महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व
Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
इन्द्र और वृत्रासुरके युद्धका वर्णन
एकाशीत्यधिकद्विशततमोऽध्यायः
इन्द्र और वृत्रासुरके युद्धका वर्णन
युधिष्ठिर उवाच
अहो धर्मिष्ठता तात वृत्रस्यामिततेजसः ।
यस्य विज्ञानमतुलं विष्णोर्भक्तिश्च तादृशी ॥ १ ॥
**युधिष्ठिरने पूछा—**दादाजी! अमित तेजस्वी वृत्रासुरकी धर्मनिष्ठा अद्भुत थी। उसका विज्ञान भी अनुपम था और भगवान् विष्णुके प्रति उसकी भक्ति भी वैसी ही उच्चकोटिकी थी ॥ १ ॥
दुर्विज्ञेयं पदं तात विष्णोरमिततेजसः ।
कथं वा राजशार्दूल पदं तु ज्ञातवानसौ ॥ २ ॥
तात! अनन्त तेजस्वी श्रीविष्णुके स्वरूपका ज्ञान तो अत्यन्त कठिन है। नृपश्रेष्ठ! उस वृत्रासुरने उस परमपदका ज्ञान कैसे प्राप्त कर लिया? यह बड़े आश्चर्यकी बात है ॥ २ ॥
भवता कथितं ह्येतच्छ्रद्दधे चाहमच्युत ।
भूयस्तु मे समुत्पन्ना बुद्धिरव्यक्तदर्शनात् ॥ ३ ॥
आपने इस घटनाका वर्णन किया है; इसलिये मैं इसे सत्य मानता और इसपर विश्वास करता हूँ; क्योंकि आप कभी सत्यसे विचलित नहीं होते हैं तथापि यह बात स्पष्टरूपसे मेरी समझमें नहीं आयी है; अतः पुनः मेरी बुद्धिमें प्रश्न उत्पन्न हो गया ॥ ३ ॥
कथं विनिहतो वृत्रः शक्रेण पुरुषर्षभ ।
धार्मिको विष्णुभक्तश्च तत्त्वज्ञश्च पदान्वये ॥ ४ ॥
पुरुषप्रवर! वृत्रासुर धर्मात्मा, भगवान् विष्णुका भक्त और वेदान्तके पदोंका अन्वय करके उनके तात्पर्यको ठीक-ठीक समझनेमें कुशल था तो भी इन्द्रने उसे कैसे मार डाला? ॥ ४ ॥
एतन्मे संशयं ब्रूहि पृच्छते भरतर्षभ ।
वृत्रस्तु राजशार्दूल यथा शक्रेण निर्जितः ॥ ५ ॥
भरतभूषण! नृपश्रेष्ठ! मैं यह बात आपसे पूछता हूँ, आप मेरे इस संशयका समाधान कीजिये। इन्द्रने वृत्रासुरको कैसे परास्त किया? ॥ ५ ॥
यथा चैवाभवद् युद्धं तच्चाचक्ष्व पितामह ।
विस्तरेण महाबाहो परं कौतूहलं हि मे ॥ ६ ॥
महाबाहु पितामह! इन्द्र और वृत्रासुरमें किस प्रकार युद्ध हुआ था, यह विस्सारपूर्वक बताइये; इसे सुननेके लिये मेरे मनमें बड़ी उत्सुकता हो रही है ॥ ६ ॥
भीष्म उवाच
रथेनेन्द्रः प्रयातो वै सार्धं देवगणैः पुरा ।
ददर्शाथाग्रतो वृत्रं धिष्ठितं पर्वतोपमम् ॥ ७ ॥
भीष्मजीने कहा— राजन्! प्राचीन कालकी बात है, इन्द्र रथपर आरूढ़ हो देवताओंको साथ ले वृत्रासुरसे युद्ध करनेके लिये चले। उन्होंने अपने सामने खड़े हुए पर्वतके समान विशालकाय वृत्रको देखा ॥ ७ ॥
योजनानां शतान्यूर्ध्वं पञ्चोच्छ्रितमरिंदम ।
