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सर्वकोश
महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,450 पृष्ठ

पृष्ठ 1823, कुल 2450 में से

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पृष्ठ 1823

हो? ॥ २२ ॥
एष ब्रह्मा च विष्णुश्च शिवश्चैव जगत्पतिः ।
सोमश्च भगवान् देवः सर्वे च परमर्षयः ॥ २३ ॥
(समुद्विग्नं समीक्ष्य त्वां स्वस्तीत्यूचुर्जयाय ते ।)
ये जगदीश्वर ब्रह्मा, विष्णु और शिव तथा भगवान् सोमदेव और समस्त महर्षि तुम्हें उद्विग्न देखकर तुम्हारी विजयके लिये स्वस्तिवाचन कर रहे हैं ॥ २३ ॥
मा कार्षीः कश्मलं शक्र कश्चिद्देवेतरो यथा ।
आर्यां युद्धे मतिं कृत्वा जहि शत्रून् सुराधिप ॥ २४ ॥
इन्द्र! किसी साधारण मनुष्यके समान तुम कायरता न प्रकट करो। सुरेश्वर! युद्धके लिये श्रेष्ठ बुद्धिका सहारा लेकर अपने शत्रुओंका संहार करो ॥ २४ ॥
एष लोकगुरुस्त्र्यक्षः सर्वलोकनमस्कृतः ।
निरीक्षते त्वां भगवांस्त्यज मोहं सुराधिप ॥ २५ ॥
देवराज! ये सर्वलोकवन्दित लोकगुरु भगवान् त्रिलोचन शिव तुम्हारी ओर कृपापूर्ण दृष्टिसे देख रहे हैं। तुम मोहको त्याग दो ॥ २५ ॥
एते ब्रह्मर्षयश्चैव बृहस्पतिपुरोगमाः ।
स्तवेन शक्र दिव्येन स्तुवन्ति त्वां जयाय वै ॥ २६ ॥
शक्र! ये बृहस्पति आदि ब्रह्मर्षि तुम्हारी विजयके लिये दिव्य स्तोत्रद्वारा स्तुति कर रहे हैं ॥ २६ ॥

भीष्म उवाच
एवं सम्बोध्यमानस्य वसिष्ठेन महात्मना ।
अतीव वासवस्यासीद् बलमुत्तमतेजसः ॥ २७ ॥
भीष्मजी कहते हैं—राजन्! महात्मा वसिष्ठके द्वारा इस प्रकार सचेत किये जानेपर महातेजस्वी इन्द्रका बल बहुत बढ़ गया ॥ २७ ॥
ततो बुद्धिमुपागम्य भगवान् पाकशासनः ।
योगेन महता युक्तस्तां मायां व्यपकर्षत ॥ २८ ॥
तब भगवान् पाकशासनने उत्तम बुद्धिका आश्रय ले महान् योगसे युक्त हो उस मायाको नष्ट कर दिया ॥ २८ ॥
ततोऽङ्गिरःसुतः श्रीमांस्ते चैव सुमहर्षयः ।
दृष्ट्वा वृत्रस्य विक्रान्तमुपागम्य महेश्वरम् ॥ २९ ॥
ऊचुर्वृत्रविनाशार्थं लोकानां हितकाम्यया ।