महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व
Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
भीष्मद्वारा राज्यरक्षाके साधनोंका वर्णन तथा संध्याके समय युधिष्ठिर आदिका विदा होना और रास्तेमें स्नान-संध्यादि नित्यकर्मसे निवृत्त होकर हस्तिनापुरमें
अष्टपञ्चाशत्तमोऽध्यायः
भीष्मद्वारा राज्यरक्षाके साधनोंका वर्णन तथा संध्याके समय युधिष्ठिर आदिका विदा होना और रास्तेमें स्नान-संध्यादि नित्यकर्मसे निवृत्त होकर हस्तिनापुरमें प्रवेश
भीष्म उवाच
एतत् ते राजधर्माणां नवनीतं युधिष्ठिर ।
बृहस्पतिर्हि भगवान् न्याय्यं धर्मं प्रशंसति ॥ १ ॥
भीष्मजी कहते हैं—युधिष्ठिर! यह मैंने तुमसे जो कुछ कहा है, राजधर्मरूपी दूधका माखन है। भगवान् बृहस्पति इस न्यायानुकूल धर्मकी ही प्रशंसा करते हैं ॥ १ ॥
विशालाक्षश्च भगवान् काव्यश्चैव महातपाः ।
सहस्राक्षो महेन्द्रश्च तथा प्राचेतसो मनुः ॥ २ ॥
भरद्वाजश्च भगवांस्तथा गौरशिरा मुनिः ।
राजशास्त्रप्रणेतारो ब्रह्मण्या ब्रह्मवादिनः ॥ ३ ॥
रक्षामेव प्रशंसन्ति धर्मं धर्मभृतां वर ।
राज्ञां राजीवताम्राक्ष साधनं चात्र मे शृणु ॥ ४ ॥
इनके सिवा भगवान् विशालाक्ष, महातपस्वी शुक्राचार्य, सहस्र नेत्रोंवाले इन्द्र, प्राचेतस मनु, भगवान् भरद्वाज और मुनिवर गौरशिरा—ये सभी ब्राह्मणभक्त और ब्रह्मवादी लोग राजशास्त्रके प्रणेता हैं, ये सब राजाके लिये प्रजापालनस्वरूप धर्मकी ही प्रशंसा करते हैं। धर्मात्माओंमें श्रेष्ठ कमलनयन युधिष्ठिर! इस रक्षात्मक धर्मके साधनोंका वर्णन करता हूँ, सुनो ॥ २—४ ॥
चारश्च प्रणिधिश्चैव काले दानममत्सरात् ।
युक्त्यादानं न चादानमयोगेन युधिष्ठिर ॥ ५ ॥
सतां संग्रहणं शौर्यं दाक्ष्यं सत्यं प्रजाहितम् ।
अनार्जवैराजर्वैश्च शत्रुपक्षस्य भेदनम् ॥ ६ ॥
केतनानां च जीर्णानामवेक्षा चैव सीदताम् ।
द्विविधस्य च दण्डस्य प्रयोगः कालचोदितः ॥ ७ ॥
साधूनामपरित्यागः कुलीनानां च धारणम् ।
निचयश्च निचेयानां सेवा बुद्धिमतामपि ॥ ८ ॥
बलानां हर्षणं नित्यं प्रजानामन्ववेक्षणम् ।
कार्येष्वखेदः कोशस्य तथैव च विवर्धनम् ॥ ९ ॥
पुरगुप्तिरविश्वासः पौरसंघातभेदनम् ।
अरिमध्यस्थमित्राणां यथावच्चान्वेक्षणम् ॥ १० ॥
उपजापश्च भृत्यानामात्मनः पुरदर्शनम् ।
अविश्वासः स्वयं चैव परस्याश्वासनं तथा ॥ ११ ॥
नीतिधर्मानुसरणं नित्यमुत्थानमेव च ।
रिपूणामनवज्ञानं नित्यं चानार्यवर्जनम् ॥ १२ ॥
