महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व
Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
राजा उपरिचरके यज्ञमें भगवान्पर बृहस्पतिका क्रोधित होना, एकत आदि मुनियोंका बृहस्पतिसे श्वेतद्वीप एवं भगवान्की महिमाका वर्णन करके उनको शान्त करना
षट्त्रिंशदधिकत्रिशततमोऽध्यायः
राजा उपरिचरके यज्ञमें भगवान्पर बृहस्पतिका क्रोधित होना, एकत आदि मुनियोंका बृहस्पतिसे श्वेतद्वीप एवं भगवान्की महिमाका वर्णन करके उनको शान्त करना
भीष्म उवाच
ततोऽतीते महाकल्पे उत्पन्नेऽङ्गिरसः सुते ।
बभूवुर्निर्वृता देवा जाते देवपुरोहिते ॥ १ ॥
भीष्मजी कहते हैं—युधिष्ठिर! तदनन्तर बीते हुए महान् कल्पके आरम्भमें जब अंगिराके पुत्र बृहस्पति उत्पन्न हुए और देवताओंके पुरोहित बन गये, तब देवताओंको बड़ा संतोष प्राप्त हुआ ॥ १ ॥
बृहद् ब्रह्म महच्चेति शब्दाः पर्यायवाचकाः ।
एभिः समन्वितो राजन् गुणैर्विद्वान् बृहस्पतिः ॥ २ ॥
राजन्! बृहत्, ब्रह्म और महत्—ये तीनों शब्द एक अर्थके वाचक हैं। इन तीनों शब्दोंके गुण देवपुरोहितमें मौजूद थे; इसलिये वे विद्वान् देवगुरु ‘बृहस्पति’ कहलाते थे ॥
तस्य शिष्यो बभूवाग्र्यो राजोपरिचरो वसुः ।
अधीतवांस्तदा शास्त्रं सम्यक् चित्रशिखण्डिजम् ॥ ३ ॥
उनके श्रेष्ठ शिष्य हुए राजा उपरिचर वसु, जिन्होंने उनसे उन दिनों चित्रशिखण्डियोंके बनाये हुए तन्त्रशास्त्रका विधिवत् अध्ययन किया ॥ ६ ॥
स राजा भावितः पूर्वं दैवेन विधिना वसुः ।
पालयामास पृथिवीं दिवमाखण्डलो यथा ॥ ४ ॥
वे राजा उपरिचर वसु पहले दैवविधानसे भावित हो इस पृथ्वीका उसी प्रकार पालन करने लगे, जैसे इन्द्र स्वर्गका ॥ ४ ॥
तस्य यज्ञो महानासीदश्वमेधो महात्मनः ।
बृहस्पतिरुपाध्यायस्तत्र होता बभूव ह ॥ ५ ॥
एक समय उन महात्मा नरेशने महान् अश्व-मेधयज्ञका आयोजन किया। उसमें उनके उपाध्याय बृहस्पति होता हुए ॥ ५ ॥
प्रजापतिसुताश्चात्र सदस्याश्चाभवंस्त्रयः ।
एकतश्च द्वितश्चैव त्रितश्चैव महर्षयः ॥ ६ ॥
प्रजापतिके तीन पुत्र एकत, द्वित और त्रित नामक महर्षि उस यज्ञमें सदस्य हुए ॥ ६ ॥
धनुषाख्योऽथ रैभ्यश्च अर्वावसुपरावसू ।
ऋषिर्मेधातिथिश्चैव ताण्ड्यश्चैव महानृषिः ॥ ७ ॥
ऋषिः शान्तिर्महाभागस्तथा वेदशिराश्च यः ।
ऋषिश्रेष्ठश्च कपिलः शालिहोत्रपिता स्मृतः ॥ ८ ॥
आद्यः कठस्तैत्तिरिश्च वैशम्पायनपूर्वजः ।
कण्वोऽथ देवहोत्रश्च एते षोडश कीर्तिताः ॥ ९ ॥
इनके सिवा (तेरह सदस्य और थे, जिनके नाम इस प्रकार हैं—) धनुष, रैभ्य, अर्वावसु, परावसु, मुनिवर मेधातिथि, महर्षि ताण्ड्य, महाभाग शान्तिमुनि, वेदशिरा, शालिहोत्रके पिता ऋषिश्रेष्ठ कपिल, आद्यकठ, वैशम्पायनके बड़े भाई तैत्तिरि, कण्व और देवहोत्र। ये कुल मिलाकर सोलह सदस्य बताये गये हैं ॥ ७–९ ॥