शतानि विस्तरेणाथ त्रीण्येवाभ्यधिकानि वै ॥ ८ ॥
शत्रुदमन नरेश! वह पाँच सौ योजन ऊँचा था और कुछ अधिक तीन सौ योजन उसकी मोटाई थी ॥ ८ ॥
तत् प्रेक्ष्य तादृशं रूपं त्रैलोक्येनापि दुर्जयम् ।
वृत्रस्य देवाः संत्रस्ता न शान्तिमुपलेभिरे ॥ ९ ॥
वृत्रासुरका वह वैसा रूप, जो तीनों लोकोंके लिये भी दुर्जय था, देखकर देवतालोग डर गये। उन्हें शान्ति नहीं मिलती थी ॥ ९ ॥
शक्रस्य तु तदा राजन्नूरुस्तम्भो व्यजायत ।
भयाद् वृत्रस्य सहसा दृष्ट्वा तद्रूपमुत्तमम् ॥ १० ॥
राजन्! उस समय वृत्रासुरका वह उत्तम एवं विशाल रूप देखकर सहसा भयके मारे इन्द्रकी दोनों जाँघें अकड़ गयीं ॥ १० ॥
ततो नादः समभवद् वादित्राणां च निःस्वनः ।
देवासुराणां सर्वेषां तस्मिन् युद्धे ह्युपस्थिते ॥ ११ ॥
तदनन्तर वह युद्ध उपस्थित होनेपर समस्त देवताओं और असुरोंके दलोंमें रणवाद्योंका भीषण नाद होने लगा ॥ ११ ॥
अथ वृत्रस्य कौरव्य दृष्ट्वा शक्रमवस्थितम् ।
न संभ्रमो न भीः काचिदास्था वा समजायत ॥ १२ ॥
कुरुनन्दन! इन्द्रको खड़ा देखकर भी वृत्रासुरके मनमें न तो घबराहट हुई, न कोई भय हुआ और न इन्द्रके प्रति उसकी कोई युद्धविषयक चेष्टा ही हुई ॥ १२ ॥
ततः समभवद् युद्धं त्रैलोक्यस्य भयंकरम् ।
शक्रस्य च सुरेन्द्रस्य वृत्रस्य च महात्मनः ॥ १३ ॥
फिर तो देवराज इन्द्र और महामनस्वी वृत्रासुरमें भारी युद्ध छिड़ गया, जो तीनों लोकोंके मनमें भय उत्पन्न करनेवाला था ॥ १३ ॥
असिभिः पट्टिशैः शूलैः शक्तितोमुद्गरैः ।
शिलाभिर्विविधाभिश्च कार्मुकैश्च महास्वनैः ॥ १४ ॥
शस्त्रैश्च विविधैर्दिव्यैः पावकोल्काभिरेव च ।
देवासुरैस्ततः सैन्यैः सर्वमासीत् समाकुलम् ॥ १५ ॥
उस समय तलवार, पट्टिश, त्रिशूल, शक्ति, तोमर, मुद्गर, नाना प्रकारकी शिला, भयानक टंकार करनेवाले धनुष, अनेक प्रकारके दिव्य अस्त्र-शस्त्र तथा आगकी ज्वालाओंसे एवं देवताओं और असुरोंकी सेनाओंसे यह सारा आकाश व्याप्त हो गया ॥ १४-१५ ॥
पितामहपुरोगाश्च सर्वे देवगणास्तथा ।
ऋषयश्च महाभागास्तद् युद्धं द्रष्टुमागमन् ॥ १६ ॥
विमानाग्र्यैर्महाराज सिद्धाश्च भरतर्षभ ।
गन्धर्वाश्च विमानाग्र्यैरप्सरोभिः समागमन् ॥ १७ ॥
भरतभूषण महाराज! ब्रह्मा आदि समस्त देवता, महाभाग ऋषि, सिद्धगण तथा अप्सराओंसहित गन्धर्व—ये सबके सब श्रेष्ठ विमानोंपर आरूढ़ हो उस अद्भुत युद्धका दृश्य देखनेके लिये वहाँ आ गये थे ॥ १६-१७ ॥
ततोऽन्तरिक्षमावृत्य वृत्रो धर्मभृतां वरः ।
अश्मवर्षेण देवेन्द्रं समाकिरदतिद्रुतम् ॥ १८ ॥