युधिष्ठिर! गुप्तचर (जासूस) रखना, दूसरे राष्ट्रोंमें अपना प्रतिनिधि (राजदूत) नियुक्त करना, सेवकोंको उनके प्रति ईर्ष्या न रखते हुए समयपर वेतन और भत्ता देना, युक्तिसे कर लेना, अन्यायसे प्रजाके धनको न हड़पना, सत्पुरुषोंका संग्रह करना, शूरता, कार्यदक्षता, सत्यभाषण, प्रजाका हित-चिन्तन, सरल या कुटिल उपायोंसे भी शत्रुपक्षमें फूट डालना, पुराने घरोंकी मरम्मत एवं मन्दिरोंका जीर्णोद्धार कराना, दीन-दुखियोंकी देखभाल करना, समयानुसार शारीरिक और आर्थिक दोनों प्रकारके दण्डका प्रयोग करना, साधु पुरुषोंका त्याग न करना, कुलीन मनुष्योंको अपने पास रखना, संग्रहयोग्य वस्तुओंका संग्रह करना, बुद्धिमान् पुरुषोंका सेवन करना, पुरस्कार आदिके द्वारा सेनाका हर्ष और उत्साह बढ़ाना, नित्य-निरन्तर प्रजाकी देख-भाल करना, कार्य करनेमें कष्टका अनुभव न करना, कोषको बढ़ाना, नगरकी रक्षाका पूरा प्रबन्ध करना, इस विषयमें दूसरोंके विश्वासपर न रहना, पुरवासियोंने अपने विरुद्ध कोई गुटबंदी की हो तो उसमें फूट डलवा देना, शत्रु, मित्र और मध्यस्थोंपर यथोचित दृष्टि रखना, दूसरोंके द्वारा अपने सेवकोंमें भी गुटबंदी न होने देना, स्वयं ही अपने नगरका निरीक्षण करना, स्वयं किसीपर भी पूरा विश्वास न करना, दूसरोंको आश्वासन देना, नीतिधर्मका अनुसरण करना, सदा ही उद्योगशील बने रहना, शत्रुओंकी ओरसे सावधान रहना और नीच कर्मों तथा दुष्ट पुरुषोंको सदाके लिये त्याग देना—ये सभी राज्यकी रक्षाके साधन हैं ॥ ५—१२ ॥
उत्थानं हि नरेन्द्राणां बृहस्पतिरभाषत ।
राजधर्मस्य तन्मूलं श्लोकांश्चात्र निबोध मे ॥ १३ ॥
बृहस्पतिने राजाओंके लिये उद्योगके महत्त्वका प्रतिपादन किया है। उद्योग ही राजधर्मका मूल है। इस विषयमें जो श्लोक हैं, उन्हें बताता हूँ, सुनो ॥ १३ ॥
उत्थानेनामृतं लब्धमुत्थानेनासुरा हताः ।
उत्थानेन महेन्द्रेण श्रेष्ठ्यं प्राप्तं दिवीह च ॥ १४ ॥
'देवराज इन्द्रने उद्योगसे ही अमृत प्राप्त किया, उद्योगसे ही असुरोंका संहार किया तथा उद्योगसे ही देवलोक और इहलोकमें श्रेष्ठता प्राप्त की ॥ १४ ॥
उत्थानवीरः पुरुषो वाग्वीरानधितिष्ठति ।
उत्थानवीरान् वाग्वीरा रमयन्त उपासते ॥ १५ ॥
'जो उद्योगमें वीर है, वह पुरुष केवल वाग्वीर पुरुषोंपर अपना आधिपत्य जमा लेता
है। वाग्वीर विद्वान् उद्योगवीर पुरुषोंका मनोरञ्जन करते हुए उनकी उपासना करते
हैं।। १५ ।।
उत्थानहीनो राजा हि बुद्धिमानपि नित्यशः।
प्रधर्षणीयः शत्रूणां भुजङ्ग इव निर्विषः।। १६ ।।
