महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व
Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1186, कुल 2450 में से
संदर्भ में पढ़ेंस एष भगवान् विष्णुरनन्त इति विश्रुतः ।
सर्वभूतात्मभूतस्थो दुर्विज्ञेयोऽकृतात्मभिः ॥ २० ॥
वह स्वयम्भू ही भगवान् विष्णु हैं, जो अनन्त नामसे प्रसिद्ध हैं, वे ही सम्पूर्ण भूतोंके अन्तःकरणमें अन्तर्यामी आत्माके रूपमें विद्यमान हैं। जिनका हृदय शुद्ध नहीं है, उनके लिये इनके स्वरूपको ठीक-ठीक जानना बहुत कठिन है ॥ २० ॥
अहंकारस्य यः स्रष्टा सर्वभूतभवाय वै ।
यतः समभवद् विश्वं पृष्टोऽहं यदिह त्वया ॥ २१ ॥
वे ही सम्पूर्ण भूतोंकी उत्पत्तिके लिये प्राकृत अहंकारकी सृष्टि करनेवाले हैं। तुमने मुझसे जो पूछा था कि इस विश्वकी उत्पत्ति किससे हुई है, वह सब मैंने तुम्हें बता दिया ॥ २१ ॥
भरद्वाज उवाच
गगनस्य दिशां चैव भूतलस्यानिलस्य वा ।
कान्यत्र परिमाणानि संशयं छिन्धि तत्त्वतः ॥ २२ ॥
भरद्वाजने पूछा— प्रभो! आकाश, दिशा, पृथ्वी और वायुका कितना-कितना परिमाण है? यह ठीक-ठीक बताकर मेरा संशय दूर कीजिये ॥ २२ ॥
भृगुरुवाच
अनन्तमेतदाकाशं सिद्धदैवतसेवितम् ।
रम्यं नानाश्रयाकीर्णं यस्यान्तो नाधिगम्यते ॥ २३ ॥
भृगुजीने कहा— मुने! यह आकाश तो अनन्त है, इसमें अनेकानेक सिद्ध और देवता निवास करते हैं। इसमें उनके भिन्न-भिन्न लोक भी स्थित हैं। यह बड़ा ही रमणीय है और इतना महान् है कि कहीं इसका अन्त नहीं मिलता ॥ २३ ॥
ऊर्ध्वं गतेरधस्तात्तु चन्द्रादित्यौ न दृश्यतः ।
तत्र देवाः स्वयं दीप्ता भास्वराभाग्निवर्चसः ॥ २४ ॥
ऊपर तथा नीचे जानेसे जहाँ सूर्य और चन्द्रमा नहीं दिखायी देते, वहाँ सूर्य और अग्निके समान तेजस्वी देवता स्वयं अपने प्रकाशसे ही प्रकाशित होते हैं ॥ २४ ॥
ते चाप्यन्तं न पश्यन्ति नभसः प्रथितौजसः ।
दुर्गमत्वादनन्तत्वादिति मे विद्धि मानद ॥ २५ ॥
मानद! परंतु वे तेजस्वी नक्षत्रस्वरूप देवता भी इस आकाशका अन्त नहीं देख पाते; क्योंकि यह दुर्गम और अनन्त है, यह बात तुम्हें मेरे मुखसे सुनकर अच्छी तरह समझ लेनी चाहिये ॥ २५ ॥
उपरिष्टोपरिष्टात्तु प्रज्वलद्भिः स्वयंप्रभैः ।
निरुद्धमेतदाकाशमप्रमेयं सुरैरपि ॥ २६ ॥