सम्भूताः सर्वसम्भारस्तस्मिन् राजन् महाक्रतौ ।
न तत्र पशुघातोऽभूत् स राजैवं स्थितोऽभवत् ॥ १० ॥
राजन्! उस महान् यज्ञमें सारे सामान एकत्र किये गये; परंतु उसमें किसी पशुका वध नहीं हुआ। वे राजा उपरिचर इसी भावसे उस यज्ञमें स्थित हुए थे ॥ १० ॥
अहिंस्रः शुचिरक्षुद्रो निराशीः कर्मसंस्तुतः ।
आरण्यकपदोद्भूता भागास्तत्रोपकल्पिताः ॥ ११ ॥
वे हिंसाभावसे रहित, पवित्र, उदार तथा कामनाओंसे रहित थे और इसी भावसे कर्ममें प्रवृत्त हुए थे। जंगलमें उत्पन्न हुए फल-मूल आदि पदार्थोंसे ही उस यज्ञमें देवताओंके भाग निश्चित किये गये थे ॥ ११ ॥
प्रीतस्ततोऽस्य भगवान् देवदेवः पुरातनः ।
साक्षात् तं दर्शयामास सोऽदृश्योऽन्येन केनचित् ॥ १२ ॥
उस समय पुराणपुरुष देवाधिदेव भगवान् नारायणने प्रसन्न होकर राजाको प्रत्यक्ष दर्शन दिया; परंतु दूसरे किसीको उनका दर्शन नहीं हुआ ॥ १२ ॥
स्वयं भागमुपाघ्राय पुरोडाशं गृहीतवान् ।
अदृश्येन हृतो भागो देवेन हरिमेधसा ॥ १३ ॥
भगवान् हयग्रीवने स्वयं अदृश्य रहकर ही अपने लिये अर्पित पुरोडाशको ग्रहण किया और उसे सूँघकर अपने अधीन कर लिया ॥ १३ ॥
बृहस्पतिस्ततः क्रुद्धः स्रुचमुद्यम्य वेगितः ।
आकाशं घ्नन् स्रुचः पातै रोषादश्रूण्यवर्तयत् ॥ १४ ॥
यह देख बृहस्पति क्रोधमें भर गये। उन्होंने बड़े वेगसे स्रुवा उठा लिया और आकाशमें उसे दे मारा। साथ ही वे रोषवश अपने नेत्रोंसे आँसू बहाने लगे ॥ १४ ॥
उवाच चोपरिचरं मया भागोऽयमुद्यतः ।
ग्राह्यः स्वयं हि देवेन मत्प्रत्यक्षं न संशयः ॥ १५ ॥
फिर वे राजा उपरिचरसे बोले—'मैंने जो यह भाग प्रस्तुत किया है, उसे भगवान्को मेरी आँखोंके सामने प्रकट होकर ग्रहण करना चाहिये, यही न्याय है, इसमें संशय नहीं है' ॥ १५ ॥
युधिष्ठिर उवाच
उद्यता यज्ञभागा हि साक्षात् प्राप्ताः सुरैरिह ।
किमर्थमिह न प्राप्तो दर्शनं स हरिर्विभुः ॥ १६ ॥
**युधिष्ठिरने पूछा—**पितामह! जब सभी देवताओंने प्रत्यक्ष दर्शन देकर अपने-अपने भाग ग्रहण किये, तब भगवान् विष्णुने उस यज्ञमें पधारकर भी क्यों प्रत्यक्ष दर्शन नहीं दिया? ॥ १६ ॥
भीष्म उवाच
ततः स तं समुद्भूतं भूमिपालो महान् वसुः ।
प्रसादयामास मुनिं सदस्यास्ते च सर्वशः ॥ १७ ॥
**भीष्मजीने कहा—**युधिष्ठिर! इसका कारण बताता हूँ, सुनो। वे महान् भूपाल वसु तथा अन्य सम्पूर्ण सदस्य मिलकर उस समय रोषमें भरे हुए मुनि बृहस्पतिको मनाने लगे ॥ १७ ॥
ऊचुश्चैनमसम्भ्रान्ता न रोषं कर्तुमर्हसि ।
नैष धर्मः कृतयुगे यस्त्वं रोषमचीकृथाः ॥ १८ ॥
