ७ ॥
पूर्वकालमें नरकासुर आदि सैकड़ों मुख्य-मुख्य दानव क्रोध और लोभके वशीभूत हो बलके मदसे मतवाले हो गये थे ॥ ७ ॥
तथैव चान्ये बहवो दानवा युद्धदुर्मदाः ।
न सहन्ते स्म देवानां समृद्धिं तामनुत्तमाम् ॥ ८ ॥
इनके सिवा और भी बहुत-से रणदुर्मद दानव थे, जो देवताओंकी उत्तम समृद्धिको सहन नहीं कर पाते थे ॥
दानवैरर्द्यमानास्तु देवा देवर्षयस्तथा ।
न शर्म लेभिरे राजन् विशमानास्ततस्ततः ॥ ९ ॥
राजन्! उन दानवोंसे पीड़ित हो देवता और देवर्षि कहीं चैन नहीं पाते थे। वे इधर-उधर लुकते-छिपते फिरते थे ॥ ९ ॥
पृथिवीमार्तरूपां ते समपश्यन् दिवौकसः ।
दानवैरभिसंस्तीर्णां घोररूपैर्महाबलैः ॥ १० ॥
समूचे भूमण्डलमें भयानक रूपधारी महाबली दानव फैल गये थे। देवताओंने देखा, यह पृथ्वी दानवोंके पापभारसे पीड़ित एवं आर्त हो उठी है ॥ १० ॥
भारार्तामप्रहृष्टां च दुःखितां संनिमज्जतीम् ।
अथादितेयाः संत्रस्ता ब्रह्माणमिदमब्रुवन् ॥ ११ ॥
यह भारसे व्याकुल, हर्ष और उल्लाससे शून्य तथा दुखी हो रसातलमें डूब रही है। यह देखकर अदितिके सभी पुत्र भयसे थर्रा उठे और ब्रह्माजीसे इस प्रकार बोले— ॥ ११ ॥
कथं शक्ष्यामहे ब्रह्मन् दानवैरभिमर्दनम् ।
स्वयम्भूस्तानुवाचेदं निसृष्टोऽत्र विधिर्मया ॥ १२ ॥
‘ब्रह्मन्! दानवलोग जो हमें इस प्रकार रौंद रहे हैं, इसे हम किस प्रकार सह सकेंगे?' तब स्वयम्भू ब्रह्माने उनसे इस प्रकार कहा—'देवताओ! इस विपत्तिको दूर करनेके लिये मैंने उपाय कर दिया है ॥ १२ ॥
ते वरेणाभिसम्पन्ना बलेन च मदेन च ।
नावबुध्यन्ति सम्मूढा विष्णुमव्यक्तदर्शनम् ॥ १३ ॥
वराहरूपिणं देवमधृष्यममरैरपि ।
‘वे दानव वर पाकर बल और अभिमानसे मत्त हो उठे हैं। वे मूढ़ दैत्य अव्यक्तस्वरूप भगवान् विष्णुको नहीं जानते, जो देवताओंके लिये भी दुर्धर्ष हैं। उन्होंने वाराह रूप धारण कर रखा है ॥ १३ १/२ ॥
एष वेगेन गत्वा हि यत्र ते दानवाधमाः ॥ १४ ॥
अन्तर्भूमिगता घोरा निवसन्ति सहस्रशः ।
शमयिष्यति तच्छ्रुत्वा जहृषुः सुरसत्तमाः ॥ १५ ॥
‘वे सहस्रों घोर दैत्य और दानवाधम भूमिके भीतर पाताललोकमें निवास करते हैं; भगवान् वराह वेगपूर्वक वहीं जाकर उन सबका विनाश कर देंगे। यह सुनकर सभी श्रेष्ठ देवता हर्षसे खिल उठे ॥ १४-१५ ॥
ततो विष्णुर्महातेजा वाराहं रूपमास्थितः ।
अन्तर्भूमिं सम्प्रविश्य जगाम दितिजान् प्रति ॥ १६ ॥