तब धर्मात्माओंमें श्रेष्ठ वृत्रासुरने आकाशको घेरकर बड़ी उतावलीके साथ देवराज इन्द्रपर पत्थरोंकी वर्षा आरम्भ कर दी ॥ १८ ॥
ततो देवगणाः क्रुद्धाः सर्वतः शरवृष्टिभिः ।
अश्मवर्षमपोहन्त वृत्रप्रेरितमाहवे ॥ १९ ॥
यह देख देवगण कुपित हो उठे। उन्होंने युद्धमें सब ओरसे बाणोंकी वर्षा करके वृत्रासुरके चलाये हुए पत्थरोंकी वर्षाको नष्ट कर दिया ॥ १९ ॥
वृत्रस्तु कुरुशार्दूल महामायो महाबलः ।
मोहयामास देवेन्द्रं मायायुद्धेन सर्वशः ॥ २० ॥
तस्य वृत्रार्दितस्याथ मोह आसीच्छतक्रतोः ।
रथन्तरेण तं तत्र वसिष्ठः समबोधयत् ॥ २१ ॥
कुरुश्रेष्ठ! महामायावी महाबली वृत्रासुरने सब ओरसे मायामय युद्ध छेड़कर देवराज इन्द्रको मोहमें डाल दिया। वृत्रासुरसे पीड़ित हुए इन्द्रपर मोह छा गया। तब वसिष्ठजीने रथन्तर सामद्वारा वहाँ इन्द्रको सचेत किया ॥ २०-२१ ॥
वसिष्ठ उवाच
देवश्रेष्ठोऽसि देवेन्द्र दैत्यासुरनिबर्हण ।
त्रैलोक्यबलसंयुक्तः कस्माच्छक्र विषीदसि ॥ २२ ॥
वसिष्ठजीने कहा—देवेन्द्र! तुम सब देवताओंमें श्रेष्ठ हो। दैत्यों तथा असुरोंका संहार करनेवाले शक्र! तुम तो त्रिलोकीके बलसे सम्पन्न हो; फिर इस प्रकार विषादमें क्यों पड़े
हो? ॥ २२ ॥
एष ब्रह्मा च विष्णुश्च शिवश्चैव जगत्पतिः ।
सोमश्च भगवान् देवः सर्वे च परमर्षयः ॥ २३ ॥
(समुद्विग्नं समीक्ष्य त्वां स्वस्तीत्यूचुर्जयाय ते ।)
ये जगदीश्वर ब्रह्मा, विष्णु और शिव तथा भगवान् सोमदेव और समस्त महर्षि तुम्हें उद्विग्न देखकर तुम्हारी विजयके लिये स्वस्तिवाचन कर रहे हैं ॥ २३ ॥
मा कार्षीः कश्मलं शक्र कश्चिद्देवेतरो यथा ।
आर्यां युद्धे मतिं कृत्वा जहि शत्रून् सुराधिप ॥ २४ ॥
इन्द्र! किसी साधारण मनुष्यके समान तुम कायरता न प्रकट करो। सुरेश्वर! युद्धके लिये श्रेष्ठ बुद्धिका सहारा लेकर अपने शत्रुओंका संहार करो ॥ २४ ॥
एष लोकगुरुस्त्र्यक्षः सर्वलोकनमस्कृतः ।
निरीक्षते त्वां भगवांस्त्यज मोहं सुराधिप ॥ २५ ॥
देवराज! ये सर्वलोकवन्दित लोकगुरु भगवान् त्रिलोचन शिव तुम्हारी ओर कृपापूर्ण दृष्टिसे देख रहे हैं। तुम मोहको त्याग दो ॥ २५ ॥
एते ब्रह्मर्षयश्चैव बृहस्पतिपुरोगमाः ।
स्तवेन शक्र दिव्येन स्तुवन्ति त्वां जयाय वै ॥ २६ ॥
शक्र! ये बृहस्पति आदि ब्रह्मर्षि तुम्हारी विजयके लिये दिव्य स्तोत्रद्वारा स्तुति कर रहे हैं ॥ २६ ॥
भीष्म उवाच
एवं सम्बोध्यमानस्य वसिष्ठेन महात्मना ।
अतीव वासवस्यासीद् बलमुत्तमतेजसः ॥ २७ ॥
भीष्मजी कहते हैं—राजन्! महात्मा वसिष्ठके द्वारा इस प्रकार सचेत किये जानेपर महातेजस्वी इन्द्रका बल बहुत बढ़ गया ॥ २७ ॥