सब लोग शान्तचित्त होकर उनसे बोले—'मुने! आप रोष न करें। आपने जो रोष किया है, यह सत्ययुगका धर्म नहीं है ॥ १८ ॥
अरोषणो ह्यसौ देवो यस्य भागोऽयमुद्यतः ।
न शक्यः स त्वया द्रष्टुमस्माभिर्वा बृहस्पते ॥ १९ ॥
यस्य प्रसादं कुरुते स वै तं द्रष्टुमर्हति ।
'बृहस्पते! जिनको यह भाग समर्पित किया गया है वे भगवान् कभी क्रोध नहीं करते। हम और आप उन्हें स्वेच्छासे नहीं देख सकते हैं। जिसपर वे कृपा करते हैं वही उनका दर्शन कर पाता है' ॥ १९ १/२ ॥
एकतद्वितत्रिताश्चोचुस्ततश्चित्रशिखण्डिनः ॥ २० ॥
वयं हि ब्रह्मणः पुत्रा मानसाः परिकीर्तिताः ।
गता निःश्रेयसार्थं हि कदाचिद् दिशमुत्तराम् ॥ २१ ॥
तदनन्तर एकत, द्वित और त्रितने तथा चित्रशिखण्डी नामवाले ऋषियोंने उनसे कहा—'बृहस्पते! हमलोग ब्रह्माजीके मानसपुत्र कहलाते हैं। एक बार अपने कल्याणकी इच्छासे हम सबने उत्तर दिशाकी यात्रा की ॥ २०-२१ ॥
तप्त्वा वर्षसहस्राणि चरित्वा तप उत्तमम् ।
एकपादाः स्थिताः सम्यक् काष्ठभूताः समाहिताः ॥ २२ ॥
मेरोरुत्तरभागे तु क्षीरोदस्यानुकूलतः ।
स देशो यत्र नस्तप्तं तपः परमदारुणम् ॥ २३ ॥
कथं पश्येम हि वयं देवं नारायणात्मकम् ।
वरेण्यं वरदं तं वै देवदेवं सनातनम् ॥ २४ ॥
‘वहाँ मेरुके उत्तर और क्षीरसागरके किनारे एक पवित्र स्थान है, जहाँ हमलोगोंने हजार वर्षोंतक एकाग्रचित्त हो काष्ठकी भाँति एक पैरसे खड़े होकर बड़ी कठोर तपस्या की थी। वह उत्तम तपस्या करके हम यही चाहते थे कि किसी तरह वरदायक सनातन देवाधिदेव वरणीय भगवान् नारायणका दर्शन कर लें ॥ २२-२४ ॥
कथं पश्येम हि वयं देवं नारायणं त्विति ।
अथ व्रतस्यावभृथे वागुवाचाशरीरिणी ॥ २५ ॥
स्निग्धगम्भीरया वाचा प्रहर्षणकरी विभो ।
‘हम बारंबार यही सोचते थे कि हमें श्रीनारायणदेवका दर्शन कैसे प्राप्त होगा? तदनन्तर व्रतकी समाप्ति होनेपर हमें हर्ष प्रदान करनेवाली किसी शरीररहित वाणीने स्नेहपूर्ण गम्भीर स्वरसे इस प्रकार कहा— ॥ २५ १/२ ॥
सुतप्तं वस्तपो विप्राः प्रसन्नेनान्तरात्मना ॥ २६ ॥
यूयं जिज्ञासवो भक्ताः कथं द्रक्ष्यथ तं विभुम् ।
‘ब्राह्मणो! तुमने प्रसन्न हृदयसे भलीभाँति तप किया है। तुम भगवान्के भक्त हो और यह जानना चाहते हो कि उन सर्वव्यापी परमात्माका दर्शन कैसे हो? ॥
क्षीरोदधेरुत्तरतः श्वेतद्वीपो महाप्रभः ॥ २७ ॥
तत्र नारायणपरा मानवाश्चन्द्रवर्चसः ।
‘इसका उपाय सुनो। क्षीरसागरके उत्तरभागमें अत्यन्त प्रकाशमान श्वेतद्वीप है। वहाँ भगवान् नारायणका भजन करनेवाले पुरुष रहते हैं, जो चन्द्रमाके समान कान्तिमान् हैं ॥ २७ १/२ ॥
