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सर्वकोश
महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,450 पृष्ठ

पृष्ठ 2254, कुल 2450 में से

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पृष्ठ 2254

फिर वे राजा उपरिचरसे बोले—'मैंने जो यह भाग प्रस्तुत किया है, उसे भगवान्‌को मेरी आँखोंके सामने प्रकट होकर ग्रहण करना चाहिये, यही न्याय है, इसमें संशय नहीं है' ॥ १५ ॥

युधिष्ठिर उवाच

उद्यता यज्ञभागा हि साक्षात् प्राप्ताः सुरैरिह ।
किमर्थमिह न प्राप्तो दर्शनं स हरिर्विभुः ॥ १६ ॥
**युधिष्ठिरने पूछा—**पितामह! जब सभी देवताओंने प्रत्यक्ष दर्शन देकर अपने-अपने भाग ग्रहण किये, तब भगवान् विष्णुने उस यज्ञमें पधारकर भी क्यों प्रत्यक्ष दर्शन नहीं दिया? ॥ १६ ॥

भीष्म उवाच

ततः स तं समुद्भूतं भूमिपालो महान् वसुः ।
प्रसादयामास मुनिं सदस्यास्ते च सर्वशः ॥ १७ ॥
**भीष्मजीने कहा—**युधिष्ठिर! इसका कारण बताता हूँ, सुनो। वे महान् भूपाल वसु तथा अन्य सम्पूर्ण सदस्य मिलकर उस समय रोषमें भरे हुए मुनि बृहस्पतिको मनाने लगे ॥ १७ ॥

ऊचुश्चैनमसम्भ्रान्ता न रोषं कर्तुमर्हसि ।
नैष धर्मः कृतयुगे यस्त्वं रोषमचीकृथाः ॥ १८ ॥
सब लोग शान्तचित्त होकर उनसे बोले—'मुने! आप रोष न करें। आपने जो रोष किया है, यह सत्ययुगका धर्म नहीं है ॥ १८ ॥

अरोषणो ह्यसौ देवो यस्य भागोऽयमुद्यतः ।
न शक्यः स त्वया द्रष्टुमस्माभिर्वा बृहस्पते ॥ १९ ॥
यस्य प्रसादं कुरुते स वै तं द्रष्टुमर्हति ।
'बृहस्पते! जिनको यह भाग समर्पित किया गया है वे भगवान् कभी क्रोध नहीं करते। हम और आप उन्हें स्वेच्छासे नहीं देख सकते हैं। जिसपर वे कृपा करते हैं वही उनका दर्शन कर पाता है' ॥ १९ १/२ ॥

एकतद्वितत्रिताश्चोचुस्ततश्चित्रशिखण्डिनः ॥ २० ॥
वयं हि ब्रह्मणः पुत्रा मानसाः परिकीर्तिताः ।
गता निःश्रेयसार्थं हि कदाचिद् दिशमुत्तराम् ॥ २१ ॥
तदनन्तर एकत, द्वित और त्रितने तथा चित्रशिखण्डी नामवाले ऋषियोंने उनसे कहा—'बृहस्पते! हमलोग ब्रह्माजीके मानसपुत्र कहलाते हैं। एक बार अपने कल्याणकी इच्छासे हम सबने उत्तर दिशाकी यात्रा की ॥ २०-२१ ॥

तप्त्वा वर्षसहस्राणि चरित्वा तप उत्तमम् ।