ततो बुद्धिमुपागम्य भगवान् पाकशासनः ।
योगेन महता युक्तस्तां मायां व्यपकर्षत ॥ २८ ॥
तब भगवान् पाकशासनने उत्तम बुद्धिका आश्रय ले महान् योगसे युक्त हो उस मायाको नष्ट कर दिया ॥ २८ ॥
ततोऽङ्गिरःसुतः श्रीमांस्ते चैव सुमहर्षयः ।
दृष्ट्वा वृत्रस्य विक्रान्तमुपागम्य महेश्वरम् ॥ २९ ॥
ऊचुर्वृत्रविनाशार्थं लोकानां हितकाम्यया ।
तदनन्तर अंगिराके पुत्र श्रीमान् बृहस्पति तथा बड़े-बड़े महर्षियोंने जब वृत्रासुरका पराक्रम देखा, तब महादेवजीके पास आकर लोकहितकी कामनासे वृत्रासुरके विनाशके लिये उनसे निवेदन किया ।। २९ १/२ ।।
ततो भगवतस्तेजो ज्वरो भूत्वा जगत्पतेः ।। ३० ।।
समाविशत् तदा रौद्रो वृत्रं लोकपतिं तदा ।
तब जगदीश्वर भगवान् शिवका तेज रौद्र ज्वर होकर लोकेश्वर वृत्रके शरीरमें समा गया ।। ३० १/२ ।।
विष्णुश्च भगवान् देवः सर्वलोकाभिपूजितः ।। ३१ ।।
ऐन्द्रं समाविशद् वज्रं लोकसंरक्षणे रतः ।
फिर लोकरक्षापरायण सर्वलोकपूजित देवेश्वर भगवान् विष्णुने भी इन्द्रके वज्रमें प्रवेश किया ।। ३१ १/२ ।।
ततो बृहस्पतिर्धीमानुपागम्य शतक्रतुम् ।
वसिष्ठश्च महातेजाः सर्वे च परमर्षयः ।। ३२ ।।
ते समासाद्य वरदं वासवं लोकपूजितम् ।
ऊचुरेकाग्रमनसो जहि वृत्रमिति प्रभो ।। ३३ ।।
तत्पश्चात् बुद्धिमान् बृहस्पति, महातेस्वी वसिष्ठ तथा सम्पूर्ण महर्षि वरदायक, लोकपूजित शतक्रतु इन्द्रके पास जाकर एकाग्रचित्त हो इस प्रकार बोले—‘प्रभो! वृत्रासुरका वध करो’ ।। ३२-३३ ।।
महेश्वर उवाच
एष वृत्रो महान् शक्र बलेन महता वृतः ।
विश्वात्मा सर्वगश्चैव बहुमायश्च विश्रुतः ।। ३४ ।।
**महेश्वर बोले—**इन्द्र! यह महान् वृत्रासुर बड़ी भारी सेनासे घिरा हुआ तुम्हारे सामने खड़ा है। ज्ञाननिष्ठ होनेके कारण यह सम्पूर्ण विश्वका आत्मा है। इसमें सर्वत्र गमन करनेकी शक्ति है। यह अनेक प्रकारकी मायाओंका सुविख्यात ज्ञाता भी है ।। ३४ ।।
तदेनमसुरश्रेष्ठं त्रैलोक्येनापि दुर्जयम् ।
जहि त्वं योगमास्थाय मावमंस्थाः सुरेश्वर ।। ३५ ।।
सुरेश्वर! यह श्रेष्ठ असुर तीनों लोकोंके लिये भी दुर्जय है। तुम योगका आश्रय लेकर इसका वध करो। इसकी अवहेलना न करो ।। ३५ ।।
अनेन हि तपस्तप्तं बलार्थममराधिप ।
षष्टिं वर्षसहस्राणि ब्रह्मा चास्मै वरं ददौ ।। ३६ ।।
अमरेश्वर! इस वृत्रासुरने बलकी प्राप्तिके लिये ही साठ हजार वर्षोंतक तप किया था और तब ब्रह्माजीने इसे मनोवाञ्छित वर दिया था ।। ३६ ।।
महत्त्वं योगिनां चैव महामायत्वमेव च ।