एकान्तभावोपगतास्ते भक्ताः पुरुषोत्तमम् ॥ २८ ॥
ते सहस्रार्चिषं देवं प्रविशन्ति सनातनम् ।
अनिन्द्रिया निराहारा अनिष्पन्दाः सुगन्धिनः ॥ २९ ॥
‘वे स्थूल इन्द्रियोंसे रहित, निराहार और निश्चेष्ट होते हैं। उनके शरीरसे मनोहर सुगन्ध निकलती रहती है तथा वे भगवान्के अनन्य भक्त होते हैं और सहस्रों किरणोंवाले उन सनातनदेव भगवान् पुरुषोत्तममें प्रवेश कर जाते हैं ॥ २८-२९ ॥
एकान्तिनस्ते पुरुषाः श्वेतद्वीपनिवासिनः ।
गच्छध्वं तत्र मुनयस्तत्रात्मा मे प्रकाशितः ॥ ३० ॥
‘मुनियो! वे श्वेतद्वीपके निवासी मेरे एकान्त भक्त हैं, तुम वहीं जाओ। वहाँ मेरे स्वरूपका प्रत्यक्ष दर्शन होता है’ ॥ ३० ॥
अथ श्रुत्वा वयं सर्वे वाचं तामशरीरिणीम् ।
यथाख्यातेन मार्गेण तं देशं प्रतिपेदिरे ॥ ३१ ॥
‘इस आकाशवाणीको सुनकर हमलोग उसके बताये हुए मार्गसे उस स्थानको गये ॥ ३१ ॥
प्राप्य श्वेतं महाद्वीपं तच्चित्तास्तद्दिदृक्षवः ।
ततोऽस्मद्दृष्टिविषयस्तदा प्रतिहतोऽभवत् ॥ ३२ ॥
‘श्वेत नामक महाद्वीपमें पहुँचकर हमारा चित्त भगवान्में ही लगा रहा। हम उनके दर्शनकी इच्छासे उत्कण्ठित हो रहे थे। वहाँ जाते ही हमारी दृष्टिशक्ति प्रतिहत हो गयी ॥ ३२ ॥
न च पश्याम पुरुषं तत्तेजोहृतदर्शनाः ।
ततो नः प्रादुरभवद् विज्ञानं दैवयोगजम् ॥ ३३ ॥
न किलातप्ततपसा शक्यते द्रष्टुमञ्जसा ।
‘वहाँके निवासियोंके तेजसे आँखें चौंधिया जानेके कारण हम वहाँ किसी पुरुषको देख नहीं पाते थे। तदनन्तर दैवयोगसे हमारे हृदयमें यह ज्ञान प्रकट हुआ कि तपस्या किये बिना हमलोग भगवान्को सुगमतापूर्वक नहीं देख सकते ॥ ३३ १/२ ॥
ततः पुनर्वर्षशतं तप्त्वा तात्कालिकं महत् ॥ ३४ ॥
व्रतावसाने च शुभान् नरान् ददृशिरे वयम् ।
श्वेतांश्चन्द्रप्रतीकाशान् सर्वलक्षणलक्षितान् ॥ ३५ ॥
‘तदनन्तर हमने तत्काल पुनः सौ वर्षोंतक बड़ी भारी तपस्या की। उस तपोमय व्रतके पूर्ण होनेपर हमलोगोंको वहाँके शुभलक्षण पुरुषोंका दर्शन हुआ, जो चन्द्रमाके समान गौरवर्ण और सब प्रकारके उत्तम लक्षणोंसे सम्पन्न थे ॥ ३४-३५ ॥
नित्याञ्जलिकृतान् ब्रह्म जपतः प्रागुदङ्मुखान् ।
मानसो नाम स जपो जप्यते तैर्महात्मभिः ॥ ३६ ॥
‘वे प्रतिदिन ईशानकोणकी ओर मुँह करके हाथ जोड़े हुए ब्रह्मका मानसजप करते थे ॥ ३६ ॥
तेनैकाग्रमनस्त्वेन प्रीतो भवति वै हरिः ।
याऽभवन्मुनिशार्दूल भाः सूर्यस्य युगक्षये ॥ ३७ ॥
एकैकस्य प्रभा तादृक् साभवन्मानवस्य ह ।
‘उनके मनकी इस एकाग्रतासे भगवान् श्रीहरि प्रसन्न होते थे। मुनिश्रेष्ठ! प्रलयकालमें सूर्यकी जैसी प्रभा होती है, वैसी ही उस द्वीपमें रहनेवाले प्रत्येक पुरुषकी थी ॥
तेजोनिवासः स द्वीप इति वै मेनिरे वयम् ॥ ३८ ॥
