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सर्वकोश
महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,450 पृष्ठ

पृष्ठ 217, कुल 2450 में से

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पृष्ठ 217

उषितौ समये ब्रह्मंस्तद् विचिन्तय साम्प्रतम् ॥ ७ ॥
'मामा! हमलोग राजा सृंजयके घरमें बड़े आदर-सत्कारके साथ रहे हैं, अतः ब्रह्मन्! इस समय इनका कुछ उपकार करनेकी बात सोचिये' ॥ ७ ॥

ततोऽहमब्रुवं राजन् पर्वतं शुभदर्शनम् ।
सर्वमेतत् त्वयि विभो भागिनेयोपपद्यते ॥ ८ ॥
राजन्! तब मैंने शुभदर्शी पर्वत मुनिसे कहा—'भगिनीपुत्र! यह सब तुम्हें ही शोभा देता है ॥ ८ ॥

वरेण च्छन्द्यतां राजा लभतां यद् यदिच्छति ।
आवयोस्तपसा सिद्धिं प्राप्नोतु यदि मन्यसे ॥ ९ ॥
'राजाको मनोवाञ्छित वर देकर संतुष्ट करो। वे जो-जो चाहते हैं, वह सब उन्हें मिले। तुम्हारी राय हो तो हम दोनोंकी तपस्यासे उनके मनोरथकी सिद्धि हो' ॥

तत आहूय राजानं संजयं जयतां वरम् ।
पर्वतोऽनुमतो वाक्यमुवाच कुरुपुङ्गव ॥ १० ॥
कुरुश्रेष्ठ! तब मेरी अनुमति ले पर्वतने विजयी वीरोंमें श्रेष्ठ राजा सृंजयको बुलाकर कहा— ॥ १० ॥

प्रीतौ स्वो नृप सत्कारैर्भवदार्जवसम्भृतैः ।
आवाभ्यामभ्यनुज्ञातो वरं नृवर चिन्तय ॥ ११ ॥
'नरेश्वर! हम दोनों तुम्हारे द्वारा सरलतापूर्वक किये गये सत्कारसे बहुत प्रसन्न हैं। हम तुम्हें आज्ञा देते हैं कि तुम इच्छानुसार कोई वर सोचकर माँग लो ॥ ११ ॥

देवानांमविहिंसायां न भवेन्मानुषक्षयम् ।
तद् गृहाण महाराज पूजार्हो नौ मतो भवान् ॥ १२ ॥
महाराज! कोई ऐसा वर माँग लो, जिससे न तो देवताओंकी हिंसा हो और न मनुष्योंका संहार ही हो सके। तुम हमारी दृष्टिमें आदरके योग्य हो' ॥ १२ ॥

संजय उवाच

प्रीतौ भवन्तौ यदि मे कृतमेतावता मम ।
एष एव परो लाभो निर्वृत्तौ मे महाफलः ॥ १३ ॥
**संजयने कहा—**ब्रह्मन्! यदि आप दोनों प्रसन्न हैं तो मैं इतनेसे ही कृतकृत्य हो गया। यही हमारे लिये महान् फलदायक परम लाभ सिद्ध हो गया ॥ १३ ॥

तमेवंवादिनं भूयः पर्वतः प्रत्यभाषत ।
वृणीष्व राजन् संकल्पं यत् ते हृदि चिरं स्थितम् ॥ १४ ॥
राजन्! ऐसी बात कहनेवाले राजा सृंजयसे पर्वतमुनिने फिर कहा—'राजन्! तुम्हारे हृदयमें जो चिरकालसे संकल्प हो, वही माँग लो' ॥ १४ ॥