महाबलत्वं च तथा तेजश्चाग्र्यं सुरेश्वर ।। ३७ ।।
सुरेन्द्र! उन्होंने इसे योगियोंकी महिमा, महा-मायावीपन, महान् बल-पराक्रम तथा सर्वश्रेष्ठ तेज प्रदान किया है ।। ३७ ।।
एतत् त्वां मामकं तेजः समाविशति वासव ।
व्यग्रमेनं त्वमप्येनं वज्रेण जहि दानवम् ।। ३८ ।।
वासव! लो, यह मेरा तेज तुम्हारे शरीरमें प्रवेश करता है। इस समय दानव वृत्र ज्वरके कारण बहुत व्यग्र हो रहा है; इसी अवस्थामें तुम वज्रसे इसे मार डालो ।। ३८ ।।
शक्र उवाच
भगवंस्त्वत्प्रसादेन दितिजं सुदुरासदम् ।
वज्रेण निहनिष्यामि पश्यतस्ते सुरर्षभ ।। ३९ ।।
इन्द्रने कहा—भगवन्! सुरश्रेष्ठ! आपकी कृपासे इस दुर्धर्ष दैत्यको मैं आपके देखते-देखते वज्रसे मार डालूँगा ।।
भीष्म उवाच
आविश्यमाने दैत्ये तु ज्वरेणाथ महासुरे ।
देवतानामृषीणां च हर्षान्नादो महानभूत् ।। ४० ।।
भीष्मजी कहते हैं—राजन्! जब महादैत्य वृत्रासुरके शरीरमें ज्वरने प्रवेश किया, तब देवता और ऋषियोंका महान् हर्षनाद वहाँ गूँज उठा ।। ४० ।।
ततो दुन्दुभयश्चैव शङ्खाश्च सुमहास्वनाः ।
मुरजा डिण्डिमाश्चैव प्रावाद्यन्त सहस्रशः ।। ४१ ।।
फिर तो दुन्दुभियाँ, जोर-जोरसे बजनेवाले शंख, ढोल और नगाड़े आदि सहस्रों बाजे बजाये जाने लगे ।।
असुराणां तु सर्वेषां स्मृतिलोपो महानभूत् ।
मायानाशश्च बलवान् क्षणेन समपद्यत ।। ४२ ।।
समस्त असुरोंकी स्मरण-शक्तिका बड़ा भारी लोप हो गया। क्षणभरमें उनकी सारी मायाओंका पूर्णरूपसे विनाश हो गया ।। ४२ ।।
तथाविष्टमथो ज्ञात्वा ऋषयो देवतास्तथा ।
स्तुवन्तः शक्रमीशानं तथा प्राचोदयन्नपि ।। ४३ ।।
इस प्रकार वृत्रासुरमें महादेवजीके ज्वरका आवेश हुआ जान देवता और ऋषि देवेश्वर इन्द्रकी स्तुति करते हुए उन्हें वृत्रवधके लिये प्रेरणा देने लगे ।। ४३ ।।
रथस्थस्य हि शक्रस्य युद्धकाले महात्मनः ।
ऋषिभिः स्तूयमानस्य रूपमासीत् सुदुर्दर्शम् ।। ४४ ।।
युद्धके समय रथपर बैठकर ऋषियोंके द्वारा अपनी स्तुति सुनते हुए महामना इन्द्रका रूप ऐसा तेजस्वी प्रतीत होता था कि उसकी ओर देखना भी अत्यन्त कठिन जान पड़ता था ॥ ४४ ॥
इति श्रीमहाभारते शान्तिपर्वणि मोक्षधर्मपर्वणि वृत्रवधे
एकाशीत्यधिकद्विशततमोऽध्यायः ॥ २८१ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत शान्तिपर्वके अन्तर्गत मोक्षधर्मपर्वमें वृत्रासुरका वधविषयक दो सौ इक्यासीवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ २८१ ॥
(दाक्षिणात्य अधिक पाठका १/२ श्लोक मिलाकर कुछ ४४ १/२ श्लोक हैं)