न तत्राभ्यधिकः कश्चित् सर्वे ते समतेजसः ।
‘हमलोगोंने तो यही समझा कि यह द्वीप तेजका ही निवासस्थान है। वहाँ कोई किसीसे बढ़कर नहीं था। सबका तेज समान था ।। ३८ १/२ ।।
अथ सूर्यसहस्रस्य प्रभां युगपदुत्थिताम् ।। ३९ ।।
सहसा दृष्टवन्तः स्म पुनरेव बृहस्पते ।
‘बृहस्पते! थोड़ी ही देरमें हमारे सामने एक ही साथ हजारों सूर्योंके समान प्रभा प्रकट हुई। हमारी दृष्टि सहसा उस ओर खिंच गयी ।। ३९ १/२ ।।
सहिताश्चाभ्यधावन्त ततस्ते मानवा द्रुतम् ।। ४० ।।
कृताञ्जलिपुटा हृष्टा नम इत्येव वादिनः ।
‘तदनन्तर वहाँके निवासी पुरुष बड़ी प्रसन्नताके साथ दोनों हाथ जोड़े ‘नमो नमः’ कहते हुए एक ही साथ तीव्र गतिसे उस तेजकी ओर दौड़े ।। ४० १/२ ।।
ततो हि वदतां तेषामश्रौष्म विपुलं ध्वनिम् ।। ४१ ।।
बलिः किलोपह्रियते तस्य देवस्य तैनरैः ।
‘इसके बाद जब वे स्तुति करने लगे, तब उनकी तुमुल ध्वनि हमारे कानोंमें पड़ी। वे सब लोग उन तेजोमय भगवान्को पूजाकी सामग्री अर्पण कर रहे थे ।।
वयं तु तेजसा तस्य सहसा हृतचेतसः ।। ४२ ।।
न किंचिदपि पश्यामो हतचक्षुर्बलेन्द्रियाः ।
‘भगवान्के उस अनिर्वचनीय तेजने हमारे चित्तको सहसा खींच लिया था; परंतु हमारे नेत्र, बल और इन्द्रियाँ प्रतिहत हो गयी थीं, इसलिये हम स्पष्ट रूपसे कुछ देख नहीं पाते थे ।। ४२ १/२ ।।
एकस्तु शब्दो विततः श्रुतोऽस्माभिरुदीरितः ।। ४३ ।।
जितं ते पुण्डरीकाक्ष नमस्ते विश्वभावन ।
नमस्तेऽस्तु हृषीकेश महापुरुषपूर्वज ।। ४४ ।।
‘परंतु एक शब्द जो उच्चस्वरसे उच्चारित होकर दूरतक फैल रहा था, हमने भी सुना। सब लोग कह रहे थे—‘पुण्डरीकाक्ष! आपकी जय हो। विश्वभावन! आपको प्रणाम है। महापुरुषोंके भी पूर्वज हृषीकेश! आपको नमस्कार है’ ।। ४३-४४ ।।
इति शब्दः श्रुतोऽस्माभिः शिक्षाक्षरसमन्वितः ।
एतस्मिन्नन्तरे वायुः सर्वगन्धवहः शुचिः ।। ४५ ।।
दिव्यान्युवाह पुष्पाणि कर्मण्यांश्चौषधीस्तथा ।
तैरिष्टः पञ्चकालज्ञैर्हरिरेकान्तिभिर्नरैः ।। ४६ ।।
भक्त्या परमया युक्तैर्मनोवाक्कर्मभिस्तदा ।
'शिक्षा और अक्षरसे युक्त यह वाक्य हमलोगोंको श्रवणगोचर हुआ। इतनेहीमें पवित्र और सुगन्धित वायु बहुत-से दिव्य पुष्प और कार्योपयोगी ओषधियाँ ले आयी, जिनसे वहाँके पंचकालवेत्ता अनन्य भक्तों ने बड़ी भक्तिके साथ मन, वाणी और क्रियाद्वारा उन श्रीहरिका पूजन किया ।। ४५-४६ १/२ ।।
नूनं तत्रागतो देवो यथा तैर्वागुदीरिता ।। ४७ ।।
वयं त्वेनं न पश्यामो मोहितास्तस्य मायया ।
'जैसी बातचीत उन्होंने की थी, उससे हमें विश्वास हो गया था कि निश्चय ही यहाँ भगवान् पधारे हुए हैं, परंतु उन्हींकी मायासे मोहित होनेके कारण हम उन्हें देख नहीं पाते थे ।। ४७ १/२ ।।
