महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व
Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 386, कुल 2450 में से
संदर्भ में पढ़ें'जो उद्योगमें वीर है, वह पुरुष केवल वाग्वीर पुरुषोंपर अपना आधिपत्य जमा लेता
है। वाग्वीर विद्वान् उद्योगवीर पुरुषोंका मनोरञ्जन करते हुए उनकी उपासना करते
हैं।। १५ ।।
उत्थानहीनो राजा हि बुद्धिमानपि नित्यशः।
प्रधर्षणीयः शत्रूणां भुजङ्ग इव निर्विषः।। १६ ।।
'जो राजा उद्योगहीन होता है, वह बुद्धिमान् होनेपर भी विषहीन सर्पके समान सदैव
शत्रुओंके द्वारा परास्त होता रहता है।। १६ ।।
न च शत्रुरवज्ञेयो दुर्बलोऽपि बलीयसा।
अल्पोऽपि हि दहत्यग्निर्विषमल्पं हिनस्ति च।। १७ ।।
'बलवान् पुरुष कभी दुर्बल शत्रुकि भी अवहेलना न करे अर्थात् उसे छोटा समझकर
उसकी ओरसे लापरवाही न दिखावे; क्योंकि आग थोड़ी-सी हो तो भी जला डालती है और
विष कम मात्रामें हो तो भी मार डालता है।। १७ ।।
एकाङ्गेनापि सम्भूतः शत्रुदुर्गमुपाश्रितः।
सर्वं तापयते देशमपि राज्ञः समृद्धिनः।। १८ ।।
'चतुरङ्गिणी सेनाके एक अङ्गसे भी सम्पन्न हुआ शत्रु दुर्गका आश्रय लेकर समृद्धिशाली
राजाके समूचे देशको भी संतप्त कर डालता है' ।। १८ ।।
राज्ञो रहस्यं यद् वाक्यं जयार्थं लोकसंग्रहः।
हृदि यच्चास्य जिह्यं स्यात् कारणेन च यद् भवेत् ।। १९ ।।
यच्चास्य कार्यं वृजिनमार्जवेनैव धारयेत् ।
दम्भनार्थं च लोकस्य धर्मिष्ठामाचरेत् क्रियाम् ।। २० ।।
राजाके लिये जो गोपनीय रहस्यकी बात हो, शत्रुओंपर विजय पानेके लिये वह जो
लोगोंका संग्रह करता हो, विजयके ही उद्देश्यसे उसके हृदयमें जो कार्य छिपा हो अथवा उसे
जो न करने योग्य असत्-कार्य करना हो, वह सब कुछ उसे सरलभावसे ही छिपाये रखना
चाहिये। वह लोगोंमें अपनी प्रतिष्ठा बनाये रखनेके लिये सदा धार्मिक कर्मोंका अनुष्ठान
करे।।
राज्यं हि सुमहत् तन्त्रं धार्यते नाकृतात्मभिः ।
न शक्यं मृदुना वोढुमायास्सथानमुत्तमम् ।। २१ ।।
राज्य एक बहुत बड़ा तन्त्र है। जिन्होंने अपने मनको वशमें नहीं किया है, ऐसे क्रूर-
स्वभाववाले राजा उस विशाल तन्त्रको सँभाल नहीं सकते। इसी प्रकार जो बहुत कोमल
प्रकृतिके होते हैं, वे भी इसका भार वहन नहीं कर सकते। उनके लिये राज्य बड़ा भारी
जंजाल हो जाता है ।। २१ ।।
राज्यं सर्वामिषं नित्यमार्जवेनेह धार्यते ।
तस्मान्मिश्रेण सततं वर्तितव्यं युधिष्ठिर ।। २२ ।।