'जो राजा उद्योगहीन होता है, वह बुद्धिमान् होनेपर भी विषहीन सर्पके समान सदैव
शत्रुओंके द्वारा परास्त होता रहता है।। १६ ।।
न च शत्रुरवज्ञेयो दुर्बलोऽपि बलीयसा।
अल्पोऽपि हि दहत्यग्निर्विषमल्पं हिनस्ति च।। १७ ।।
'बलवान् पुरुष कभी दुर्बल शत्रुकि भी अवहेलना न करे अर्थात् उसे छोटा समझकर
उसकी ओरसे लापरवाही न दिखावे; क्योंकि आग थोड़ी-सी हो तो भी जला डालती है और
विष कम मात्रामें हो तो भी मार डालता है।। १७ ।।
एकाङ्गेनापि सम्भूतः शत्रुदुर्गमुपाश्रितः।
सर्वं तापयते देशमपि राज्ञः समृद्धिनः।। १८ ।।
'चतुरङ्गिणी सेनाके एक अङ्गसे भी सम्पन्न हुआ शत्रु दुर्गका आश्रय लेकर समृद्धिशाली
राजाके समूचे देशको भी संतप्त कर डालता है' ।। १८ ।।
राज्ञो रहस्यं यद् वाक्यं जयार्थं लोकसंग्रहः।
हृदि यच्चास्य जिह्यं स्यात् कारणेन च यद् भवेत् ।। १९ ।।
यच्चास्य कार्यं वृजिनमार्जवेनैव धारयेत् ।
दम्भनार्थं च लोकस्य धर्मिष्ठामाचरेत् क्रियाम् ।। २० ।।
राजाके लिये जो गोपनीय रहस्यकी बात हो, शत्रुओंपर विजय पानेके लिये वह जो
लोगोंका संग्रह करता हो, विजयके ही उद्देश्यसे उसके हृदयमें जो कार्य छिपा हो अथवा उसे
जो न करने योग्य असत्-कार्य करना हो, वह सब कुछ उसे सरलभावसे ही छिपाये रखना
चाहिये। वह लोगोंमें अपनी प्रतिष्ठा बनाये रखनेके लिये सदा धार्मिक कर्मोंका अनुष्ठान
करे।।
राज्यं हि सुमहत् तन्त्रं धार्यते नाकृतात्मभिः ।
न शक्यं मृदुना वोढुमायास्सथानमुत्तमम् ।। २१ ।।
राज्य एक बहुत बड़ा तन्त्र है। जिन्होंने अपने मनको वशमें नहीं किया है, ऐसे क्रूर-
स्वभाववाले राजा उस विशाल तन्त्रको सँभाल नहीं सकते। इसी प्रकार जो बहुत कोमल
प्रकृतिके होते हैं, वे भी इसका भार वहन नहीं कर सकते। उनके लिये राज्य बड़ा भारी
जंजाल हो जाता है ।। २१ ।।
राज्यं सर्वामिषं नित्यमार्जवेनेह धार्यते ।
तस्मान्मिश्रेण सततं वर्तितव्यं युधिष्ठिर ।। २२ ।।
युधिष्ठिर! राज्य सबके उपभोगकी वस्तु है; अतः सदा सरल भावसे ही उसकी सँभाल की जा सकती है। इसलिये राजामें क्रूरता और कोमलता दोनों भावोंका सम्मिश्रण होना चाहिये ॥ २२ ॥
यद्यप्यस्य विपत्तिः स्याद् रक्षमाणस्य वै प्रजाः ।
सोऽप्यस्य विपुलो धर्म एवंवृत्ता हि भूमिपाः ॥ २३ ॥
प्रजाकी रक्षा करते हुए राजाके प्राण चले जायें तो भी वह उसके लिये महान् धर्म है। राजाओंके व्यवहार और बर्ताव ऐसे ही होने चाहिये ॥ २३ ॥
एष ते राजधर्माणां लेशः समनुवर्णितः ।