मारुते संनिवृत्ते च बलौ च प्रतिपादिते ।। ४८ ।।
चिन्ताव्याकुलितात्मानो जाताः स्मोऽङ्गिरसां वर ।
'बृहस्पते! जब उस सुगन्धित वायुका चलना बंद हो गया और भगवान्को बलिसमर्पणका कार्य पूर्ण हो गया तब हमलोग मन-ही-मन चिन्तासे व्याकुल हो उठे ।।
मानवानां सहस्रेषु तेषु वै शुद्धयोनिषु ।। ४९ ।।
अस्मान् कश्चिन्मनसा चक्षुषा वाप्यपूजयत् ।
'वहाँ शुद्ध कुलवाले सहस्रों पुरुष थे; परंतु उनमेंसे किसीने मनसे अथवा दृष्टिपातद्वारा भी हमलोगोंका सत्कार नहीं किया ।। ४९ १/२ ।।
तेऽपि स्वस्था मुनिगणा एकभावमनुव्रताः ।। ५० ।।
नास्मासु दधिरे भावं ब्रह्मभावमनुष्ठिताः ।
वहाँ जो स्वस्थ मुनिगण थे, वे भी अनन्य भावसे भगवान्के भजनमें ही मन लगाये रहते थे। उन ब्रह्मभावमें स्थित मुनियोंने हमलोगोंकी ओर ध्यान नहीं दिया ।। ५० १/२ ।।
ततोऽस्मान् सुपरिश्रान्तांस्तपसा चातिकर्शितान् ।। ५१ ।।
उवाच स्वस्थं किमपि भूतं तत्राशरीरकम् ।
'हमलोग तपस्यासे थककर अत्यन्त दुर्बल हो गये थे। उस समय हमलोगोंसे किसी शरीररहित स्वस्थ प्राणी (देवता) ने कहा ।। ५१ १/२ ।।
देव उवाच
दृष्टा वः पुरुषाः श्वेताः सर्वेन्द्रियविवर्जिताः ।। ५२ ।।
दृष्टो भवति देवेश एभिर्दृष्टैर्द्विजोत्तमैः ।
देवता बोले— मुनिवरो! तुमलोगोंने श्वेतद्वीपनिवासी श्वेतकाय इन्द्रियरहित पुरुषोंका दर्शन किया। इन श्रेष्ठ द्विजोंके दर्शन होनेसे साक्षात् देवेश्वर भगवान्का ही दर्शन हो जाता है ।। ५२ १/२ ।।
गच्छध्वं मुनयः सर्वे यथागतमितोऽचिरात् ।। ५३ ।।
न स शक्यस्त्वभक्तेन द्रष्टुं देवः कथंचन ।
मुनियो! तुम सब लोग जैसे आये हो, वैसे ही शीघ्र लौट जाओ। भगवान्में अनन्य भक्ति हुए बिना किसीको किसी तरह भी उनका साक्षात् दर्शन नहीं हो सकता ।।
कामं कालेन महता एकान्तित्वमुपागतैः ।। ५४ ।।
शक्यो द्रष्टुं स भगवान् प्रभामण्डलदुर्द्दशः ।
हाँ, बहुत समयतक उनकी भक्ति करते-करते जब पूरी अनन्यता आ जायगी, तब ज्योतिःपुंजके कारण कठिनाईसे देखे जानेवाले भगवान्का दर्शन सम्भव हो सकता है ।। ५४ १/२ ।।
महत् कार्यं च कर्तव्यं युष्माभिर्द्विजसत्तमाः ।। ५५ ।।
इतः कृतयुगेऽतीते विपर्यासं गतेऽपि च ।
वैवस्वतेऽन्तरे विप्राः प्राप्ते त्रेतायुगे पुनः ।। ५६ ।।
सुराणां कार्यसिद्धयर्थं सहाया वै भविष्यथ ।
विप्रवरो! इस समय तुम्हें अभी बहुत बड़ा काम करना है। इस सत्ययुगके बीतनेपर जब धर्ममें किंचित् व्यतिक्रम आ जायगा और वैवस्वत मन्वन्तरके त्रेतायुगका आरम्भ होगा, उस समय देवताओंके कार्यकी सिद्धिके लिये तुमलोग ही सहायक होगे ।। ५५-५६ १/२ ।।