उधर महातेजस्वी भगवान् विष्णु वाराहरूप धारण कर बड़े वेगसे भूमिके भीतर प्रविष्ट हुए और दैत्योंके पास जा पहुँचे ॥ १६ ॥
दृष्ट्वा च सहिताः सर्वे दैत्याः सत्त्वममानुषम् ।
प्रसह्य तरसा सर्वे संतस्थुः कालमोहिताः ॥ १७ ॥
उस अलौकिक जन्तुको देखकर सब दैत्य एक साथ हो वेगपूर्वक उसका सामना करनेके लिये हठात् खड़े हो गये; क्योंकि वे कालसे मोहित हो रहे थे ॥
ततस्ते समभिद्रुत्य वराहं जगृहुः समम् ।
संक्रुद्धाश्च वराहं तं व्यकर्षन्त समन्ततः ॥ १८ ॥
उन सबने कुपित होकर भगवान् वराहपर एक साथ धावा बोल दिया और उन्हें हाथोंहाथ पकड़ लिया। पकड़कर वे वाराहदेवको चारों ओरसे खींचने लगे ॥ १८ ॥
दानवेन्द्रा महाकाया महावीर्यबलोच्छ्रिताः ।
नाशक्नुवंश्च किंचित् ते तस्य कर्तुं तदा विभो ॥ १९ ॥
प्रभो! यद्यपि वे विशालकाय दानवराज महान् बल और वीर्यसे सम्पन्न थे, तो भी उन भगवान्का कुछ बिगाड़ न सके ॥ १९ ॥
ततोऽगच्छत् विस्मयं ते दानवेन्द्रा भयं तथा ।
संशयं गतमात्मानं मेनिरे च सहस्रशः ॥ २० ॥
इससे उन दानवेन्द्रोंको बड़ा विस्मय और भय प्राप्त हुआ। वे सहस्रों दैत्य अपने आपको जीवनके संशयमें पड़ा हुआ मानने लगे ॥ २० ॥
ततो देवाधिदेवः स योगात्मा योगसारथिः ।
योगमास्थाय भगवांस्तदा भरतसत्तम ॥ २१ ॥
विननाद महानादं क्षोभयन् दैत्यदानवान् ।
संनादिता येन लोकाः सर्वांश्चैव दिशो दश ॥ २२ ॥
भरतश्रेष्ठ! इसके बाद योगस्वरूप योगके नियन्ता देवाधिदेव भगवान् वराह दैत्यों और दानवोंको क्षोभमें डालनेके लिये योगका आश्रय ले बड़े जोर-जोरसे गर्जना करने लगे। उस भीषण गर्जनासे तीनों लोक और ये सारी दसों दिशाएँ गूँज उठीं ॥ २१-२२ ॥
तेन संनादशब्देन लोकानां क्षोभ आगमत् ।
संत्रस्ताश्च भृशं लोके देवाः शक्रपुरोगमाः ॥ २३ ॥
उस भीषण गर्जनासे समस्त लोकोंमें हलचल मच गयी। स्वर्गलोकमें इन्द्र आदि देवता भी अत्यन्त भयभीत हो उठे ॥ २३ ॥
निर्विचेष्टं जगच्चापि बभूवातिभृशं तदा ।
स्थावरं जङ्गमं चैव तेन नादेन मोहितम् ॥ २४ ॥
उस सिंहनादसे मोहित होकर समस्त चराचर जगत् अत्यन्त चेष्टारहित हो गया ॥ २४ ॥
ततस्ते दानवाः सर्वे तेन नादेन भीषिताः ।
पेतुर्गतासवश्चैव विष्णुतेजःप्रमोहिताः ॥ २५ ॥
तदनन्तर वे सब दानव भगवान्की उस गर्जनासे भयभीत हो प्राणशून्य होकर पृथ्वीपर गिर पड़े। वे सब-के-सब भगवान् विष्णुके तेजसे मोहित हो अपनी सुध-बुध खो बैठे थे ॥ २५ ॥
रसातलगतश्चापि वराहस्त्रिदशद्विषाम् ।
खुरैर्विदारयामास मांसमेदोऽस्थिसंचयान् ॥ २६ ॥