भूयस्ते यत्र संदेहस्तद् ब्रूहि कुरुसत्तम ॥ २४ ॥
कुरुश्रेष्ठ! यह मैंने तुम्हारे सामने राजधर्मोंका लेशमात्र वर्णन किया है। अब तुम्हें जिस बातमें संदेह हो, वह पूछो ॥ २४ ॥
वैशम्पायन उवाच
ततो व्यासश्च भगवान् देवस्थानोऽश्म एव च ।
वासुदेवः कृपश्चैव सात्यकिः संजयस्तथा ॥ २५ ॥
साधु साध्विति संहृष्टाः पुष्यमाणैरिवाननैः ।
अस्तुवंश्च नरव्याघ्रं भीष्मं धर्मभृतां वरम् ॥ २६ ॥
**वैशम्पायनजी कहते हैं—**जनमेजय! भीष्मजीका यह वक्तव्य सुनकर भगवान् व्यास, देवस्थान, अश्म, वसुदेवनन्दन श्रीकृष्ण, कृपाचार्य, सात्यकि और संजय बड़े प्रसन्न हुए और हर्षसे खिले हुए मुखोंद्वारा साधुवाद देते हुए धर्मात्माओंमें श्रेष्ठ पुरुषसिंह भीष्मजीकी भूरि-भूरि प्रशंसा करने लगे ॥ २५-२६ ॥
ततो दीनमना भीष्ममुवाच कुरुसत्तमः ।
नेत्राभ्यामश्रुपूर्णाभ्यां पादौ तस्य शनैःस्पृशन् ॥ २७ ॥
श्व इदानीं स्वसन्देहं प्रक्ष्यामि त्वां पितामह ।
उपैति सविता ह्यस्तं रसमापीय पार्थिवम् ॥ २८ ॥
तत्पश्चात् कुरुश्रेष्ठ युधिष्ठिरने मन-ही-मन दुखी हो दोनों नेत्रोंमें आँसू भरकर धीरेसे भीष्मजीके चरण छुए और कहा—'पितामह! इस समय भगवान् सूर्य अपनी किरणोंद्वारा पृथ्वीके रसका शोषण करके अस्ताचलको जा रहे हैं; इसलिये अब मैं कल आपसे अपना संदेह पूछूँगा' ॥
ततो द्विजातीनभिवाद्य केशवः
कृपश्च ते चैव युधिष्ठिरादयः ।
प्रदक्षिणीकृत्य महानदीसुतं
ततो रथानारुरुहुर्मुदान्विताः ॥ २९ ॥
तदनन्तर ब्राह्मणोंको प्रणाम करके भगवान् श्रीकृष्ण, कृपाचार्य तथा युधिष्ठिर आदिने महानदी गङ्गाके पुत्र भीष्मजीकी परिक्रमा की। फिर वे प्रसन्नतापूर्वक अपने रथोंपर आरूढ़ हो गये ॥ २९ ॥
दृषद्वतीं चाप्यवगाह्य सुव्रताः
कृतोदकार्थाः कृतजप्यमङ्गलाः ।
उपास्य संध्यां विधिवत् परंतपा-
स्ततः पुरं ते विविशुर्गजाह्वयम् ॥ ३० ॥
फिर दृषद्वती नदीमें स्नान करके उत्तम व्रतका पालन करनेवाले वे शत्रुसंतापी वीर विधिपूर्वक संध्या, तर्पण और जप आदि मङ्गलकारी कर्मोंका अनुष्ठान करके वहाँसे हस्तिनापुरमें चले आये ॥ ३० ॥
इति श्रीमहाभारते शान्तिपर्वणि राजधर्मानुशासनपर्वणि
युधिष्ठिरादिस्वस्थानगमनेऽष्टपञ्चाशत्तमोऽध्यायः ॥ ५८ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत शान्तिपर्वके अन्तर्गत राजधर्मानुशासनपर्वमें युधिष्ठिर आदिका
अपने निवासस्थानको प्रस्थानविषयक अट्ठावनवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ५८ ॥