ततस्तदद्भुतं वाक्यं निशम्यैवामृतोपमम् ।। ५७ ।।
तस्य प्रसादात् प्राप्ताः स्मो देशमीप्सितमञ्जसा ।
‘यह अमृतके समान मधुर एवं अद्भुत वचन सुनकर हमलोग भगवान्की कृपासे अनायास ही अपने अभीष्ट स्थानपर आ पहुँचे ।। ५७ १/२ ।।
एवं सुतपसा चैव हव्यकव्यैस्तथैव च ।। ५८ ।।
देवोऽस्माभिर्न दृष्टः स कथं त्वं द्रष्टुमर्हसि ।
‘बृहस्पते! इस प्रकार हमने बड़ी भारी तपस्या की, हव्य-कव्योंके द्वारा भगवान्का पूजन भी किया, तो भी हमें उनका दर्शन न हो सका। फिर तुम कैसे अनायास ही उनका दर्शन पा लोगे? ।। ५८ १/२ ।।
नारायणो महद्भूतं विश्वसृग्हव्यकव्यभुक् ।। ५९ ।।
अनादिनिधनोऽव्यक्तो देवदानवपूजितः ।
‘भगवान् नारायण सबसे महान् देवता हैं। वे ही संसारके स्रष्टा और हव्य-कव्यके भोक्ता हैं। उनका आदि और अन्त नहीं है। उन अव्यक्त परमेश्वरकी देवता और दानव भी पूजा करते हैं’ ।। ५९ १/२ ।।
एवमेकतवाक्येन द्वितत्रितमतेन च ।। ६० ।।
अनुनीतः सदस्यैश्च बृहस्पतिरुदारधीः ।
समापयत् ततो यज्ञं दैवतं समपूजयत् ।। ६१ ।।
इस प्रकार एकतके कहनेसे, द्वित और त्रितकी सम्मतिसे तथा अन्य सदस्योंद्वारा अनुनय किये जानेसे उदारबुद्धि बृहस्पतिने उस यज्ञको समाप्त किया और भगवान्की पूजा की॥ ६०-६१॥
समाप्तयज्ञो राजापि प्रजां पालितवान् वसुः ।
ब्रह्मशापाद् दिवो भ्रष्टः प्रविवेश महीं ततः ॥ ६२ ॥
राजा वसु भी यज्ञ पूरा करके प्रजाका पालन करने लगे। एक बार ब्रह्मशापसे उन्हें स्वर्गसे भ्रष्ट होना पड़ा था। उस समय वे पृथ्वीके भीतर रसातलमें समा गये थे॥ ६२ ॥
स राजा राजशार्दूल सत्यधर्मपरायणः ।
अन्तर्भूमिगतश्चैव सततं धर्मवत्सलः ॥ ६३ ॥
नारायणपरो भूत्वा नारायणजयं जपन् ।
तस्यैव च प्रसादेन पुनरेवोत्थितस्तु सः ॥ ६४ ॥
महीतलाद् गतः स्थानं ब्रह्मणः समनन्तरम् ।
परां गतिमनुप्राप्त इति नैष्ठिकमञ्जसा ॥ ६५ ॥
नृपश्रेष्ठ! सदा धर्मपर अनुराग रखनेवाले सत्यधर्मपरायण राजा उपरिचर भूमिके भीतर प्रवेश करके भी निरन्तर नारायण-मन्त्रका जप करते हुए भी उन्हींकी आराधनामें तत्पर रहते थे। अतः उन्हींकी कृपासे वे पुनः ऊपरको उठे और भूतलसे ब्रह्मलोकमें जाकर उन्होंने परम गति प्राप्त कर ली। अनायास ही उन्हें निष्ठावानोंकी यह उत्तम गति प्राप्त हो गयी॥ ६३—६५॥
इति श्रीमहाभारते शान्तिपर्वणि मोक्षधर्मपर्वणि नारायणीये
षट्त्रिंशदधिकत्रिशततमोऽध्यायः ॥ ३३६ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत शान्तिपर्वके अन्तर्गत मोक्षधर्मपर्वमें नारायणकी महत्ताका वर्णनविषयक तीन सौ छत्तीसवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ ३३६ ॥